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आंख की किरकिरी - रवीन्द्रनाथ टैगोर

12:02 PM Feb 12, 2024 IST | Reena Yadav
आंख की किरकिरी   रवीन्द्रनाथ टैगोर
aankh ki kirkiri by ravindranath tagore
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रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई "आंख की किरकिरी" एक उपन्यास है जो जीवन के प्रति संवेदनशीलता और सांस्कृतिक उत्थान की महत्वपूर्ण कथा प्रस्तुत करता है।

कथा का मुख्य पात्र निलाद्रि है, जो एक गरीब गांव में अपने परिवार के साथ रहता है। निलाद्रि की विशेषता यह है कि उसकी आंखें एकदम स्पष्ट नहीं हैं, और वह उसे देखने में कठिनाई महसूस करता है। फिर भी, उसके मन में एक अद्वितीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता होती है जिसे वह अपने अंदर धारण करता है।

निलाद्रि की जीवन की कथाएँ उसकी व्यक्तित्व और समाज में उसके स्थान को दर्शाती हैं। वह अपने अद्भुत भावनाओं, समझदारी, और साहस से जीतता है।

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उपन्यास में, निलाद्रि के चारों ओर का संसार उसके सामने उजागर होता है। वह देखता है कि कैसे विभिन्न व्यक्तियों और समुदायों में अंतर का बयान किया जाता है, और कैसे उनकी समझदारी और निष्ठा उन्हें सफलता की ओर ले जाती है।

निलाद्रि का प्रेरणादायक चरित्र और उसकी जीवन दृश्यों में उन्होंने साहित्य के माध्यम से व्यक्तित्व के महत्व को प्रस्तुत किया है। उनके कठिनाइयों और संघर्षों के बावजूद, वह अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध रहता है और उसकी आत्मा को निर्मलता का मार्ग चुनता है।

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"आंख की किरकिरी" एक उत्कृष्ट उपन्यास है जो मानवता, समाज, और साहित्य के महत्वपूर्ण मुद्दों को बताता है। रबीन्द्रनाथ टैगोर की यह कहानी हमें समझदारी, सहानुभूति, और सहयोग के महत्व को समझाती है और हमें जीवन में सकारात्मकता और संघर्ष के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती है।

रवींद्रनाथ टैगोर, भारतीय साहित्य के एक अग्रणी और नोबेल पुरस्कार विजेता कवि, लेखक, और समाजसेवी थे। उनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ था। उन्होंने अपने उत्कृष्ट साहित्य, संगीत, कला, और दार्शनिक विचारों के लिए विश्वभर में प्रसिद्धता प्राप्त की।

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टैगोर की काव्य और कविताएं, जैसे "गीतांजलि", "गोरा", और "चित्रा", उनकी अद्वितीय शैली, संवेदनशीलता, और साहित्यिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके लेखन में संतुलन, सरलता, और गहराई थी, जो उन्हें अन्य कवियों से अलग बनाता है।

टैगोर ने भारतीय समाज को समर्पित और आधुनिक शिक्षा के लिए अपनी अद्वितीय योगदान भी दिया। उनका शिक्षा और साहित्य में दृष्टिकोण व्यापक था, जो विभिन्न जातियों, धर्मों, और भाषाओं के बीच सामंजस्य और समरसता को प्रोत्साहित करता था।

उन्होंने समाज में स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा दिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वाधीनता, और सम्मान के महत्व को भी बढ़ावा दिया। टैगोर ने 7 अगस्त 1941 को अपने आदर्शों और कला के प्रशंसकों के बीच विचार गहनता में समाप्त किया। उनकी योगदान को भारतीय समाज और साहित्य की दृष्टि से अमर माना जाता है।

विनोद की मां हरिमती महेन्द्र की मां राजलक्ष्मी के पास जाकर धरना देने लगी। दोनों एक ही गांव की थीं, छुटपन में साथ खेली थीं।

राजलक्ष्मी महेन्द्र के पीछे पड़ गई-“बेटा महेन्द्र, इस गरीब की बिटिया का उद्धार करना पड़ेगा। सुना है, लड़की बड़ी सुन्दर है, फिर लिखी-पढ़ी भी है। उसकी रुचियां भी तुम लोगों जैसी हैं।

महेन्द्र बोला-“आजकल के तो सभी लड़के मुझ जैसे ही होते हैं।”

राजलक्ष्मी, “तुझसे शादी की बात करना ही मुश्किल है।”

महेन्द्र “मां, इसे छोड़कर दुनिया में क्या और कोई बात नहीं है।”

महेन्द्र के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे। मां से महेन्द्र का बर्ताव साधारण लोगों जैसा न था। उम्र लगभग बाईस की हुई, एम.ए. पास करके डाक्टरी पढ़ना शुरू किया है, मगर मां से उसकी रोज-रोज की जिद का अंत नहीं। कंगारू के बच्चे की तरह माता के गर्भ से बाहर आकर भी उसके बाहरी थैली में टंगे रहने की उसे आदत हो गई है। मां के बिना आहार-विहार, आराम-विराम कुछ भी नहीं हो पाता।

अब की बार जब मां विनोदिनी के लिए बुरी तरह उसके पीछे पड़ गई तो महेन्द्र बोला. “अच्छा, एक बार लड़की को देख लेने दो!”

लड़की देखने जाने का दिन आया तो कहा, “देखने से क्या होगा? शादी तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए कर रहा हूं। फिर मेरे अच्छा-बुरा देखने का कोई अर्थ नहीं है।”

महेन्द्र के कहने में पर्याप्त गुस्सा था, मगर मां ने सोचा, “शुभ-दृष्टि”1 के समय जब मेरी पसन्द और उसकी पसन्द एक हो जाएगी, तो उसका स्वर भी नर्म हो जाएगा।”

राजलक्ष्मी ने बेफिक्र होकर विवाह का दिन तय किया। दिन जितना ही करीब आने लगा, महेन्द्र का मन उतना ही बेचैन हो उठा। मात्र दो-चार दिन पहले वह कह बैठा-“नहीं मां, यह मुझसे हर्गिज न होगा।”

छुटपन से महेन्द्र को हर तरह का सहारा मिलता रहा है। इसलिए उसकी इच्छा सर्वोपरि है। दूसरे का दबाव उसे बर्दाश्त नहीं। अपनी स्वीकृति और दूसरों के आग्रह ने उसे बेबस कर दिया है, इसीलिए विवाह के प्रस्ताव के प्रति नाहक ही उसकी वितृष्णा बढ़ गई और विवाह का दिन नजदीक आ गया तो उसने एकबारगी ‘नाही’ कर दी।

महेन्द्र का जिगरी दोस्त था बिहारी; वह महेन्द्र को ‘भैया’ और उसकी मां को ‘मां’ कहा करता था। मां उसे स्टीमर के पीछे जुड़ी डोंगी जैसा भारवाही सामान मानती थीं और वैसी ही उस पर ममता भी रखती थीं। वे बिहारी से बोली-“बेटे, यह तो अब तुम्हें ही करना है, नहीं तो उस बेचारी लड़की….”

बिहारी ने हाथ जोड़कर कहा-“मां, यह मुझसे न होगा। अच्छी न लगी कहकर महेन्द्र जो मिठाई छोड़ देता है वह मैंने बहुत खाई, मगर लड़की के बारे में ऐसा नहीं हो सकता।”

राजलक्ष्मी ने सोचा, ‘भला बिहारी विवाह करेगा! उसे तो बस एक महेन्द्र की पड़ी है, बहू लाने का खयाल भी नहीं आता उसके मन में।’

यह सोचकर बिहारी के प्रति उनकी कृपा-मिश्रित ममता कुछ और बढ़ गई।

विनोदिनी के पिता कुछ खास धनी न थे, परन्तु अपनी इकलौती बेटी को मिशनरी मेम रखकर बड़े जतन से पढ़ाया-लिखाया। इतना ही नहीं घर के काम में भी चाक चौबंद किया। वे गुजर गए और बेचारी विधवा मां बेटी के विवाह के लिए परेशान हो गई। पास में रुपया-पैसा नहीं, ऊपर से लड़की की उम्र भी ज्यादा।

आखिर राजलक्ष्मी ने अपने मौके में गांव के एक रिश्ते के भतीजे से विनोदिनी का विवाह करा दिया।

कुछ ही दिनों में वह विधवा हो गई। महेन्द्र ने हंसकर कहा, “गनीमत थी कि शादी नहीं की।”

कोई तीन साल बाद मां-बेटे में फिर एक बात हो रही थी।

“बेटा, लोग तो मेरी ही शिकायत करते हैं।”

“क्यों भला, तुमने लोगों का ऐसा क्या बिगाड़ा है?”

“बहू के आने से बेटा पराया न हो जाए, मैं इसी डर से तेरी शादी नहीं करती-लोग यही कहा करते हैं।”

महेन्द्र ने कहा, “डर तो होना ही चाहिए। मैं मां होता, तो जीते जी लड़के का विवाह न करता। लोगों की शिकायतें सुन लेता।”

मां हंसकर बोली-“सुनो, जरा इसकी बातें सुन लो।”

महेन्द्र बोला-“बहू तो आकर लड़के को अपना बना ही लेती है। फिर इतना कष्ट उठाने वाली मां अपने-आप दूर हो जाती है। तुम्हें यह चाहे जैसा लगे मुझे तो ठीक नहीं लगता।”

राजलक्ष्मी ने मन-ही-मन गद्गद् होकर हाल ही आई अपनी विधवा देवरानी से कहा, “सुनो मंझली, जरा महेन्द्र की सुनो! कहीं बहू आकर मां पर हावी न हो जाए, इसी डर से वह विवाह नहीं करना चाहता। ऐसी बात कभी सुनी है तुमने?”

चाची बोली, “यह तुम्हारी ज्यादती है बेटे! जब की जो बात हो, वही अच्छी लगती है। मां का दामन छोड़कर अब घर-गृहस्थी बसाने का समय आ गया है। अब नादानी अच्छी नहीं लगती उल्टे शर्म आती है।”

राजलक्ष्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी। इस सिलसिले में उन्होंने जो कुछ कहा, वह जैसा हो मगर शहर भागा तो नहीं था। बोली “मेरा बेटा अगर और लड़कों की अपेक्षा अपनी मां को ज्यादा स्नेह करता है, तो तुम्हें शर्म क्यों लगती है, मंझली बहू? कोख का लड़का होता तो समझ में आता।”

राजलक्ष्मी को लगा, ‘निपूती बेटे के सौभाग्य वाली से ईर्ष्या कर रही है।’

मंझली बहू ने कहा-“तुमने बहू लाने की चर्चा चलाई। इसीलिए यह बात निकल गई, वर्ना मुझे क्या हक है?”

राजलक्ष्मी बोलीं-“मेरा बेटा अगर विवाह नहीं करता, तो तुम्हारी छाती क्यों फटती है! ठीक तो है, लड़के की जैसे आज तक देख-भाल करती आई हूं, आइन्दा भी कर लूंगी-इसके लिए और किसी की मदद की जरूरत न होगी।”

मंझली बहू आंसू बहाती चुपचाप चली गई। महेन्द्र को मन-ही-मन इससे चोट पहुंची। कॉलेज से कुछ पहले ही लौटकर वह अपनी चाची के कमरे में दाखिल हुआ।

वह समझ रहा था कि चाची ने जो कुछ कहा था, उसमें सिवाय स्नेह के और कुछ न था। और उसे यह भी पता था कि चाची की एक भानजी है। जिसके माता-पिता नहीं हैं। वे चाहती हैं कि महेन्द्र से उसका ब्याह हो जाए। हालांकि शादी करना उसे पसंद न था। फिर भी चाची की यह आंतरिक इच्छा उसे स्वाभाविक और करुण लगती है। उसे मालूम था कि उनकी कोई संतान नहीं है।

महेन्द्र कमरे में पहुंचा, तो दिन ज्यादा नहीं रह गया था। चाची अन्नपूर्णा खिड़की पर माथा टिकाए उदास बैठी थीं। बगल के कमरे में खाना ढका रखा था। शायद उन्होंने खाया नहीं।

बहुत थोड़े में ही महेन्द्र की आंखें भर आतीं। चाची को देखकर उसकी आंखें छल-छला उठीं। करीब जाकर स्निग्ध स्वर से बोला- “चाची!”

अन्नपूर्णा ने हंसने की कोशिश की। कहा, “आ बेटे, बैठ!”

महेन्द्र बोला-“भूख बड़ी जोर से लगी है चाची, प्रसाद पाना चाहता हूं।”

अन्नपूर्णा उसकी चालाकी ताड़ गई और अपने उमड़ते आंसुओं को मुश्किल से जब्त करके उसने खुद खाया और उसे खिलाया।

महेन्द्र का मन भीगा हुआ था। चाची को दिलासा देने के विचार से वह अचानक बोल उठा, “अच्छा चाची, तुमने अपनी भानजी की बात बताई थी, एक बार दिखा सकती हो?”

कहकर महेन्द्र डर गया।

अन्नपूर्णा हंसकर बोलीं-“क्यों? शादी के लड्डू फूट रहे हैं बेटा!”

महेन्द्र झटपट बोल उठा-“नहीं-नहीं, अपने लिए नहीं, मैंने बिहारी को राजी किया है। लड़की देखने का कोई दिन तय कर दो!”

अन्नपूर्णा बोली-“अहा, उस बेचारी का ऐसा भाग्य कहां? भला उसे बिहारी जैसा लड़का नसीब हो सकता है!”

महेन्द्र चाची के कमरे से निकला कि दरवाजे पर मां से मुलाकात हो गई। राजलक्ष्मी ने पूछा, “क्यों रे, क्या राय-मशविरा कर रहा था?”

महेन्द्र बोला-“राय-मशविरा नहीं, पान लेने गया था।”

मां ने कहा-“तेरा पान तो मेरे कमरे में रखा है।”

महेन्द्र ने कुछ नहीं कहा। चला गया।

राजलक्ष्मी अन्दर गई और अन्नपूर्णा की रुलाई से सूजी आंखें देखकर लमहेभर में बहुत-सोच लिया। छूटते ही फुफकार छोड़ी-“क्यों मंझली बहू, महेन्द्र के कान भर रही थी, है न?”

और बिना कुछ सुने तत्काल तेजी से निकल गई।

कन्या देखने की बात महेन्द्र ने की जरूर मगर वह भूल गया फिर भी अन्नपूर्णा नहीं भूली। उन्होंने लड़की के अभिभावक, उसके बड़े चाचा को जल्दी में श्याम बाजार पत्र भेजा और एक दिन तय कर लिया।

महेन्द्र ने जब सुना कि देखने का दिन पक्का हो गया है तो बोला-“चाची, इतनी जल्दी क्यों की! बिहारी से तो मैंने अभी तक जिक्र नहीं किया।”

अन्नपूर्णा बोलीं-“ऐसा भी होता है भला! अब अगर तुम लोग न जाओ तो वे क्या सोचेंगे?”

महेन्द्र ने बिहारी को बुलाकर सारी बातें बताई कहा-“चलो तो सही लड़की न जंची, तो तुम्हें मजबूर नहीं किया जाएगा।”

बिहारी बोला-“यह मैं नहीं कह सकता। चाची की भानजी को देखने जाना है। देखकर मेरे मुंह से यह बात हर्गिज न निकल सकेगी कि लड़की मुझे पसन्द नहीं।”

महेन्द्र ने कहा-“फिर तो ठीक ही है।”

बिहारी बोला-“लेकिन तुम्हारी तरफ से यह ज्यादती है, महेन्द्र भैया! खुद तो हल्के हो जाएं और दूसरे के कंधे पर बोझ रख दें, यह ठीक नहीं। अब चाची का जी दुखाना मेरे लिए बहुत कठिन है।”

महेन्द्र कुछ शर्मिन्दा और नाराज होकर बोला-“आखिर इरादा क्या है तुम्हारा?”

बिहारी बोला-“मेरे नाम पर जब तुमने उन्हें उम्मीद दिलाई है तो मैं विवाह करूंगा। यह देखने जाने का ढोंग बेकार है।”

बिहारी अन्नपूर्णा की देवी की भांति भक्ति करता था। आखिर अन्नपूर्णा ने खुद बिहारी को बुलवा कर कहा-“ऐसा भी कहीं होता है, बेटे! लड़की देखे बिना ही विवाह करोगे। यह हर्गिज न होगा। लड़की पसंद न आए तो तुम हर्गिज ‘हां’ नहीं करोगे। समझे। तुम्हें मेरी कसम…!”

जाने के दिन कालेज से लौटकर महेन्द्र ने मां से कहा-“जरा मेरा वह रेशमी कुरता और ढाका वाली धोती निकाल दो!”

मां ने पूछा-“क्यों, कहां जाना है?”

महेन्द्र बोला-“काम है, तुम ला दो, फिर बताऊंगा।”

महेन्द्र थोड़ा संवरे बिना न रह सका। दूसरे के लिए ही क्यों न हो, लड़की का मसला जवानी में सभी से थोड़ा-संवार करा ही लेता है।

दोनों दोस्त लड़की देखने निकल पड़े।

लड़की के बड़े चाचा अनुकूल बाबू ने अपनी कमाई से अपना बाग वाला तिमंजिला मकान मुहल्ले में सबसे ऊंचा बना रखा है।

गरीब भाई की मां-बाप-विहीना बेटी को उन्होंने अपने ही यहां रखा है। उसकी मौसी अन्नपूर्णा ने कहा था, मेरे पास रहने दो। इससे खर्च की कमी जरूर होती, लेकिन गौरव की कमी के डर से अनुकूल राजी न हुए। यहां तक कि मुलाकात के लिए भी कभी उसे मौसी के यहां नहीं जाने देते थे। अपनी मर्यादा के बारे में इतने ही सख्त थे वे।

लड़की के विवाह की चिंता का समय आया। लेकिन इन दिनों विवाह के विषय में ‘यादृशी भावना यस्य सिद्धर्भवति तादृशी’ वाली बात लागू नहीं होती। चिंता के साथ-साथ लागत भी लगती। परन्तु दहेज की बात उठते ही अनुकूल कहते, मेरी भी तो अपनी लड़की है, अकेले मुझसे कितना करते बनेगा। इसी तरह दिन निकलते जा रहे थे। ऐसे में बन-संवर कर खुशबू बिखेरते हुए रंग-भूमि में अपने दोस्त के साथ महेन्द्र ने प्रवेश किया।

चैत का महीना। सूरज डूब रहा था। दुमंजिले का दक्षिणी बरामदा चिकने चीनी टाइलों का बना, उसी के एक ओर दोनों मेहमानों के लिए फल-फूल, मिठाई से भरी चांदी की तश्तरियां रखी गईं। बर्फ के पानी-भरे गिलास जैसे ओस-बूंदों से झल-मल। बिहारी के साथ महेन्द्र सकुचाते हुए खाने बैठा। नीचे माली पौधों में पानी डाल रहा था और भीगी मिट्टी की सौंधी सुगन्ध लिए दक्खिनी बयार महेन्द्र की धप्-धप् धुली चादर के छोर को हैरान कर रही थी। आसपास के दरवाजे के झरोखों की ओट से कभी-कभी दबी हंसी, फुसफुसाहट, कभी-कभी गहनों की खनखनाहट सुनाई दे रही थी।

खाना खत्म हो चुका तो अन्दर की तरफ देखते हुए अनुकूल बाबू ने कहा-“चुन्नी, पान तो ले आ, बेटी!”

जरा देर में संकोच से पीछे का दरवाजा खुल गया और सारे संसार की लाज से सिमटी एक लड़की हाथ में पानदान लिये अनुकूल बाबू के पास आकर खड़ी हुई। वे बोले, “शर्म काहे की बिटिया, पानदान उनके सामने रखो!”

उसने झुककर कांपते हुए हाथों से मेहमानों की बगल में पानदान रख दिया। बरामदे के पश्चिमी छोर से डूबते हुए सूरज की आभा उसके लज्जित मुखड़े को मंडित कर गई। इसी मौके से महेन्द्र ने उस कांपती हुई लड़की के करुण मुख की छवि देख ली।

बालिका जाने लगी। अनुकूल बाबू बोले-“जरा ठहर जा, चुन्नी! बिहारी बाबू, यह है छोटे भाई अपूर्व की लड़की; अपूर्व तो चल बसा, अब मेरे सिवाय इसका कोई नहीं।”

और उन्होंने एक लम्बी उसांस ली।

महेन्द्र का मन पसीज गया। उसने एक बार फिर लड़की की तरफ देखा।

उसकी उम्र साफ-साफ कोई न बताता। सगे-संबंधी कहते, बारह-तेरह होगी। यानि चौदह-पंद्रह होने की संभावना ही ज्यादा थी। लेकिन चूंकि दया पर चल रही थी इसलिए सहमे से भाव ने उसके नवयौवन के आरंभ को जब्त कर रखा था।

महेन्द्र ने पूछा-“तुम्हारा नाम?”

अनुकूल बाबू ने उत्साह दिया-“बता बेटी, अपना नाम बता!”

अपने अभ्यस्त आदेश-पालन के ढंग से झुककर उसने कहा-“जी, मेरा नाम आशालता है।”

आशा! महेन्द्र को लगा, नाम बड़ा ही करुण और स्वर बड़ा कोमल है।

दोनों मित्रों ने बाहर सड़क पर आकर गाड़ी छोड़ दी। महेन्द्र बोला-“बिहारी, इस लड़की को तुम हर्गिज मत छोड़ो?”

बिहारी ने इसका कुछ साफ जवाब न दिया। बोला-“इसे देखकर इसकी मौसी याद आ जाती है। ऐसी ही भली होगी शायद!”

महेन्द्र ने कहा- “जो बोझा तुम्हारे कंधे पर लाद दिया, अब वह शायद वैसा भारी नहीं लग रहा है।”

बिहारी ने कहा-“नहीं, लगता तो है ढो लूंगा।”

महेन्द्र बोला-“इतनी तकलीफ उठाने की क्या जरूरत है? तुम्हें बोझा लग रहा हो तो मैं उठा लूं।”

बिहारी ने गम्भीर होकर महेन्द्र की तरफ ताका। बोला-“सच? अब भी ठीक-ठीक बता दो! यदि तुम शादी कर लो तो चाची कहीं ज्यादा खुश होंगी-उन्हें हमेशा पास रखने का मौका मिलेगा।”

महेन्द्र बोला-“पागल हो तुम! यह होना होता तो कब का हो जाता।”

बिहारी ने कोई एतराज न किया। चला गया और महेन्द्र भी यहां-वहां भटककर घर पहुंच गया।

मां पूरियां निकाल रही थीं। चाची तब तक अपनी भानजी के पास से लौटकर नहीं आई थीं।

महेन्द्र अकेला सूनी छत पर गया और चटाई बिछाकर लेट गया। कलकत्ता की ऊंची अट्टालिकाओं के शिखरों पर शुक्ला सप्तमी का आधा चांद टहल रहा था। मां ने खाने के लिए बुलाया, तो महेन्द्र ने अलसाई आवाज में कहा- “छोड़ो, अब उठने को जी नहीं चाहता।”

मां ने कहा-“तो यहीं ले लाऊं?”

महेन्द्र बोला-“आज नहीं खाऊंगा। मैं खाकर आया हूं।”

मां ने पूछा-“कहां खाने गया था?”

महेन्द्र बोला-“बाद में बताऊंगा।”

वे लौटने लगी तो थोड़ा सोचते हुए महेन्द्र ने कहा-“मां! खाना यहीं ले आओ।”

रात में महेन्द्र ठीक से सो नहीं पाया। सुबह ही वह बिहारी के घर पहुंच गया। बोला-“भई यारो, मैंने बड़ी ध्यान से सोचा और देखा- कि चाची यही चाहती है कि शादी मैं ही करूं।”

बिहारी बोला-“इसके लिए सोचने की जरूरत नहीं थी। यह बात तो वे खुद कई बार कह चुकी हैं।”

महेन्द्र बोला-“तभी तो कहता हूं, मैंने आशा से विवाह न किया तो उन्हें दुःख होगा।”

बिहारी बोला-“हो सकता है!”

महेन्द्र ने कहा, “मेरा खयाल है, यह तो ज्यादती होगी।”

“हां! बात तो ठीक है।” बिहारी ने कहा। उसने कहा-“मगर यह बात थोड़ी देर से आपकी समझ में आई। कल आ जाता तो अच्छा होता।” महेन्द्र–“एक दिन बाद ही आया, तो क्या बुरा हो गया।”

विवाह की बात पर मन की लगाम को छोड़ना था कि महेन्द्र के लिए धीरज रखना कठिन हो गया। उसके मन में आया-इस बारे में बात करने का तो कोई अर्थ नहीं है। शादी हो ही जानी चाहिए।

उसने मां से कहा-“अच्छा मां, मैं विवाह करने के लिए राजी हूं।”

मां मन-ही-मन बोलीं-“समझ गई, उस दिन अचानक क्यों मंझली बहू अपनी भानजी को देखने चली गई। और क्यों महेन्द्र बन-ठन कर घर से निकला।”

उनके अनुरोध की बार-बार उपेक्षा होती रही और अन्नपूर्णा की साजिश कारगर हो गई, इस बात से वह नाराज हो उठीं। कहा-“अच्छा, मैं अच्छी सी लड़की को देखती हूं।”

आशा का जिक्र करते हुए महेन्द्र ने कहा-“लड़की तो मिल गई।”

राजलक्ष्मी बोली-“उस लड़की से विवाह नहीं हो सकता, यह मैं कहे देती हूं।”

महेन्द्र ने बड़े संयत शब्दों में कहा-“क्यों मां, लड़की बुरी तो नहीं है।”

राजलक्ष्मी-“उसके तीनों कुल में कोई नहीं। ऐसी लड़की से विवाह रचकर अपने कुटुम्ब को सुख भी न मिल सकेगा।”

महेन्द्र-“कुटुम्ब को सुख मिले न मिले लड़की मुझे खूब पसन्द है। उससे शादी न हुई तो मैं दु:खी हो जाऊंगा।”

लड़के की जिद से राजलक्ष्मी और सख्त हो गई। वह अन्नपूर्णा से भिड़ गई-“एक अनाथ से विवाह कराकर तुम मेरे लड़के को फंसा रही हो। यह हरकत है।”

अन्नपूर्णा रो पड़ी-“उससे तो शादी की कोई बात ही नहीं हुई, उसने तुम्हें क्या कहा, इसकी मुझे जरा भी खबर नहीं।”

राजलक्ष्मी इसका रत्ती-भर यकीन न कर सकीं।

अन्नपूर्णा ने बिहारी को बुलवाया और आंसू भरकर कहा-“तय तो सब तुमसे हुआ था, फिर तुमने पासा क्यों पलट दिया? मैं कहे देती हूं शादी तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी। यह बेड़ा तुम न पार करोगे तो मुझे बड़ी शर्मिन्दगी उठानी होगी। वैसे लड़की अच्छी है।”

बिहारी ने कहा-“चाची, तुम्हारी बात मंजूर है। वह तुम्हारी भानजी है, फिर मेरे ‘ना’ करने की कोई बात ही नहीं। लेकिन महेन्द्र…”

अन्नपूर्णा बोलीं-“नहीं-नहीं बेटे, महेन्द्र से उसका विवाह किसी भी हालत में न होगा। यकीन मानो, तुमसे विवाह हो, तभी मैं ज्यादा निश्चिंत हो सकूंगी। महेन्द्र से रिश्ता हो यह मैं चाहती भी नहीं।”

बिहारी बोला-“तुम्हीं नहीं चाहती तो कोई बात नहीं।”

और वह राजलक्ष्मी के पास जाकर बोला-“मां, चाची की भानजी से मेरी शादी पक्की हो गई। सगे-संबंधियों में तो कोई महिला है नहीं इसलिए मैं ही खबर देने आया हूं।”

राजलक्ष्मी-“अच्छा! बड़ी खुशी हुई बिहारी, सुनकर। लड़की बड़ी भली है। तेरे लायक। इसे हाथ से जाने मत देना!”

बिहारी-“हाथ से बाहर होने का सवाल ही क्या! खुद महेन्द्र भैया ने लड़की पसन्द करके रिश्ता पक्का किया है।”

इस झंझट से महेन्द्र और भी उत्तेजित हो गया। मां और चाची से नाराज होकर वह मामूली-से छात्रावास में जाकर रहने लगा।

राजलक्ष्मी रोती हुई अन्नपूर्णा के कमरे में पहुंची; कहा-“मंझली बहू, लगता है, उदास होकर महेन्द्र ने घर छोड़ दिया, उसे बचाओ!”

अन्नपूर्णा बोली-“दीदी, धीरज रखो, दो दिन के बाद गुस्सा उतर जाएगा।”

राजलक्ष्मी बोलीं-“तुम उसे जानती नहीं बहन, वह जो चाहता है, न मिले तो कुछ भी कर सकता है। जैसे भी हो, अपनी बहन की लड़की से…”

अन्नपूर्णा-“भला यह कैसे होगा दीदी, बिहारी से बात लगभग पक्की हो चुकी।”

राजलक्ष्मी बोलीं-“हो चुकी, तो टूटने में देर कितनी लगती है?”

और उन्होंने बिहारी को बुलवाया। कहा-“तुम्हारे लिए मैं दूसरी लड़की ढूंढ देती हूं- मगर इससे तुम्हें बाज आना पड़ेगा।”

बिहारी बोला-“नहीं मां, यह नहीं होगा। सब तय हो चुका है।”

राजलक्ष्मी फिर अन्नपूर्णा के पास गईं। बोलीं-“मेरे सिर की कसम मंझली, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूं… तुम्हीं बिहारी से कहो! तुम कहोगी तो बिगड़ी बन जाएगी।”

आखिर अन्नपूर्णा ने बिहारी से कहा-“बेटा, तुमसे कुछ कहने का मुंह नहीं है, मगर लाचारी है क्या करूं। आशा को तुम्हें सौंपकर ही मैं निश्चित होती, मगर क्या बताऊं, सब तो तुम्हें पता है ही।”

बिहारी-“समझ गया। तुम जो हुक्म करोगी, वही होगा। लेकिन फिर कभी किसी से विवाह करने का मुझसे आग्रह मत करना!”

बिहारी चला गया। अन्नपूर्णा की आंखें छल छला गईं। महेन्द्र का अमंगल न हो, इस आशंका से उन्होंने आंखें पोंछ लीं। बार-बार दिल को दिलासा दिया-“जो हुआ, अच्छा ही हुआ।”

और इस तरह राजलक्ष्मी-अन्नपूर्णा-महेन्द्र में किल-किल चलते-चलते आखिर विवाह का दिन आया। रोशनी हंसती हुई जली, शहनाई उतनी ही मधुर बजी जितनी वह बजा करती है। यानी उसके दिल के साथ कोई न था।

सज-संवरकर लज्जित और मुग्ध-मन आशा अपनी नई दुनिया में पहली बार आई। उसके कंपित कोमल हृदय को पता ही न चला कि उसके इस बसेरे में कहीं कांटा है। बल्कि यह सोचकर भरोसे और आनंद से उसके सारे ही संदेह जाते रहे कि इस दुनिया में एक मात्रा मां जैसी अपनी मौसी के पास जा रही है।

विवाह के बाद राजलक्ष्मी ने कहा-“मैं कहती हूं, अभी कुछ दिन बहू अपने बड़े चाचा के घर ही रहे।”

महेन्द्र ने पूछा-“ऐसा क्यों, मां?”

मां ने कहा-“तुम्हारा इम्तहान है। पढ़ाई-लिखाई में रुकावट पड़ सकती है।”

महेन्द्र बोला-“आखिर मैं कोई नन्हा-नादान हूं। अपने भले-बुरे की समझ नहीं मुझे?”

राजलक्ष्मी, “जो हो, साल-भर की ही तो बात है।”

महेन्द्र ने कहा-“इसके मां-बाप रहे होते, तो मुझे कोई एतराज न होता-लेकिन चाचा के यहां इसे मैं नहीं छोड़ सकता।”

राजलक्ष्मी-(अपने आप) “बाप रे आप ही मालिक, सास कोई नहीं! कल शादी और आज ही इतनी हमदर्दी! आखिर हमारी भी तो शादी हुई थी। मगर तब ऐसी बेहयाई न थी।”

महेन्द्र ने दृढ़ता से कहा-“तुम बिलकुल मत सोचो, मां! इम्तहान में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”

आखिर राजलक्ष्मी असीम उत्साह से बहू को गृहस्थी के काम-काज सिखाने में जुट गईं। भंडार रसोई और पूजा-घर में आशा के दिन कटने लगे; रात को अपने साथ सुलाकर वह उसके आत्मीय बिछोह की कमी को पूरा करने लगीं।

काफी सोच समझकर अन्नपूर्णा आशा से दूर ही रहा करतीं। कोई अभिभावक जब खुद सारी ईख का रस चूसने लगता है, तब निराश बच्चे की रंजिश कम नहीं होती। महेन्द्र की हालत भी वैसी ही हो गई। उसकी आंखों के सामने ही नवयुवती वधू का सारा मीठा रस गिरस्ती के कामों में निचुड़ता रहे, यह भला कैसे सहा जा सकता है।

अन्नपूर्णा जानती थीं कि राजलक्ष्मी ज्यादती कर रही हैं। फिर भी उन्होंने कहा-“क्यों बेटे बहू को गृहस्थी के धन्धे सिखाए जा रहे हैं; अच्छा ही तो है। आजकल की लड़कियों की तरह उपन्यास पढ़ना, कार्पेट बुनना और सिर्फ बाबू बने रहना क्या अच्छा है?”

महेन्द्र उत्तेजित होकर बोला-“आजकल की लड़कियां आजकल की लड़कियों की तरह ही रहेंगी। वह चाहे भली हों, चाहे बुरी। मेरी स्त्री अगर मेरी ही तरह उपन्यास पढ़कर रस ले सके तो इसमें क्या बुरी बात है। यह न तो परिहास की बात है न पछतावे की।”

अन्नपूर्णा के कमरे में बेटे की आवाज सुनकर राजलक्ष्मी सब छोड़कर आ गई। रूखे स्वर में बोली-“क्या मनसूबे बनाए जा रहे हैं?”

महेन्द्र ने वैसे ही उत्तेजित भाव से कहा, “मनसूबे क्या होंगे, बहू को घर में नौकरानी की तरह काम मैं न करने दूंगा।”

मां ने अपनी तीखी जलन को दबाकर बड़े ही तीखे धीर भाव से कहा-“आखिर उससे क्या कराना होगा?”

महेन्द्र बोला-“मैं उसे लिखना-पढ़ना सिखाऊंगा।”

राजलक्ष्मी कुछ न बोलीं। तेजी से कदम बढ़ाती हुई चली गईं और बहू का हाथ पकड़कर खींचती हुई महेन्द्र के पास लाकर बोलीं-“यह रही तुम्हारी बहू, सिखाओ लिखना-पढ़ना!”

और अन्नपूर्णा की तरफ पलटकर गले में अंचरा डालकर कहा-“माफ करो मंझली बहू, माफ करो! तुम्हारी भानजी की मर्यादा मेरी समझ में न आई। मैंने इसके कोमल हाथों में हल्दी लगाई है। अब तुम इसे धो-पोंछकर परी बनाकर रखो-महेन्द्र को सौंपो-ये आराम से लिखना-पढ़ना सीखें, नौकरानी का काम मैं करूंगी।”

राजलक्ष्मी अपने कमरे में चली गई और दरवाजा जोर से बंद कर लिया क्षोभ से अन्नपूर्णा जमीन पर बैठ गई। अचानक यह क्या हो गया, आशा के पल्ले नहीं पड़ा कि माजरा क्या है? महेन्द्र नाराज हो गया। मन-ही-मन बोला-“जो हुआ सो हुआ, अब से अपनी स्त्री का भार अपने हाथों में लेना पड़ेगा, नहीं तो जुल्म होगा।”

मन और कर्तव्य बोध दोनों मिल जाएं तो अच्छा लगता है। पत्नी की उन्नति के चक्कर में महेन्द्र रम गया। न तो उसे काम का ध्यान रहा न लोगों की परवाह।

घमंडी राजलक्ष्मी ने अपने-आप कहा- ‘अब अगर महेन्द्र बीवी को लेकर मेरे दरवाजे पर सिर पीटकर जान भी दे दे तो भी मैं मुड़कर नहीं देखूंगी। देखती हूं, मां को छोड़कर बीवी के साथ कैसे रहेगा?’

दिन बीतने लगे। राजलक्ष्मी के दरवाजे पर किसी अनुतप्त के पांवों की आहट न सुनाई पड़ी।

राजलक्ष्मी ने अपने मन में तय किया-‘अच्छा माफी मांगने आएगा तो माफ कर दूंगी, नहीं तो कहां जाएगा। बहुत दुःखी हो जाएगा बेचारा। लेकिन माफी कोई मांगे तभी तो आप माफ कर सकते हैं। कोई माफी के लिए दहलीज पर आया ही नहीं। राजलक्ष्मी ने सोचा कि मैं ही जाकर उसे क्षमा कर आऊंगी। लड़का रूठ गया है तो क्या मां भी रुठी रहे।’

तिमंजिले पर एक कोने के छोटे-से कमरे में महेन्द्र सोया करता था, वही उसकी पढ़ने की जगह भी थी। इधर कई दिनों से मां ने उसके कपड़े सहेजने, बिस्तर बिछाने, झाड़ने-बुहारने में कोई दिलचस्पी नहीं ली। मातृ-स्नेह के जिन कर्तव्यों की वह आदी थीं, बहुत दिनों तक उन कामों को न करने से वही दुःखी हो गई। उस दिन दोपहर को एकाएक मन में आया, “अभी महेन्द्र कालेज गया होगा, इसी बीच उसका कमरा ठीक कर आऊं, लौटकर वह समझ जाएगा कि कमरे में मां का हाथ फिरा है।”

सीढ़ियों से राजलक्ष्मी ऊपर गईं। महेन्द्र के कमरे के दरवाजे का एक पल्ला खुला था। सामने जाते ही मानो कांटा चुभ गया। चौंक कर ठिठक गई। देखा, फर्श पर महेन्द्र लेटा है और दरवाजे की तरफ पीठ किये बहू धीरे-धीरे उसके पांव सहला रही है। दोपहर की तेज धूप में खुले कमरे में दाम्पत्य-लीला देखकर राजलक्ष्मी शर्म और धिक्कार से सिमट गई और चुपचाप नीचे उतर आई। .

कुछ दिन सूखा पड़ने से नाज के जो पौधे सूखकर पीले पड़ जाते हैं, बारिश आने पर वे तुरन्त बढ़ जाते हैं। आशा के साथ भी ऐसा ही हुआ। जहां उसका रक्त सम्बन्ध था, वहां वह कभी भी आत्मीयता का दावा न कर सकी, आज पराए घर में जब उसे बिन मांगे हक मिला, तो उसने इसे लेने में देर न की।

उस दिन दोपहर में राजलक्ष्मी नीचे उतर आई। उसने सोचा अन्नपूर्णा को जलाया जाए। बोली-“अरी ओ मंझली, जाकर देख जरा तुम्हारी नवाब की बेटी नवाब के घर से कैसा पाठ पढ़ कर आई है! घर के बड़े-बूढ़े आज होते तो”

अन्नपूर्णा ने कातर होकर कहा- “दीदी, अपनी बहू को तुम शिक्षा दो, या हुकुमत चलाओ मुझे क्या? मुझसे क्यों कह रही हो।”

राजलक्ष्मी धनुष की तनी डोरी-सी टंकार उठी-“हूं; मेरी बहू! जब तक तुम मंत्री हो, वह मुझे कैसे मान सकती है!”

यह सुनकर अन्नपूर्णा पैर पटकती हुई महेन्द्र के कमरे में पहुंच गई। आशा से बोली-“तू इस तरह से मेरा सिर नीचा करेगी री, मुंहजली! शर्म नहीं, हया नहीं, समय-असमय का खयाल नहीं, बूढ़ी सास पर सारा गृहस्थी का बोझ डालकर तुम यहां आराम फरमा रही हो? मेरा ही नसीब जला कि मैं तुझे इस घर में ले आई।”

कहते-कहते उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और आशा भी सिर झुकाए आंचल के छोर को नाखून से नोंचती हुई चुपचाप रोने लगी।

महेन्द्र ने कहा-“चाची, तुम नाहक बहू की लानत-मलामत कर रही हो। उसे तो मैंने रोक रखा है।”

अन्नपूर्णा ने कहा-“रोककर कौन-सा अच्छा किया है। यह तुम उसे क्या शिक्षा दे रहे हो?”

महेन्द्र बोला-“यह देखो, इसके लिए मैं स्लेट, बही, किताब सब खरीद लाया हूं। इसे मैं लिखना-पढ़ना सिखाऊंगा, चाहे लोग मेरी निन्दा करें।”

अन्नपूर्णा बाली-“ठीक है, लेकिन यह क्या तमाम दिन? शाम के बाद घंटा-आधा घंटा पढ़ लिया बस!”

“घंटा-आधा घंटा पढ़ाना ही तो काफी होगा।”

महेन्द्र-“इतना आसान नहीं है चाची, पढ़ने-लिखने में समय लगता है।”

अन्नपूर्णा खीझकर चली गई। आशा भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। महेन्द्र दरवाजा रोककर खड़ा हो गया-उसने आशा की गीली आंखों की विनती न मानी। वैसे आशा को नहीं लगता कि लिखना-पढ़ना जरूरी भी है फिर भी वह अपने पति की खातिर किताबों पर एकबारगी झुककर सिर हिलाती हुई बताई चीजें याद करती रहती। कमरे के कोने में छोटी-सी मेज पर डाक्टरी की किताब खोले मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे होते, बीच-बीच में कनखियों से छात्रा को देखते रहते। अचानक अपनी किताब बन्द करके आवाज दी-“चुन्नी!” यह आशा का ही घरेलू नाम था।

चौंक कर आशा ने उधर देखा। वह बोला, “जरा लाओ तो किताब देखूं, कहां पढ़ रही हो?” आशा को लगा जांच होगी और उसमें पास होने की उम्मीद कम ही थी। आगे-आगे पाठ और पीछे सपाट कुछ यही हाल था। एक हाथ से उसकी कमर को कसकर लपेटकर दूसरे हाथ से किताब पकड़कर पूछा-“आज कितना पढ़ गई देखूं तो।”

जितनी पंक्तियों पर वह सरसरी निगाह फेर गई थी, दिखा दिया। महेन्द्र ने अचरज से कहा-“ओह, इतना पढ़ गई! मैंने कितना पढ़ा, बताऊं?”

और अपनी किताब के किसी अध्याय का शीर्षक-भर दिखा दिया। अचरज से आंखें बड़ी-बड़ी करके आशा ने पूछा-“तो इतनी देर से कर क्या रहे थे?”

उसकी ठोढ़ी पकड़कर महेन्द्र ने कहा-“मैं किसी के बारे में सोच रहा था; और जिसके बारे में सोच रहा था, वह दीमक का वर्णन पढ़ने में मशगूल थी!”

इस बे-वजह शिकायत का सटीक जवाब आशा न दे सकी, लेकिन प्रेम की प्रतियोगिता में झूठी हार मान लेनी पड़ती है।

ऐसे ही एक रोज महेन्द्र मौजूद नहीं था। मौका पाकर आशा पढ़ने बैठ गई कि अचानक कहीं से आकर उसने आंखें मींच लीं और किताब छीनकर कहने लगा, “बे-रहम, मैं नहीं होता हूं तो तुम मेरे बारे में सोचती तक नहीं। किताबों में डूब जाती हो!”

आशा ने कहा-“तुम मुझे गंवार बनाए रखोगे?”

महेन्द्र ने कहा-“तुम्हारी कृपा से अपनी ही विद्या कौन आगे बढ़ रही है!”

बात आशा को लग गई। फौरन चल देने का उपक्रम करती बोली-“मैंने तुम्हारी पढ़ाई में ऐसी कौन सी रुकावट डाली है?”

उसका हाथ थाम कर महेन्द्र ने कहा-“यह तुम नहीं समझोगी? मुझे भूल कर तुम जितनी आसानी से पढ़-लिख लेती हो, तुम्हें भूलकर उतनी आसानी से मैं नहीं पढ़-लिख पाता।”

शिक्षक ही जब शिक्षा की सबसे बड़ी बाधा हो तो छात्रा की क्या मजाल कि विद्या के वन में राह बनाकर चल सके। कभी-कभी मौसी की झिड़की याद आती और चित्त विचलित हो जाता। सास को देखकर शर्म से गड़ जाती। लेकिन सास उसे किसी काम को न कहती। अपने मन से उनकी मदद करना चाहती तो वह पढ़ाई के हर्जे की बात कह कर वापस भेज देती।

आखिर अन्नपूर्णा ने आशा से कहा-“तेरी जो पढ़ाई चल रही है, वह तो देख ही रही हूं, महेन्द्र को क्या डॉक्टरी का इम्तहान न देने दोगी?”

यह सुनकर आशा ने अपने जी को कड़ा किया। महेन्द्र से कहा-“तुम्हारे इम्तहान की तैयारी नहीं हो पा रही है। आज से मैं नीचे मौसी के कमरे में रहा करूंगी।”

इस उम्र में ऐसा कठोर संन्यास-व्रत! सोने के कमरे से एकबारगी मौसी के कमरे में निर्वासन! ऐसी कठोर प्रतिज्ञा करते हुए उसकी आंखों के कोनों में आंसू झलक पड़े, बेबस होंठ कांप उठे और गला रुंध गया। महेन्द्र बोला-“बेहतर है, चाची के कमरे में ही चलो! मगर तब उन्हें हमारे कमरे में ऊपर आना पड़ेगा।”

ऐसा एक गम्भीर प्रस्ताव मजाक बन गया, आशा इससे नाराज हुई। महेन्द्र ने कहा-“इससे तो अच्छा है कि तुम रात-दिन मुझे आंखों-आंखों में रखो और निगरानी करो! फिर देखो कि मेरी इम्तहान की पढ़ाई चलती है कि नहीं।”

एक दिन बारिश हो रही थी। बादल घिरे थे। ऐसे में बदन पर एक सुवासित महीन चादर और जूही की माला गले में डाले महेन्द्र मगन-मन अपने सोने के कमरे में पहुंचा। अचानक आशा को चौंका देने के विचार से-जूतों की आवाज न होने दी। झांक कर देखा, पूरब की खुली खिड़की से पानी के छींटे लिये हवा के तीखे झोंके कमरे में आ रहे हैं, दीया बुझ गया है और आशा नीचे बिछावन पर पड़ी रो रही है।

महेन्द्र जल्दी से उसके करीब गया और पूछा-“क्या बात हैं?” वह दूने आवेग से रोने लगी। बड़ी देर के बाद महेन्द्र को जवाब मिला कि मौसी से और बर्दाश्त न हो सका। वह अपने फुफेरे भाई के यहां चली गई।

महेन्द्र के मन में आया, ‘गई तो गई, लेकिन बदली की ऐसी सुहानी सांझ को खराब कर गई।’

अन्त में सारा गुस्सा मां पर आया। वही तो इन सारे अनर्थों की जड़ है!

महेन्द्र ने कहा-‘हम भी वहीं चले जायेंगे, जहां चाची गई है। देखते हैं, मां किससे झगड़ती है?’

और उसने नाहक ही शोर-गुल के साथ असबाब बांधने के लिए कुली को बुलाना शुरू कर दिया।

राजलक्ष्मी समझ गई। धीरे-धीरे महेन्द्र के पास आई। शांत स्वर में पूछा-“कहां जा रहा है?”

महेन्द्र ने पहले कोई जवाब ही न दिया। दो-तीन बार पूछे जाने पर बताया-“चाची के पास।”

राजलक्ष्मी बोली-“अरे! तो मैं ही उन्हें यहां बुला देती हूं।”

राजलक्ष्मी उसी समय पालकी पर सवार होकर अन्नपूर्णा के घर गई। गले में कपड़ा डालकर हाथ जोड़ते हुए कहा-“खुश हो मंझली बहू, मुझे माफ करो।”

अन्नपूर्णा ने जल्दी-जल्दी उनके पैरों की धूल ली। कातर स्वर में कहा-“दीदी, मुझे दोषी क्यों बना रहीं हैं? तुम जैसा हुक्म दोगी, वैसा ही करूंगी।”

राजलक्ष्मी ने कहा-“तुम चली आई हो, तो मेरे बेटा-पतोहू भी घर छोड़-कर यहीं आ रहे हैं।”

कहते-कहते वह रो पड़ी।

जिठानी-देवरानी दोनों घर लौट आई। तब भी वर्षा हो रही थी। अन्नपूर्णा जब महेन्द्र के कमरे में पहुंची, आशा का रोना थम चुका था। महेन्द्र बातों से उसे हंसाने की कोशिश कर रहा था। आसार थे कि बदलियां यूं ही नहीं गुजर जाएंगी।

अन्नपूर्णा ने कहा-“चुन्नी, तू मुझे घर में भी न रहने देगी और कहीं जाऊं तो भी पीछे लग जाएगी। क्या मेरे लिए कहीं चैन नहीं!”

आशा चौंक पड़ी।

महेन्द्र बड़ा ही खीझकर बोला-“क्यों चाची, चुन्नी ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

अन्नपूर्णा ने कहा-“बहू की ऐसी बेहयाई बर्दाश्त न हो सकी, तभी यहां से चली गई थी। फिर अपनी सास को रुलाकर मुंहजली ने मुझे क्यों बुलाया?”

जीवन के अध्याय में मां-चाची ऐसी विघ्नकारिणी होती हैं, महेन्द्र को इसका पता न था।

दूसरे दिन राजलक्ष्मी ने बिहारी को बुलवाकर कहा-“बेटा बिहारी, तुम एक बार महेन्द्र से पूछ देखो, जमाने से गांव नहीं गए। मैं एक बार बारासत जाना चाहती हूं।”

बिहारी ने कहा,“जमाने से नहीं गई तो क्या हुआ? खैर, मैं पूछ देखता हूं।

मगर वह राजी भी होगा, ऐसा नहीं लगता।”

महेन्द्र ने कहा-“जन्म-भूमि को देखने की इच्छा जरूर होती है लेकिन मां का वहां ज्यादा दिन न रहना ही अच्छा होगा। बरसात के मौसम में वह जगह अच्छी नहीं।”

महेन्द्र बड़ी आसानी से राजी हो गया, इससे बिहारी कुढ़ गया। बोला-“मां अकेली जाएंगी, वहां उनकी देखभाल कौन करेगा? भाभी को भी साथ भेज दो न?”

कहकर, बिहारी हंसा।

बिहारी के इस गहरे व्यंग से कुंठित होकर महेन्द्र ने कहा-“मेरे लिए यह कोई मुश्किल है क्या?”

मगर बात इससे आगे न बढ़ी।

बिहारी इसी तरह आशा के मन को विमुख कर दिया करता और यह जानकर कि आशा इससे कुढ़ती है, उसे मजा आता।

कहना बेकार होगा, राजलक्ष्मी जन्म-भूमि के दर्शन के लिए उतनी बेताब न थीं। गर्मी के दिनों में जब नदी का पानी सूख जाता है, तो मल्लाह कदम-कदम पर लग्गी से थाह लेता है कि कहां कितना पानी है। राजलक्ष्मी उसी तरह मां-बेटे के सम्बन्ध की थाह ले रही थी। उन्हें यह उम्मीद न थी कि उनके बारासत जाने का प्रस्ताव इतनी जल्दी मंजूर हो जायेगा। सोचा, “अन्नपूर्णा और मेरे दोनों के घर से बाहर जाने में फर्क है।”

अन्नपूर्णा भीतरी मतलब समझ गई। कहने लगी, “दीदी जाएंगी, तो मैं भी न रह सकूंगी।”

महेन्द्र ने मां से कहा-“सुन लिया तुमने? तुम जाओगी तो चाची भी जाएंगी। अपनी गृहस्थी का क्या होगा फिर?”

राजलक्ष्मी विद्वेष के जहर से जर्जर होकर बोलीं-“तुम भी जा रही हो मंझली? तुम्हारे जाने से काम कैसे चलेगा? नहीं, तुम्हें रहना ही पड़ेगा।”

राजलक्ष्मी उतावली हो गई। दूसरे दिन दोपहर को ही तैयार हो गई। महेन्द्र ही उन्हें पहुंचाने जाएगा, इसमें किसी को भी शुबहा न था। लेकिन रवाना होते वक्त मालूम पड़ा महेन्द्र ने मां के साथ जाने के लिए प्यादे और दरबान तक कर रखे हैं।

बिहारी ने पूछा-“तुम अभी तक तैयार नहीं हुए क्या, भैया?”

महेन्द्र ने लजाकर कहा-“मेरे कालेज की….”

बिहारी ने कहा-“खैर, तुम छोड़ दो! मां को मैं वहीं छोड़ आता हूं।”

महेन्द्र मन ही मन नाराज हुआ। अकेले में आशा से बोला, “सचमुच, बिहारी ने ज्यादती शुरू कर दी है। वह यह दिखाना चाहता है कि वह मां का खयाल मुझसे ज्यादा रखता है।”

अन्नपूर्णा को रह जाना पड़ा। परन्तु लाज, कुढ़न और खीझने से वह सिमटी-सी रहीं। चाची में यह दुराव देखकर महेन्द्र नाराज हुआ और आशा भी रूठी रही।

राजलक्ष्मी मैके पहुंची। तय था कि उन्हें छोड़कर बिहारी आ जाएगा लेकिन वहां की हालत देखकर वह ठहर गया।

राजलक्ष्मी के मैके में महज दो-एक बूढ़ी विधवाएं थीं। चारों तरफ घना जंगल और बांस की झाड़ियां; पोखर का हरा-हरा पानी; दिन-दोपहर में स्यार की ‘हुआ-हुआ’ से राजलक्ष्मी की रूह तड़प उठती।

बिहारी ने कहा-“मां, जन्म-भूमि यह जरूर है, मगर इसे ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ तो हर्गिज नहीं कहा जा सकता। तुम्हें यहां अकेली छोड़कर लौट जाऊं तो मुझे पाप लगेगा।”

राजलक्ष्मी के प्राण भी कांप उठे। ऐसे में विनोदिनी भी आ गई। विनोदिनी के बारे में पहले ही कहा जा चुका है। महेन्द्र से, और कभी बिहारी से उसके विवाह की बात चली थी। विधना की लिखी भाग्य-लिपि से जिस आदमी से उसका विवाह हुआ वह जल्दी ही चल बसा।

उसके बाद से विनोदिनी घने जंगल में अकेली लता-सी, इस गांव में घुटकर जी रही थी। वही अनाथ, राजलक्ष्मी के पास आई, उन्हें प्रणाम किया और उनके सेवा-जतन में जुट गई। सेवा तो सेवा है, घड़ी को आलस नहीं। काम की कैसी सफाई, कितनी अच्छी रसोई, कैसी मीठी बातचीत! राजलक्ष्मी कहतीं-“काफी देर हो चुकी बिटिया, तुम भी थोड़ा-सा खा लो जाकर!”

वैसे राजलक्ष्मी उसकी फुफिया सास थी।

राजलक्ष्मी कहतीं-“इस तरह तो तुम बीमार पड़ जाओगी, बेटी!”

अपने प्रति बड़ी लापरवाही दिखाती हुई विनोदिनी कहती-“हमारे दु:ख-सहे शरीर में नाराजगी को गुंजाइश नहीं। अहा, कितने दिनों के बाद तो अपनी जन्मभूमि आई हो! यहां है भी क्या? काहे से तुम्हारा आदर करूं!”

बिहारी तो दो ही दिनों में मुहल्ले-भर का बुजुर्ग बन बैठा। कोई दवा-दारू, तो कोई मुकदमे के राय-मशविरे के लिए आता; कोई उसकी इसलिए खुशामद करता कि किसी बड़े दफ्तर में उसके बेटे को नौकरी दिला दे; कोई उससे अपनी दरखास्त लिखवाता। बूढ़ों की बैठक और कुली-मजूरों के ताड़ी के अड्डे तक वह समान रूप से जाता-आता। सभी उसका सम्मान करते।

गंवई गांव में आए कलकत्ता के उस नवयुवक के निर्वासन-दंड को भी विनोदिनी अंत:पुर की ओट से हल्का करने की भरसक कोशिश किया करती। मुहल्ले का चक्कर काटकर जब भी वह आता तो पाता कि किसी ने उसके कमरे को बड़े जतन से सहेज-संवार दिया है; कांसे के एक गिलास में कुछ फूल-पत्तों का गुच्छा सजा रखा है और सिरहाने के एक तरफ पढ़ने योग्य कुछ किताबें रख दी हैं। किताबों में किसी महिला के हाथ से बड़ी कंजूसी के साथ छोटे अक्षरों में लिखा है।

गांवों में अतिथि सत्कार का जो आम तरीका है, उससे इसमें थोड़ा फर्क था। उसी का जिक्र करते हुए बिहारी जब तारीफ करता, तो राजलक्ष्मी कहतीं-‘और ऐसी लड़की को तुम लोगों ने कबूल नहीं किया!’

हंसते हुए बिहारी कहता-“बेशक हमने अच्छा नहीं किया मां, ठगा गया। मगर एक बात है, विवाह न करके ठगाना बेहतर है, ब्याह करके ठगाता तो मुसीबत थी!”

राजलक्ष्मी के जी में बार-बार यही आता रहा, ‘यही तो मेरी पतोहू होने योग्य थी। क्यों न हुई भला!’

राजलक्ष्मी कलकत्ता लौटने का जिक्र करतीं कि विनोदिनी की आंखें छल छला उठतीं। कहती-“आखिर तुम दो दिन के लिए क्यों आई, बुआ? अब तुम्हें छोड़कर मैं कैसे रहूंगी?”

भावावेश में राजलक्ष्मी कह उठतीं-“तू मेरी बहू क्यों न हुई बेटी, मैं तुझे कलेजे से लगाए रखती।”

सुनकर शर्म से विनोदिनी किसी बहाने वहां से हट जाती। राजलक्ष्मी इस इंतजार में थीं कि कलकत्ता से विनीत अनुरोध का कोई पत्र आएगा। मां से अलग महेन्द्र आज तक इतने दिन कभी न रहा था। मां के इस लम्बे बिछोह ने निश्चय ही उसके सब्र का बांध तोड़ दिया होगा। राजलक्ष्मी बेटे के गिड़गिड़ाहट-भरे पत्र का इंतजार कर रही थीं।

बिहारी के नाम महेन्द्र का पत्र आया। लिखा था, “लगता हैं मां बहुत दिनों के बाद मैके गई हैं, शायद बड़े मजे में होंगी।”

राजलक्ष्मी ने सोचा, “महेन्द्र ने रूठकर ऐसा लिखा है। बड़े मजे में होंगी। महेन्द्र को छोड़कर बदनसीब मां भला सुख से कैसे रह सकती है?”

“अरे बिहारी, उसके बाद क्या लिखा है उसने, पढ़कर सुना तो जरा!”

बिहारी बोला-“और कुछ नहीं लिखा है, मां!”

और उसने पत्र को मुट्ठी से दौंचकर एक कापी में रखा और कमरे में एक ओर धप्प से पटक दिया।

राजलक्ष्मी अब भला थिर रह सकती थी! हो न हो, महेन्द्र मां पर इतना नाराज हुआ है कि बिहारी ने पढ़कर सुनाया नहीं।

गौ के थन पर चोट करके बछड़ा जिस प्रकार दूध और वात्सल्य का संचार करता है, उसी प्रकार महेन्द्र की नाराजगी ने आघात पहुंचाकर राजलक्ष्मी के घुटे वात्सल्य को उभार दिया। उन्होंने महेन्द्र को माफ कर दिया। बोलीं-“अहा, अपनी बहू को लेकर महेन्द्र सुखी है, सुखी रहे-जैसे भी हो, वह सुख से रहे। जो मां उसे छोड़कर कभी एक पल नहीं रह सकती, वही उसे छोड़कर चली आई है, इसलिए महेन्द्र अपनी मां से नाराज हो गया है।”

रह-रहकर उनकी आंखों में आंसू उमड़ने लगे।

उस दिन वह बार-बार बिहारी से जाकर कहती रहीं-“बेटे, तुम जाकर नहा लो। यहां बड़ी बदपरहेजी हो रही है तुम्हारी।”

उस दिन बिहारी का भी जी नहाने-खाने का न था। वह बोला-“मुझ जैसे अभागे बदपरहेजी में ही ठीक रहते हैं।”

राजलक्ष्मी अड़ गई-“नहीं-नहीं, नहा डालो!”

बार-बार जिद करने से बिहारी नहाने गया। उसका कमरे से बाहर कदम रखना था कि झपटकर राजलक्ष्मी ने वह किताब उठा ली और उसके अंदर से पत्र को निकाला।

पत्र उसने विनोदिनी को दिया। कहा, “पढ़ तो देखो जरा, महेन्द्र ने बिहारी को क्या लिखा है?”

पढ़कर विनोदिनी सुनाने लगी। शुरू में महेन्द्र ने मां के बारे में लिखा था, लेकिन बड़ा मुख्तसर। बिहारी ने जितना भर सुनाया, उससे ज्यादा कुछ नहीं।

उसके बाद आशा का जिक्र था। मौज-मजे और खुशियों से विभोर होकर लिखा था।

विनोदिनी ने थोड़ा पढ़ा और शर्म से थक गई। कहा-‘यह क्या सुनोगी, बुआ!’

राजलक्ष्मी का स्नेह से अकुलाया चेहरा पल-भर में जमकर पत्थर जैसा सख्त हो गया। जरा देर चुप रहीं, फिर बोली-‘रहने दो!’

और चिट्ठी उन्होंने वापस न ली। चली गई।

चिट्ठी लेकर विनोदिनी कमरे में चली गई। अंदर से कुंडी बन्द कर ली और बिस्तर पर बैठकर पढ़ने लगी।

चिट्ठी में विनोदिनी को क्या रस मिला, वही जाने। पढ़ते-पढ़ते उसकी आंखें दोपहर के तपे बालू-सी जलने लगीं। उसका निःश्वास रेगिस्तान की बयार जैसी गर्म हो उठी।

“कैसा है महेन्द्र, कैसी है आशा और इन दोनों का प्रेम ही कैसा है,” यही बात उसके मन को मथने लगी। पत्र को गोद में डाले, पांव फैलाए, दीवार से पीठ टिकाकर सामने ताकती वह देर तक सोचती रही।

महेन्द्र की वह चिट्ठी बिहारी को फिर ढूंढ़े न मिली।

अचानक उसी दिन दोपहर में अन्नपूर्णा आ धमकी। किसी बुरी खबर की आशंका से राजलक्ष्मी का कलेजा सहसा कांप उठा। कुछ पछने की उन्हें हिम्मत न हुई। वह फक पड़े चेहरे से अन्नपूर्णा की तरफ ताकती रह गई।

अन्नपूर्णा ने कहा-‘कलकत्ता का समाचार ठीक है।’

राजलक्ष्मी ने पूछा-‘फिर तुम यहां कैसे?’

अन्नपूर्णा बोलीं-‘दीदी, अपनी गृहस्थी तुम जाकर सम्हालो। संसार से अपना जी उचट गया है। मैं काशी जाने की तय करके निकली हूं। तुम्हें प्रणाम करने आ गई। जान में, अनजान में जाने कितने कसूर हो गए हैं माफ करना। और तुम्हारी बहू…, कहते-कहते आंखों से आंसू उफन उठे-’वह नादान बच्ची है, उसके मां नहीं; वह दोषी हो चाहे निर्दोष, तुम्हारी है।’

अन्नपूर्णा और न बोल सकी।

राजलक्ष्मी जल्दी से उनके नहाने-खाने का इंतजाम करने गई। बिहारी को मालूम हुआ तो वह घोष की मठिया से दौड़ आया। अन्नपूर्णा को प्रणाम करके बोला-“ऐसा भी होता है भला, हम सबको निर्दयी की तरह ठुकराकर तुम चल दोगी?”

आंसू जब्त करके अन्नपूर्णा ने कहा-“मुझे अब फेरने की कोशिश मत करो बिहारी, तुम लोग सुखी रहो, मेरे लिए कुछ रुका न रहेगा।”

बिहारी कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला-“महेन्द्र की किस्मत खोटी है कि उसने तुम्हें रुखसत कर दिया।”

अन्नपूर्णा चौंककर बोलीं-“ऐसा मत कहो, मैं उस पर बिलकुल नाराज नहीं हूं। मेरे गए बिना उनका भला न होगा।”

बहुत दूर ताकता हुआ बिहारी चुप बैठा रहा। अपने आंचल से सोने की दो बालियां निकालकर अन्नपूर्णा बोलीं-“बेटे, ये बालियां रख लो! बहू आये तो मेरा आशीर्वाद जताकर इन्हें पहना देना!”

बालियां मस्तक से लगाकर आंसू छिपाने के लिए बिहारी बगल के कमरे में चला गया।

जाते वक्त बोलीं-“मेरे महेन्द्र और मेरी आशा का ध्यान रखना, बिहारी!”

राजलक्ष्मी के हाथों उन्होंने एक कागज दिया। कहा-“ससुर की जायदाद में मेरा जो हिस्सा है, वह मैंने इस वसीयत में महेन्द्र को लिख दिया है। मुझे हर माह सिर्फ पन्द्रह रुपए भेज दिया करना!”

झुककर उन्होंने राजलक्ष्मी के पैरों की धूल माथे लगाई और तीर्थयात्रा को निकल पड़ी।

आशा को डर लगा। क्या हुआ यह? मां चली गई, मौसी चली गई। उन दोनों का सुख मानो सबको खल रहा है, अब उसकी बारी है शायद। सूने घर में दाम्पत्य की नई प्रेम-लीला उसे न जाने कैसी लगने लगी।

संसार के कठोर कर्तव्यों से प्रेम को फूल के समान तोड़कर अलग कर लेने पर यह अपने ही रस से अपने को संजीवित नहीं रख पाता, धीरे-धीरे मुरझाकर विकृत हो जाता है। आशा को भी ऐसा लगने लगा कि उनके अथक मिलन में एक थकान और कमजोरी है। वह मिलन रह-रहकर मानो शिथिल हो जाता है-प्रेम की जड़ अगर कामों में न हो तो भोग का विकास पूर्ण और स्थायी नहीं होता।

महेन्द्र ने भी अपने विमुख संसार के खिलाफ विद्रोह करके अपने प्रेमोत्सव के सभी दीपों को एक साथ जलाकर बड़ी धूमधाम से सूने घर के अमंगल में ही उसने आशा से कहा-“तुम्हें इन दिनों हो क्या गया है, चुन्नी! मौसी चली गई तो इस तरह मुंह लटकाए क्या रहती हो? हम दोनों के प्रेम में क्या सभी प्रेम समाए हुए नहीं हैं।

आशा दु:खी होकर सोचती-अपने प्रेम में कोई अपूर्णता तो है। मैं तो मौसी की बात सोचा करती हूं। सास चली गई हैं, इसका मुझे डर लगता है।’

घर के कामकाज अब ठीक से नहीं चलते। नौकर-चाकर कन्नी काटने लगे। ‘तबियत खराब है’ कहकर नौकरानी एक दिन नहीं आई रसोई पकाने वाला ब्राह्मण शराब पीकर गायब हो गया। महेन्द्र ने आशा से कहा-‘खूब मजा आया, आज हम लोग खुद ही रसोई बनाएं।’

गाड़ी से महेन्द्र न्यू मार्केट गया। कौन-सी चीज कितनी चाहिए, इसका उसे कुछ भी पता न था, बहुत-सा सामान उठाकर खुशी-खुशी घर लौटा। उन चीजों का किया क्या जाए, यह आशा भी ठीक से न जानती थी। प्रयोग में ही दिन के दो-तीन बज गए और बहुत-सा अजीबो-गरीब खाना तैयार करके महेन्द्र को बड़ा मजा आया। लेकिन आशा महेन्द्र के उस मजे में साथ न दे सकी। अपनी अज्ञता पर उसे मन-ही-मन बड़ी लज्जा और कुढ़न हुई।

कमरे की चीजें इस कदर बिखर गई थीं कि जरूरत पर कुछ पाना ही कठिन था। महेन्द्र की डॉक्टरी वाली छुरी एक दिन तरकारी काटने के काम आई और कूड़ों के ढेर में जा छिपी; जिस पर वह नोट लिखा करता था, वह कापी पंखे का काम करके अन्त में रसोई की राख में आराम करने लगी।

इन अनहोनी घटनाओं से महेन्द्र के कौतूहल की सीमा न रही, लेकिन आशा को इससे तकलीफ होने लगी। बेतरतीबी के बहाव में सारी गृहस्थी को बहाकर हंसते हुए उसी के साथ बहते चलना उस बालिका को विभीषिका जैसा लगा।

एक दिन शाम को दोनों बरामदे में बैठे थे। सामने खुली छत। बारिश खुल जाने से कलकत्ता की दूर तक फैली इमारतों की चोटियां चांदनी में नहा रही थीं। बगीचे से मौलसिरी के बहुत-से ओदे फूल लाकर आशा माथा झुकाए माला गूंथ रही थी। महेन्द्र खींचातानी करके, रुकावट डालकर, उल्टा-सीधा सुनाकर नाहक ही झगड़ा करना चाह रहा था। बेवजह इस तरह सताये जाने के कारण आशा उसे झिड़कना चाहती थी कि किसी बनावटी उपाय से उसका मुंह दबाकर महेन्द्र उसकी कहन को अंकुराते ही कुचल रहा था।

किसी पड़ोसी के पिंजरे की कोयलिया कूक उठी। महेन्द्र ने उसी दम अपने सिर पर झूलते हुए पिंजरे को देखा। अपनी कोयल पड़ोसी की कोयल की बोली चुपचाप कभी नहीं सह सकती-आज वह चुप क्यों है?

महेन्द्र ने कहा-“तुम्हारी आवाज से लजा गई है।”

उत्कंठित होकर आशा ने कहा-“आज इसे हो क्या गया।”

आशा ने निहोरा करके कहा-“मजाक नहीं, देखो न, उसे क्या हुआ है?”

महेन्द्र ने पिंजरे को उतारा। पिंजरे पर लिपटे हुए कपड़ों को हटाया। देखा, कोयल मरी पड़ी थी। अन्नपूर्णा के जाने के बाद खानसामा छुट्टी पर चला गया था। कोयल का किसी ने खयाल ही न किया था।

देखते-ही-देखते आशा का चेहरा फीका पड़ गया। उसकी अंगुलियां चल न सकी-फूल यों ही पड़े रह गए। चोट तो महेन्द्र को भी लगी, लेकिन नाहक ही रस-भंग होगा, इसलिए उसने इसे हंसकर टाल जाने की कोशिश की। बोला-

“अच्छा ही हुआ। मैं इधर डॉक्टरी को निकलता और उधर यह कमबख्त ‘कू-कू’ करके तुम्हें जलाया करती थी।”

कहकर अपने बाहु-पाश में लपेटकर उसने आशा को अपने पास खींच लेना चाहा। अपने को धीरे-धीरे उसके बन्धन से छुड़ाकर आशा ने आंचल से मौलसिरी के सब फूल गिरा दिए। बोली-“छिः छि; अब देर क्यों? जल्दी जाकर मां को ले लाओ!”

इतने में दुतल्ले से ‘महेन्द्र भैया’ की पुकार सुनाई पड़ी। ‘अरे रे, आओ-आओ…’ महेन्द्र ने जवाब दिया। बिहारी की आवाज से उसका हृदय खिल उठा। विवाह के बाद वह इन दोनों के सुख का बाधक बनकर कभी-कभी आता रहा है, आज वही बाधा सुख के लिए निहायत जरूरी लगी।

बिहारी का आना आशा को भी अच्छा लगा। वह जरा घूंघट खींचकर जल्दी से उठ बैठी। महेन्द्र बोला-‘अरे, जा कहां रही हो, और कोई नहीं, बिहारी आ रहा है।’

आशा ने कहा-‘भाई साहब के लिए नाश्ता ले आऊं?’

एक काम का मौका आ गया, इससे आशा का अवसाद कुछ हल्का हो गया।

सास की कुशल के लिए घूंघट काढ़े वह खड़ी रही। बिहारी से अभी भी वह बोलती-चालती नहीं।

अन्दर कदम रखते ही बिहारी ने कहा-“तौबा-तौबा! कैसे कवित्व के बीच आ टपका मैं! खैर फिक्र न करो भाभी, मैं बैरंग वापस जाता हूं।

आशा ने महेन्द्र की तरफ ताका। महेन्द्र ने पूछा-“मां की क्या खबर है, बिहारी?”

बिहारी बोला-“मां और चाची की चर्चा अभी क्यों भाई, काफी समय है।

सच ए नाइट वाज नाट मेड फार मदरस एंड आंटस।

कहकर बिहारी लौट पड़ा। महेन्द्र ने उसे जबर्दस्ती खींचकर बिठा दिया। बिहारी ने कहा-“देख लो भाभी, कसूर मेरा नहीं है-यह मुझे जबरन खींच लाया है-पाप इसने किया है, अभिशाप मुझ पर न पड़े।”

आशा से कोई जवाब देते नहीं बनता, इसलिए ऐसी बातों से वह खीझ उठती है। बिहारी जानकर उसे तंग करता है।

बिहारी ने कहा-“घर की हालत आंखों से देख रहा हूं-अब भी क्या मां को लाने का वक्त नहीं आया?”

महेन्द्र ने कहा-“बेशक! हम तो उन्हीं की राह देख रहे हैं।”

बिहारी ने कहा-“यही जताते हुए उन्हें पत्र लिखने में तुम्हें नाम का समय लगेगा, लेकिन उनकी खुशी का अन्त न रहेगा। भाभी, उन दो मिनटों के लिए महेन्द्र भैया को तुम्हें फुरसत देनी पड़ेगी, मेरी दरखास्त रही।”

आशा बिगड़कर चली गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

महेन्द्र बोला-“जाने किस शुभ घड़ी में तुम दोनों की भेंट हुई थी-आखिर सुलह नहीं ही हो सकी-वहीं खट-पट।”

बिहारी ने कहा-“तुम्हें तुम्हारी मां ने तो बर्बाद किया ही, पत्नी भी बर्बाद करने पर तुली है। यही मुझसे नहीं देखा जाता, इसी से जब-तब कुछ कह देता हूं।”

महेन्द्र-“मगर नतीजा क्या होता है उसका?”

बिहारी-“नतीजा तुम्हारे लिए कुछ खास नहीं होता, मेरे लिए थोड़ा-बहुत होता है।”

बिहारी ने खुद बैठकर महेन्द्र से चिट्ठी लिखवाई और उस पत्र के साथ दूसरे ही दिन राजलक्ष्मी को लेने गया। राजलक्ष्मी समझ गई, चिट्ठी बिहारी ने लिखवाई है-मगर फिर भी उससे रहा न गया। साथ-साथ विनोदिनी आई।

लौटकर उन्होंने घर की जो बदतर हालत देखी-तमाम यों ही गन्दा पड़ा, तितर-बितर-इसलिए बहू के प्रति उनका मन और भी खराब हो गया।

लेकिन बहू में यह कैसा परिवर्तन! वह छाया-सी उनके पीछे डोलती फिरती। कहें, न कहें, हरदम हर काम में हाथ बंटाने को मुस्तैद। आजिज आकर वह कह उठतीं-“छोड़ो-छोड़ो, मिट्टी पलीद करके रख दोगी तुम! जो काम आता नहीं, उसमें हाथ क्या डालना?”

राजलक्ष्मी के जी में आया, “हो न हो, अन्नपूर्णा के चले जाने से ही बहू की यह तरक्की हुई है।” लेकिन फिर मन में आया, “महेन्द्र सोचेगा, चाची थीं तो मैं बीवी के साथ निष्कंटक मौज करता था और मां का पहुंचना था कि विरह का दुःख शुरू हो गया। इससे यही साबित होगा कि चाची उसकी शुभैषी रहीं, मां सुख का कांटा है। रहने दो, अपने को क्या पड़ी?”

इधर कहीं महेन्द्र दिन को बुला भेजता तो बहू जाने में अनाकानी करती। राजलक्ष्मी ही झिड़का करतीं-“महेन्द्र बुला रहा है, तुम टाल जाती हो! ज्यादा दुलार पाने का यही नतीजा होता है। जाओ, सब्जियां मैं देख लूंगी।”

फिर शुरू होता वही स्लेट-पेंसिल और ‘चारुपाठ’ का झूठ नाटक। प्रेम के अकारण अभियोग से एक-दूसरे को दोषी ठहराना-किसका प्रेम ज्यादा वजनी है, इस पर निरर्थक वाद-विवाद। वर्षा के दिन को रात और चांदनी रात को दिन बनाना।

ऐसे में एक दिन विनोदिनी आशा के गले से लिपटकर बोली-“बहन, तुम्हारा सौभाग्य अक्षय हो…जुग-जुग जियो! लेकिन चूंकि मैं दुखिया हूं, इसलिए क्या मेरी तरफ एक नजर ताकना भी गुनाह है?”

छुटपन से ही अपने आत्मीय के यहां पराई-सी पली थी, इसलिए लोगों के सामने आशा सदा संकुचित रहा करती। जुड़ी भौंहे और तीखी निगाह, अनिंद्य मुखड़ा और भरी हुई जवानी लिए जब विनोदिनी आई, तो खुद बढ़कर उससे परिचय करने की हिम्मत आशा की न हुई।

आशा ने गौर किया, राजलक्ष्मी से विनोदिनी को किसी भी तरह का संकोच नहीं। और मानो आशा को दिखा-दिखाकर राजलक्ष्मी भी उसका काफी आदर करतीं। यह भी देखा, घर के कामकाज में विनोदिनी पटु है, प्रभुत्व मानो उसके लिए बहुत ही सहज है, स्वभाव सिद्ध-नौकर-नौकरानियों से काम लेने, झिड़कने-फटकारने और हुक्म देने में उसे जरा भी हिचक नहीं होती। यह सब देख-भालकर विनोदिनी के आगे आशा अपने को बहुत छोटा समझने लगी।

वही सर्वगुण संपन्न विनोदिनी जब खुद उससे नेह की भीख मांगने आई, तो उसका आनन्द चौगुना हो उमड़ पड़ा। जादूगर के माया-तरु की तरह उसके प्रेम का बीज एक ही दिन में अंकुराया, पत्तों से लद गया और फल-फूल उठा।

आशा ने कहा-“हम-तुम सखियां हुईं, एक कोई नाम रख छोड़ें हम अपना।”

विनोदिनी ने हंसकर पूछा-“क्या आखिर?”

आशा ने बहुत-से अच्छे-अच्छे नाम गिनाए-“हरसिंगार, कदंब, मौलसिरी…”

विनोदिनी बोली-“ये सारे-के-सारे बड़े पुराने पड़ गए। इन दुलार के नामों की कोई कद्र नहीं।”

आशा ने पूछा-“फिर तुम्हें कौन-सा पसन्द है?”

हंसकर विनोदिनी ने कहा-“आंख की किरकिरी।”

आशा कोई मीठा-सा नाम ही चाहती थी, लेकिन विनोदिनी की पसन्द से उसने दुलार की इस गाली को ही कबूल कर लिया। बांहों से उसकी गरदन लपेटकर बोली-“मेरी आंख की किरकिरी!”

और हंसते-हंसते लोट-पोट हो गई।

आशा को एक साथी की बड़ी जरूरत भी थी। प्यार का त्योहार भी महज दो आदमियों से नहीं मनता–मीठी बातों की मिठाई बांटने के लिए गैरों की भी जरूरत पड़ती है।

भूखी-प्यासी विनोदिनी भी नई बहू से प्रेम के इतिहास को शराबी की दहकती हुई सुरा के समान कान फैलाकर पीने लगी। सूनी दोपहरी में मां जब सोती होती, घर के नौकर-चाकर निचले तल्ले के आरामगाह में छिप जाते, बिहारी की ताकीद से महेन्द्र कुछ देर के लिए कालेज गया होता और धूप से तपी नीलिमा के एक छोर से चील की तीखी आवाज बहुत धीमी सुनाई देती, तो कमरे के फर्श पर अपने बालों को तकिए पर बिखेरे आशा लेट जाती और पेट के नीचे तकिया रखकर पट पड़ी विनोदिनी उसकी गुन-गुन स्वर से कही जाने वाली कहानी में तन्मय हो जाती-उसकी कनपटी लाल हो उठती, सांस जोर-जोर से चलने लगती।

विनोदिनी खोद-खोदकर पूछती और छोटी-से-छोटी बात भी निकाल लेती, एक ही बात कई बार सुनती-घटना खत्म हो जाती तो कल्पना करती; कहती-“अच्छा बहन, कहीं ऐसा होता तो क्या होता और यह होता तो क्या करती?” इन अनहोनी कल्पनाओं की राह में सुख की बातों को खींचकर दूर तक ले जाना आशा को भी अच्छा लगता।

विनोदिनी कहती-“अच्छा भई आंख की किरकिरी, तुझसे कहीं बिहारी बाबू का ब्याह हुआ होता तो?”

आशा-“राम-राम, ऐसा न कहो! बड़ी शर्म आती है मुझे। हां, तुम्हारे साथ होता तो क्या कहने! चर्चा तो तुमसे होने की भी चली थी।”

विनोदिनी-“मुझसे तो जाने कितनों की, कितनी ही बातें चलीं। न हुआ, ठीक ही हुआ। मैं जैसी हूं, ठीक हूं।”

आशा प्रतिवाद करती। वह भला यह कैसे कबूल कर ले कि विनोदिनी की अवस्था उससे अच्छी है। उसने कहा-“जरा यह तो सोच देखो, अगर मेरे पति से तुम्हारा ब्याह हो जाता! होते-होते ही तो रह गया।”

होते-होते ही रह गया। क्यों नहीं हुआ? आशा का यह बिस्तर, यह पलंग सभी तो उसी का इन्तजार कर रहे थे। उस सजे-सजाये शयनकक्ष को विनोदिनी देखती और इस बात को किसी भी तरह न भुला पाती। इस घर की वह महज एक मेहमान है-आज उसे जगह मिली है, कल छोड़ जाना होगा।

तीसरे पहर विनोदिनी खुद अपनी अनूठी कुशलता से आशा का जूड़ा बांध देती और जतन से श्रृंगार करके उसके पति के पास भेजा करती।

इस तरह खामखाह देर कर देना चाहती।

नाराज होकर महेन्द्र कहता, “तुम्हारी यह सहेली तो टस से मस नहीं होना चाहती-घर कब जाएंगी?”

उतावली हो आशा कहती, “न-न, मेरी आंख की किरकिरी पर तुम नाराज क्यों हो। तुम्हें पता नहीं, तुम्हारी चर्चा उसे कितनी अच्छी लगती है-किस जतन से वह सजा-संवार कर मुझे तुम्हारे पास भेजा करती है।”

राजलक्ष्मी आशा को कुछ करने-धरने न देतीं। विनोदिनी ने उसकी तरफदारी की, और उसे काम में जुटाया। विनोदिनी को आलस जरा भी नहीं था। दिन-भर एक-सी काम में लगी आशा को वह छुट्टी नहीं देना चाहती। एक के बाद दूसरा, वह कामों का कुछ ऐसा क्रम बनाती कि आशा के लिए जरा भी चैन पाना गैरमुमकिन था। आशा का पति छत वाले सूने कमरे में बैठा चिढ़ के मारे छटपटा रहा है-यह सोचकर विनोदिनी मन-ही-मन हंसती रहती। आशा अकुलाकर कहती, “भई आंख की किरकिरी, अब इजाजत दो, वह नाराज हो जाएंगे।”

झट विनोदिनी कहती, “बस, जरा-सा। इसे खत्म करके चली जाओ! ज्यादा देर न होगी।”

जरा देर में आशा फिर उद्विग्न होकर कहती “न बहन, अब वह सचमुच ही नाराज होंगे। मुझे छोड़ दो, चलूं मैं।”

विनोदिनी कहती, “जरा नाराज ही हुए तो क्या। सुहाग में गुस्सा न मिले तो मुहब्बत में स्वाद नहीं मिलता-जैसे सब्जी में नमक-मिर्च के बिना।”

लेकिन नमक-मिर्च का मजा क्या होता है, यह विनोदिनी ही समझ रही थी-न थी सिर्फ उसके पास सब्जी। उसकी नस-नस में मानो आग लग गई। जिधर भी नजर करती, चिनगारियां उगलती उसकी आंखें। ऐसी आराम की गिरस्ती! ऐसे सुहाग के स्वामी! इस घर को तो मैं राजा की रियासत, इस स्वामी को अपने चरणों का दास बनाकर रखती। (आशा को गले लगाकर) “भई आंख की किरकिरी, मुझे बताओ न, कल तुम लोगों में क्या बातें हुईं। तुमने वह कहा था, जो मैंने करने को कहा था? तुम लोगों के प्यार की बातें सुनकर मेरी भूख-प्यास जाती रहती है।”

एक दिन आखिर आजिज आकर महेन्द्र ने मां से कहा-“यह अच्छी बात है, मां? दूसरे के घर की एक जवान विधवा को घर रखकर एक भारी जिम्मेदारी कंधे पर लाद लेने की क्या पड़ी है? जाने कब क्या मुसीबत हो?”

राजलक्ष्मी ने कहा-“अरे, यह तो अपने विपिन की बहू है, इसे मैं बिरानी थोड़े ही समझती हूं।”

महेन्द्र ने कहा-“जो कहो, लेकिन यह अच्छा नहीं है। मेरी राय में इसे रखना ठीक नहीं।”

राजलक्ष्मी खूब जानती थीं कि महेन्द्र की राय को ठकराना आसान नहीं। इसलिए उन्होंने बिहारी से कहा-“अरे बिहारी तू एक बार महेन्द्र को समझाकर देख। यह विपिन की बह जबसे यहां है, तभी से इस बुढ़ापे में मुझे थोड़ा आराम मिला है। वह पराई हो या जो हो, किसी से कभी ऐसी सेवा नहीं करता है।”

बिहारी ने कोई जवाब न दिया। वह जाकर महेन्द्र से बोला, “क्या, विनोदिनी की भी सोचते हो?”

महेन्द्र ने हंसकर कहा-“सोचकर रात की नींद हराम है। अपनी भाभी से पूछ देखो, विनोदिनी के ध्यान से इन दिनों और सब ध्यान टूट गया है।”

घूंघट की आड़ से आशा ने महेन्द्र को चुपचाप धमकाया। बिहारी ने कहा-“अच्छा, दूसरा विषवृक्ष!1 चुन्नी उसे यहां से निकाल बाहर करने को छटपटा रही है।”

घूंघट से आशा की आंखों ने फिर उसे झिड़का।

बिहारी ने कहा-“निकाल ही बाहर करो तो लौट आने में कितनी देर लगती है! अरे, विधवा का विवाह रचा दो, विष के दांत एकबारगी टूट जाएंगे।”

महेन्द्र बोला-“विवाह तो कुन्द का भी कर दिया गया था।”

बिहारी ने कहा-“इस उपमा को अभी छोड़ो! विनोदिनी की बात कभी-कभी मैं सोचा करता हूं। तुम्हारे यहां तो जिन्दगी भर यह रह नहीं सकती। और इनके यहां का जंगल किसी के लिए भी वनवास है।

विनोदिनी आज तक महेन्द्र के सामने नहीं गई, पर बिहारी ने उसको देखा है। उसने सिर्फ इतना समझा है कि यह स्त्री जंगल में छोड़ने लायक नहीं है। लेकिन शिखा घर के दिये में एक तरह से जलती है, और दूसरी तरह वह घर को आग भी लगा देती है। महेन्द्र के मन में यह शंका भी थी।

महेन्द्र ने इस बात पर बिहारी की खूब खिल्ली उड़ाई। बिहारी ने भी इसका जवाब दिया। लेकिन उसके मन ने समझा था कि यह स्त्री खिलवाड़ करने की नहीं, उसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।

राजलक्ष्मी ने विनोदिनी को सावधान कर दिया। कहा-“देखना बेटी, बहू से इतनी मिठास न रखना! तुम गांव-घर में गृहस्थ के यहां रही हो-आजकल के चाल-चलन को नहीं जानतीं। बुद्धिमती हो, समझ-बूझकर चलना!’

इसके बाद विनोदिनी ने आशा को दूर ही दूर रखा। कहा-“मैं भई होती कौन हूं! मेरी जैसी स्त्री से अगर आप अपनी इज्जत बचाकर चलना नहीं चाहते तो कब क्या हो जाएगा, कौन कह सकता है?”

आशा निहोरे-विनती करती, गिड़गिड़ाती, रोती-पीटती, लेकिन विनोदिनी एकदम अडिग। बातों से आशा आकंठ भर उठी, मगर विनोदिनी ने तरजीह न दी।

इधर महेन्द्र के बाजू शिथिल हो गए। जो अनियम और उच्छृखंलता पहले उसे कौतुक-सी लगती थी, वही अब धीरे-धीरे उसे दुखाने लगी। आशा की सांसारिक अपटुता से उसे खीझ होती, लेकिन जबान खोलकर कहता नहीं।

प्यार की जलती हुई सेज पर आंख खोलकर धीरे-धीरे घर-गृहस्थी के धन्धों, लिखाई-पढ़ाई में ध्यान देकर महेन्द्र ने करवट बदली। अपनी चिकित्सा-सम्बन्धी किताबों का उसने जाने कहां-कहां से उद्धार किया और अपने कोट-पतलून को धूप दिखाने की चेष्टा की।

  1. बंकिमचन्द्र चटर्जी का उपन्यास।

विनोदिनी जब बिलकुल ही पकड़ में न आई, तो आशा को एक तरकीब सूझी। बोली, “भई आंख की किरकिरी, तुम मेरे पति के सामने क्यों नहीं आतीं, भागती क्यों फिरती हो?”

विनोदिनी ने बड़े संक्षेप में लेकिन तेज स्वर में कहा-“छि:!” आशा बोली, “क्यों? मां से मुझे पता चला है, तुम हम लोगों की गैर नहीं हो।”

गंभीर होकर विनोदिनी ने कहा-“संसार में अपना-पराया कोई नहीं होता। जो अपना मानता है, वही अपना है और जो पराया समझता है, वह अपना होते हुए भी पराया है।”

आशा ने देखा, यह बात लाजवाब है। वास्तव में उसके पति विनोदिनी के साथ ज्यादती करते हैं, सचमुच उसे गैर समझते हैं और नाहक ही उससे खीझा करते हैं।

उस दिन सांझ को आशा ने बड़े नाजो-अंदाज से पति के सामने छेड़ा-“तुम्हें मेरी आंख की किरकिरी से परिचय करना पड़ेगा।”

महेन्द्र हंसकर बोला, “तुम्हारे साहस की बलिहारी!”

आशा ने पूछा-“क्यों, इसमें डर किस बात का?”

महेन्द्र-“अपनी सखी की जिस गजब की खूबसूरती का जिक्र किया करती हो वह लो खतरे से खाली नहीं।”

आशा ने कहा-“खैर, वह मैं देख लूंगी। तुम उससे बोलोगे या नहीं, इतना बता दो।”

विनोदिनी को देखने का कौतूहल महेन्द्र को भी था। फिर भी यह आग्रह उसे ठीक नहीं लग रहा था।

हृदय के नाते के बारे में महेन्द्र के उचित-अनुचित का आदर्श औरों की अपेक्षा कुछ कड़ा था। इसके पहले वह विवाह की बात नहीं सुनना चाहता था, इसलिए कि कहीं मां के अधिकार पर आंच न आये। और अब आशा के संबंध की रक्षा वह इस तरह से करना चाहता कि किसी पराई औरत के लिए मन में जरा-सा भी कौतूहल न पैदा हो। प्यार के मामले में वह बड़ा वैसा-सा है, लेकिन पक्का-इस बात का उसे मन-ही-मन नाज भी था। यहां तक कि वह चूंकि बिहारी को अपना दोस्त कहता, इसलिए दूसरे किसी को भी वह मित्र नहीं मानना चाहता। कोई उसकी ओर खींचकर आता भी तो वह जबर्दस्ती उसकी ओर से लापरवाही दिखाता और बिहारी के सामने उस बेचारे का मजाक उड़ाते हुए अपनी उदासी जाहिर करता। बिहारी कहीं एतराज करता तो महेन्द्र कहता, “यह तुमसे हो सकता है। कहीं भी जाते हो, तुम्हें मित्रों की कमी नहीं रहती… मगर मैं हर किसी को मित्र नहीं मान सकता।”

ऐसे महेन्द्र का मन जब इधर एक अपरिचिता की ओर कौतूहल और व्यग्रता से बरबस खिंच जाया करता, तो अपने आदर्श के आगे वह नीचा हो जाता। सो वह विनोदिनी को घर से हटाने के लिए अपनी मां को तंग करने लगा।

महेन्द्र ने कहा-“रहने भी दो चुन्नी, तुम्हारी किरकिरी से गप-शप की फुर्सत कहां है अपने पास? पढ़ने के वक्त किताबों से नाता और फुर्सत की घड़ियों के लिए तुम हो-इस बीच…!”

आशा ने कहा-“खैर, तुम्हारी पढ़ाई के समय का हिस्सा नहीं लूंगी, अपने ही समय में से कुछ मैं अपनी किरकिरी को दे दूंगी।”

महेन्द्र बोला-“माना तुम दे दोगी, मगर मैं क्यों दूंगा?”

दोनों के बीच में विनोदिनी के लिए सुई की नोक-भर भी जगह छोड़ने को महेन्द्र तैयार नहीं था, यह बात उसके गर्व का विषय बन बैठी। उसका वह गर्व आशा से सहा नहीं जाता, पर आज उसने हार कबूल कर ली। कहा-“खैर, मेरी ही खातिर तुम मेरी किरकिरी से बोलो!”

आशा के आगे अपने प्रेम की दृढ़ता और श्रेष्ठता प्रमाणित करके अन्त में बड़ी कृपा करके वह विनोदिनी से बात करने को राजी हुआ।

दूसरे दिन सुबह आशा गई और सोई हुई विनोदि