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अखरोट का दंदासा - 21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश

07:00 PM Jul 05, 2024 IST | Reena Yadav
अखरोट का दंदासा   21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश
akharot ka dandaasa
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

सेवती देवी का गांव बहुत ऊंचाई पर था। वहां खूब बर्फ पड़ती थी। गांव के पीछे घने जंगल थे जिसमें चुल्ली (जंगली खुबानी) और अखरोट के पेड़ भी थे। दाडू (खट्टे अनार) के पेड़ भी थे। गांव के लोग चुल्ली झाड़कर ले आते और उसकी गुठलियों को तोड़कर उसके तेल का प्रयोग घर में करते थे। दाडू से दाना निकालकर बेचते और अखरोट की जड़ों से छाल निकालकर दंदासा (दातुन) बेचा करते थे।

सेवती को अखरोट के दंदासे से दांत साफ करना बहुत पसंद था। जब तक गांव में थी तब तक तो उसका यह शौक आराम से पूरा होता रहा। पर बाद में बच्चों की पढ़ाई के लिए उसे शिमला आना पड़ा। पर वह जब भी गांव जाती खूब सारा दंदासा निकाल कर ले आती और अपनी सहेलियों को भी बांट देती। शहर में रहते हुए भी उसने कभी लिपस्टिक नहीं खरीदी थी। बस दंदासे से ही दांत चमकाती और होंठ तो अपने आप लाल हो जाते थे उसके।

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इस बार कई साल बाद वह गांव आई थी। जब वापस आने को थोड़ा समय रह गया तो उसने अपने उस रिश्तेदार को बुलवाया जो उसे जंगल से दंदासा लाकर दिया करता था। पर वह बीमार था, आ नहीं सका। सेवती सोच में पड़ गई कि अब उसे दंदासा कैसे मिलेगा? भाई ने हंसते हुए कहा, “जंगल जाकर खुद निकाल लाओ। कौन-सा मुश्किल काम है।”

सेवती को भाई की बात चुनौती-सी लगी। इसलिए दूसरे दिन उसने अपने भाई की बेटी तनु को साथ लिया और जंगल में दंदासा खोजने निकल पड़ी। तनु जाना नहीं चाहती थी। उसे पता था कि दंदासा पेड़ की जड़ों की छाल से निकला जाता है। उसने कुछ ही दिन पहले स्कूल में पढ़ा था कि जड़ें काटने से पेड़ सूख जाते हैं। जंगल से फलदार पेड़ कम हो रहे हैं। जंगली पशु-पक्षी जंगली फलों को खाकर जीते हैं। भोजन न मिलने से शहरों और गांवों की तरफ आ रहे हैं और खेती को नष्ट कर रहे हैं। उन्हें पाठशाला में अध्यापिका ने शपथ दिलाई थी कि वे बेमतलब किसी पेड़ को हानि नहीं पहुंचाएंगे। वह बुआ के साथ बेमन से ही आ तो गई। पर सोच रही थी कि कैसे रोके बुआ को पेड़ की जड़ें काटने से। यही सोचते-सोचते उन्होंने सारा जंगल छान मारा, पर अखरोट का पेड़ नहीं मिला तो नहीं मिला। यही नहीं, कई जगह वे दोनों कांटेदार झाड़ियों से भी उलझीं।

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दोनों दिन भर भटकती रहीं पर उन्हें जंगल में एक भी पेड़ अखरोट का नहीं मिला। थक-हार कर शाम को खाली हाथ लौटना पड़ा। रात को भाई ने पूछा, “क्यों सेवती! मिला नहीं दंदासा।”

सेवती को एक तो दंदासा न मिलने का गुस्सा था, ऊपर से कांटों से कपड़े भी फटे और कई जगह कांटों से हाथ-पैर भी छिल गये थे। उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

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“बुआ, जख्म वाली ट्यूब लगा दूं?” तनु ने कहा तो बुआ ने हां में सिर हिला दिया बस।

तनु ने ट्यूब लगाते हुए कहा, “बहुत दर्द हो रहा है बुआ?”

“हां रे! कपड़े भी फटे और खून भी निकला। फिर भी दंदासा नहीं मिला।”

“एक बात कहूं बुआ? कभी सोचा तुमने, इन पेड़ों को भी दर्द होता है जब हम इनकी जड़ें काटते हैं? थोड़ा-थोड़ा सब काटते रहे और पेड़ सूख गये। हमारे गुरु जी कह रहे थे, पेड़ों में भी जान होती है।”

“चुप रह, ज्यादा ज्ञानी मत बन। कल बगीचे के अखरोट से दंदासा निकालूंगी।”

यह सुनकर तनु का मुंह सूख गया और वह चुपचाप वहां से बाहर निकल गई। सुबह न तो उसने बुआ को नमस्ते कहा और न उसके साथ बात की। कुछ खाया भी नहीं और बगीचे में जाकर अखरोट के पेड़ों के पास बैठ गई।

घर में जब तनु की खोज हुई तो वह किसी को भी नहीं मिली। धीरे-धीरे रात घिरने लगी पर तनु का कुछ पता नहीं चल रहा था। अचानक सेवती ने कहा, “भैया! बगीचे में भी देखा क्या?”

“अरे, यह तो किसी ने सोचा ही नहीं।”

सब दौड़ पड़े बगीचे की तरफ। उन्होंने देखा तनु अखरोट के तने से लगी बैठी थी। उनको आते देखकर चीखने लगी, “नहीं, मैं नहीं काटने दूंगी इसकी जड़ें। मेरा पेड़ मर जाएगा। नहीं नहीं, नहीं।”

“नहीं तनु! हम तेरे पेड़ की जड़ें नहीं काटेंगे। माफ कर दे बेटी।” सेवती की आंखों से आंसू निकल आए।

“सच बुआ?”

“हां बेटा! दांत साफ करने के लिए दंदासा जरूरी नहीं। और भी बहुत कुछ है। हम तेरे पेड़ को नहीं छुएंगे।” सेवती ने उसे गोद में उठाते हुए कहा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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