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और बांध बन गया…. - 21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश

07:00 PM Jun 19, 2024 IST | Reena Yadav
और बांध बन गया…    21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश
aur baandh ban gaya
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

हर रोज की तरह आज भी भारतेश की मम्मी ऑफिस से घर आकर सीधे किचन गार्डन में गई। भारतेश उन्हें इस वक्त किचन गार्डन में ही जो मिलता था।

“भारतेश!” मम्मी ने आवाज दी तो मिट्टी से सन्ने हाथों को झाड़ते हुए भारतेश मम्मा से लिपट गया।

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“अरे! तुम फिर गीले कपड़ों में? बीमार पड़ जाओगे बेटा!” भारतेश के गीले कपड़ों को देखकर मम्मी थोड़ा खीझ कर बोली।

“मम्मा! वो तो मैं प्लांट्स को पानी दे रहा था न! अब आप कपड़े बदल देना।” अपने बाल सुलभ अंदाज में भारतेश ने मम्मी को कहा और घर के अंदर दौड़ गया।

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“मेरे लिए आज क्या लाए, मम्मा!” भारतेश ने कपड़े बदलते-बदलते मम्मी से कहा तो मम्मी ने उसे क्रियोन का एक पैकेट दिया। क्रियोन लेकर भारतेश बहुत खुश हुआ। उसे ड्राइंग करना बहुत पसंद जो था।

यह रोज का सिलसिला था। भारतेश 6 वर्ष का होने वाला था। जब से उसने खेलना शुरू किया वह मिट्टी, पौधों, पानी और पत्थर से ही खेला। आजकल के बच्चों की तरह मोबाइल, लैपटॉप और कार्टून चैनल्स से दूर भारतेश अपने नैसर्गिक स्वभाव से ही प्रकृति प्रेमी था। हालांकि शिमला में अत्यधिक ठंड होने की वजह से उसे मिट्टी, पानी व बर्फ से खेलने से मम्मी रोकती रहती। पर वह अपने मन की कर ही लेता। बर्फ हो या बरसात, गर्मी हो या पतझड़, भारतेश जब देखो किचन गार्डन में मस्त रहता। इस छोटी सी उम्र में उसे हर चीज की जिज्ञासा रहती। पुदीना, धनिया, पालक, तुलसी, सरसों, बिच्छु बूटी, वीड्स उसे इन चीजों की अच्छी-खासी पहचान हो गई थी।

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उन सब चीजों में मम्मी को जो एक चीज अखरती थी वो था भारतेश का किचन गार्डन में पाइप से पानी बहाते रहना। शिमला में सारा साल पानी की किल्लत जो रहती। गर्मी हो तो पानी के स्रोत सूख जाते हैं। बरसात हो तो पानी में अत्यधिक मिट्टी-गाद आने से कथित जल-विभागों को पानी लिफ्ट करने में दिक्कत आती है और सर्दी हो तो बर्फ की वजह से जल की पाइपें जाम हो जाती है। आस-पास कोई प्राकृतिक स्रोत न होने से या फिर हैंडपंपस् का घरों से बहुत दूर होने से पानी की भरपाई करना मुश्किल हो जाता है। और फिर दो सौ, तीन सौ सीढ़ियां चढ़कर, उतरकर कौन पानी की बाल्टी भर उठा लाए। “उफ! पहाड़ का जीना भी कितना मुश्किल है।” मम्मी अक्सर कहती रहती।

ऑफिस जाने से पहले भारतेश को मम्मी की हिदायत जरूर मिलती कि वो व्यर्थ पानी न बहाए। पर फिर भी भारतेश अपने पापा को बहला-फुसला कर पानी खर्च करने में मना ही लेता।

पापा भी अक्सर भारतेश की मम्मी को यही कहते, “खेलने दो, न! पानी ही तो है। और फिर बेचारा करता ही क्या है? पौधों को ही तो सींचता है। अब छोटा है तो बेचारा व्यर्थ भी बहाएगा।”

मम्मी पानी की किल्लत की वजह से खीझती जरूर। मगर वो भी भारतेश की मिट्टी, पानी व पौधों के खेल से बहुत खुश रहती।

भारतेश के खेल का सिलसिला यूं चलता रहता। इस बार गर्मी की छुट्टियों में मम्मी-पापा ने मनाली घूमने का कार्यक्रम बनाया। भारतेश और उसकी बड़ी बहन रिया बहुत खुश थे। कुल्लू-मनाली के रास्ते में व्यास नदी पर बने पण्डोह डैम पर पापा ने कुछ देर गाड़ी रोकी। एक साथ अथाह जल भण्डार को देखकर भारतेश की बांछे खिल गई और भारतेश के प्रश्नों का सिलसिला शुरू हो गया।

कुछ ही देर में वे पण्डोह डैम से आगे मनाली के लिए चल पड़े। मगर भारतेश के पण्डोह बांध के जल भण्डार को लेकर जिज्ञासु प्रश्न खत्म नहीं हुए। बातों ही बातों में बांध क्या है? क्यों बनाए जाते हैं? भारतेश को काफी पता चल गया।

कुल्लू-मनाली का रास्ता यूं भी कल-कल बहती व्यास नदी के किनारे होने से दोनों बच्चों को खूब रोमांचित कर रहा था। रास्ते में पैराग्लाइडर देखकर दोनों को और ज्यादा मजा आया। और व्यास में रिवर-राफ्टिंग का नजारा देख भारतेश व रिया राफ्टिंग की जिद करने लगे। पर दोनों इस रोमांच के लिए अभी काफी छोटे थे। इसलिए मम्मी-पापा ने उन्हें समझा-बुझाकर टाल दिया।

कुल्लू-मनाली की यात्रा बहुत रोमांचकारी रही। चार दिन बाद शिमला लौटने पर भी भारतेश पण्डोह डैम, रिवर राफ्टिंग व रास्ते में दिखते ऊंचे झरनों की बातें करते न थकता।

“पापा, क्या हम किचन गार्डन में डैम नहीं बना सकते?” भारतेश ने पूछा तो मम्मी-पापा दोनों चौंक गए।

“लेकिन बेटा, उसके लिए बहुत जगह, बहुत ज्यादा पानी चाहिए न।” पापा ने कहा।

“पापा, हम रेन वाटर से अपना डैम बना लेंगे।” भारतेश ने इस तरह से बड़ों की तरह सोचकर मम्मी-पापा को पहली बार हैरान नहीं किया। इस तरह के सुझाव वो अपने बाल सुलभ अंदाज में बहुत बार देता था।

अचानक पापा को कुछ सूझी। उन्होंने अपने जान-पहचान वाले ठेकेदार को फोन करके बुलाया।

दूसरे दिन पापा ने वहीं किचन गार्डन में एक छोटी-सी आयताकार हौदी बनवा दी। जिसको उन्होंने रेन वाटर पाइप की ढलान से जोड़ दिया। अक्सर उस पाइप से कई बार ओवरफ्लो होती बिल्डिंग की टंकी का पानी भी आता था। उस रोज भी वही हुआ। कुछ पानी का ओवरफ्लो हुआ और रात को जमकर बारिश भी हुई। सुबह हुई तो देखा हौदी पानी से लबालब भर चुकी थी।

“बेटा, उठो! देखो, तुम्हारा डैम पानी से भर चुका है।” पापा की आवाज सुन भारतेश आंखें मलता हुआ झट से उठा और किचन गार्डन की ओर दौड़ा।

बारिश होने के बाद शिमला में ठंड हो जाना एक आम बात थी। मम्मी ने भारतेश को रोककर जैकेट पहनाई तब उसे बाहर निकलने दिया। भारतेश की खुशी का ठिकाना न था।

हालांकि आज भारतेश के पौधों को पानी ही जरूरत न थी। मगर पानी देखकर वह बोला, “देखा, मैंने कहा था न कि यहां डैम बन सकता है!”

“हां, क्यों नहीं! यह भारतेश का ही तो आइडिया है।”

“भारतेश अन्दर आ जाओ। स्कूल जाने का भी टाइम हो रहा है। दूध पीकर नहा-धो लो।” मम्मी ने किचन से आवाज दी तो भारतेश पापा के साथ अन्दर आ गया।

उस शाम मम्मी जब ऑफिस से घर आकर किचन गार्डन गई तो भारतेश को पानी की हौदी में कागज की कश्ती चलाते देखकर खुश हो गई, और आश्वस्त भी। रिया ने उसे कागज की कश्तियां बनाकर जो दी थीं। भारतेश के किचन गार्डन के लिए अब पानी की कमी न रही। भारतेश का बांध जो बन गया था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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