For the best experience, open
https://m.grehlakshmi.com
on your mobile browser.

बस जिस्म नहीं हूं मैं—गृहलक्ष्मी की कविता

01:00 PM Jun 30, 2024 IST | Sapna Jha
बस जिस्म नहीं हूं मैं—गृहलक्ष्मी की कविता
Bas Jism Nahi Hoon Mein
Advertisement

Hindi Poem: बस जिस्म नहीं मैं एक कली हूं कब तक मुझको तोड़ोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

रूहानी मोहब्बत होती है तुम जिस्मानी करते हो
हैवानो से बनकर के तुम वहशीपन मुझ पर करते हो
बेइज्जत और बदनाम कर बाजारू का इल्जाम दिया
अस्मत लेकर रोटी देते पर कहते हो अहसान किया
खुद की आंखे तो नंगी है मुझ को कब तक तुम ढांकोगे
पट जाऊं तो अच्छा है अगर ना मानूं ऐसिड फेंकोगे

इन हवस भरी आंखों से तुम अब कब तक मुझको तोड़ोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

Advertisement

इंसानियत को छोड़ के तुम मज़हब को आगे रखते हो
तेरी बेटी मेरी बेटी कह मुझको नंगा करते हो
दो दिन का धरना देकर के इंसाफ कि बातें करते हो
तारीखों पर तारीख चढ़ा सूली पर मुझको धरते हो
आसिफा के अंदर खून वही जो निर्भया में बहता है
मज़हब इंसानों से बनता क्यूं इंसा मरता रहता है

अपनी बेटी को घर में रख दूजे की बेटी छेडोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

Advertisement

मांग सिंदूर सजा के तुम हकदार मेरे बन जाते हो
जब चाहा दिल बहला लेते जब चाहा आंख दिखाते हो
लाखों सेहरे तुमने पहने सफेद मुझे पहनाते हो
इक मोम की गुड़िया समझ मुझे फरमानों पे नचाते हो
इतिहास गवाही देता है बस ऐश मर्द ही करता है
औरत के हिस्से गुरबत है सहना बस सहना पड़ता है

जिस कोख में कोपल बनते हो उसको भी तुम ना छोड़ोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

Advertisement

Also read: कुछ पल अपने लिए—गृहलक्ष्मी की कविता

Advertisement
Tags :
Advertisement