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बाशी और मुर्मू - 21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां उत्तर प्रदेश

07:00 PM Jul 10, 2024 IST | Reena Yadav
बाशी और मुर्मू   21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां उत्तर प्रदेश
Bashi aur Murmu
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

बाशी और मुर्मू साथ पढ़ते-पढ़ते अच्छी सहेलियाँ बन गयी थी। वे दोनों स्विट्जरलैंड के रॉयल इन्टरनेशनल स्कूल में कक्षा तीन की छात्राएँ थीं। ये एक बड़ा और मंहगा स्कूल था, जिसमें कई देशों के बड़े अधिकारियों और उद्योगपतियों के बच्चे ही पढ़ते थे। बाशी जापान और मुर्मू बांग्लादेश की रहने वाली थी। दोनों की मातृभाषाएँ अलग थीं, जिससे वह स्कूल की अनिवार्य भाषा अंग्रेजी में बातें किया करती थी।

वे दोनों रूम मेट भी थीं। साथ पढ़ती, साथ खेलती और आपस में दोस्ताना लड़ाई-झगड़े भी करती। बाशी कभी मुर्मू की चोटी खींच लेती, तो मुर्मू भी उसकी पीठ पर हौले से धौल जमाने में न चूकती। बाशी चीख कर उसे पकड़ने के लिये दौड़ती, तो मुर्मू भी हॉस्टल में चीखकर हँगामा कर देती। वार्डन सब समझती थी, सो दोनों को डांट कर चुप करा देती और दोनों फिर से चुपचाप पढ़ाई करने लगती।

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स्विट्जरलैंड में सर्दियों की छुट्टियाँ हुई तो दोनों सहेलियाँ भी एक महीने के लिये अपने देश वापस लौट गयी।

मुर्मू के अब्बा एक बड़े व्यापारी थे, जिनका कई देशों में आयात-निर्यात का कारोबार था। उन्होंने गर्मी की छुट्टियों में सपरिवार विदेश पर्यटन की योजना बनायी थी। सो, मुर्मू के आते ही वे लोग अगले हफ्ते की फ्लाइट पकड़कर रवाना हो गये। वे लोग बैंकॉक आये थे, जो थाईलैंड की राजधानी थी। वहाँ उनका परिवार एक होटल में ठहरा और घूम-घूम कर शहर के पर्यटन स्थलों का आनन्द उठाने लगा।

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मुर्मू को वहाँ के खूबसूरत पार्क और सुनहरे बौद्ध मन्दिर खूब पसन्द आये थे। उसकी इच्छा कोई ऐतिहासिक स्थल भी देखने की थी। उसके अब्बा ने बताया कि इस देश में अभी भी किस्से-कहानियों वाले राजा-रानी का ही शासन चलता है। मुर्मू को आश्चर्य के साथ जिज्ञासा भी हुई। अतः एक दिन उसके परिवार ने वहाँ के राजा का प्रसिद्ध राजमहल देखने का निश्चय किया।

वे सब अगले दिन राजमहल जा पहुँचे। वहाँ भी पर्यटकों की खूब भीड़ थी। एक विशाल झील के बीचोबीच राजा का शानदार महल बना था। सामने दर्जनों फव्वारे चल रहे थे। साफ पानी में सूरज की तेज रोशनी पड़ने से शीशे जैसी चमक परावर्तित होकर महल पर पड़ रही थी, जिससे सारा महल चमचमा रहा था। भीड़ के बीच मुर्मू और उसका परिवार भी मंत्रमुग्ध-सा घूमने लगा।

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तभी मुर्मू की नजर लगभग पचास मीटर दूर खड़ी एक सुन्दर लड़की पर पड़ी। वह राजकुमारियों जैसे बेहद सुन्दर और महँगे कपड़े पहने महल की ओर देख रही थी। उसके अगल-बगल काफी भीड़ थी। कुछ लोग सुरक्षाकर्मियों जैसी वर्दी भी पहने थे। बाशी को पहचानते मुर्मू को देर न लगी। उसे बहुत अच्छा लगा। उसने खुशी के मारे जोर से पुकारा- “बाशी”।

लेकिन बाशी न सुन सकी। मुर्मू की आवाज भीड़ के शोर में दब गयी थी। लेकिन अब वह अपने को रोक न सकी। वह भीड़ के बीच तेजी से घुसते हुए बाशी की ओर लपकी। छोटी बच्ची होने के कारण उसे कोई असुविधा न हुई। देखते ही देखते वह भीड़ के बीच घुसते हुए बाशी के पीछे जा पहुँची। उसे गुस्सा भी आया था कि इतनी जोर से पुकारने के बावजूद बाशी उसकी आवाज नहीं सुन सकी थी।

अपनी दोस्ती के स्वभाव अनुसार उसने नजदीक पहुँचते ही बाशी की पीठ पर एक जोर का धौल जमाया- “बाशी की बच्ची, रोकने से रुकती भी नहीं।

लेकिन गलती यह हुई कि मुर्मू के मुँह से ये वाक्य उसकी मातृभाषा बांगला में निकले थे, जिसे वहाँ कोई समझ नहीं पाया था। जबकि आगे की ओर जा रही बाशी की पीठ पर पीछे से अचानक यह धौल पड़ते ही उसके मुँह से चीख निकल गयी और वह संभलते-संभलते भी लड़खड़ा कर आगे की ओर गिर पड़ी।

“अरे पकड़ो, किसी ने बाशी पर हमला किया है, “बचाओ उसे।” जापानी भाषा में चीखते सुरक्षाकर्मियों की भीड़ ने बाशी को उठाया। “अरे, उसे फर्स्ट-एड दो, कहीं ज्यादा चोट तो नहीं लग गयी?” कुछ लोग बाशी को उठाकर भीड़ से बाहर एक सुरक्षित जगह की ओर दौड़े।

किसी ने कहा- “अरे, उसे भी पकडों, जिसने हमला किया है। कछ सुरक्षाकर्मियों ने मुर्मू को भी जोर से पकड़कर घेर लिया और उसे भी खींचते हुए उसी सुरक्षित जगह की ओर लेकर चल दिये।

“मुझे छोड़ दो, मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया। वह मेरी दोस्त है।” यह सब देख मुर्मू जोर-जोर से रोने लगी, लेकिन उसकी बांग्ला भाषा के कारण वहाँ कोई उसकी बात समझ नहीं पा रहा था।

तभी मुर्मू को कुछ याद आया- “उसने जोर से पुकारा “अब्बू अब्बू! बचाओ मुझे।

उसके अब्बू भी मुर्मू को ही खोज रहे थे। बांग्ला भाषा में आयी यह चीख सुनकर उन्हें किसी अनहोनी की आशंका हुई। वे आवाज की दिशा में दौड़ पड़े। भीड़ की हलचल देखकर उन्होने जल्द ही मुर्मू को खोज लिया। सुरक्षाकर्मियों से अंग्रेजी में पूछा- “मेरी बेटी मुर्मू के साथ आखिर यहाँ हो क्या रहा है?”

सुरक्षाकर्मियों ने बताया कि वह जापान के राजदूत की बेटी बाशी के बॉडीगार्ड हैं। इस लड़की ने उसे अचानक पीठ पर धक्का देकर गिरा दिया था।

“अब्बू!

उन्हें सामने देख मुर्मू ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और दौड़कर रोते हुए उनसे लिपट गयी। वह डर के मारे कुछ बोल नहीं पा रही थी।

उसे सांत्वना देते हुए अब्बू बोले – “मेरी बेटी ऐसी नहीं है, जरूर कोई गलतफहमी हुई होगी।” वह चारों तरफ खड़े सुरक्षाकर्मियों से बहस करने लगे।

तभी अचानक ही डरी हुई मुर्मू की फिर से चीख निकल गयी – “ओ आह….. ।” अब्बू ने घबराकर पूछा- “क्या हुआ बेटी?”

मुर्मू ने सहमते हुए कहा – “किसी ने अभी जोर से मेरी चोटी खींची।”

“चोटी…? यहाँ तेरी चोटी कौन खींचेगा?” - वह आश्चर्यचकित होते हुए बोले।

“मैं हूँ मुर्मू! तेरी बेस्ट फ्रेंड बाशी, और कौन खींचेगा? “हाहाहाहा” – इस मधुर स्वर में वहाँ जैसे अनेक घंटियाँ बज उठी थीं। अंग्रेजी में बोले गये ये वाक्य सभी की समझ में आये थे।

सबने चौंककर देखा, वह सुरक्षाकर्मियों के पीछे चुपके से आकर खड़ी बाशी ही थी। उसके बाएँ हाथ पर चोट के इलाज वाली एक छोटी सी मरहम-पट्टी चिपकी थी। अब तक वह सामने आ गयी और मुर्मू को अपनी ओर खींचते हुए बोली- “भेंट नहीं करेगी अपनी आफत की पुड़िया से?”

समवेत हँसी का ठहाका छूटा। दोनों सहेलियाँ एक दूसरे से स्नेहवश चिपक गयी थी। कुछ गिले-शिकवे भी फूट पड़े – “तूने बताया नहीं था कि सर्दी की छुट्टियों में बैंकॉक जायेगी?”

“तूने भी तो नहीं बताया था कि तू भी बैंकॉक ही आयेगी?”

“हाहाहाहा” ……और अब इस यादगार पर्यटन की शाम को वे दोनों ठहाके लगाते हुए सपरिवार जापानी दूतावास में रात का भोजन कर रहे थे। कहीं कोई गिला शिकवा नहीं था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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