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दंड - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jun 24, 2024 IST | Reena Yadav
दंड   मुंशी प्रेमचंद
dand by munshi premchand
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संध्या का समय था। कचहरी उठ गई थी। अहलकार और चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे-पैसे मिल जायें। कचहरी के बरामदों में सांड़ों ने वकीलों की जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहर्रिरों की जगह कुत्ते बैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, लाठी टेकता हुआ, जज साहब के बँगले पर पहुँचा और सायबान में खड़ा हो गया। जज साहब का नाम था मिस्टर जी. सिन्हा। अरदली ने दूर ही से ललकारा- कौन सायबान में खड़ा है? क्या चाहता है?

बूढ़ा- गरीब ब्राह्मण हूँ भैया, साहब से भेंट होगी?

अरदली- साहब तुम जैसों से नहीं मिला करते?

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बूढ़े ने लाठी पर अकड़कर कहा- क्यों आई, हम सड़े हैं या डाकू-चोर हैं, कि हमारे मुँह में कुछ लगा हुआ है?

अरदली- भीख माँगकर मुकदमा लड़ने आये होगे?

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बूढ़ा- तो कोई पाप किया है? अगर घर बेचकर मुकदमा नहीं लड़ते, तो कुछ बुरा करते हैं? यहाँ तो मुकदमा लड़ते-लड़ते उम्र बीत गई, लेकिन घर का पैसा नहीं खर्च किया। मियाँ की जूती, मियाँ के सिर करते हैं। दस भले-मानसों से माँगकर एक को दे दिया। चलो छुट्टी हुई। गाँव-भर नाम से काँपता है। किसी ने जरा भी टिर-पिर की और मैंने अदालत में दावा दायर किया।

अरदली- किसी बड़े आदमी से पाला नहीं पड़ा अभी?

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बूढ़ा- अजी, कितने ही बड़ों को बड़े घर भिजवा दिया, तुम हो किस फेर में। हाईकोर्ट तक जाता हूँ सीधा। कोई मेरे मुँह क्या आएगा बेचारा। गाँठ से तो कौड़ी जाती नहीं, फिर डर क्यों? जिसकी जिस चीज पर दाँत लगाए, अपना करके छोड़ा। सीधे न दिया तो अदालत में घसीट लाये और रगेद-रगेद कर मारा, अपना क्या बिगड़ता है। तो साहब से इत्तला करते हो कि मैं ही पुकारूं?

अरदली ने देखा, यह आदमी यों जाने वाला नहीं, तो जाकर साहब से उसकी इत्तला की। साहब ने हुलिया पूछा और खुश होकर कहा- फौरन बुला लो।

अरदली- हुजूर, बिलकुल फटे हाल है।

साहब- गुदड़ी ही में लाल होते हैं। जाकर भेज दो।

मिस्टर सिन्हा अधेड़ आदमी थे, बहुत ही शान्त, बहुत ही विचारशील। बातें बहुत कम करते थे। कठोरता और असभ्यता, जो शासन का अंग समझी जाती है, उनको छू भी नहीं गई थी। न्याय और दया के देवता मालूम होते थे। निगाह ऐसी बारीक पायी थी कि सूरत देखते ही आदमी पहचान जाते थे। डील-डौल देवों का-सा था और रंग आबनूस का-सा। आराम-कुर्सी पर लेटे हुए पेचवान पी रहे थे। बूढ़े ने जाकर सलाम किया।

सिन्हा- तुम हो जगत पांडे ? आओ बैठो। तुम्हारा मुकदमा तो बहुत ही कमजोर है। भले आदमी, जाल भी न करते बना?

जगत- ऐसा न कहें हुजूर, गरीब आदमी हूँ मर जाऊंगा।

सिन्हा-किसी वकील-मुख्तार से सलाह भी न ले ली?

जगत- अब तो सरकार की सरन में आया हूँ।

सिन्हा- सरकार क्या मिसिल बदल देंगे या नया कानून गढ़ेगे? तुम गच्चा खा गए। मैं कभी कानून के बाहर नहीं जाता। जानते हो न, अपील से कभी मेरी तजबीज रद्द नहीं होती?

जगत- बड़ा धरम होगा सरकार! (सिन्हा के पैरों पर गिन्नयों की एक पोटली रखकर) बड़ा दुखी हूँ सरकार।

सिन्हा- (मुस्कराकर) यहाँ भी अपनी चालबाजी से नहीं चूकते? निकालो अभी और। ओस से प्यास नहीं बुझती। भला, दहाई तो पूरी करो।

जगत- बहुत तंग हूँ दीनबंधु।

सिन्हा- डालो, डालो कमर में हाथ। भला, कुछ मेरे नाम की लाज तो रखो। जगत-लुट जाऊंगा सरकार!

सिन्हा- लुटे तुम्हारे दुश्मन, जो इलाका बेचकर लड़ते हैं। तुम्हारे यजमानों का भगवान भला करें, तुम्हें किस बात की कमी है।

मिस्टर सिन्हा इस मामले में जरा भी रियायत न करते थे। जगत ने देखा कि यहाँ काइयाँपन से काम न चलेगा, तो चुपके से पाँच गिन्नियाँ और निकाली। लेकिन उन्हें मिस्टर सिन्हा के पैरों पर रखते समय उसकी आँखों से आंसू निकल आया। यह उसकी बरसों की कमाई थी। बरसों पेट काटकर, तन जलाकर, मन बाँधकर, झूठी गवाहियाँ देकर उसने यह थाती संचय कर पायी थीं। उसका हाथों से निकलना प्राण निकलने से कम दुखदायी न था।

जगत पांडे के चले जाने के बाद, करीब 9 बजे रात को, जज साहब के बंगले पर एक ताँगा आकर रुका और उस पर से पंडित सत्यदेव उतरे, जो राजा साहब शिवपुर के मुख्तार थे।

मिस्टर सिन्हा ने मुस्कराकर कहा- आप शायद अपने इलाके में गरीबों को न रहने देंगे। इतना जुल्म!

सत्यदेव- गरीब परवर, यह कहिए कि गरीबों के मारे अब इलाके में हमारा रहना मुश्किल हो रहा है। आप जानते हैं, सीधी उँगली घी नहीं निकलता। जमींदार को कुछ-न-कुछ सख्ती करनी ही पड़ती है, मगर अब यह हाल है कि हमने जरा चूं भी कीं तो उन्हीं गरीबों की त्यौरियाँ बदल जाती हैं। सब मुफ्त में जमीन जोतना चाहते हैं। लगान मांगिए तो फौजदारी का दावा करने को तैयार। अब इसी जगत पांडे को देखिए। गंगा की कसम है हुजूर, सरासर झूठा दावा है। हुजूर से कोई बात छिपी तो रह नहीं सकती। अगर जगत पांडे यह मुकदमा जीत गया, हमें बोरियां-बंधना छोड़कर भागना पड़ेगा। अब हुजूर ही बसाएं तो बस सकते हैं। राजा साहब ने हुजूर को सलाम कर कहा है और अर्ज की है कि इस मामले में जगत पांडे की ऐसी खबर लें कि वह भी याद करे।

मिस्टर सिन्हा ने भवें सिकोड़ कर कहा- कानून मेरे घर तो नहीं बनता?

सत्यदेव- हुजूर के हाथ में सब कुछ है।

यह कहकर गिन्नियों की एक गड्डी निकालकर मेज़ पर रख दी। मिस्टर सिन्हा ने गड्डी को आंखों से देखकर कहा- इन्हें मेरी तरफ से राजा साहब की नजर कर दीजिएगा। आखिर आप कोई वकील तो करेंगे ही। उसे क्या दीजिएगा?

सत्यदेव- यह तो हुजूर के हाथ में है। जितनी ही पेशियाँ होंगी, उतना ही खर्च भी बढ़ेगा।

सिन्हा- मैं चाहूं, तो महीनों लटका सकता हूँ।

सत्यदेव- हां, इससे कौन इनकार कर सकता है।

सिन्हा-पाँच पेशियाँ भी हुई, तो आपके कम-से-कम एक हजार उड़ जाएंगे, आप यहाँ उसका आधा पूरा कर दीजिए, तो एक ही पेशी में बारा-न्यारा हो जाये। आधी रकम बच जाये।

सत्यदेव ने 10 गिन्नियाँ और निकालकर मेज़ पर रख दीं और घमंड के साथ बोले- कुछ हो तो राजा साहब से कह दूं, आप इत्मीनान रखें, साहब की कृपादृष्टि हो गई है।

मिस्टर सिन्हा ने तीव्र स्वर में कहा- जी नहीं, यह कहने की जरूरत नहीं। मैं किसी शर्त पर यह रकम नहीं ले रहा हूं। मैं करूँगा वही, जो कानून की मंशा होगी। कानून के खिलाफ जौ भर नहीं जा सकता। यही मेरा उसूल है। आप लोग मेरी खातिर करते हैं, यह आपकी शराफत है। मैं उसे अपना दुश्मन समझता हूं, जो मेरा ईमान खरीदना चाहे। मैं कुछ लेता हूँ, सच्चाई का इनाम समझकर लेता हूं।

जगत पांडे को पूरा विश्वास था कि मेरी जीत होगी, लेकिन तजवीज़ सुनी तो होश उड़ गए। दावा खारिज हो गया। उस पर खर्च की खपत अलग। मेरे साथ यह चाल! अगर लाला साहब को इसका मजा न चखा दिया तो ब्राह्मण नहीं। हैं किस फेर में? सारा रोब भुला दूंगा। यहाँ गाढ़ी कमाई के रुपये हैं। कौन पचा सकता है? हाड़ फोड़-फोड़कर निकालेंगे। द्वार पर सिर पटक-पटक कर मर जाऊंगा।

उसी दिन संध्या को जगत पांडे ने मिस्टर सिन्हा के बंगले के सामने आसन जमा दिया। वहाँ बरगद का एक घना वृक्ष था। मुकदमे वाले वहीं सत्तू चबेना खाते और दोपहर उसी की छाँह में काटते थे। जगत पांडे उनसे मिस्टर सिन्हा की दिल खोलकर जिन्दा करता। न कुछ खाता न पीता, बस लोगों को अपनी राम कहानी सुनाया करता। जो सुनता, वह जज साहब को चार खोटी-खरी कहता- आदमी नहीं पिशाच है। इसे तो ऐसी जगह मारे, जहाँ पानी न मिले। रुपये के रुपये लिये, ऊपर से खर्चे समेत डिग्री कर दी। यही करना था तो रुपये काहे को निगले थे? यह है हमारे भाई -बंदों का हाल। यह अपने कहलाते हैं। इनसे तो अंग्रेज ही अच्छे। इस तरह की आलोचनाएँ दिन-भर हुआ करतीं। जगत पांडे के आस-पास आठों पहर जमघट लगा रहता था।

इस तरह चार दिन बीत गये और मिस्टर सिन्हा के कानों में भी बात पहुँची। अन्य रिश्वती कर्मचारियों की तरह वह भी हेकड़ आदमी थे। ऐसे निर्द्वन्द्व रहते, मानों उनमें यह बुराई छू तक नहीं गई है। जब वह कानून से जौ-भर भी न टलते थे, तो उन पर रिश्वत का सन्देह हो ही क्यों कर सकता था, और कोई करता भी तो उसकी मानता कौन? ऐसे चतुर खिलाड़ी के विरुद्ध कोई जाने की कार्रवाई कैसे होती? मिस्टर सिन्हा अपने अफसरों से भी खुशामद का व्यवहार न करते। इससे हुक्काम भी उनका बहुत आदर करते थे। मगर जगत पांडे ने वह मंत्र मारा था, जिसका उनके पास कोई उत्तर न था। ऐसे बाँगड़ आदमी से आज तक उन्हें साबिका न पड़ा था। अपने नौकरों से पूछते- बूढ़ा क्या कर रहा है! नौकर लोग अपनापन जताने के लिए झूठ के पुल बांध देते- हुजूर कहता था, भूत बनकर लगूंगा, मेरी वेदी बने तो सही, जिस दिन मरूंगा,उस दिन एक-एक के सौ जगत पांडे होंगे।

मिस्टर सिन्हा पक्के नास्तिक थे, लेकिन ये बातें सुन-सुनकर सशंक हो जाते, और उनकी पत्नी तो थर-थर काँपने लगतीं। वह नौकरों से बार-बार कहतीं, उससे जाकर पूछो, क्या चाहता है। जितने रुपये चाहे ले ले, हमसे जो माँगे वह देंगे, बस यहाँ से चला जाये। लेकिन मिस्टर सिन्हा आदमियों को इशारे से मना कर देते थे। उन्हें अभी तक आशा थी कि भूख-प्यास से व्याकुल होकर बूढ़ा चला जायेगा। इससे अधिक यह भय था कि मैं जरा भी नरम पड़ा और नौकरों ने मुझे उल्लू बनाया।

छठे दिन मालूम हुआ कि जगत पांडे अबोल हो गया है, उससे हिला तक नहीं जाता, चुपचाप पड़ा आकाश की ओर देख रहा है। शायद आज रात को दम निकल जाये। मिस्टर सिन्हा ने लम्बी साँस ली और गहरी चिन्ता में डूब गए। पत्नी ने आँखों में आँसू भरकर आग्रहपूर्वक कहा- तुम्हें मेरे सिर की कसम। जाकर किसी तरह इस बला को टालो। बूढ़ा मर गया, तो हम कहीं के न रहेंगे। अब रुपये का मुँह मत देखो। दो-चार हजार भी देने पड़े, तो देकर उसे मनाओ। तुमको जाते शर्म आती हो, तो मैं चली जाऊँ।

सिन्हा- जाने का इरादा तो मैं कई दिन से कर रहा हूँ लेकिन जब देखता हूँ वहाँ भीड़ लगी रहती है, इससे हिम्मत नहीं पड़ती। सब आदमियों के सामने तो मुझसे न जाया जायेगा, चाहे कितनी ही बड़ी मुसीबत क्यों न आ पड़े। तुम दो- चार हजार को कहती हो, मैं दस-पाँच हजार देने को तैयार हूँ। लेकिन वहाँ जा नहीं सकता। न जाने, किस बुरी साइत में मैंने इसके रुपये लिये। जानता कि यह इतना फसाद खड़ा करेगा, तो फाटक में घुसने ही न देता। देखने में तो ऐसा सीधा मालूम होता था कि गऊ है। मैंने पहली बार आदमी पहचानने में धोखा खाया।

पत्नी- तो मैं ही चली जाऊँ? शहर की तरफ से आऊंगी और सब आदमियों को हटाकर अकेले में बात करूंगी। किसी को खबर न होगी कि कौन है। इसमें तो कोई हर्ज नहीं है।

मिस्टर सिन्हा ने संदिग्ध भाव से कहा- ताड़ने वाले ताड़ ही जायेंगे, चाहे तुम कितना ही छिपाओ।

पत्नी- ताड़ जायेंगे, ताड़ जायें, अब इससे कहाँ तक डरूं? बदनामी अभी क्या कम हो रही है, जो और हो जायेगी? सारी दुनिया जानती है कि तुमने रुपये लिये हैं। यों ही कोई किसी पर प्राण नहीं देता। फिर अब व्यर्थ की ऐंठ क्यों करो?

मिस्टर सिन्हा अब मर्मवेदना को न दबा सके। बोले- प्रिय, यह व्यर्थ की ऐंठ नहीं है। चोर को अदालत में बेंत खाने से उतनी लज्जा नहीं आती, स्त्री को कलंक से उतनी लज्जा नहीं आती, जितनी किसी हाकिम को अपनी रिश्वत का परदा खुलने से आती है। वह जहर खाकर मर जायेगा, पर संसार के सामने अपना परदा न खोलेगा। अपना सर्वनाश देख सकता है, पर वह अपमान नहीं सह सकता। जिंदा खाल खिंचने या कोल्हू. में पेरे जाने के सिवा और कोई ऐसी स्थिति नहीं है, जो उसे अपना अपराध स्वीकार करा सके। इसका तो मुझे जरा भी भय नहीं है कि ब्राह्मण भूत बनकर हमको सताएगा या हमें उसकी वेदी बनाकर पूजनी पड़ेगी। यह भी जानता हूँ कि पाप का दंड भी बहुधा नहीं मिलता, लेकिन हिन्दू होने के कारण संस्कारों की शंका कुछ-कुछ बनी हुई है। ब्रह्म-हत्या का कलंक सिर पर लेते हुए आत्मा काँपती है। बस, इतनी बात है। मैं आज रात को मौका देखकर जाऊंगा और इस संकट को काटने के लिए जो कुछ हो सकेगा, करूंगा। खातिर जमा रखो।

आधी रात बीत चुकी थी। मिस्टर सिन्हा घर से निकले और अकेले जगत पांडे को मनाने चले। बरगद के नीचे बिलकुल सन्नाटा था। अंधकार ऐसा था, मानो निशा देवी यहीं शयन कर रही है। जगत पांडे की साँस जोर-जोर से चल रही थी, मानो मौत जबरदस्ती घसीटे लिये जाती हो। मिस्टर सिन्हा के रोएँ खड़े हो गए। बुड्ढा कहीं मर तो नहीं रहा है? जेब से लालटेन निकाली और जगत के समीप जाकर बोले- पांडेजी, कहो क्या हाल है?

जगत पांडे ने आँखें खोलकर देखा और उठने की असफल चेष्टा करके बोला- मेरा हाल पूछते हो? देखते नहीं हो, मर रहा हूँ।

सिन्हा- तो इस तरह क्यों प्राण देते हो?

जगत- यही इच्छा है, तो मैं क्या करूँ?

सिन्हा- मेरी तो इच्छा नहीं। हां, तुम अलबत्ता मेरा सर्वनाश करने पर तुले हुए हो। आखिर मैंने तुम्हारे डेढ़ सौ रुपए ही तो लिये हैं। इतने ही रुपये के लिए तुम इतना बड़ा अनुष्ठान कर रहे हो।

जगत- डेढ़ सौ रुपये की बात नहीं है। तुमने मुझे मिट्टी में जो मिला दिया। मेरी डिग्री हो गई होती, तो मुझे दस बीघे जमीन मिल जाती और सारे इलाके में नाम हो जाता। तुमने मेरे डेढ़ सौ नहीं लिये, मेरे पाँच हजार बिगाड़ दिए। पूरे पाँच हजार। लेकिन यह घमण्ड न रहेगा, याद रखना। कहे देता हूँ सत्यानाश हो जाएगा । इस अदालत में तुम्हारा राज्य है, लेकिन भगवान के दरबार में विप्रो ही का राज्य है। विप्र का धन लेकर कोई सुखी नहीं रह सकता।

मिस्टर सिन्हा ने बहुत खेद और लज्जा प्रकट की, बहुत अनुनय-विनय से काम लिया और अंत में पूछा- सच बतलाओ पांडे, कितने रुपये पा जाओ तो यह अनुष्ठान छोड़ दो?

जगत पांडे इस बार जोर लगाकर उठ बैठे और बड़ी उत्सुकता से बोले- पाँच हजार से कौड़ी कम न लूँगा।

सिन्हा-पाँच हजार तो बहुत होते हैं। इतना जुल्म न करो।

जगत- नहीं, इससे कम न लूंगा।

यह कहकर जगत पांडे फिर लेट गया। उसने ये शब्द इतने निश्चयात्मक भाव से कहे थे कि मिस्टर सिन्हा को और कुछ कहने का साहस न हुआ। रुपये लाने घर चले, लेकिन घर पहुँचते-पहुँचते नीयत बदल गई। डेढ़ सौ के बदले पाँच हजार देते कष्ट हुआ। मन में कहा- मरता है, मर जाने दो, कहाँ की ब्रह्म-हत्या और कैसा पाप! यह सब पाखंड है। बदनामी न होगी? सरकारी मुलाजिम तो यों ही बदनाम होते हैं, यह कोई नई बात थोड़े ही है। बचा कैसे उठ बैठे थे। समझा होगा, उल्लू फंसा। अगर छह दिन के- उपवास करने से पाँच हजार मिलें, तो मैं महीने में कम-से-कम पाँच मर्तबा यह अनुष्ठान करूँ। पाँच हजार नहीं, कोई मुझे एक ही हजार दे दे। यहाँ तो महीने भर नाक रगड़ता हूँ तब जाकर 600 रु. के दर्शन होते हैं। नोंच-खसोट से भी शायद ही किसी महीने में इससे ज्यादा मिलता हो। बैठा मेरी राह देख रहा होगा। लेना रुपये, मुँह मीठा हो जायेगा।

वह चारपाई पर लेटना चाहते थे कि उनकी पत्नी जी आकर खड़ी हो गईं। उनके सिर के बाल खुले हुए थे, आंखें सहमी हुई, रह-रहकर काँप उठती थीं। मुँह से शब्द न निकलता था। बड़ी मुश्किल से बोलीं- आधी रात तो हो गई होगी? तुम जगत पांडे के पास चले जाओ। मैंने अभी ऐसा बुरा सपना देखा कि अभी तक कलेजा धड़क रहा है, जान संकट में पड़ी हुई है। जाकर किसी तरह उसे टालो।

मिस्टर सिन्हा- वहीं से तो चला आ रहा हूँ। मुझे तुमसे ज्यादा फिक्र है। अभी आकर खड़ा ही हुआ था कि तुम आयी।

पत्नी- अच्छा! तो तुम गये थे! क्या बातें हुईं, राजी हुआ?

सिन्हा- पाँच हजार रुपये माँगता है!

पत्नी- पाँच हजार!

सिन्हा- कौड़ी कम नहीं कर सकता और मेरे पास इस वक्त एक हजार से ज्यादा न होंगे।

पत्नी ने एक क्षण सोचकर कहा- जितना माँगता है उतना ही दे दो, किसी तरह गला तो छूटे। तुम्हारे पास रुपये न हों, तो मैं दे दूँगी। अभी से सपने दिखाई देने लगे हैं। मरा तो प्राण कैसे बचेंगे! बोलता-बालता है न?

मिस्टर सिन्हा अगर आबनूस थे, तो उनकी पत्नी चंदन। सिन्हा उनके गुलाम थे, उनके इशारों पर चलते थे। पत्नी जी भी पति-शासन में कुशल थी। सौंदर्य और अज्ञान में अपवाद है। सुंदरी कभी भोली नहीं होती। वह पुरुष के मर्मस्थल पर आसन जमाना जानती है।

सिन्हा- तो लाओ देता आऊँ, लेकिन आदमी बड़ा चग्घड़ है, कहीं रुपये लेकर सबको दिखाता फिरा तो?

पत्नी- इसको इसी वक्त यहाँ से भगाना होगा।

सिन्हा- तो निकालो, दे ही दूँ। जिंदगी में यह बात भी याद रहेगी।

पत्नी ने अविश्वास के भाव से कहा- चलो, मैं भी चलती हूँ। इस वक्त कौन देखता है।

पत्नी से अधिक पुरुष के चरित्र का ज्ञान और किसी को नहीं होता। मिस्टर सिन्हा की मनोवृत्तियों को उनकी पत्नी जी खूब जानती थीं। कौन जाने, रास्ते में रुपये कहीं छिपा दें और कह दें, दे आये। या कहने लगें, रुपये लेकर भी नहीं टलता, तो मैं क्या करूँ। जाकर संदूक से नोटों के पुलिंदे निकाले और उन्हें चादर में छिपाकर मिस्टर सिन्हा के साथ चलीं। सिन्हा के मुँह पर झाडू-सी फिरी हुई थी। लालटेन लिए पछताते चले जाते थे। 5000 रु. निकले जाते। फिर इतने रुपये कब मिलेंगे, कौन जानता है! इससे तो कहीं अच्छा था कि दुष्ट मर ही जाता। बला से बदनामी होती, कोई मेरी जेब से रुपये तो न छीन लेता। ईश्वर करे, मर गया हो।

अभी दोनों आदमी फाटक ही तक आये थे कि देखा, जगत पांडे लाठी टेकता चला आता है। उसका स्वरूप इतना डरावना था, मानो श्मशान से कोई मुर्दा भागा आता हो।

इनको देखते ही जगत पांडे बैठ गया और हांफता हुआ बोला- बड़ी देर हुई, आये?

पत्नी जी बोलीं- महाराज, हम तो आ ही रहे थे, तुमने क्यों कष्ट किया? रुपये लेकर सीधे घर चले जाओगे न?

जगत- हां-हाँ। सीधा घर जाऊंगा। कहां हैं रुपये देखूं।

पत्नी जी ने नोटों का पुलिंदा बाहर निकाला और लालटेन दिखाकर बोली- गिन लो। पूरे 5,000 रु. हैं। पांडे ने पुलिन्दा लिया और बैठकर उसे उलट-पुलट कर देखने लगा। उसकी आँखें एक नए प्रकाश से चमकने लगीं। हाथों में नोटों को तौलता हुआ बोला- पूरे पाँच हजार हैं?

पत्नी- पूरे, गिन लो!

जगत- पाँच हजार में दो टोकरी भर जायेगी! (हाथों से बताकर) इतने सारे हुए पाँच हजार.

सिन्हा- क्या अब भी तुम्हें विश्वास नहीं आता?

जगत- हैं, पूरे हैं, पूरे पाँच हजार! तो अब जाऊँ, भाग जाऊँ?

यह कहकर वह पुलिंदा लिये कई कदम लड़खड़ाता हुआ चला, जैसे कोई शराबी, और तब धम से जमीन पर गिर पड़ा। मिस्टर सिन्हा लपक कर उठाने दौड़े, तो देखा उसकी आँखें पथरा गई हैं और मुख पीला पड़ गया है। बोले-पांडे-पांडे, क्या कहीं चोट आ गई?

पांडे ने एक बार मुँह खोला, जैसे मरती हुई चिड़िया सिर लटकाकर चोंच खोल देती है। जीवन का अन्तिम धागा भी टूट गया। होंठ खुले हुए थे और नोटों का पुलिंदा छाती पर रखा हुआ था। इतने में पत्नी जी भी आ पहुँची और शव देखकर चौंक पड़ी।

पत्नी- इसे क्या हो गया?

सिन्हा- मर गया, और क्या हो गया?

पत्नी-(सिर पीटकर) मर गया! हाय भगवान! अब कहां जाऊँ।

यह कहकर वह बंगले की ओर बड़ी तेजी से चलीं, मिस्टर सिन्हा ने भी नोटों का पुलिंदा शव की छाती पर से उठा लिया और चले।

पत्नी- ये रुपये अब क्या होंगे?

सिन्हा-किसी धर्म-कार्य में दे दूँगा ।

पत्नी- घर में मत रखना, खबरदार! हाय भगवान।

दूसरे दिन सारे शहर में खबर मशहूर हो गई-जगत पांडे ने जज साहब पर जान दे दी। उसका शव उठा तो हजारों आदमी साथ थे। मिस्टर सिन्हा को खुल्लम- खुल्ला गालियाँ दी जा रही थीं।

संध्या समय मिस्टर सिन्हा कचहरी से आकर मन मारे बैठे थे कि नौकरों ने आकर कहा- सरकार, हमको छुट्टी दी जाये! हमारा हिसाब कर दीजिए। हमारी बिरादरी के लोग धमकाते हैं कि तुम जज साहब की नौकरी करोगे, तो हुक्का- पानी बंद हो जायेगा।

सिन्हा ने झल्लाकर कहा- कौन धमकाता है?

कहार- किसका नाम बताएँ सरकार? सभी तो कह रहे हैं।

रसोइया- हुजूर, मुझे तो लोग धमकाते हैं कि मंदिर में न घुसने पाओगे।

सिन्हा- एक महीने की नोटिस दिये बगैर तुम नहीं जा सकते।

साईस- हुजूर, बिरादरी से बिगाड़ करके हम लोग कहाँ जाएँगे? हमारा आज से इस्तीफा है। हिसाब जब चाहे कर दीजिएगा ।

मिस्टर सिन्हा ने बहुत धमकाया, फिर दिलासा देने लगे, लेकिन नौकरों ने एक न सुनी। आधे घण्टे के अंदर सबों ने अपना-अपना रास्ता लिया। मिस्टर सिन्हा दाँत पीसकर रह गए, लेकिन हाकिमों का काम कब रुकता है? उन्होंने उसी वक्त कोतवाल को खबर दी और कई आदमी बेगार में पकड़ आये। काम चल निकला।

उसी दिन से मिस्टर सिन्हा और हिन्दू समाज में खींच-तान शुरू हुई। धोबी ने कपड़े धोना बंद कर दिया। ग्वाले ने दूध लाने में आनाकानी की। नाई ने हजामत बनानी छोड़ी। इन विपत्तियों पर पत्नी जी का रोना-धोना और भी गजब था। इन्हें रोज भयंकर स्वप्न दिखाई देते। रात को एक कमरे से दूसरे में जाते प्राण निकलते थे। किसी का जरा सिर भी दुखता, तो नहों में जान समा जाती। सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि अपने सम्बन्धियों ने भी आना-जाना छोड़ दिया। एक दिन साले आये, मगर बिना पानी पिये चले गये। इसी तरह एक बहनोई का आगमन हुआ। उन्होंने पान तक न खाया। मिस्टर सिन्हा बड़े धैर्य से यह सारा तिरस्कार सहते जाते थे। अब तक उनकी आर्थिक हानि न हुई थी। गरज के बावले झक मारकर आते ही थे और नजर-नजराना मिलता ही था। फिर विशेष चिन्ता का कोई कारण न था।

लेकिन बिरादरी से बैर करना पानी में रहकर मगर से बैर करना है। कोई- न-कोई ऐसा अवसर अवश्य ही आ जाता है, जब हमको बिरादरी के सामने सिर झुकाना पड़ता है। मिस्टर सिन्हा को भी साल के अन्दर ही ऐसा अवसर आ पड़ा। यह उनकी पुत्री का विवाह था। यही वह समस्या है, जो बड़े-बड़े हेकड़ों का घमंड चूर-चूर कर देती है। आप किसी के आने-जाने की परवाह न करें, हुक्का-पानी, भोज- भात, मेल-जोल किसी बात की परवाह न करें, मगर लड़की का विवाह तो न टलने वाली बला है। उससे बचकर आप कहां जाएँगे।

मिस्टर सिन्हा को इस बात का दगदगा तो पहले ही था कि त्रिवेणी के विवाह में बाधाएँ पड़ेंगी, लेकिन उन्हें विश्वास था कि द्रव्य की अपार शक्ति इस मुश्किल को हल कर देगी। कुछ दिन तक उन्होंने जानबूझकर टाला कि शायद इस आँधी का जोर कुछ कम हो जाए, लेकिन जब त्रिवेणी का सोलहवाँ साल समाप्त हो गया, तो दाल-मटोल की गुंजाइश न रही। संदेशे भेजने लगे, लेकिन जहाँ संदेशिया जाता, वही जवाब मिलता- हमें मंजूर नहीं। जिन घरों में साल-भर पहले उनका सन्देशा पाकर लोग अपने भाग्य को सराहते, वहाँ से अब सूखा जवाब मिलता था- हमें मंजूर नहीं। मिस्टर सिन्हा धन का लोभ देते, जमीन नजर करने को कहते, लड़के को विलायत भेजकर ऊँची शिक्षा दिलाने का प्रस्ताव करते, किन्तु उनके सारे आयोजनों का एक ही जवाब मिलता था- हमें मंजूर नहीं।

ऊँचे घरानों का यह हाल देखकर मिस्टर सिन्हा उन घरानों में सन्देश भेजने लगे, जिनके साथ पहले बैठकर भोजन करने में भी उन्हें संकोच होता था, लेकिन यहाँ भी यही जवाब मिला- हमें मंजूर नहीं। यहाँ तक कि कई जगह वह खुद दौड़- दौड़कर गये, लोगों की मिन्नतें कीं, पर यही जवाब मिला- साहब, हमें मंजूर नहीं। शायद बहिष्कृत घरानों में उनका सन्देश स्वीकार कर लिया जाता, पर मिस्टर सिन्हा जान बूझकर मक्खी न निगलना चाहते थे। ऐसे लोगों से संबंध न करना चाहते थे, जिनका बिरादरी में कोई स्थान न था। इस तरह एक वर्ष बीत गया।

मिसेज सिन्हा चारपाई पर पड़ी कराह रही थीं, त्रिवेणी भोजन बना रही थी और मिस्टर सिन्हा पत्नी के पास चिंता में डूबे हुए थे। उनके हाथ में एक खत था, बार-बार उसे देखते और कुछ सोचने लगते थे। बड़ी देर के बाद रोहिणी ने अपनी आंखें खोलीं और बोलीं- अब न बचूँगी। पांडे मेरी जान लेकर छोड़ेगा। हाथ में कैसा कागज है?

सिन्हा- यंशोदानंद के पास से खत आया है। पाजी को यह खत लिखते हुए शर्म नहीं आयी? मैंने इसकी नौकरी लगाई, इसकी शादी करवाई और आज उसका मिज़ाज इतना बढ़ गया है कि अपने छोटे आई की शादी मेरी लड़की से करना पसंद नहीं करता। अभागे के भाग्य खुल जाते।

पत्नी- भगवान, अब ले चलो। यह दुर्दशा नहीं देखी जाती। अंगूर खाने का जी चाहता है, मँगवाए हैं कि नहीं?

सिन्हा- मैं खुद जाकर लेता आया था।

यह कहकर उन्होंने तश्तरी में अंगूर भरकर पत्नी के पास रख दिये। वह उठा-उठाकर खाने लगीं। जब तश्तरी खाली हो गई तो बोलीं- अब किसके यहाँ सन्देश भेजोगे?

सिन्हा- किसके यहाँ बताऊँ! मेरी समझ में तो अब कोई ऐसा आदमी नहीं रह गया। ऐसी बिरादरी में रहने से तो यह हजार दर्जा अच्छा है कि बिरादरी के बाहर रहूँ। मैंने एक ब्राह्मण से रिश्वत ली। इससे मुझे इनकार नहीं। लेकिन कौन रिश्वत नहीं लेता? अपने गौ पर कोई नहीं चूकता। ब्राह्मण नहीं, खुद ईश्वर ही क्यों न हों, रिश्वत खाने वाले उन्हें भी चूरा लेंगे। रिश्वत देने वाला अगर निराश होकर अपने प्राण दे देता है, तो मेरा क्या अपराध? अगर कोई मेरे फैसले से नाराज होकर जहर खा ले, तो मैं क्या कर सकता हूँ। इस पर भी मैं प्रायश्चित्त करने को तैयार हूँ। बिरादरी जो दण्ड दे, उसे स्वीकार करने को तैयार हूँ। सबसे कह चुका हूँ मुझसे जो प्रायश्चित्त चाहो, करा लो, पर कोई नहीं सुनता। दंड अपराध के अनुकूल होना चाहिए, नहीं तो यह अन्याय है। अगर किसी मुसलमान का छुआ भोजन खाने के लिए बिरादरी मुझे काले पानी भेजना चाहे, तो मैं उसे कभी न मानूँगा। फिर अपराध अगर है तो मेरा है। मेरी लड़की ने क्या अपराध किया है! मेरे अपराध के लिए लड़की को दंड देना सरासर न्याय-विरुद्ध है।

पत्नी -मगर करोगे क्या? कोई पंचायत क्यों नहीं करते?

सिन्हा- पंचायत में भी तो बिरादरी के मुखिया लोग ही होंगे, उनसे मुझे न्याय की आशा नहीं। वास्तव में इस तिरस्कार का कारण ईर्ष्या है। मुझे देखकर सब जलते हैं और इसी बहाने से मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं। मैं इन लोगों को खूब समझता हूँ।

पत्नी-मन की लालसा मन ही में रह गई। यह अरमान लिये संसार से जाना पड़ेगा। भगवान की जैसी इच्छा। तुम्हारी बातों से मुझे डर लगता है कि मेरी बच्ची की न-जाने क्या दशा होगी। मगर तुमसे मेरी अन्तिम विनय यही है कि बिरादरी के बाहर न जाना, नहीं तो परलोक में भी मेरी आत्मा को शान्ति न मिलेगी। यह शोक मेरी जान ले रहा है। हाय, मेरी बच्ची पर न-जाने क्या विपत्ति आने वाली है।

यह कहते कहते मिसेज सिन्हा की आँखों से आँसू बहने लगे। मिस्टर सिन्हा ने उनको दिलासा देते हुए कहा- इसकी चिंता मत करो प्रिय। मेरा आशय केवल यह था कि ऐसे भाव मेरे मन में आया करते हैं। तुमसे सच कहता हूँ बिरादरी के अन्याय से कलेजा छलनी हो गया है।

पत्नी- बिरादरी को बुरा मत कहो। बिरादरी का डर न हो, तो आदमी न- जाने क्या-क्या उत्पात करे। बिरादरी को बुरा न कहो। (कलेजे पर हाथ रखकर) यहाँ बड़ा दर्द हो रहा है। यंशोदानंद ने भी कोरा जवाब दे दिया। किसी करवट चैन नहीं आता। क्या करूँ भगवान।

सिन्हा- डॉक्टर को बुलाऊँ?

पत्नी- तुम्हारा जी चाहे बुला लो, लेकिन मैं बचूँगी नहीं। जरा तिब्बी को बुला लो, प्यार कर लूँ जी डूबा जाता है। मेरी बच्ची! हाय मेरी बच्ची।

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