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दौड़-गृहलक्ष्मी की कहानियां

01:00 PM Jun 28, 2024 IST | Sapna Jha
दौड़ गृहलक्ष्मी की कहानियां
Daud
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Hindi Kahani: “भैया का फोन आया था आज…” सागर ने नेहा से कहा तो वो चौंक गई”क्यों?अभी पिछले हफ्ते ही तो अम्मा को लेकर गए हैं,अब क्या आफत आ गई?”
“कह रहे थे कि होली पर इस बार मां को हमारे पास भेज देंगे,उन्हें अपनी ससुराल जाना है एक हफ्ते के लिए”सागर बोला तो नेहा फट पड़ी…
“कहे देती हूं अगर ऐसा हुआ तो मै अपने मायके चले जाऊंगी,मुझसे नहीं होती लगातार तुम्हारी मां की सेवा सुश्रुषा,अभी तो गई हैं…”
“अरे सुनो नेहू!” सागर ने चिरौरी करते कहा,”तुम बात बात में रूठा न करो,तुम जानती हो मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता इसलिए मुझे बार बार मायके जाने की धमकी क्यों देती हो जान!”
“और क्या करूं?तुम्हारी भाभी बहुत होशियार समझती हैं खुद को,जब हमारा टर्न था,हमने रखा मां को तुम्हारी,अब उनकी बारी आई तो लगी बहाने बनाने…अपने मायके जाना है तो मां को भी साथ ले जाओ..!”
करता हूं कुछ बाबा!लेकिन देखो तुम मायके जाने की बात दोबारा न करना!उसके करीब आते सागर बोला तो नेहा मुस्करा दी…”तुम भी किसी को अपने प्यार में कबाब की हड्डी नहीं बनने दोगे,वादा करो!”
कहते हुए नेहा ने अपना गोरा,मुलायम सा हाथ सागर की तरफ बढ़ाया तो सागर ने उसका हाथ जल्दी से अपने होंठों से लगा कर चूम लिया और वो इठलाती हुई काम का बहाना कर उससे हाथ छुड़ा के किचेन की तरफ भागी।

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सागर परेशान था,कहने को उसने कह दिया था नेहा से लेकिन बड़े भाई मयंक से क्या कहे?उनकी पत्नी यानि उसकी भाभी शिखा जॉब करती थीं,उन्हें अम्मा को रखने में ज्यादा दिक्कत होती थी क्योंकि अम्मा वहां खाने में हमेशा नुक्स निकालती थीं,दरअसल खाना बनाने वाली के हाथ का खाना उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आता था।
इधर नेहा तो सारा दिन घर में ही रहती थी पर जब तक अम्मा यहां उनके पास रहती,वो किसी न किसी बहाने,अम्मा के खिलाफ सागर के कान भरती ही रहती थी और वो परेशान हो उठता था और बेचैनी से इंतजार करता उस दिन का जब वो बड़े भाई मयंक के यहां रहने जाएं।
बड़ा अजीब लगता था सागर को कि जिस अम्मा ने उन दोनो भाई और दो बहनों को बड़े आराम से पाल लिया था जबकि उस वक्त न इतनी सुविधाएं हुआ करती थीं और न ही इतनी पैसों की इफरायत,अब वो दोनो भाई को बहुत अच्छी पोस्ट्स पर काम कर रहे थे,अकेली अम्मा को नहीं रख पा रहे थे।
जब तक बाऊ जी थे,उन्हें पता ही नहीं चला मां बाप की जिम्मेदारी क्या होती है?मां पिता में अच्छी बॉन्डिंग थी,सारे बच्चे त्योहारों पर इकठ्ठे होते,दोनो बहन भी अपने पतियों और बच्चों संग आ जाती,खूब रौनक लगाते सब मिलकर और जाते हुए उनके मां बाप उन्हें अक्सर कुछ दे ही देते।
पिताजी ने बहुत कुछ छोड़ा था जाते हुए,ऐसा नहीं था कि उनकी मां उन बच्चों पर आर्थिक रूप से आश्रित थीं पर इस बड़ी उम्र में अकेले रहने के नाम डर जाती थीं।भगवान न करे कभी कुछ हो जाए तो कोई देखने वाला भी तो होना चाहिए।उन्हें लगा था कि दोनो बेटे कहीं आप में भिड़ न जाएं कि मां उनके पास ही रहेंगी पर सच्चाई इससे कोसो दूर निकली।
वो दोनो तो इस बात पर लड़ रहे थे कि मां को तू रख ले, मै नहीं रख पाऊंगा।
उनकी मां कल्याणी की आंखें भर आई जब उसने अपने बच्चों का इतना स्वार्थी रूप देखा।ये वही बच्चे हैं जो अपने बाऊ जी के आगे मिन्नते करते नहीं थकते थे कि आप दोनो हमारे साथ चलो।
क्या वो एक दिखावा था?क्या इन्हें जरा भी फिक्र नहीं थी हमारी और न हमसे प्यार ही था? हे भगवान!इनकी परवरिश में कहां गलती हो गई?वो सोचती।
कल्याणी ने बहुत मना किया फिर उनके साथ जाने के लिए,लेकिन फिर उसकी बेटियां अड़ गई कि मां को हम साथ ले जायेंगे।
कितनी भी आधुनिक हो कल्याणी पर बेटियों दामाद के घर रहने के संस्कार नहीं थे उसके।आखिर मन मारकर ये तय हुआ कि छह छह महीने एक एक लड़के के पास रहेंगी वो।
शुरू शुरू में कुछ समय कट गया था चैन से फिर विवाद होने लगे।लड़कों को शिकायत थी मां से कि पिताजी की संपत्ति का बंटवारा क्यों नहीं करती, उस घर को बंद करके क्यों डाला है?कल्याणी डरती थी कि अभी मेरे हाथ में कुछ है तो शायद लालच में ही ये मेरा ख्याल रखेंगे,एक बार मुझसे सारे अधिकार छीन लिए तो कहीं मुझे दर दर की ठोकर खाने को न छोड़ दें।
जब उठते बैठते दोनो बेटों बहुओं ने कल्याणी को तंग कर दिया तो फिर एक दिन आया जब उसने वो पुश्तैनी मकान बेचना तय किया।
मकान बिकता तो उसका सामान भी बेचना पड़ा,कल्याणी उस सामान से इमोशनली जुड़ी हुई थी,मिट्टी के भावों बिकते उस सामान की कीमत कल्याणी के लिए करोड़ों से ज्यादा की थी।
उफ्फ..ये लकड़ी की मेज़!उसपर सागर और मयंक के पिता बैठकर कितना लिखी पढ़ी का काम निबटाते थे,वो रसोई में रखा ऊंचा गद्दीदार स्टूल जो उन्होंने कितने प्यार से मेरे लिए बनवाया था कि तू खड़े खड़े काम करते थक जाती होगी,इसपर बैठकर बनाया कर खाना।
कल्याणी उस पर प्यार से हाथ फेरती रह गई और बच्चों ने निर्दयता से उसे कबाड़ी को बेच दिया।कुछ मंहगे सामानों के लिए वो आपस में कुत्ते बिल्ली की तरह लड़ रहे थे।
“भैया!ये ओ जनरल का स्प्लिट एसी मै ले जाऊंगी”,उसकी छोटी लड़की सोना बोली तो उसके दामाद ने भी कोई विरोध नहीं किया और कल्याणी शॉक्ड सी देखती रही।
“ये डबल डोर फ्रीज तो पापा ने मुझे देने को कहा था”,बड़ी भी कहां पीछे रहने वाली थी!
सागर और मयंक बडबडा रहे थे कि पैसा,जायदाद,सामान सबमें हिस्सा लेने तो तैयार बैठी हैं ये दोनो और मां को रखने की बात आयेगी तो मां उन्हें फ्री कर देंगी ये कहकर कि ये लड़कियां हैं!
कल्याणी फटी आंखों से ये सब तमाशा देखती रही,इन्हें मुझसे जरा प्यार नहीं,इन्हें रुचि है तो इस बात में कि किसके हिस्से में क्या सामान आ रहा है! कोई एक स्वार्थी हो तो आदमी संतोष कर भी ले पर यहां तो बड़े से छोटे तक,लड़की हो या लड़का,बहू हो या दामाद,सभी एक समान मतलबी निकले।
कल्याणी सोच में पड़ गई,इस निर्जीव सामान को बटोरने में इन्हें इतना अच्छा लग रहा है और जीती जागती मां सामने खड़ी है,उसकी भावनाओं की तनिक भी कद्र नहीं।ये लोग कहते हैं आजकल जमाने में बड़ा कंपटीशन है,हर बात में दौड़ लगी हुई है,अगर आप धीरे चलोगे तो दौड़ में पीछे रह जाओगे इसलिए आंख मींचे ये लोग दौड़े चले जा रहे हैं पर कहां और कब रुकना है,इसकी उन्हें खबर ही नहीं।
और फिर, और सामानों की तरह कल्याणी का भी बंटवारा हो गया था,साल के पहले छह महीने बड़े बेटे मयंक के पास और बाद के छह महीने सागर के पास।हालांकि कल्याणी को ऐसा करने में जोर पड़ा था क्योंकि मयंक हिल स्टेशन पर था,जनवरी और फरवरी में वहां बर्फ जमी रहती थी और उसे जोड़ों में दर्द की शिकायत थी और सागर प्लेन में था,वहां की चिपचिपी गर्मी उसे परेशान कर देती पर कौन सुने उसकी।बेटों का तानाशाही फरमान जारी होता और वो चुपचाप वहीं रहने को मजबूर थी।
अब जनवरी में सागर,कल्याणी को मटन भैया के पास छोड़ के आ गया था और अचानक से मयंक भैया का फोन आ गया कि वो मां को आके ले जाए क्योंकि उन्हें और शिखा भाभी को उनके साले की शादी में स्टेट्स जाना है ,फिर वो होली करके ही लौटेंगे अब।
सागर चल तो दिया था मां को लाने फिर से लेकिन उसका दिल धड़क रहा था,नेहा रूठ के चली ही गई तो क्या करूंगा?मुझे तो उसके बिना रात को नींद भी नहीं आती?भैया सही कोई तारीक पूछूंगा कि इस बीच मां को कहां रखा जाए?
वहां पहुंच कर वो दोनो भाई इसी बात पर आपस में गरमा गर्म बहस में उलझे थे कि ऐसी स्थिति में मां का बंटवारा कैसे हो?
कल्याणी ने ये सुना तो वो अवाक रह गई ,कुछ देर तो वो सुन्न पड़ गई लेकिन फिर हिम्मत बटोर के बोलीं,बेटा!तुम दोनो मेरी बात कान खोल कर सुन लो।
चौंक के उन्होंने मां को देखा,आखिर क्या कहना चाहती हैं ये?
देखो! मैं काफी समय से नोटिस कर रही हूं,तुम से कोई भी मुझे साथ रखने को तैयार नहीं है,बेटा! मै कोई सामान नहीं हूं जिसका बंटवारा करोगे तुम,आधा तू रख ले,आधा मैं रख लूं…बूढ़ा आदमी एक जगह रहने का अभ्यस्त हो जाता है तो कहीं दूसरी जगह उसे पसंद नहीं आती आसानी से लेकिन मै फिर भी तुम्हारे साथ सामंजस्य बैठाने का प्रयास कर ही रही थी पर तुम दोनो ने सिद्ध कर दिया कि तुम्हें अपनी मां के मान सम्मान की तो छोड़ो,उसकी किसी भी भावना की कोई कद्र नहीं,ऐसे में मेरा निर्णय है कि मैं अलग ही रहूंगी।मैंने एक ओल्ड एज होम में बात भी कर ली है,वो मुझे रख लेंगे लेकिन एक बात याद रखना,जब बूढ़े हो कर रहने के लिए मकान बनाओ अपना उसमे एक आउट हाउस जरूर बनाना।
क्यों?दोनो एक साथ बोले।
क्योंकि जब तुम्हारा बुढ़ापा आएगा,तुम्हारे बच्चे भी तुम्हें वहीं रखेंगे,बच्चे जैसा
देखते हैं ,उसे बहुत जल्दी सीख जाते हैं।
ये सुनते ही सागर और मयंक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं,वो कल्याणी के कदमों पर गिर गए,मां!हमे माफ कर दीजिए,आपने हमारी आंखें खोल दी।आप जब तक जहां रहना चाहे रह सकती हैं।
अपनी पत्नियों से तो पूछ लो पहले! मां ने याद दिलाया।
उनकी क्या औकात मां!वो कुछ बोल सके,वो हमारी शह पर ही इतराती है।
उन्होंने कहा तो कल्याणी मंद मंद मुस्करा दी।

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