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ढहते रिश्ते-गृहलक्ष्मी की कहानियां

01:00 PM Jul 06, 2024 IST | Sapna Jha
ढहते रिश्ते गृहलक्ष्मी की कहानियां
Dhahte Rishtey
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Hindi Story: आजकल शादियां धूमधाम से होती हैं, बड़े बड़े होटल या रिजॉर्ट लिए जाते हैं, खर्चा भी बहुत किया जाता है,  हर रस्म ग्लैमरस, बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती  कपड़े डिजाइनर होना चाहिए, कोई कलर थीम होना चाहिए , तमाम तरह के बॉडी ट्रीटमेंट ब्यूटी ट्रीटमेंट छह महीने पहले से शुरू हो जाते हैं कभी कभी तो बाराती और घराती भी  कलर कोड तय करके ही कपड़े बनवाते हैं।यानी सब कुछ परफेक्ट,
सबकी खुशी में हम लोग भी खुशी खुशी शामिल होते हैं, फिर कोई पहचान के लोग हो या परिवार की शादी  लेकिन दुख तो तब होता है जब एक दो सालों बाद ही मालूम पड़ता है कि कुछ कारण वशशादी टूट गई या आपसी सहमति से अलग हो गए । कुछ लोग तो बच्चे होने के बाद भी अलग हो जाते हैं यही कारण है की कुटुंब न्यायालयों में ऐसे मामलों की बाद आई हुई है, और वकीलों के पास लंबी लाइन है ।
 अलगाव और तलाक के कई कारण हो सकते हैं ।पति पत्नी का समन्वय न होना  दोनो की नौकरी ,बच्चे को जन्म देना, ऐसा समाज के हर वर्ग में हो रहा है कभी कभी विवाह से पूर्व के संबंध भी एक कारण होता है । फिर भी एक सबसे बड़ा कारण जो आज बहुत ज्यादा देखा जा रहा है वो है विवाहेत्तर संबंध ।

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आज सारी टेक्नोलॉजी घरों में है कंप्यूटर ,लैपटॉप और सबसे बड़ा हर हाथ में मोबाइल है, और इस जादुई  डिब्बी में सारा ज्ञान भरा पड़ा है । इतना सब कुछ होने के बाद भी लोगो को अकेलापन लगता है, आकर एकरसता ने जीवन में घर बना लिया है  हरदम कुछ नया चाहिए  चाहे खाने में हो पहनने में हो या कुछ अन्य क्षेत्र हो । कुछ डिफरेंट की चाह में स्त्री पुरुष भी एक नए साथी  दोस्त या सुख दुख की  बातें करने वाले की तलाश में रहते हैं । और फिर परिणामों का विचार किए बिना उसको पाने की राह पर चल पड़ते हैं ।
   दो तीन वर्ष पहले एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने विवाहेत्तर संबंधों पर सर्वे किया ,शहरों की नौकरीपेशा महिलाओं ने बेबाकी से स्वीकार किया कि वे इस प्रकार के संबंधों में हैं और उन्हें कोई ग्लानि नही है ।आज की इस भागती दौड़ती जिंदगी में पुरुष जहां  सुकून के दो पल गुजारने के लिए किसी महिला मित्र की तलाश करता है ,वहीं  महिलाएं भी कुछ नयापन  पाने की चाह में सहकर्मी रिश्तेदार या पड़ोसी  का साथ ढूढती हैं । माता पिता की इन गतिविधियों का शिकार बनते हैं बच्चे, बच्चे भले ही आधुनिक युग में पल रहे हैं और जी रहे हैं लेकिन वे अपने माता पिता की जगह किसी और को  स्वीकार नहीं कर सकते । जहा मां या पिता की मृत्यु के बाद सौतेली मां या पिता को आसानी से स्वीकार नहीं करता,वहां ऐसे संबंधों से उपजी स्थिति तो और भी भयंकर होती है ।बच्चे एक अजीब सी मानसिक कशमकश से गुजरते हैं उनके मन में जो सवाल उठते हैं उनके जवाब देने वाला कोई नहीं होता  और ऐसे बच्चे अपने विचारों की दुनिया में अलग से ही खोए रहते हैं  किशोरावस्था में या युवा  होने पर ये गलत राह भी पकड़ लेते हैं उनके स्वभाव में भी अशोभनीय परिवर्तन आने लगते है, प्यार और लगाव पाने की आयु में उन्हें टूट फूट महसूस होती है
कोई पारिवारिक नियंत्रण या अनुशासन न होने के कारण परिवार टूट जाते हैं  ऐसे स्त्री पुरुषों को समाज भी अच्छी नजर से नही देखता । इस प्रकार के परिवारों के बच्चे जब अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं तो सही गलत बताने वाला  मार्गदर्शन करने वाला या समझाने वाला कोई नहीं होता या बच्चा उस व्यक्ति को मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार ही नही कर पाता ऐसे बच्चे  जब जीवन में आने वाले उतार  चढ़ावों का सामना नहीं कर पाते तो आत्मघाती निर्णय लेने में संकोच नहीं करते क्योंकि वे मानसिक रूप से बहुत कमजोर हो जाते हैं । बच्चो के मन में अपने माता या पिता के प्रति एक दबा हुआ गुस्सा रहता है जिससे वे मानसिक तनाव और दुविधा से गुजरते हैं ।
जाहिर है कि विवाहेत्तर संबंधों से पारिवारिक ताना बाना टूट जाता हैं सामाजिक स्थिति तो और भी खराब हो जाती है   लोगो में बढ़ती मानसिक समस्याएं इसका एक प्रमाण होती हैं । सब कुछ बिखरा सा लगता है  मानसिक द्वंद में फसे लोग समय आने पर विपरीत परिस्थितियों से लड़ भी नही सकते फिर चाहे विवाह हो कैरियर हो या उनका कार्यक्षेत्र ।
मनोविज्ञानियों के अनुसार ऐसे लोग अपने करीबी लोगों पर भी हमले करने से नही चूकते ।कोई कानून विवाह विच्छेद या पति पत्नी के झगड़ों को आसानी से न तो सुलझा सकता है न ही जीवन में सुख  शांति ला सकता है और किसी अंतिम सुखद परिणाम की तरफ ले जा सकता है । घर की बात घर में ही सुलझाना चाहिए बच्चो को माता पिता दोनो का साहचर्य चाहिए । घरों परिवारों में संवादहीनता की स्थिति कई समस्याएं पैदा कर रही हैं  माता पिता को सहनशीलता और समझदारी दिखानी पड़ेगी ।
नैतिकता के नियम हर युग देश समय परिवार में एक से ही रहते हैं लोग कितना भी कहें की समय बदल गया है लेकिन समय हमको अनैतिक होने की इजाजत नहीं देता । सभी लोग स्वच्छंदता और स्वतंत्रता की बातें करने गलत व्यवहार और गलत बातों को सही ठहरा कर एक मानसिक रूप से बीमार समाज ही बना रहे हैं । स्वतंत्रता का अर्थ है खुद का खुद पर नियंत्रण,  न कि बेलगाम होना । स्वतंत्रता पर अंकुश स्वयं ही लगाना है ।
   हम मकान बनवाते हैं तो उसकी नींव पक्की करने के लिए क्या क्या जतन करते हैं , वास्तु पूजा पाठ ज्योतिषी पंडित पुजारी सबका सहारा लेते हैं ताकि मकान पक्का बने,  और हमारी आने वाली पीढ़ियां उसमे रहकर मकान का आनंद ले सकें, लेकिन परिवार का विकास कार्य समय लोग नींव की बात भूल जाते हैं
खंडित परिवार से खंडित समाज ही बनता है फिर हम  अखंड कैसे रह सकते हैं ।

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