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दिलों का बंटवारा-गृहलक्ष्मी की कहानियां

01:00 PM Jun 20, 2024 IST | Sapna Jha
दिलों का बंटवारा गृहलक्ष्मी की कहानियां
Dilon ka Batwara
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Hindi Kahani: बड़ी शांति से मेरा घर खड़ा था जैसे कि कोई बहुत बड़ा तूफान गुजर चुका हो।
बिल्कुल ही मौन और स्तब्ध !
मैंने टैक्सी वाले को पेमेंट किया और अपने सामान लेकर बड़े से गेट से अंदर आने लगी।
कोई हलचल नहीं ,कोई शोरगुल नहीं। ऐसा लग रहा था कि घर में कोई है ही नहीं।
नहीं तो पिछले साल जब मैं आई थी तब मेरे गेट में घुसने से पहले ही दोनों भैया के बच्चे बुआ बुआ करते हुए मेरे आगे पीछे दौड़ने लगे थे।
“अरे भाई ठहरो तो, पहले नमिता को अंदर तो आने दो!” बड़े भैया हंसते हुए जब चारों बच्चों की झिड़की लगाई थी तब चारों बच्चे अलग होकर मुझे बैठने का मौका दे दिया था।
मैंने भी अपना पर्स खोलकर सबसे पहले उन्हें चॉकलेट थमाया फिर उनके गिफ्ट निकाल कर दिए।
दिन भर पूरे घर में बच्चों की आवाज गूंजती रहती थी क्योंकि उस समय स्कूल भी बंद था।
बच्चे दिन भर घर में रहते थे और उधम मचाया करते थे।
हमारा वह बड़ा सा आंगन जो हमारे भी बचपन का गवाह था ,अब नई पीढ़ी का भी।बहुत ही खुशनसीब आंगन था।

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कई बार उनके शोर शराबे से मां परेशान हो जाती थी।
उनके चिलपों से उकता कर उन्हें डांट भी देती थी फिर उन्हें याद आता था तो वह हंस कर कहती “नमिता, मैं सठिया गई हूं। बच्चों की आवाज मुझे चुभती है!”
मैं अपना सूटकेस खिसकाती हुई ड्राइंग रूम तक आ चुकी थी।
दरवाजा मेरे स्वागत में खुला हुआ ही था, मगर अंदर भी कोई नहीं था।
“मां!,आप कहाँ हैं?” मैं आवाज देकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
कहीं से कोई आवाज नहीं आई।
अंदर घुसकर जैसे ही मैंने आंगन को देखा मेरा दिल टूट गया ।
अब वहां एक ऊंची दीवार खड़ी हो चुकी थी।
मतलब उस ओर बड़े भैया का हिस्सा था। बीच में बंटवारा हो चुका था।
अपने कमरे के पीछे वाले बालकनी में मां अकेले बैठी थी।
उन्हें मेरी आहट भी सुनाई नहीं पड़ी। जैसे ही मैं वहां पहुंची, उनकी नजर मुझसे टकराई तो उन्होंने बड़ी ही उदासी भरे आवाज में कहा
“नमिता आ गई बेटा, आओ बैठो।पानी पी लो। अभी सुधा आती होगी। तब तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं ।”
मेरा दिल बुझ गया। “मतलब अब मां को मेरे लिए चाय बनाने के लिए भाभी से इजाजत लेनी होगी!
मां भी जिम्मेदारी का बोझ तो नहीं बन गई है!” कई बातें मेरे दिमाग में घूमने लगी।
मुझे चुप देख कर मां ने फिर से कहा
“कहाँ खोई है तू नमिता?”
“नहीं मां मैं पहले फ्रेश हो जाऊंगी उसके बाद ही कुछ खाऊंगी। आप आराम से बैठिये। मैं नहा लेती हूं।”
“ ठीक है बेटा, यहीं मेरे बाथरूम में तू नहा ले और अपना बैग भी यहीं रख ले।”
“ क्यों मां?”
फिर मुझे याद आया मेरा कमरा जो शादी से पहले मेरा होता था वह तो वह बड़े भैया के हिस्से में चला गया है।
मेरा मन फिर से कचोट गया। बचपन की यादें भुलाए नहीं भूलती। वह हम पर हावी होती है।
बड़े बुझे मन से मैंने अपने सूटकेस से कपड़े निकाले और तौलिया लेकर बाथरूम में घुस गई।
शावर की ठंडी फुहारें मेरे शरीर को तो ठंडक पहुंचा रही थी मगर मेरा मन अभी उबल रहा था।
कई बार मां की बातें फोन पर आ जाती थीं।
“ नमिता, अब तेरे बाबूजी के बाद दोनों भाई वैसे नहीं रहे ,जैसे पहले थे।मेरे अंदर इतनी ताकत नहीं जैसे तेरे बाबूजी की थी। मैं उन्हें समेट नहीं पाई ।उनका लड़ाई खत्म नहीं कर पाई।
आखिरकार इस घर का बंटवारा हो ही गया। मैं नहीं चाहती थी मेरे जीते जी इस घर के बीचों बीच दीवार पड़े मगर …!”
मां की सिसकती हुई आवाज सुनाई पड़ती तो मैं उन्हें सांत्वना देने के लिए कहती
“अरे मां, यह तो हर घर की कहानी है और फिर जब पापा ने वसीयत बनाकर ही गए हैं तो फिर यह लड़ाई झगड़ा क्यों?”
अब मां के उदास चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा है कि पिछले एक साल में उन्होंने सिर्फ अपना पति नहीं खोया है बल्कि बच्चे भी खो दिए हैं।
काफी देर तक शावर के नीचे रहने के बाद मेरा मन थोड़ा सा रिफ्रेश हो चुका था।
मैं कपड़े बदलकर बाहर आई तब तक सुधा भाभी घर आ चुकी थी।
“आओ नमिता गरमागरम पकौड़े खाओ।”
तुम्हारे भैया तुम्हारा फेवरेट मोमोज बनाने के लिए ही रुक गए हैं।
रात में तो तुम्हारे लिए तुम्हारा फेवरेट तंदूरी चिकन मोमोज आ रहा है। तुम्हें पसंद है ना!”
“हाँ भाभी।”
भाभी का तनाव मुक्त मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर मुझे ऐसा लगा ही नहीं कि 6 महीने में इतना बड़ा तूफान आकर चला गया है।
इतना बड़ा तूफान कि घर में दीवार उठाने की जरूरत पड़ गई ।
न जाने इस मनमुटाव का कौन सा कारण होगा ?
सामने मां बैठी हुई थी इसलिए मैं भी मुस्कुराती हुई बोल रही थी।
चाय पीने के बाद मां ने मुझसे कहा “नमिता तुम आराम करो। मैं पूजा कर लेती हूं। शाम हो गई है।”
“ ठीक है मां,मैं ने फिर सुधा भाभी से कहा “भाभी चलिए, मैं आपकी किचन में मदद करवा देती हूं।”
“ बस मां का खाना है वह मैं बना दूंगी। हम लोग तो मोमोज ही खाएंगे ना!”
मां के हटते ही भाभी के चेहरे पर कई उतार चढ़ाव आने लगे।
उन्होंने बड़े ही दबे स्वर में कहा ”नमिता, तुम्हें तो ऐसा लग रहा होगा कि मैं बहुत बुरी हूं। मैंने घर में बटवारा करवा दिया मगर ऐसा नहीं है।
कोई कब तक चुप रह सकता है। रिश्ते की हद होती है।
कोई झुकता है तो सामने वाले को भी इज्जत करना चाहिए।
बड़ी भाभी ने तो हद पार कर दिया। अपने मायके वालों को बुलाकर महीना महीना रोक कर रखती थी और उन सब का खाना मैं अकेली बनाती रहती थी।
बताओ यह सब कुछ ठीक लगता है क्या?
उस पर बड़े भैया कभी कुछ भी नहीं बोलते थे।“
वह अपनी भड़ास निकाले जा रही थीं।
मुझे लगा कि मेरा चुप रहना ही ठीक है इसलिए मैंने कहा” भाभी, आपको जो ठीक लगे आप वही कीजिए।”
रात में खाने के टेबल पर कई तरह के डिशेज सजे हुए थे। मोमोज, पास्ता,नूडल्स मिठाई और भी कई तरह के आइटम रखे हुए थे।
प्रवीण भैया के चेहरे पर मेरे आने की खुशी दिख रही थी।
“अच्छा से खाओ नमिता सब तुम्हारी पसंद का ही है।”
“हाँ भैया, मगर आप दोनों ने मुझे अचानक ही यहां क्यों बुलाया?”
“तुमसे काम था नमिता।नहीं तो उलाहना देती रहती जिंदगी भर इसलिए बुलाना पड़ा।”
“कैसा उलाहना?”मैं आश्चर्य चकित थी। तभी बड़ी भाभी का फोन मेरे फोन पर आने लगा।
मैंने उठाकर हेलो बोला तो बड़ी भाभी ने कहा
“आ गई नमिता, कल सुबह का नाश्ता हमारे साथ ही करोगी। तुम्हारे भैया ने खास इंतजाम करके रखा है।”
“ इसकी क्या जरूरत थी भाभी?”
मैं संकोच में भरकर बोली।
“ अरे तुम बड़ी भाभी से इतना फॉर्मेलिटी क्यों कर रही हो ?तुम्हारे भैया ने छोले भटूरे का ऑर्डर दे भी दिया है।
कल सुबह-सुबह तुम्हारे लिए जलेबी और छोले भटूरे आ रहे हैं।कल सुबह तुम आ जाना।”
“ ठीक है भाभी।”
मैंने सवाललिया निगाहों से भैया भाभी की तरफ देखा ।उन्हें भाभी ने इन्वाइट नहीं किया था।
मुझे बहुत बुरा लगा।
“भैया आपको बोला नहीं आने के लिए।”
“अरे कोई बात नहीं। मैं वैसे भी वहां नहीं जाता।”
न जाने किस बात की कड़वाहट करने भैया के अंदर आ गई थी। अधूरा खाना छोड़ कर वहां से उठकर चले गए।
दूसरे दिन बड़ी भाभी के यहां गरमा गरम छोले भटूरे और गरम जलेबी खाते हुए मुझे ऐसा लग ही नहीं कि बड़े भैया और भाभी के प्रेम में कहीं से कोई दिखावटीपन आ गया हो।
मेरे लिए दिल खोलकर उनका प्रेम झलक रहा था। मेरी आंखों में आंसू आ गए।
भाभी ने कहा
“नमिता, जल्दी से नाश्ता खत्म कर लो मैं तुम्हारे लिए मसाले वाली चाय बनाने जा रही हूं ,जो तुम्हें पसंद है ना।”
मेरी आंखों में आंसू आ गए।
विवेक भैया मेरे पास आकर बैठ गए। उन्होंने कहा
“क्या बात है नमिता, तुम रो रही हो?”
“ हां भैया इस घर की बंटवारा ने दिल को तोड़ दिया! ना जाने क्या बात है मुझे नहीं पता मगर पापा के जाने की बाद ऐसा क्या हो गया कि घर के बीच में दीवार खड़ी हो गई?”
बड़े भैया लंबी सांस लेकर बोले “मां भी यही बोलती है, तुम ही बोल रही हो। तुम दोनों की शिकायत यही है इसलिए मैंने अपने हिस्से का जमीन बिल्डर को दे दिया है।
अब मैं यहां से जा रहा हूं। मैंने अपने लिए एक फ्लैट ले लिया है।”
“फ्लैट ले लिया है मगर कहां?” मैं आश्चर्य से भर उठी।
“यहीं गोविंद नगर में सूर्या अपार्टमेंट में।
जब चाहो तब चली आना ।वैसे जब भी गृह प्रवेश होगा मैं तुम्हें फोन करूंगा।”
मेरे पास कई प्रश्न थे मगर मैं चुप रह कर नीचे आ गई।
“ कैसा रहा नाश्ता तुम्हारा?”प्रवीण भैया के पूछने पर मैंने कहा
“ बहुत अच्छा मगर कुछ कमी थी!”
“क्या?”
“आपको पता है कि बड़े भैया अपना घर बेचकर सूर्या अपार्टमेंट में अपना फ्लैट ले रहे हैं।”
“नहीं मुझे नहीं पता था। प्रवीण भैया ने कहा, मैं भी तुम्हें यही बताना चाह रहा था कि मैं यह जमीन बेचकर दूसरा फ्लैट लेने वाला हूं।
इस घर में ना धूप आती है ना हवा।
कुछ भी नहीं आता। अच्छा है कि फ्लैट लेकर उसमे रहें ताकि धूप, हवा सब आए।
अब तुम ही देखो कितना घुटन भरा आंगन हो गया है?”
मैं मन ही मन बोली
“ भैया यह घुटन आपके और बड़े भैया के दिमाग के फितूर के कारण हुई है, नहीं तो इस आंगन में ही हमारा बचपन बीता था। कितने चिड़ियों ने यहां अपने घोंसले बनाए थे। कितनी बार गेंदा और गुलदाउदी हमने उगाया था।
झूठ झूठ का घर बनाकर हम खेले थे और न जाने कितनी बार 50 चोर का किस्सा बना था मगर अब यहां सांस ही नहीं आ रही है।”
मैं चुप ही रही मैंने ऊपर से यही कहा
“आप बिल्कुल सही कर रहे हैं भैया, यहां तो घुटन सी लगती है। हवा का नामो निशान नहीं है।”
“ नमिता मां जिद कर रही है बड़े भैया के पास जाकर रहने के लिए तो शायद मां अगले महीने बड़े भैया के पास चली जाएगी। तबतक मैं इस जमीन के सारे फॉर्मिलिटिज पूरी कर लूंगा।”
मेरा मन तिक्तता से भर उठा
“क्या मां भी एक जिम्मेदारी है?उसका भी बंटवारा हो? कभी यहां तो कभी वहां!
अगर आज पापा होते तो शायद किसी को हिम्मत नहीं होती इस घर में दीवार उठाने की।
मां की ममता और प्यार ने तुम्हें आप दोनों को इतना बेपरवाह बना दिया कि आप दोनों ने अपनी हदें पर कर दी है।”

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मैं बहुत ही ज्यादा टूट गई थी। दिखावटी शब्द नहीं थे, जज्बात नहीं थी।
मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैं खुद दो बेटों की मां थी।
कहीं यही दानव मेरे बच्चों के बीच में भी ना जाए!
मैंने भैया से कहा
“भैया, कुछ दिनों के लिए मां को मेरे पास भेज दीजिए।”

“ पर क्यों?”प्रवीण भैया आश्चर्य चकित हो गए।

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“ मेरा मन नहीं लगता भैया। दोनों बच्चे हॉस्टल में हैं। भुवन टूर पर ही रहते हैं।
मैं ज्यादातर अकेली रहती हूं तो मेरे साथ बोलने बतियाने वाला कोई तो रहेगा।”

“ हां ठीक है। कुछ दिनों के लिए तुम मां को ले जाओ।”

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“ ठीक है भैया, मैं ले जाती हूं।”

मैं मां को साथ लेकर गाड़ी में बैठ गई।
मां के उदास चेहरे पर कोई खुशी तो नहीं थी मगर कुछ दिन बेटी के साथ रहने की एक संतुष्टि थी।
“कम से कम उनके मन को टटोलकर उनके भड़ास तो निकाल दूं।
बेटी हूँ तो अपना फर्ज पूरा कर दूं।
एक और बंटवारा मैंने कर लिया था। मां की खुशियों का बंटवारा।”

गाड़ी आगे बढ़ चुकी थी।दोनों भाइयों की लाडली बहन फिर आने का वादा कर।

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