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एक आंच की कसर - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jun 12, 2024 IST | Reena Yadav
एक आंच की कसर   मुंशी प्रेमचंद
ek aanch kee kasar by munshi premchand
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सारे नगर में महाशय यशोदानंद का बयान हो रहा था। नगर ही में नहीं, समस्त प्रान्त में उनकी कीर्ति गायी जाती थी, समाचार पत्रों में टिप्पणियाँ हो रही थीं, मित्रों के प्रशंसापूर्ण पत्रों का ताँता लगा हुआ था। समाज-सेवा इसको कहते हैं। उन्नत विचार के लोग ऐसा ही करते हैं। महाशय जी ने शिक्षित समुदाय का मुख उन्नत कर दिया। अब कौन यह कहने का साहस कर सकता है हमारे नेता केवल बात के धनी हैं, काम के धनी नहीं। महाशय जी चाहते तो अपने पुत्र के लिए उन्हें कम-से-कम 20 हजार रुपये दहेज में मिलते, उस पर खुशामद पाते। मगर लाला साहब ने सिद्धान्त के सामने धन की रत्ती बराबर परवाह न की और अपने पुत्र का विवाह बिना एक पाई दहेज लिये स्वीकार किया। वाह! वाह! हिम्मत हो तो ऐसी हो, सिद्धान्त-प्रेम हो तो ऐसा हो, आदर्श-पालन हो तो ऐसा हो। वाह-वाह रे सच्चे वीर, अपनी माता के सच्चे सपूत, तूने वह कर दिखाया, जो कभी किसी ने न किया था। हम बड़े गर्व से तेरे सामने मस्तक नवाते हैं।

महाशय यशोदानंद के दो पुत्र थे। बड़ा लड़का पढ़-लिखकर फाजिल हो चुका था। उसी का विवाह हो रहा था और जैसा हम देख चुके हैं, बिना कुछ दहेज लिये। आज वर का तिलक था। शाहजहाँ पुर के महाशय स्वामी दयाल तिलक लेकर आने वाले थे। शहर के गणमान्य सज्जनों को निमंत्रण दे दिये गए थे। वे लोग जमा हो गए थे। महफ़िल सजी हुई थी। एक प्रवीण सितारिया अपना कौशल दिखाकर लोगों को मुग्ध कर रहा था। दावत का सामान भी तैयार था। मित्रगण यशोदानंद को बधाइयाँ दे रहे थे।

एक महाशय बोले- तुमने तो यार कमाल कर दिया।

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दूसरे- कमाल! यह कहिए कि झंडे गाड़ दिए। अब तक जिसे देखा, मंच पर व्याख्यान झाड़ते ही देखा। जब काम करने का अवसर आता था, तो लोग दुम दबा लेते थे।

तीसरे- कैसे-कैसे बहाने गढ़े जाते हैं- साहब, हमें तो दहेज से सख्त नफरत है। यह मेरे सिद्धान्त के विरुद्ध है, पर करूँ क्या, बच्चे की अम्मी नहीं मानती। कोई अपने बाप पर फेंकता है, कोई और किसी खुर्राट पर।

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चौथे- अजी, कितने तो ऐसे बेहया हैं, जो साफ-साफ कह देते हैं कि हमने लड़के की शिक्षा-दीक्षा में जितना खर्च किया है, वह हमें मिलना चाहिए। मानो उन्होंने यह रुपये किसी बैंक में जमा किए थे।

पांचवें- खूब समझ रहा हूँ आप लोग मुझ पर छींट उड़ा रहे हैं। इसमें लड़के वालों का ही सारा दोष है या लड़की वाले का भी है?

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पहले- लड़की वाले का क्या दोष है? सिवा इसके की वह लड़की का बाप है?

दूसरे- सारा दोष ईश्वर का है, जिसने लड़कियाँ पैदा की। क्यों?

पांचवें- मैं यह नहीं कहता। न सारा दोष लड़की वाले का है, न सारा दोष लड़के वालों का। दोनों ही दोषी हैं। अगर लड़की वाला कुछ न दे, तो उसे यह शिकायत करने का तो कोई अधिकार नहीं है कि डाल क्यों नहीं लाये, सुन्दर जोड़े क्यों नहीं लाये, बाजे-गाजे और धूमधाम के साथ क्यों नहीं आए? बताइए!

चौथे -हाँ आपका यह प्रश्न गौर करने के लायक है। मेरी समझ में तो ऐसी दशा में लड़के के पिता से यह शिकायत न होनी चाहिए।

पाँचवें- तो यों कहिए कि दहेज की प्रथा के साथ ही डाल, गहने और जोड़ों की प्रथा भी त्याज्य है। केवल दहेज को मिटाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है।

यशोदानंद- यह भी lame excuse1 है। मैंने दहेज नहीं लिया है, लेकिन क्या डाला गहने न ले जाऊंगा।

पहने- महाशय आपकी बात निराली है। आप अपनी गिनती हम दुनिया वालों के साथ क्यों करते हैं? आपका स्थान तो देवताओं के साथ है।

दूसरे- 20 हजार की रकम छोड़ दी? क्या बात है!

यंशोदानंद- मेरा तो यह निश्चय है कि हमें सदैव Principles2 पर स्थिर रहना चाहिए। Principal3 के सामने money4 की कोई Value5 नहीं है। दहेज की कुप्रथा पर मैंने खुद कोई व्याख्यान नहीं दिया, शायद कोई नोट तक नहीं लिखा। हाँ Conference6 में इस प्रस्ताव को Second7 कर चुका हूँ और इसलिए मैं अपने को उस प्रस्ताव से बँधा हुआ पाता हूँ। मैं उसे तोड़ना भी चाहूँ तो आत्मा न तोड़ने देगी। मैं सत्य कहता हूँ यह रुपये ले लूँ तो मुझे इतनी मानसिक वेदना होगी कि शायद मैं इस आघात से बच ही न सकूँ।

पाँचवें- अब की conference आपको सभापति न बनाए तो उसका घोर अन्याय है।

यशोदानंद- मैंने अपनी duty8 कर दी, उसका recognition9 हो या न हो, मुझे इसकी परवा नहीं।

इतने में खबर हुई कि महाशय स्वामी दयाल आ पहुँचे। लोग उनका अभिवादन करने को तैयार हुए। उन्हें सोफा पर ला बिठाया और तिलक का संस्कार आरम्भ हो गया। स्वामी दयाल ने एक ढाक के पत्तल पर नारियल, सुपारी, चावल, पान आदि वस्तुएँ वर के सामने रखीं। ब्राह्मणों ने मंत्र पढ़े, हवन हुआ और वर के माथे पर तिलक लगा दिया गया। तुरन्त घर की स्त्रियों ने मंगलाचरण गाना शुरू किया। यहाँ महफिल में महाशय यंशोदानंद ने एक चौकी पर खड़े होकर दहेज की कुप्रथा पर व्याख्यान देना शुरू किया। व्याख्यान पहले से लिखकर तैयार कर लिया गया था। उन्होंने दहेज की ऐतिहासिक व्याख्या की थी। पूर्वकाल में दहेज का नाम भी न था। महाशयों! कोई जानता ही न था कि दहेज या ठिहरौनी किस चिड़िया का नाम है। सत्य मानिए कोई जानता ही न था ठिहरौनी है क्या चीज, पशु या पक्षी, आसमान में या जमीन में, खाने में या पीने में। बादशाही जमाने में इस प्रथा की बुनियाद पड़ी। हमारे युवक सेनाओं में सम्मिलित होने लगे। वह वीर लोग थे, सेवाओं में जाना गर्व की बात समझते थे। माताएँ अपने दुलारे को अपने हाथ से शस्त्रों से सजाकर रणक्षेत्र में भेजती थी। इस भांति युवकों की संख्या कम होने लगी और लड़कों का मोल-तोल शुरू हुआ। आज यह नौबत आ गई है कि मेरी इस तुच्छ, महातुच्छ सेवा पर पत्रों में टिप्पणियाँ हो रही हैं, मानो मैंने कोई असाधारण काम किया है। मैं कहता हूँ अगर आप संसार में जीवित रहना चाहते हैं, तो इस प्रथा का तुरन्त अन्त कीजिए।

एक महाशय ने शंका की- क्या इसका अन्त किए बिना हम सब मर जाएँगे?

यंशोदानंद- अगर ऐसा होता तो क्या पूछना था, लोगों को दण्ड मिल जाता और वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए। यह ईश्वर का अत्याचार है कि ऐसे लोभी, धन पर गिरने वाले, बुर्दा-फरोश, अपनी सन्तान का विक्रय करने वाले नराधम जीवित हैं और सुखी हैं। समाज उनका तिरस्कार नहीं करता। मगर वह सब बुर्दा-फरोश हैं इत्यादि।

व्याख्यान बहुत लम्बा और हास्य से भरा हुआ था। लोगों ने खूब वाह-वाह की। अपना वक्तव्य समाप्त करने के बाद उन्होंने अपने छोटे लड़के परमानंद को, जिसकी अवस्था कोई 7 वर्ष की थी, मंच पर खड़ा किया। उसे उन्होंने एक छोटा-सा व्याख्यान लिखकर दे रखा था। दिखाना चाहते थे कि इस कुल के छोटे बालक भी कितने कुशाग्र-बुद्धि के हैं। सभा-समाजों में बालकों से व्याख्यान दिलाने की प्रथा है ही, किसी को कौतूहल न हुआ। बालक बड़ा सुन्दर, होनहार, हँसमुख था। मुस्कराता हुआ मंच पर आया और जेब से एक कागज निकालकर बड़े गर्व के साथ उच्च स्वर में पढ़ने लगा-

प्रिय बंधु,

नमस्कार।

आपके पत्र से विदित होता है कि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है। मैं ईश्वर को साक्षी करके निवेदन करता हूँ कि निर्दिष्ट धन आपकी सेवा में इतनी गुप्त रीति से पहुँचेगा कि किसी को लेश मात्र भी सन्देह न होगा। हां, केवल एक जिज्ञासा करने की दृष्टता करता हूँ। इस व्यापार को गुप्त रखने से आपको जो सम्मान और प्रतिष्ठा-लाभ होगा, और मेरे निकटवर्ती बंधुओं में मेरी जो जिन्दा की जायेगी, उसके उपलब्ध में मेरे साथ क्या रिआयत होगी? मेरा विनीत अनुरोध है कि 25 में से 5 निकालकर मेरे साथ न्याय किया जाये।

महाशय यंशोदानंद घर में मेहमानों के लिए भोजन डालने का आदेश करने गये थे। निकले तो यह वाक्य उनके कान में पड़ा- ‘25 में से 5 निकालकर मेरे साथ न्याय कीजिए।’ चेहरा फक हो गया, झटपट लड़के के पास गये, कागज उसके हाथ से छीन लिया और बोले- नालायक, यह क्या पढ़ रहा है, यह तो किसी मुवक्किल का खत है, जो उसने अपने मुकदमे के बारे में लिखकर दिया था।

एक महाशय- पढ़ने दीजिए, इस तहरीर में जो लुत्फ़ है, वह किसी दूसरी तहरीर में न होगा।

दूसरी- जादू वह, जो सिर पर चढ़के बोले!

तीसरे- अब जलसा बरखास्त कीजिए। मैं तो चला।

चौथे- यहाँ भी चलन्तू हुए।

यंशोदानंद- बैठिएगा, पत्तल लगाए जा रहे हैं।

पहले- बेटा परमानंद, जरा यहाँ तो आना, तुमने यह कागज कहाँ पाया?

परमानंद- बाबूजी ही ने तो लिखकर अपनी मेज़ के अंदर रख दिया था। मुझसे कहा था कि इसे पढ़ना। अब फालतू मुझसे खफा हो रहे हैं।

यंशोदानंद- वह यह कागज था सुअर! मैंने तो मेज़ के ऊपर रख दिया था। तूने ड्राअर में से क्यों यह कागज निकाला?

परमानंद- मुझे, मेज़ पर नहीं मिला।

यंशोदानंद- तो मुझसे क्यों नहीं कहा, ड्राअर क्यों खोला? देखो, आज ऐसी खबर लेता हूँ कि तुम भी याद करोगे।

पहले- यह आकाशवाणी है।

दूसरे- इसी को लीडरी कहते है कि अपना उल्लू भी सीधा करो और नेकीनाम भी बनो।

तीसरा- शर्म आनी चाहिए। यह त्याग से मिलता है, धोखेबाज़ी से नहीं।

चौथा- मिल तो गया था, पर एक आंच की कसर रह गई।

पाँचवें- ईश्वर पाखंडियों को यों ही दण्ड देता है।

यह कहते हुए लोग उठ खड़े हुए। यशोदानंद समझ गए कि भंडा फूट गया, अब रंग न जमेगा। बार-बार परमानन्द को कुपित नेत्रों से देखते थे और डंडा तौलकर रह जाते थे। इस शैतान ने आज जीती-जिताई बाजी खो दी, मुँह में कालिख लग गई, सिर नीचा हो गया। गोली मार देने का काम किया है।

उधर रास्ते में मित्र-वर्ग यों टिप्पणियाँ करते जा रहे थे-

एक- ईश्वर ने मुँह में कैसी कालिमा लगायी कि हयादार होगा तो अब सूरत न दिखाएगा।

दूसरा- ऐसे-ऐसे धनी, मानी, विद्वान लोग ऐसे पतित हो सकते हैं, मुझे तो यही आश्चर्य है। लेना है तो खुले खजाने लो, कौन तुम्हारा हाथ पकड़ता है, यह क्या कि माल भी चुपके-चुपके उड़ाओ और यश भी कमाओ।

तीसरा- मक्कार का मुँह काला।

चौथा- यंशोदानंद पर दया आ रही है। बेचारे ने इतनी धूर्तता की, उस पर भी कलई खुल ही गई। बस, एक आंच की कसर रह गई।

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