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घर का आंगन-गृहलक्ष्मी की कहानियां

07:00 PM Jun 09, 2024 IST | Sapna Jha
घर का आंगन गृहलक्ष्मी की कहानियां
Ghar ka Aangan
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Hindi Kahani: " रूपाली जल्दी से सामान बांध लो तुम , अब हम इस घर में एक पल भी नहीं रह सकते , जिस घर में हमारी बात नहीं मानी जाए , जिस घर में हमारे सुझावों को अमल में नहीं लाया जाए , उन पर विचार - विमर्श नहीं किया जाए , जिस घर में हमारे साथ परायों जैसा व्यवहार होता हो , हम उस घर में रहकर भी क्या करेंगे ? यह " घर का आंगन " अब हमारे लिए पराया है इसलिए अब इसका " बंटवारा " होगा " विनय अपनी पत्नी रूपाली से यह सब घर के बरामदे में कुर्सी से उठकर ऊंची - ऊंची आवाज़ों में कह रहा था। रूपाली जो ऊपर वाले कमरे में अपनी छोटी ननद ज्योति के साथ में बैठकर गपशप कर रही थी अचानक विनय की आवाज सुनकर सहम जाती है वह ज्योति से पूछती है - " क्या हुआ अचानक ? कुछ गड़बड़ हो गई है क्या ? तुम्हारे भईया अचानक से इतना गुस्सा क्यों हो गए ? अभी बहुत अच्छे से बातें कर रहे थे "। ज्योति जवाब देते हुए कहती है - " भाभी पता नहीं , चलकर देखते हैं क्या हुआ होगा। विनय की इन सभी बातों को घर के मुखिया श्री राममनोहर जी अपनी धर्म पत्नी मनोरमा जी के साथ में बरामदे में ही सोफे पर बैठकर बहुत ही आराम से सुन रहे थे। रूपाली और ज्योति दोनों बरामदे में आ जाते हैं , रूपाली पूछती है - " क्या हुआ विनय तुम इतने गुस्से में क्यों हो ? क्या हुआ है ? , कुछ तो बताओ ? " ज्योति अपने पिता श्री राममनोहर जी से पूछती है -" क्या हुआ पिताजी भईया इतने नाराज़ क्यों हैं ? , आप सबकुछ सुनकर भी इतने खामोश क्यों हैं ? आपको तो ऊंची आवाज पसंद नहीं है " कुछ उत्तर नहीं मिलने पर वह परेशान होने लगती है। एक अजीब - सी खामोशी पूरे घर में अपना आशियाना बना लेती है।

कुछ पलों के बाद श्री राममनोहर जी अपनी धर्मपत्नी मनोरमा जी से कहते हैं - " चलिए खाना खाते हैं , आज क्या बनाया है " ? और अपनी बड़ी बहु रूपाली और अपनी छोटी बेटी ज्योति से कहते हैं - " चलो आ जाओ तुम सब भी खाना खा लो "। श्री राम मनोहर जी और उनकी धर्मपत्नी मनोरमा जी के परिवार में चार बच्चे हैं , उनका बड़ा बेटा विनय जो एक प्राइवेट कंपनी में कार्य करता है उसका विवाह रूपाली से हुआ है , छोटा बेटा राहुल जो अभी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है , बड़ी बेटी पूजा जिसका विवाह प्रीतम से हो गया है और दोनों सरकारी विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं , छोटी बेटी ज्योति जो एक प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत है और घर में उसकी शादी की बातें हो रही हैं। रूपाली उसे अक्सर मजाक में मैनेजर साहिबा कहकर बुलाती है। पूरा परिवार सुख और शांति से खुशियों के साथ में रहता था। श्री राममनोहर जी और उनकी धर्मपत्नी मनोरमा जी ने इस परिवार को अपने संस्कारों से सींच कर रखा है। यह परिवार एक आदर्श परिवार के रूप में जाना जाता है। " घर का आंगन " कभी " बंटवारा " देखेगा यह कोई सोचता भी नहीं था।

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बड़े बेटे विनय का स्थानांतरण दूसरे शहर में हो गया था इसलिए वह अपनी पत्नी रूपाली के साथ में दूसरे शहर में जाकर रहने लगता है। छोटे बेटे राहुल और छोटी बेटी ज्योति की पढ़ाई के लिए विनय हर महीने कुछ पैसे भेजता रहता है। समय के साथ में छोटी बेटी की नौकरी एक प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर लग जाती है। घर में खुशियां निवास कर रही थीं मगर उसकी शादी में होने वाले खर्च की बातें इस घर में होना शुरू हो चुकी थीं। माता - पिता अपनी जमा पूंजी से अपनी छोटी बेटी ज्योति का विवाह करने का निश्चय कर चुके थे मगर विनय उनसे कह रहा था , कि जब हम भाईयों का " बंटवारा " होगा तब हम आपकी जमा पूंजी और फिर " घर का आंगन " का भी " बंटवारा कर लेंगे। आखिर सब कुछ हम भाईयों का ही तो है बहनें तो शादी के बाद अपने ससुराल में ही रहेंगी। विनय की इन बातों को सुनकर दोनों श्री राममनोहर जी एवम श्रीमती मनोरमा जी को बहुत दु:ख होता है मगर बुजुर्ग और समझदारी के आवरण में वह अपनी आंखों से बहते हुए अपने आंसूओं को छुपा लेते हैं।

विनय और रूपाली वहां से चले जाते हैं। " घर का आंगन " जो अभी कुछ पलों पहले तक एकता और खुशियों का केंद्र बना हुआ था वह अब " बंटवारा " और उससे उत्पन्न अशांति का केंद्र बनने लगा था। सभी सदस्य कुछ इस प्रकार से रह रहे थे जैसे वह सब एक - दूसरे से अनजान और अपरिचित हैं। जिस प्रकार पतझड़ में वृक्ष से टूटकर पत्ते अलग होकर जमीन पर करीब तो रहते और दिखाई भी देते हैं मगर साथ में नहीं होते हैं। इस परिवार रूपी वृक्ष के सभी सदस्य सिर्फ अपना जीवन बाहरी आवरण में जीने की कोशिश कर रहे थे मगर उनकी आत्मा अभी भी इस जीवन को जीने की अपनी सहमती नहीं दे रही थी। धीरे - धीरे बस समय निकल रहा था इन सभी की आत्मा और जिंदगी वहीं पर रुकी हुई थी। सभी एक - दूसरे को अंदर से बहुत याद कर रहे थे मगर सामने आने पर अपने अहंकार और स्वाभिमान की चादर ओढ़ लेते थे। जिससे उनके अहंकार और स्वाभिमान को कोई चोट नहीं पहुंच सके। तीज और त्यौहार पर घर में कोई भी खुशी और उत्साह नज़र नहीं आता था क्योंकि खुशियां और उत्साह पूरे परिवार के साथ में आने पर मिलती है किसी दिन और अवसर से नहीं मिलती है। सिर्फ विचारों की लड़ाई है सिर्फ विचारों का मतभेद है सिर्फ खुद को सही साबित करने की जंग है। विचारों को समझना और उन पर तर्क - वितर्क करना उन पर योजनाएं बनाना और भविष्य में संभव लाभ और हानि पर कोई चर्चा ही नहीं हुई थी। सिर्फ एक पक्ष को ही सत्य माना जा रहा था।

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कुछ समय बाद घर का काम करने के बाद रूपाली बालकनी में बैठकर कुछ समय अपने लिए निकाल रही थी उसने अभी अपनी आंखें बंद करके स्वयं के साथ बातें करना शुरू ही किया था कि गाड़ी की आवाज उसके कानों में पड़ी। उसने देखा कि पड़ोस वाले घर में रहने वाला संयुक्त परिवार छुट्टियों का आनंद लेने के लिए बाहर जा रहा है। रूपाली को यह सब देखकर अपने परिवार की याद आने लगी कुछ पलों पहले शांत चेहरे पर अब निराशा की रेखाएं आने लगी थीं। अपना परिवार अपने " घर का आंगन " कितना सुंदर होता है। सभी सदस्यों का एक साथ रहना। तभी घर की घंटी बजती है वह दरवाजा खोलती है विनय उसे अपना बैग देकर डाइनिंग टेबल पर बैठ जाता है , रूपाली उसे पानी देते हुए कहती है - " विनय बहुत समय हो गया है चलो अपने घर चलते हैं अपना परिवार अपना घर मुझे बहुत याद आता है अपने परिवार के सदस्यों की याद मुझे बहुत आती है "। विनय रूपाली की बातें सुनकर उससे कहता है - " रूपाली तुम्हें मालूम है वहां हमारी कोई बात नही मानेगा पिताजी अपनी जिद नहीं छोड़ रहे हैं। तुम ही बताओ क्या मैं गलत हूं ? , क्या मैं चाहता हूं ? , कि " घर का आंगन " का " बंटवारा " हो। नहीं रूपाली मगर आय का स्त्रोत भी तो होना चाहिए अगर पिता जी और माता जी अपनी पूरी जमा पूंजी इस विवाह में खर्च कर देंगे तो फिर आगे क्या होगा। तुम बताओ  मैं क्या करूं " ? रूपाली कहती है -" विनय हम कल घर जाकर पिता जी और माता जी से बात करेंगे "

बरामदे में पिता श्री राममनोहर जी अखबार पढ़ रहे थे और मां मनोरमा जी रसोई घर में खाना बना रही थीं। राहुल सरकारी नौकरी के लिए अपना साक्षात्कार देने जा रहा था और ज्योति बैंक जाने के लिए तैयार हो रही थी। घर के सभी सदस्य बरामदे में आ जाते हैं। रूपाली कहती है - " जी , विनय कुछ कहना चाहते हैं "। विनय कहता है - " पिता जी आप और मां मुझे माफ कर दीजिए। उस दिन जो हुआ मैं बहुत शर्मिंदा हूं , मुझे बस इस परिवार की चिंता हो रही थी अगर आप दोनों अपनी जमा पूंजी इस विवाह में खर्च कर देंगे तो फिर आप दोनों के पास क्या बचेगा। "। पिता जी अपनी कुर्सी से उठकर विनय को गले लगाते हुए  कहते हैं - " बेटा विनय यह कहने के लिए तुमने इतना समय लगा दिया बेटा , एक बार बताया होता तो क्या मैं तुम्हारे इस फैसले को स्वीकार नहीं करता बेटा हमारे " घर का आंगन " कभी " बंटवारा " नहीं देखेगा " बेटा। विनय कहता है - " आपने सही कहा है पिता जी "। यह सब सुनकर परिवार के सभी सदस्य भावुक होकर आंखों में आंसू लिए एक - दूसरे से गले लगकर कहते हैं - " हमारा " घर का आंगन " कभी भी " बंटवारा " नहीं देखेगा "।

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