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दूध का उफान-गृहलक्ष्मी की कहानी-Laghu katha

01:00 PM Jun 27, 2023 IST | Madhu Goel
दूध का उफान गृहलक्ष्मी की कहानी laghu katha
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सुबह का समय था। दूध वाला दूध देकर गया था। मेघा ने गैस जलाई और दूध उबालने रख दिया,यह सोच कि दूध में उबाल आने में समय लगेगा, तो दूसरे काम में लग गई। एक के बाद एक काम याद आते रहे हैं और वह करती रही।इस बीच यह भूल गई कि दूध गैस पर उबालने रख कर आई है।

पति "शिरीष"को प्यास लगी वह पानी लेने के लिए किचन में आए तो देखा दूध में उफान आ रहा है,और दूध भिगोने से निकलकर गैस पर गिर रहा है। शिरिष ने फटाफट गैस का स्विच बंद कर दिया।

इधर -उधर नजर कर मेघा को देखा तो पता चला मेघा रानी जी अपने काम में लगी हुई हैं।

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शिरीष ने मेघा को वहीं से आवाज लगाई और कहा," मेघा...,"अगर दूध उबालने रखा है तो पहले दूध उबाल लेती. दूध गैस पर रखने के बाद ही तुम्हें सारे काम याद आते हैं." यहाँ आ कर देखो...,सारा दूध उफान आ-आ कर निकल गया।

तुम दूसरे कामों में इतना खो जाती हो कि पहले काम की याद ही नहीं रहती।यह जानते हुए भी कि दूध का गिरना अशुभ होता है।ऐसा पहली बार नहीं कई बार हुआ है..,मेघा..तुम कब समझोगी?"

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पति शिरीष का लैक्चर सुनते-ही मेघा काम छोड़कर घबराई हुई सी भागी भागी रसोई में आई और कहा," ओह... हो,अभी कुछ देर पहले ही दूध गैस पर रख गैस ऑन की थी, इतनी देर में उफान आ कर निकल भी गया...,कमाल है।"

हां-हां, तुमसे पूछ कर निकलेगा, कि मैं रुकूं या निकलूं.

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मेघा अपना सा मुंह लेकर रह गई, सोचने लगी," मैं दूसरे कामों में इतना उलझ जाती हूँ ,कि पहला काम ध्यान ही नहीं रहता ."पता नहीं दूध के आगे मैं हार क्यों जाती हूँ?"सारे दिन के कामों में तो कहीं कोई गड़बड़ नहीं होती?इस दूध को मुझ से क्या दुश्मनी है?

अच्छा अब मूड मत खराब करो... चाय बना लो ... प्लीज़, दोनों चाय पीते हैं... शिरीष ने मुस्कुराते हुए  कहा।

इतना एटीट्यूड क्यों दिखा रहे हो? चाय तो बन ही जाएगी।

बात आई-गई हो गई।

अगले दिन सुबह का समय था, शिरीष नहाने गए हुए थे, इसी बीच दूध वाला आ गया.मेघा ने दूध लिया और गैस पर उबालने रख दिया और शिरीष के लिए नाश्ता बनाने लगी, दूध में जल्दी उफान लाने के लिए गैस फुल कर दी, यह सोच कि, नाश्ता बनाते बनाते दूध देख लूंगी, म्यूजिक भी चल रहा था.वह इत्मीनान से काम करती रही। इसी बीच शिरीष की आवाज आती है... मेघा कहां हो... तुम?मेघा को शिरीष की आवाज  का पता तो चला लेकिन...समझ नहीं पाई कि शिरीष क्या बोल रहे हैं?उसने म्यूजिक बंद कर दिया।उसी समय शिरीष ने दोबारा आवाज  लगाई, मेघा ने आवाज सुन कहा,बोलो क्या बात है, वो मैं पोहा बना रही... हूं! !

"जरा तौलिया पकड़ा देना।"

मेघा का फिर दूध से ध्यान हट गया और तौलिये  में चला गया। इधर -उधर नजर कर तौलिया देखने लगी,देखा तौलिया बाहर बिलंगनी पर लटका है, पौनी कड़ाही में छोड़...,तौलिया बिलंगनी से उतार शिरीष को देने चली गई. इस बीच भला दूध  महाश्य कहां रूकने वाले थे,वह आनन-फानन अपनी चरम सीमा पर पहुंच गए और बह निकले।

तौलिया शिरीष को पकड़ा कर जैसे ही मेघा किचन में आई तो देखा...दूध महाश्य जी का चारों तरफ साम्राज्य फैला हुआ था,यह देख मेघा कह बैठी इतनी भी तसल्ली नहीं थी,आ ही तो रही थी.मेघा के हाथ  में जो भी कपड़ा आया झैड़ -पैड़ साफ करने लगी।

इसी बीच शिरीष भी बाथरूम से निकल टॉवल बिलंगनी पर डालने के लिए आ गए,किचन की तरफ नजर की तो देखा दूध उफान आ-आ कर बह गया है,और मेघा रानी साफ करने में लगी हुई है। मेघा की शिरीष  से नजरे चार हुईं वह सकपका गई।

शिरीष का गुस्सा सातवे आसमान पर चढ़ गया और कह बैठा, आज फिर तुमने दूध बहा दिया, तुम से कितनी बार कहा है एक टाइम में एक काम किया करो,"यह बात तुम्हें कब समझ आएगी... मेघा?"

अरे आपने ही तो तौलिया मांगा था!

 मैं क्या करती? इस बीच दूध में उफान आया और  बह निकला।

आप हैं कि...आवाज पर आवाज दिए जा रहे थे,अगर टाॅवल नहीं पकड़ती तो! !

अच्छी मुसीबत है,एक काम हो तो हो कैसे? सारी गलतियां मेघा की ही हैं।

गैस बंद करने का स्विच तो है ही नहीं... जैसे... शिरीष ने  गुस्से से कहा?

हाँ है, तुम्हारी हाय तौबा में..मैं सोच पाऊं जब ना! !

मेघा ने गुस्से से हाथ झटकते हुए कहा,"मैंने भी सोच लिया यह रोज-रोज की बातें हो गई।आज से आप अपने काम खुद किया करें," फिर मैं भी तो देखूं दूध निकलता कैसे हैं?"

सारी गल्ती मेघा की ही हैं,"अरे सुबह के समय 50 काम होते हैं कभी समझा है आपने?"

शिरीष ने भी मेघा की तरह हाथ झटकते हुए कहा,"ठीक है-ठीक है,कर लेंगे...अहसान क्यों जता रही हो।"

दूध की तरह दोनों के बीच तूफ़ान आया और थम गया, बात वहीं खत्म हो गई।

रक्षाबंधन का दिन था।मेघा को भाई के टीका करने जाना था। वर्किंग डे था। शिरीष की छुट्टी नहीं थी।ऑफिस जाना भी जरूरी था। शिरिष अपने घर के अकेले बेटे थे,उनकी अपनी कोई बहन नहीं थी।

दूध वाला दूध दे गया था।मेघा ने दूध गैस पर उबालने के लिए रख दिया।

शिरीष ने मेघा से कहा," मैं सोच रहा हूं आफिस जाते समय तुम्हें तुम्हारे भाई रवि के घर छोड़ देता हूं ,मेरी जरूरी मीटिंग है, मैं मीटिंग खत्म होने के बाद में वहीं पहुंच जाऊंगा।तुम तैयार हो जाओ,दूध मैं देख लेता हूं ,वर्ना मुझे आफिस को देर हो जायेगी।

अरे वाह...,यह कह मेघा खुशी-खुशी तैयार होने चलीं गई। तैयार होने के बाद मेघा किचन में आई तो,देखती क्या है,"जनाब गैस के सामने खड़े हैं और दूध उफान आ कर बह रहा है।यह दृश्य देख मेघा खड़ी की खड़ी रह गई..।

"शिरीष महाश्य अपनी ही दुनियां में खोए हुए हैं...,कमाल है!!

मेघा रोज -रोज दूध में उफान की बातों से परेशान हो चुकी थी।उसने "आव देखा न ताव" बस फिर क्या था, शिरीष पर बरस पड़ी,कहा...,"गैस के आगे खड़े हैं जनाब, फिर भी... दूध बहा दिया...आपने।"

शिरीष भौचक्क से कभी मेघा को देखते तो कभी दूध को।

बोल पड़ी...,अब वो बातें कहां गई?

"मेघा...,मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि एक बार में एक काम किया करो।"

यह सब बातें मेरे लिए ही हैं...,याद करो!!

आप तो एक ही काम कर रहे थे...,"फिर क्या हुआ...जनाब?" मुझे भी तो पता चले?

वो क्या है...मै दूध में उफान आने के इंतज़ार में खड़ा था, पता नहीं क्यूं मेरा ध्यान ट्रेक से हट गया?शिरीष ने बोला।

वहीं तो...,अब आया समझ में...,मेरा तो दूसरे काम में ध्यान हो जाता था, इसलिए दूध बहता था ,आपने तो बिना काम किए ही दूध बहा दिया..., जनाब!!

यह भी भूल गए, मैं यहां क्यों खड़ा हूं?

शिरीष को कुछ जवाब नहीं सूझा ,बस इतना ही कह पाया..ओ..फ्फो...तुम भी..ना..,कह चुप हो गया।

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