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गुनाहों का सौदागर - राहुल भाग-7

09:00 AM Jul 05, 2022 IST | sahnawaj
गुनाहों का सौदागर    राहुल भाग 7
gunahon ka Saudagar by rahul
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मौरिस रोड के चौराहे पर ही उसे अमृत नजर आ गया, जो एक पनवाड़ी से बातें कर रहा था। अमरसिंह ने जल्दी से रिक्शेवाले से कहा‒“रोक…रोक…इधर ही रोक दे।”

रिक्शेवाले ने रिक्शा रोक दिया। अमरसिंह न जेब से दो रुपए निकालकर रिक्शाचालक को दिए तो उसने हैरत से कहा‒“दो रुपए…काहे के साहब ?”

गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

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“तेरा किराया।”

“कमाल है, साहब। आप पहले सिपाही हो, जिसने किराया दिया है। जब से रिक्शा चला रहा हूं, आज तक कभी किसी ने किराया नहीं दिया।”

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अमरसिंह कुछ न बोला। वह तेजी से अमृत के समीप पहुंचा और पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए उसे सम्बोधित करके बोला‒“सुनो…”

अमृत चौंककर मुड़ा। अमरसिंह को देखकर ठिठक गया‒“हां, बोलो।”

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“तुम्हारा नाम अमृत है…लाला सुखीराम के बेटे ?”

“हां…क्यों ?”

“मैं कांस्टेबल अमरसिंह हूं।”

“तुम शायद कल रात…?”

अमरसिंह ने उसकी बात काटकर कहा‒“कल रात मैंने ही उन तीन लुटेरों में से एक को पकड़ा था।”

“ओहो…तुम गश्ती दस्ते में थे ?”

“हां, लेकिन उन तीनों में से किसी ने मोटरसाइकिल नहीं रुकवाई थी। मैंने पप्पी की भुजा इतनी जोेर से पकड़ी थी कि मजबूरन उसे उतरना पड़ा। बाकी दो भाग गए।

“और जानते हो, पप्पी के साथी बदमाशों ने मुझसे बदला लेने के लिए कल रात धोखे से मेरे घर का दरवाजा खुलवा लिया ओर मेरी जवान बहन के साथ छेड़छाड़ की।”

“नहीं…”

“मैंने तुम्हारे लिए इतना कुछ किया और तुम लोगों ने पप्पी को छुड़वा दिया ? तुम्हारे पिता यह बयान लिखकर दे आए कि पप्पी वह लड़का नहीं, जो लुटेरा बनकर दुकान में घुसा था।

“आज पप्पी को किसी चार्ज के बिना छोड़ दिया गया और वह मेरी वह नई साइकिल उड़ाकर ले गया, जा मैंने अपनी मां की कानों की बालियां बेचकर थाने-जाने के लिए खरीदी थी।”

“हे भगवान !”

“वैसे तो तुम लोग कानून और पुलिस को बुरा-भला कहते रहते हो। जब कानून तुम्हारा साथ दे तो तुम खुद ही कानून के रक्षकों को झुठला देते हो।”

अमृत ने ठंडी सांस ली और बोला‒“आओ, वहां एक-एक प्याली चाय पिएंगे।”

अमर ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा‒“नहीं, मैं रिश्वतखोर नहीं हूं।”

अमृत ने गम्भीरता से कहा‒“मैं भी रिश्वत के सख्त खिलाफ हूं। यह तो दोस्ताना पेशकश है।”

अमरसिंह ने उसे ध्यान से देखा।

अमृत उसके हाथ में हाथ डालकर बोला‒“आ जाओ, हम दोनों उम्र में बराबर ही होंगे।”

कुछ देर बाद वह रेस्तरां में थे। अमृत ने दुकानदार से कहा‒“चाचा ! दो कप चाय…”

“अच्छा, लाला।”

अमृत ने अमरसिंह की तरफ मुड़कर कहा‒

“हूं, तो कल रात उन बदमाशों ने तुम्हारी बहन के साथ बदतमीजी की ?”

अमर ने गम्भीरता से कहा‒“मैंने हवालात में उसकी मरम्मत कर ली। अगर मुझे दूसरे लोग न पकड़ते तो एक-आध हड्डी-पसली जरूर तोड़ देता हरामी की।”

चाय वालेे लड़के ने दो कप चाय लाकर रख दी। अमृत ने एक प्याली अमरसिंह की तरफ बढ़ाई। दूसरी अपने आगे सरकाकर बोला‒“और जानते हो, हम लोगों पर कल रात से क्या बीती है ?”

“क्या…”

“सबसे पहले कई लड़के मोटरसाइकिलों पर शोर मचाते हुए गुजरे। हमारी गैलरी में पत्थर फेंका गया, ताकि हम लोग डर जाएं।”

“ओहो…फिर…?”

“फिर टेलीफोन पर पिताजी को धमकी दी गई।”

“नहीं…।”

“और आज सुबह जब पिताजी दुकान खोल रहे थे तो तीन मोटरसाइकिल सवार गुजरें एक ने बड़ा-सा पत्थर खींचकर मारा, जिससे हमारा डेढ़ हजार रुपए का शो-केस टूट गया।”

अमरसिंह के होंठ सख्ती से भिंच गए थे। वह बोला‒“और तुम लोगों ने डरकर पीछा छुड़वा लिया।”

अमृत ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा‒“मैं नहीं जानता कि डर किस चिड़िया का नाम है।”

“तो फिर…?”

“पिताजी को हशमत खां और प्रोफेसर साहब ने बहकाया कि ऐसे बदमाशों से दुश्मनी मोल लेना अच्छा नहीं। फिर सारे दुकानदार उनकी हां में हां मिलाने लगे। मैं फिर भी सहमत न हुआ, लेकिन पिताजी ने मुझे डांटकर चुप करा दिया।

“प्रोफेसर और हशमत साहब पिताजी को गाड़ी में थाने ले गए। मुझे नहीं मालूम उन्होंने क्या बयान दिया। बस, इतना जरूर मालूम हो गया कि पप्पी को छुड़वाकर आए हैं, मैं उनसे बात भी नहीं कर रहा।”

अमरसिंह ने बेचैनी से पहलू बदलकर कहा‒“क्या हो गया है जनता को ? एक तरफ पुलिस को कोआपरेट नहीं करती। दूसरी तरफ पुलिस पर लापरवाही, अनदेखी और गुन्डों की पीठ ठोंकने का आरोप लगाती है।”

“मैं तो यह सोचता हूं कि क्या हो गया है कानून को, कानून के रक्षकों को ? क्यों वे लोग दबाव में आकर मुजरिमों को छोड़ देते हैं ?”

“और क्या करें ? प्रोफेसर साहब और हशमत ने बयान दिया है कि उन्होंने मात्रा गुन्डों की पीठ देखी थी। वह तो साफ बच गए। अब तुम्हारे पिताजी पप्पी को बिल्कुल ही दूध का धुला हुआ साबित करके आ गए।”

“अगर मेरे पिताजी ऐसा न करते तो क्या आप लोग हमारे परिवार की और हमारी रक्षा की जिम्मेदारी लेते ? प्रोफेसर सर और हशमत साहब के साथ भी वही न होता, जो तुम्हारी बहन और हमारे साथ हुआ ?”

यानी आप जनता को दोषी नहीं मानते ?”

“नहीं। दोषी वह कानून है, जिसमें मुजरिमों के बचाव के इतने खाने खुले रख दिए गए हैं कि खुद तुम लोग मुजरिमों को बांधकर नहीं रख सकते।”

“इसलिए कि हमारे हाथ कदाचित् उन बड़े लोगों ने बांध रखे हैं, जो तुरन्त उन गुंडों की सिफारिशें लेकर आ जाते हैं।”

अमृत ने उसे ध्यान से देखकर कहा‒“क्या काई आया था ?”

“कल रात कोई शेरवानी साहब आए थे।”

अमृत चौंककर बोला‒“शेरवानी…ओह…वह वोट बैंक ?”

“वोट बैंक ?”

“मतलब फिर समझाऊंगा। पप्पी तो बहुत बड़े आदमी का बेटा है न ?”

“हां, ज्योति ऑयल मिल के मालिक का बेटा। हैरत है कि यह चंद हजार रुपए की लूटमार करता फिर रहा है शहर में !”

“शेरवानी को जरूर पप्पी के पिता ने भेजा होगा।”

“वह अपने बेटे को गुंडागर्दी पर रोक नहीं लगा सकता और उसके लिए बड़े-बड़े लोगों की सिफारिशें भेज देता है।”

“अमरसिंह, तुम नहीं जानते जगताप क्या है।”

“क्या है ?”

“जगताप वह व्यक्ति है, जिसके आशीर्वाद के बिना हमारे शहर का कोई एम॰ पी॰, एम॰ एल॰ ए॰ इलेक्शन नहीं जीत सकता।”

“ओहो…”

“और शेरवानी वोट बैंक है।”

“वह कैसे ?”

“शेरवानी खुद इलेक्शन नहीं लड़ता, इलेक्शन लड़वाता है और उसका समर्थन प्राप्त करने के लिए पहले से उसे खरीदा जाता है।”

“अच्छा…?”

“जिस पार्टी को शेरवानी का समर्थन प्राप्त हो, जगताप शेरवानी को उसी पार्टी के लिए खरीदता है, फिर शेरवानी जलसे और जुलूसों का आयोजन करता है, जिनमें वह अपने उम्मीदवार के विरोधी को सांप्रदायवादी सिद्ध करने के लिए न केवल भाषण देता है, बल्कि अपने संप्रदाय के लिए भावुक तनाव के सामान भी करता है।”

“मिसाल के तौर पर ?”

“मिसाल के तौर पर मेरा एक क्लासमेट है‒अशरफ ! उसकी बहन कॉलेज में इसलिए प्रसिद्ध है कि वह एक अच्छी कलाकार है। गीत-संगीत, अभिनय और क्लासीकल डांस में निपुण है। भरतनाट्यम में उसने एवार्ड भी ले रखा है।”

अमरसिंह झट बोला‒“उसका नाम सुलताना है न ?”

“हां, वही।”

“अच्छा तो फिर ?”

“पिछले इलेक्शन में शेरवानी ने सुलताना को कन्वेसिंग की इन्चार्ज बनवाया। जगताप के गुंडों ने सुलताना का अपहरण करके रात भर कहीं बन्द रखा। दूसरी सुबह शेरवानी ने शहर भर में यह अफवाह फैला दी कि सुलताना का विरोधी उम्मीदवार ने इसलिए अपहरण करा लिया कि सुलताना मुसलमान है और एक सेक्यूरल उम्मीदवार की कन्वेसिंग कर रही थी।”

“ओहो…!”

“हालांकि दूसरे ही दिन पुलिस ने बिल्कुल पूर्वनियोजित कार्यक्रम के अनुसार छापा मारकर सुलताना को बरामद कर लिया और सुलताना की इज्जत पर भी आंच नहीं आई थी। लेकिन सुलताना को उस घटना का इतना भीषण आघात पहुंचा था कि दूसरे दिन ही उसने छत के पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली।”

“नहीं…!”

“अशरफ की मां सदमे से पागल हो गई। अशरफ ने जुनून में आकर शेरवानी पर कातिलाना आक्रमण कर दिया। लेकिन वह पकड़ा गया और अब जेल में है।”

अमरसिंह सन्नाटे में बैठा रह गया था। अमृत ने ठंडी सांस लेकर चाय का घूंट भरा। फिर अमरसिंह तरफ देखकर बोला‒“अभी तक अशरफ का मुकद्दमा शुरू नहीं हुआ। हालांकि छः महीने गुजर गए हैं। उससे न तो प्रेस वालों को मिलने की आज्ञा है, न ही दोस्तों को।

“कई बार मैं मिलने गया हूं। उनके लिए मैंने कुछ अन्दर भिजवानेे की कोशिश की, वह भी नहीं भेजने दिया गया। अब उसकी मां को मैं अक्सर देखने चला जाता हूं। मगर देखा नहीं जाता।

अमृत के चेहरे पर घोर आंतरिक व्यथा झलक रही थी। उसने कहा‒“कैसे बदलेगा यह सब कुछ ? हर धर्म का सामान्य जन इतना मूर्ख है कि वह इन लोगों की न तो राजनीति समझता है, न ही चालें। बस, आंखें बन्द करके उसी को बोट दे डालते हैं, जिसे उनके नेता की सपोर्ट प्राप्त हो।”

अमरसिंह ने प्याली खाली करके कहा‒“कुछ-न-कुछ तो करना ही पड़ेगा।”

“क्या करेंगे ? एक तुम या एक मैं क्या कर सकते हैं ?”

“एक और एक ग्यारह हो जाएंगे, क्या हम लोग मिलकर कुछ नहीं कर सकते।”

“अशरफ ? वह तो जेल में है।”

“उसके लिए कोई सफाई का वकील खड़ा हुआ ?”

“कौन खड़ा करेगा ? सब जानते हैं कि उसने शेरवानी पर हमला किया था। उसके धर्म के लोग अशरफ को बाहर देख भी लें तो उसे चीर-फाड़कर रख दें। हमारे धर्म के लोग जगताप के हाथों में हैं, क्योंकि जगताप हर इलेक्शन से पहले जनता के लिए अपने खर्चे पर कोई-कोई अच्छा काम कर देता है कि सब उसका गुणगान करने लगते हैं।”

“जैसे…?”

“जैसे पिछली बार उसने इलेक्शन से कुछ पहले म्यूनिसपलिटी वालों के हाथों एक पुरानी, जीर्ण-जर्जर मंदिर की इमारत गिरवाई। अपने गुंडे भेजरक पथराव करा दिया पुलिस पर। फिर खुद पहुंच गया। जनता और गुंडों को शांत किया और म्यूनिसपलिटी से आदेश निकलवाकर नए सिरे से मन्दिर का निर्माण करा दिया, लोगों ने जगताप को पूजना शुरू कर दिया।”

दोनों कुछ देर खामोश रहे।

अचानक बाहर एक मोटरसाइकिल रुकी और वे लोग चौंककर बाहर देखने लगे। अमृत समझा कि कोई गड़बड़ है।

मगर अमरसिंह उठता हुआ बोला‒“ओहो, यह तो सुदर्शन है।”

“सुदर्शन कौन ?”

“मेरी बहन का मंगेतर।”

“अरे, तुम अन्दर बुला लो उसे।”

“नहीं। मैं तुमसे फिर कभी मिलूंगा अमृत और अब हम दोनों का मिलना जरूरी है।”

“जब और जहां कहो।”

“मैं खुद ही तुमसे कांटेक्ट कर लूंगा।”

वह बाहर निकला और सुदर्शन के साथ पिछली सीट पर बैठकर चला गया।

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