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पवनपुत्र हनुमान नन्हे हनुमान का जन्म

02:00 PM Dec 08, 2023 IST | Guddu KUmar
पवनपुत्र हनुमान नन्हे हनुमान का जन्म
hanuman biography
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बहुत समय पहले, अंजना नामक एक मादा बंदर थी। वास्तव में वह स्वर्गलोक
की एक सुंदर अप्सरा थी। उसका असली नाम पुंजिकास्थल था। उसे एक शाप
के कारण बंदरिया के रूप में जन्म लेना पड़ा। यह शाप तभी समाप्त हो सकता
था जब अंजना, भगवान शिव के अवतार को जन्म दे देती।
अंजना और उसके पति ने भगवान शिव की घोर आराधना की। उनके तप से
प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वर दिया। जल्द ही अंजना ने भगवान शिव
के अवतार के रूप में हनुमान को जन्म दिया।

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नन्हा हनुमान बहुत ही नटखट बालक था। एक दिन उसे भूख लगी पर खाने
को कुछ नहीं मिल सका। अचानक ही उसे सूरज दिखाई दिया। वह एक
लाल गोले की तरह चमक रहा था।
फ्ओह, पका हुआ लाल फल! इसे तो मुझे अवश्य खाना चाहिए।य् हनुमान ने
सोचा। नन्हा हनुमान असाधारण शक्तियों के साथ जन्मा था। वह सूरज की
ओर उड़ा व उसे अपने हाथों में लेने की कोशिश की।

भगवान इंद्र ने हनुमान को तेजी से सूरज की ओर आते देखा। वह क्रोधित
हो गए-फ्मूर्ख बालक! तूने सूर्य पर आक्रमण करने का साहस कैसे
किया?य् वह गरजे।

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नन्हे हनुमान को इंद्र के गुस्से या बल के बारे में कुछ नहीं पता था। उसने
चेतावनी को अनसुना किया और अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। अब तो
इंद्र देवता के गुस्से की सीमा न रही। उन्होंने झट से अपना वज्र उठाया और
हनुमान पर प्रहार किया।

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नन्हा हनुमान वज्र की चोट से घायल हो गया। वह नीचे गिरने लगा
तो वायुदेव ने उसे देख लिया। वह यह नहीं सह सकते थे कि उनका
बालक धरती पर जा गिरे (वे हनुमान के धर्मपिता थे)। उन्होंने
हनुमान को बचाने के लिए धरती को ऊं चा उठा दिया।
वह उसे पाताल लोक में ले गए और बोले, फ्मेरे पुत्र! तुम यहां पूरी
तरह से सुरक्षित हो।य्

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नन्हा हनुमान पाताल लोक में सुरक्षित था। हालांकि धरती पर वायु के बिना
सभी जीव व्याकुल हो गए। पेड़-पौधे, जानवर और मनुष्य मरने लगे। ब्रह्मा
जी ने ब्रह्माण्ड की रक्षा करने का निर्णय लिया।

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फ्प्रिय वायु! कृपया धरती पर लौट जाओ। लोग दम घुटने के कारण
मर रहे हैं।य् ब्रह्मा जी ने वायुदेव से विनती की।
फ्मेरा पुत्र घायल है। इसके लिए आप क्या करेंगे?य् वायुदेव ने पूछा।
ब्रह्मा जी ने स्वर्ग के देवों से विनती की कि वे नन्हे हनुमान को वर दें।
उन्होंने हनुमान को वर दिया कि उन्हें कभी कोई हरा नहीं सकेगा और
वे अमर हो जाएंगे। बालक हनुमान उसी समय स्वस्थ हो गया। अंत में
वायुदेव धरती पर लौटे और लोगों का जीवन सामान्य हुआ।

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नन्हा हनुमान बड़ा होने लगा। वह दिन-ब-दिन नटखट होता जा रहा था। वैसे
देखा जाए तो कुछ भी उसके बस में नहीं था- भगवान शिव का अवतार,
असाधारण शक्तियों का वरदान और एक बंदर के गुण व लक्षण----। हनुमान
बहुत ही दुष्ट और शरारती हो गए थे। वे अकसर लोगों के लिए मुश्किलें
खड़ी कर देते और उन्हें सताते।

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नन्हे हनुमान को आश्रमों में जाकर ऋषियों और मुनियों को तंग करने में विशेष
आनंद आता था। एक दिन वह एक आश्रम में घूम रहे थे। उन्होंने एक मुनि को
ध्यान में मग्न देखा। फिर उन्होंने देखा कि आसपास के मुनि भी तपस्या में लीन
थे। वहां खेलने के लिए कोई भी नहीं था।
हनुमान को ऊब होने लगी। वे एक मुनि की गोद में उछल कर बैठ गए और
उनकी दाढ़ी नोचने लगे। मुनि अचानक आई इस मुसीबत से घबरा गए और
हनुमान उनकी बौखलाहट देख खिलखिलाने लगे।

मुनि के गुस्से की सीमा न रही। फ्ओह! तुम फिर से आ गए। तुम कितने समय
से हमें इसी तरह परेशान करते आ रहे हो।य् मुनि चिल्लाए।
फ्यह तो रोज का ही तमाशा होता जा रहा है। समय आ गया है कि हम इस
दुष्ट बंदर को सबक सिखाएं।य् दूसरे मुनि ने कहा।

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फ्आज के बाद तुम अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं कर सकोगे। इसे
अपने-आप को ऊं चा उठाने, प्रार्थना करने और दूसरों का कल्याण
करने के ही काम में ला सकोगे।य् मुनियों ने शाप दिया।
हनुमान के लिए यह शाप भी वरदान ही साबित हुआ क्योंकि इसने
उनका पूरा व्यक्तित्व ही बदल दिया। वे बहुत ही शांत, रचनात्मक
और शक्तिशाली बन गए।

जैसे-जैसे समय बीतता गया। केसरी को अपने पुत्र की शिक्षा के बारे में चिंता
सताने लगी। उन्होंने तय किया कि वे उसे सूर्यदेव के पास भेजेंगे।
हनुमान ने पिता की आज्ञा का पालन किया और झट से सूर्यदेव के पास जा
पहुंचे।
फ्माफ करना बच्चे! मैं प्रतिदिन पूरे आकाश को पार कर तुम्हें शिक्षा देने नहीं
आ सकता। मुझे तो लगातार अपना कर्तव्य पूरा करना होता है।य् सूर्य ने हनुमान
से कहा।

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हनुमान भी पिता की इच्छा पूरी करने के लिए संकल्प ले चुके थे। उन्होंने खुद
को और भी बड़ा बना लिया। फ्प्रभु! मैं आपके पास आऊंगा। आप मुझे इस
कक्षा से ही देख पाएंगे। इस तरह आपके काम में भी बाधा नहीं आएगी।य्
हनुमान ने कहा।
सूर्यदेव हनुमान के समर्पण भाव से प्रसन्न हुए और उसने अपना शिष्य स्वीकार
लिया।

हनुमान ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली। फ्प्रभु! मैं आपको धन्यवाद करता हूं कि
आपने मुझे पवित्र ग्रंथों का ज्ञान प्रदान किया। मैं आपको गुरुदक्षिणा के रूप
में क्या दे सकता हूं?य् हनुमान ने अपने गुरु सूर्यदेव से पूछा।
फ्मैं अपने लिए कुछ नहीं चाहता। मुझसे वादा करो कि तुम मेरे द्वारा रचे गए
सुग्रीव को मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान करोगे।य् सूर्य देव ने कहा।

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फ्जैसा आप कहें प्रभु!य् हनुमान ने कहा और सुग्रीव की राजधानी किष्किंधा
के लिए रवाना हो गए।
दुर्भाग्य से सुग्रीव के भाई बालि ने छल से उसका राज्य छीन लिया। सुग्रीव को
छिपने की जगह खोजनी पड़ी और हनुमान ने एक वफादार सेवक की तरह
पूरा साथ दिया।
फ्मैं हमेशा आपका साथ दूंगा।य् हनुमान ने सुग्रीव को दिलासा दिया।

फ्क्या मैं जान सकता हूं कि आप जैसे भले लोग यहां घने वन में क्या कर रहे
हैं।य् हनुमान ने पूछा।

लक्ष्मण को तो यह सुनकर गुस्सा आ गया पर हनुमान ने प्रभु राम को
अपनी बातों व बुद्धिमता से प्रभावित करना चाहा। राम भी जान गए कि वे
किसी सामान्य ब्राह्मण से बात नहीं कर रहे इसलिए उन्होंने अपना
वास्तविक परिचय दे दिया।
हनुमान भगवान राम से मिलकर गदगद् हो गए और उनके चरणों में गिर
गए। फ्ओह प्रभु! मैं आपको पहचान क्यों नहीं पाया?य्
राम ने हनुमान को उठाकर गले से लगा लिया।

सुग्रीव भी सब समझने के बाद अपने छिपने के स्थान से बाहर आ गया।
उसने बताया कि किस तरह वह भाई के धोखे के कारण अपने ही राज्य से
बाहर मारा-मारा घूम रहा था। सुग्रीव को यह भी पता चला कि राक्षसराज
रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया।

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फ्प्रभु! मैं आपकी मदद करता पर अपनी सेना के बिना कुछ नहीं कर सकता।
आप मुझे मेरा राज्य दिलवा दें। मैं रावण के विरुद्ध युद्ध में आपका साथ
दूंगा।य् सुग्रीव ने वचन दिया।

प्रभु राम ने हामी भर दी। उन्हाेंने सुग्रीव से कहा कि वह बालि को चुनौती दे।
सुग्रीव ने चुनौती दी और उनके बीच युद्ध होने लगा। भगवान राम के एक ही
तीर ने सुग्रीव के भाई के प्राण ले लिए। सुग्रीव को अपना राज्य वापिस मिल
गया।

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फ्चलो सीता माता की खोज आरंभ करें।य् हनुमान ने कहा।

हनुमान अब प्रभु राम की सेवा में स्वयं को अर्पित कर चुके थे। वे सुग्रीव
की सेना सहित माता सीता की खोज के लिए लंका की ओर चल दिए।
अंत में वे एक द्वीप पर पहुंचे। उन्हें लंका जाने से पहले एक विशाल
सागर लांघना था।
फ्ओह! हम यह समुद्र कैसे पार कर सकेंगे?य् सुग्रीव ने कहा।

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फ्प्रभु आप आज्ञा दें। मैं इस सागर के ऊपर से उड़ कर पार चला जाऊंगा।य्
हनुमान ने राम से कहा।
भगवान राम ने निशानी के तौर पर अपनी अंगूठी हनुमान को दी और कहा
कि सीता से मिलते ही उसे दिखा दें।

हनुमान बड़ी तेजी से सागर के ऊपर से उड़ते हुए लंका की ओर जा रहे थे।
भगवान इंद्र ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी। उन्होंने सर्प राक्षसी सुरसा को
भेजा और हनुमान को युद्ध के लिए चुनौती दी। विशालकाय सुरसा अचानक
ही हनुमान के आगे आ गई।
फ्मैं भूखी हूं। आज तुम ही मेरा भोजन बनोगे।य् सुरसा जोर से गरजी।
फ्माता! मैं एक आवश्यक कार्य से जा रहा हूं। मुझे सीता माता का पता
लगाना है। भगवान राम ने मुझे इस काम के लिए चुना है। मैं अपना काम पूरा
करने के बाद निश्चित रूप से आपका भोजन बनने के लिए आ जाऊंगा।य्
हनुमान ने सुरसा से विनती की।

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सुरसा आगबबूला हो उठी। उसने हनुमान को निगलने के लिए अपना मुंह
खोल दिया। हनुमान ने अपना शरीर और भी विशाल कर लिया। सुरसा ने
अपना मुंह और भी बड़ा खोल लिया। हनुमान ने भी अपना आकार बढ़ा
लिया। अंत में जब सुरसा ने बहुत ही बड़ा मुंह खोला तो हनुमान को एक
तरकीब सूझी गई। वे एक मक्खी जितने छोटे आकार के बन गए और
एकदम से सुरसा के मुंह में जाकर बाहर आ गए।

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फ्माता! मैंने आपके मुख में प्रवेश करके आपकी इच्छा पूरी कर दी है। अब
कृपया मुझे जाने दें।य् हनुमान ने हाथ जोड़ कर कहा।
सुरसा हनुमान की चतुराई और विनय से प्रसन्न हुई और कार्य में सफल होने
का वरदान देते हुए जाने का रास्ता दे दिया।

सुरसा से भेंट के बाद हनुमान ने अपनी गति और भी बढ़ा दी। अंत में वह
लंका के द्वार पर पहुंचे। उन्होंने काफी खोजबीन के बाद पता लगा ही लिया
कि रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में कैद कर रखा था।
हनुमान ने वाटिका में एक सुंदर स्त्री को रोते हुए प्रभु राम का नाम जपते
देखा तो वह जान गए कि वह माता सीता ही हैं।

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फ्माता! मैं श्रीराम का दूत हनुमान हूं।य् हनुमान ने सीता से कहा। सीता ने सोचा
कि रावण ने ही छल से किसी बंदर को भेजा है इसलिए उन्होंने हनुमान की
बात पर विश्वास नहीं किया।
फ्माता! श्री राम ने आपके लिए यह अंगूठी भेजी है।य् हनुमान ने कहा।
सीता अपने प्रभु की अंगूठी और समाचार पाकर प्रसन्न हो उठीं। उन्हाेंने
हनुमान को आशीर्वाद दिया।

हनुमान को भूख लगी थी और वह कुछ खाना चाहते थे। सीता ने उन्हें अशोक
वाटिका से फल तोड़कर खाने की अनुमति दे दी। हनुमान पेड़ों से फल तोड़ने
के लिए यहां-वहां छलांगें लगाने लगे। लंका में एक बंदर के उत्पात मचाने की
खबर रावण को भी मिल गई। उसने झट से अपने बड़े बेटे मेघनाद को
हनुमान को पकड़ने के लिए भेजा।

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पहले तो मेघनाद को भी हनुमान को काबू
करने में कठिनाई हुई पर उसने अपने ब्रह्मपाश में किसी तरह हनुमान को बांध
ही लिया। हनुमान चाह कर भी उस अस्त्र का अपमान नहीं कर सके।

मेघनाद हनुमान को रावण के दरबार में ले आया। एक बंदर को देखते ही
रावण का पारा सातवें आसमान तक जा पहुंचा। फ्तुमने मेरी नगरी में घुसने
का साहस कैसे किया? क्या तुम मुझे नहीं जानते?य्

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हनुमान रावण को देखकर हंसे। रावण को और भी क्रोध आ गया। उसने
हनुमान की पूंछ में आग लगवा दी। हनुमान ने अपना आकार छोटा करके
खुद को बंधनमुक्त कर दिया। वह इधर से उधर छलांग लगाने लगे और इस
तरह पूरी लंका नगरी में आग लग गई। उन्होंने लंका को आग की लपटों के
हवाले करने के बाद लौटने का निर्णय लिया और फिर से प्रभु राम के पास
उड़ चले।

हनुमान वहां पहुंचे, जहां राम वानरसेना सहित उनका इंतज़ार कर रहे थे।
उन्होंने प्रभु राम को सारी घटना सुना दी। उन्होंने तय किया कि वे लंका तक
जाने के लिए एक पुल बनाएंगे। जल्द ही नल और नील के मार्गदर्शन में एक
पुल बनकर तैयार हो गया। भगवान राम और उनकी सेना पुल पार लंका जा
पहुंचे।

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लंका में घमासान युद्ध आरंभ हो गया। रावण और राम दोनों की ही सेनाएं
बहुत बलशाली थीं। वे भयंकर अस्त्र-शस्त्रें के साथ लड़ने लगे। रावण राम के
बल को देख चिंतित हुआ और उनका मनोबल तोड़ने की साजिश रचने लगा।
उसने मेघनाद को ब्रह्मपाश के साथ मैदान में भेज दिया।

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जब युद्ध आरंभ हुआ तो राम की सेना भारी पड़ने लगी। मेघनाद ने प्रभु राम
पर अपना वह शक्तिशाली पाश चला दिया। लक्ष्मण राम को बचाने के लिए
आगे आए और घायल हो गए। वह वहीं बेसुध होकर गिर गए।

मेघनाथ की शत्तिफ़शाली पाश से लक्ष्मण मूर्छित हो गए। वह रावण के भाई
तथा प्रभु राम के हितैषी विभीषण के कहने पर लंका के वैद्य सुषेण को साथ
ले आए। सुषेण अपने महल में सो रहे थे। हनुमान उन्हें वहां से उठाकर मैदान
में ही ले आए। सुषेण ने कहा कि लक्ष्मण की प्राण रक्षा के लिए हिमालय से
संजीवनी बूटी लानी होगी।

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हनुमान एक भी पल गंवाए बिना हिमालय की ओर चल दिए। वहां जब वह
जड़ी-बूटी को पहचान नहीं पाए तो उन्होंने पूरा पर्वत ही हथेली पर उठा लिया
और सोचा-वैद्य जी स्वयं ही बूटी निकाल लेंगे। जल्दी ही वह राम के पास
पहुंच गए और सुषेण की चिकित्सा से लक्ष्मण को होश आ गया।

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जल्द ही भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव और विशाल वानरसेना ने
रावण को हरा दिया। भगवान राम ने दुष्ट रावण का अंत कर दिया। हनुमान
और भगवान राम की सेना ने सीता की रक्षा की। तब तक प्रभु का वनवास
काल भी समाप्त होने को था। वे अयोध्या लौट आए और उन्हें वहां का राजा
बनाया गया। हनुमान प्रभु राम के सच्चे सेवक बनकर सदैव उनके साथ ही
रहने लगे।

भगवान राम अपने सभी सहायकों को धन्यवाद देना चाहते थे। उन्होंने
सबको धन्यवाद देते हुए अनमोल उपहार भेंट में दिए।
फ्हनुमान! तुम तो विशेष उपहार पाने के योग्य हो।य् यह कहते हुए सीता
माता ने अपना अनमोल हार उन्हें थमा दिया। हनुमान ने उस हार को बड़े
ही आश्चर्य से देखा।
फिर वे अचानक उसके मनके निकाल-निकाल कर तोड़ने लगे।

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फ्हनुमान! तुम यह क्या कर रहे हो?य् सीता ने कहा।
फ्माता! मैं देखना चाहता था कि क्या इन रत्नों में प्रभु राम की छवि
दिखती है पर इनमें तो कुछ भी नहीं है। ये मेरे किसी काम के नहीं हैं।य्
हनुमान ने उत्तर दिया।

यह सुनकर दरबार में खड़े सभी लोग हंसने लगे। यह देखकर हनुमान को रोष
आ गया और उन्होंने अपने हाथों से वहीं अपना सीना चीर कर दिखा दिया।
उसमें प्रभु राम और सीता की छवि अंकित थी।

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भगवान राम की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने हनुमान को गले से लगा
लिया। हनुमान सदा अयोध्या में ही रहे और आजीवन अपने प्रभु राम की
सेवा करते रहे।

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