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हरे-भरे सपने - 21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश

07:00 PM Jun 20, 2024 IST | Reena Yadav
हरे भरे सपने   21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश
hare-bhare sapane
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

टिंकू को हमेशा कोई न कोई शरारत सूझती। बाहर से वह भोला बना रहता पर अन्दर ही अन्दर उसके शरारती दिमाग में शरारत के कीड़े कुलबुलाते रहते। घर पर और विद्यालय में वह शरारतें तो करता पर उसके भोलेपन के कारण उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता था।

जब कोई देख नहीं रहा होता तो वह अपनी बहन की अलमारी से उसकी चीजें निकालकर उन्हें खोल देता और फिर चुपचाप रख देता। और फंस जाते उसके चचेरे भाई। विद्यालय में भी वह मौका लगने पर अपने सहपाठियों की किताबें-कापियां एक-दूसरे के थैलों में डालकर उन्हें आपस में लड़ा देता था। फिर जब अध्यापकों से उन्हें डांट पड़ती तो चुपचाप मुस्कुराते हुए मजा लेता था।

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उसके चाचा कृषि विभाग में कार्यरत थे। उन्हें खेती-बाड़ी और फलदार पौधे रोपने का बड़ा शौक था। वे अपनी पुश्तैनी जमीन पर तरह-तरह की फसलें उगाते तथा पुराने और खराब हो चुके फलदार पौधों के स्थान पर नए पौधों को रोपते। पिछली बरसात में उन्होंने अपने बगीचे में अनेक पौधे रोपे थे जिनमें आम, नींबू, कटहल और मौसम्मी के पौधे थे। वे उनकी खूब देखभाल करते थे। घर के दूसरे सदस्य भी अपने कामों से समय निकालकर इस काम में उनका पूरा सहयोग करते थे। समय-समय पर उनको खाद-पानी देते रहते। खरपतवार तथा कीटों से उनकी देखभाल करते थे। टिंकू भी सबके साथ कभी-कभार उनकी देखभाल करता था।

एक दिन टिंकू के हाथ घर पर तेज करवाकर रखा हुआ दराट लग गया। वह उसे लेकर बगीचे में चला गया और झाड़ियों पर तलवार की तरह उसे चलाने लगा। कुछ झाड़ियां काटने के बाद उसका ध्यान बगीचे में उगे उन पौधों पर गया। तलवार की तरह दराट चलाते हुए उसने बहुत से छोटे पौधों को भी काट दिया। घर आकर उसने दराट चुपचाप अपने स्थान पर रख दिया।

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दूसरे दिन जब उसके चाचा बगीचे में गये तो उन्होंने पौधों को बुरी तरह कटे हुए देखा। उन्हें बड़ा दुःख हुआ। घर आकर उन्होंने इसके बारे में बताया। बच्चों से भी इस बारे में पूछा। इसके पीछे किसका हाथ है? उन्हें इसका कुछ पता नहीं चला। टिंकू भी चुपचाप था। किसी को उस पर संदेह भी नहीं हुआ। उसने देखा कि पौधों के कटने से सभी बड़े दुखी हैं। तब उसे अपनी हरकत पर बड़ा दुःख हुआ। उसे एक बार लगा कि वह अपनी इस हरकत के लिए चाचाजी और सबसे माफी मांग ले परन्तु उसे डांट का डर था।

घर में यह मान लिया गया कि किसी शरारती आदमी ने जो उनके बगीचे की हरियाली से चिढ़ता था, उसने ही ऐसा किया होगा। पर वह है कौन? इसका पता नहीं चल पाया। टिंकू मन ही मन बड़ा परेशान था। अपना कारनामा बताये तब आफत और न बताने पर भी एक डर उसे भीतर से खाए जा रहा था। इन्हीं दिनों उसके विद्यालय में पर्यावरण दिवस मनाया गया। पर्यावरण के प्रति जागरुक करने के लिए पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कुछ लोगों को भी आमंत्रित किया गया था। उन्होंने पर्यावरण के महत्त्व, उसके संरक्षण की आवश्यकता और उपायों को लेकर बहुत कुछ बताया। विद्यालय के बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों ने भी अपने विचार रखे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ लघु नाटिकाओं के माध्यम से पर्यावरण के महत्त्व और उसको बचाने के तरीकों को प्रदर्शित किया। प्रधानाचार्य का वक्तव्य भी काफी प्रेरक था। परन्तु टिंकू पर लघु नाटिकाओं का बड़ा प्रभाव पड़ा। उसे पहली बार पता चला कि पेड़-पौधों में भी हमारी तरह ही जान होती है। हमारे जीवन को बचाने में पेड़-पौधों का ही सबसे अधिक योगदान होता है। यह जानकर उसे अपने किए पर पहले से भी अधिक दुःख हो रहा था।

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इस कार्यक्रम के बाद विद्यालय के अध्यापकों और विद्यार्थियों द्वारा विद्यालय के प्रांगण और आस-पड़ोस के गांवों में खाली पड़े स्थानों पर वृक्षारोपण किया गया। छोटी कक्षाओं के विद्यार्थी भी उनके साथ थे। वे पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए हाथों में तख्तियां लेकर घूम रहे थे और नारे लगा रहे थे। टिंकू भी उनके साथ नारे लगा रहा था। कुछ देर बाद वह नारे लगाना छोड़कर बड़े विद्यार्थियों के पास आ गया और उनके साथ पौधारोपण में हाथ बंटाने लग पड़ा। इस काम में वह इतना तल्लीन हो गया कि उसके सारे कपड़े भी मिट्टी से खराब हो गये। पर उसे इसकी जरा भी परवाह नहीं थी। उसे तो पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधे लगाने में अपना योगदान देना था। उसके मन में यह बात घर कर गयी थी कि वृक्ष बचेंगे तभी हम बचेंगे। वृक्ष हमें फल, फूल, पत्ते और छाया ही नहीं देते अपितु वे हमें सांसे भी देते हैं। वृक्षों के उपकारों को जानकर आज वह बड़ा प्रसन्न था।

विद्यालय से घर आते हुआ भी वह अपने में खोया रहा। वृक्षों के उपकारों के बारे में ही सोचता रहा। उसकी आंखों के सामने बार-बार वह दराट घूम रहा था जिससे उसने चाचा के लगाए पौधों को काट डाला था। उसे बड़ी शर्म महसूस हो रही थी। घर जाकर, कपड़े बदलकर वह सीधा बगीचे में चला गया। कटे पौधों के पास जाकर उन्हें देखने लगा तथा देख-देखकर रोने लगा। बड़ी देर तक वह कटे पेड़ों से माफी मांगता रहा। उसके बाद भी बड़ी देर तक मायूस होकर वह वहीं बैठा रहा।

उसके मन में बगीचे को फिर से हरा-भरा करने का विचार आया। इसके लिए उसने अपने जेब-खर्च को बचाने का प्रण लिया। उन पैसों से वह पास की पौधशाला से पौधे लाएगा और काटे हुए पौधों के स्थान पर रोपेगा। इस विचार से उसके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गयी। सूरज लाल गोले-सा अस्ताचल में लुढ़क रहा था। तभी उसे लगा कि अब घर चलना चाहिए।

घर आकर उसने अपनी गुल्लक देखी। उसे उठाया तो देखा कि वह अब काफी भर चुकी है। इससे उसके प्रण को और भी बल मिला। रात को खाकर सोया तो उसे बड़ी अच्छी नींद आई। सपनों में कई तरह के पेड़ आये। फूल आए, फल आए, तितलियां आई, कोयलें कूकी, मोर नाचे और गिलहरियों ने उछल कूद मचायी। ऐसा लगभग एक महीने तक होता रहा। वह रोज हरे-भरे सपने देखता रहा।

एक महीने बाद जब बरसात रिमझिम करती हुई धरती पर उतरी, तब तक उसने जेब-खर्च के बहुत पैसे बचा लिये थे। उसने इस महीने कोई फिजूलखर्ची नहीं की। उसका पूरा ध्यान अपने हरे-भरे सपनों को बगीचे में उगाने में ही लगा रहा। उसने गुल्लक को भी तोड़ दिया। अब उसके पास बहुत सारे पैसे थे। रविवार के दिन वह इन पैसों को लेकर पौधशाला में गया और बहुत से फलदार पौधों को खरीदा। पौधशाला वाले ने उसे अच्छे व जरूरत के हिसाब से पौधे दिये क्योंकि वह उसे और उसके चाचा को अच्छी तरह से जानता था। टिंकू के चाचा से वह अपनी पौधशाला के लिए सलाह भी लेता रहता था और उनके बताए तरीकों से भी अपनी पौधशाला में प्रयोग करता रहता था।

टिंकू ने चुपचाप सारे पौधे बगीचे में पहुंचा दिये। उसके बाद वह घर गया और अपने चाचा को बुला लाया। चाचा ने जब बगीचे में इतने पौधे देखे तब वे बड़े खुश हुए। उन्होंने एक मजदूर को बुलाया और उसके साथ मिलकर सारे पौधे बगीचे में लगा दिए। टिंकू ने भी उनका पूरा साथ दिया। काम समाप्त करने के बाद जब वह घर लौटा तो बुरी तरह से थक चुका था। खाना खाकर जब वह सोया तो उसके सपनों में वे हरे-भरे पौधे बड़े वृक्षों के रूप में आए। उसे लगा कि वह उनके नीचे ही लेटा, उनकी आंखों में आंखें डालकर उनसे हंस-हंसकर बातें कर रहा है। उनकी बातों-बातों में ही सुबह हो गयी थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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