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होली का उपहार - मुंशी प्रेमचंद की कहानी

07:00 PM Dec 22, 2023 IST | Reena Yadav
होली का उपहार   मुंशी प्रेमचंद की कहानी
holee ka upahaar munshi premchand ki story
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मैकूलाल अमरकान्त के घर शतरंज खेलने आये तो देखा, वह कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं । पूछा - कहीं बाहर की तैयारी कर रहे हो क्या भाई? फुरसत हो, तो आओ, आज दो-चार बाजियाँ हो जाये ।

अमरकान्त ने संदूक में आईना-कंघी रखते हुए कहा - नहीं भाई, आज तो बिलकुल फुरसत नहीं है । कल जरा ससुराल जा रहा हूँ । सामान-आमान ठीक कर रहा हूँ ।

मैकू - तो आज ही से क्या तैयारी करने लगे? चार कदम तो हैं । शायद पहली बार जा रहे हो?

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अमर - हाँ यार, अभी एक बार भी नहीं गया । मेरी इच्छा तो अभी जाने की न थी; पर ससुरजी आग्रह कर रहे हैं ।

मैकू - तो कल शाम को उठना और चल देना । आधे घंटे में तो पहुँच जाओगे ।

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अमर - मेरे हृदय में तो अभी से जाने कैसी धड़कन हो रही है । अभी तक तो कल्पना में पत्नी-मिलन का आनन्द लेता था । अब वह कल्पना प्रत्यक्ष हुई जाती है । कल्पना सुन्दर होती है, प्रत्यक्ष क्या होगा, कौन जाने ।

मैकू - तो कोई सौगात ले ली है? खाली हाथ न जाना, नहीं मुँह ही सीधा न होगा ।

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अमरकान्त ने कोई सौगात न ली थी । इस कला में अभी अभ्यस्त न हुए थे ।

मैकू बोला - तो अब ले लो, भले आदमी! पहली बार जा रहे हो, भला वह दिल में क्या कहेंगी?

अमर - तो क्या चीज ले जाऊँ? मुझे तो इसका खयाल ही नहीं आया । कोई ऐसी चीज बताओ, जो कम खर्च और बालानशीन हो; क्योंकि घर भी रुपये भेजने हैं, दादा ने रुपये माँगे हैं ।

मैकू माँ-बाप से अलग रहता था । व्यंग करके बोला - जब दादा ने रुपये माँगे हैं, तो भला कैसे टाल सकते हो! दादा का रुपये माँगना कोई मामूली बात तो है नहीं ।

अमरकान्त ने व्यंग्य न समझकर कहा - हाँ, इसी वजह से तो मैंने होली के लिए कपड़े भी नहीं बनवाए । मगर जब कोई सौगात ले जानी भी जरूरी है, तो कुछ न कुछ तो लेना ही पड़ेगा । हल्के दामों की कोई बीज बतलाओ ।

दोनों मित्रों में विचार-विनिमय होने लगा । विषय बड़े ही महत्व का था । उसी आधार पर भावी दाम्पत्य-जीवन सुखमय या इसके प्रतिकूल हो सकता था । पहले दिन बिल्ली को मारना अगर जीवन पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है, तो पहला उपहार क्या कम महत्व का विषय है? देर तक बहस होती रही; पर कोई निश्चय न हो सका ।

उसी वक्त एक पारसी महिला एक नये फैशन की साड़ी पहने हुए मोटर पर निकल गई । मैकूलाल ने कहा - अगर ऐसी एक साड़ी ले लो तो वह जरूर खुश हो जाये । कितना सूफियाना रंग है और वज़ा कितनी निराली! मेरी आँखों में तो जैसे बस गई । हाशिम की दुकान से ले लो । (25) में आ जायेगी ।

अमरकान्त भी उस साड़ी पर मुग्ध हो रहा था । वधू यह साड़ी देखकर कितनी प्रसन्न होगी और उसके गोरे रंग पर यह कितनी खिलेगी, वह इस कल्पना में मग्न था । बोला - हाँ यार, पसन्द तो मुझे भी है; लेकिन हाशिम की दुकान पर तो पिकेटिंग हो रही है ।

‘तो होने दो । खरीदनेवाले खरीदते ही हैं । अपनी इच्छा है, जो चीज चाहते हैं, खरीदते हैं, किसी के बाबा का साझा हैं?'

अमरकान्त ने क्षमा-प्रार्थना के भाव से कहा - यह तो सत्य है, लेकिन मेरे लिए स्वयंसेवकों के बीच से दुकान में जाना सम्भव नहीं है । फिर तमाशाइयों की हरदम भीड़ भी तो लगी रहती है ।

मैकू ने मानो उसकी कायरता पर दया करके कहा - तो पीछे के द्वार से चले जाना । वहाँ पिकेटिंग नहीं होती ।

‘किसी देशी दुकान पर न मिल जायेगी?'

‘हाशिम की दुकान के सिवा और कहीं न मिलेगी ।'

2

संध्या हो गई थी । अमीनाबाद में आकर्षण का उदय हो गया था । सूर्य की प्रतिभा विद्युत-प्रकाश के बुलबुल में अपनी स्तुति छोड़ गई थी ।

अमरकान्त दबे पाँव हाशिम की दुकान के सामने पहुँचा । स्वयंसेवकों का धरना भी था और तमाशाइयों की भीड़ भी । उसने दो-तीन बार अन्दर जाने के लिए कलेजा मजबूत किया, पर फुटपाथ तक जाते-जाते हिम्मत ने जवाब दे दिया ।

मगर साड़ी लेना जरूरी था । वह उसकी आँखों में खुब गई थी । वह उसके लिए पागल हो रहा था ।

आखिर उसने पिछवाड़े के द्वार से जाने का निश्चय किया । जाकर देखा, अभी तक वहाँ कोई वालंटियर न था । जल्दी से एक सपाटे में भीतर चला गया और बीस-पच्चीस मिनट में उसी नमूने की एक साड़ी लेकर फिर उसी द्वार पर आया; पर इतनी ही देर में परिस्थिति बदल चुकी थी । तीन स्वयंसेवक आ पहुँचे थे । अमरकान्त एक मिनट तक द्वार पर दुविधा में खड़ा रहा । फिर तीर की निकल भागा और दुर्भाग्य की बात एक बुढ़िया लाठी टेकती हुई चली आ रही थी । अमरकान्त उससे टकरा गया । बुढ़िया गिर पड़ी और लगी गालियाँ देने आँखों में चर्बी छा गई है क्या? देखकर नहीं चलते? यह जवानी ढै जाएगी एक दिन ।

अमरकान्त के पाँव आगे न जा सके । बुढ़िया को उठाया और उससे क्षमा माँग रहे थे कि तीनों स्वयंसेवकों ने पीछे आकर उन्हें घेर लिया । एक स्वयंसेवक ने साड़ी के पैकेट पर हाथ रखते हुए कहा - बिल्लाती कपड़ा ले जाए का हुक्म नहीं ना । बुलाइत है, तो सुनत नाहीं ही ।

दूसरा बोला - आप तो ऐसे भागे, जैसे-कोई चोर भागे ।

तीसरा - हज्जारन मनई पकरि-पकरि के जेहल में भरा जात अहै, देश में आग लगी है, और इनका मन बिल्लाती माल से नहीं भरा ।

अमरकान्त ने पैकेट को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़कर कहा - तुम लोग मुझे जाने दोगे या नहीं?

पहले स्वयंसेवक ने पैकेट पर हाथ बढ़ाते हुए कहा - जाये कसन देई । बिल्लाती कपड़ा लेके तुम यहाँ से कबी नाहीं जाय सकत ही ।

अमरकान्त ने पैकेट को एक झटके में छुड़ाकर कहा - तुम मुझे हर्गिज नहीं रोक सकते ।

उन्होंने आगे कदम बढ़ाया, मगर दो स्वयंसेवक तुरन्त उसके सामने लेट गये । अब बेचारे बड़ी मुश्किल में फँसे । जिस विपत्ति से बचना चाहते थे, वह जबरदस्ती गले पड़ गई । एक मिनट में बीसों आदमी जमा हो गये । चारों तरफ से उन पर टिप्पणियां होने लगी ।

‘कोई जण्टुलमैन मालूम होते हैं ।'

‘यह लोग अपने को शिक्षित कहते हैं । छिः! इस दुकान पर से रोज दस-पाँच आदमी गिरफ्तार होते हैं; पर आपको इसकी क्या परवाह ।'

कपड़ा छीन लो और कह दो, जाकर पुलिस में रपट करें ।'

बेचारे बेड़ियों-सी पहने खड़े थे । कैसे गला छूटे, इसका कोई उपाय न सूझता था । मैकूलाल पर क्रोध आ रहा था कि उसी ने यह रोग उनके सिर मढ़ा । उन्हें तो किसी सौगात की फिक्र न थी । आये वहाँ से कि कोई सौगात ले ली ।

कुछ देर तक लोग टिप्पणियां ही करते रहे, फिर छीन-झपट शुरू हुई । किसी ने सिर से टोपी उड़ा दी । उसकी तरफ लपक, तो एक ने साड़ी का पैकेट हाथ से छीन लिया । फिर वह हाथों-हाथ गायब हो गई ।

अमरकान्त ने बिगड़कर कहा - मैं जाकर पुलिस में रिपोर्ट करता हूँ ।

एक आदमी ने कहा - हाँ-हाँ, जरूर जाओ और हम सभी को फांसी बढ़ता दो!

सहसा एक युवती खद्दर की साड़ी पहने, एक थैला लिए आ निकली । यहाँ यह हुड़दंग देखकर बोली - क्या मुआमला है? तुम लोग क्यों इस भले आदमी को दिक कर रहे हो?

अमरकान्त की जान में जान आई । उसके पास जाकर फरियाद करने लगे - ये लोग मेरे कपड़े छीनकर भाग गये हैं और उन्हें गायब कर दिया । मैं इसे डाका कहता हूँ यह चोरी है । इसे मैं न सत्याग्रह कहता हूँ न देश-प्रेम । युवती ने दिलासा दिया - घबराइए नहीं! आपके कपड़े मिल जायेंगे, होंगे तो इन्हीं लोगों के पास! कैसे कपड़े थे?

एक स्वयंसेवक बोला - बहिनजी, इन्होंने हाशिम की दुकान से कपड़े लिए हैं ।

युवती - किसी की दुकान से लिए हों, तुम्हें उनके हाथ से कपड़ा छीनने का कोई अधिकार नहीं है । आप इनके कपड़े वापस ला दो । किसके पास है?

एक क्षण में अमरकान्त की साड़ी जैसे हाथों-हाथ गई थी, वैसे ही हाथों-हाथ वापस आ गई । जरा देर में भीड़ गायब हो गई । स्वयंसेवक भी चले गये । अमरकान्त ने युवती को धन्यवाद देते हुए कहा - आप इस समय न आई होतीं तो इन लोगों ने धोती तो गायब कर ही दी थी, शायद मेरी खबर भी लेते ।

युवती ने सरल भर्त्सना के भाव से कहा - जन-सम्पत्ति का लिहाज सभी को करना पड़ता है; मगर आपने इस दुकान से कपड़े लिए ही क्यों? जब आप देख रहे हैं कि वहाँ हमारे ऊपर कितना अत्याचार हो रहा है; फिर भी आप न माने । जो लोग समझकर भी नहीं समझते, उन्हें कैसे कोई समझाए!

अमरकान्त इस समय लज्जित हो गये और अपने मित्रों में बैठकर वे जो स्वेच्छा के राग अलापा करते थे, वह भूल गये । बोले - मैंने अपने लिए नहीं खरीदे हैं, एक महिला की फरमाइश थी; इसलिए मजबूर था ।

‘उस महिला को आपने समझाया नहीं ?'

‘आप समझाती, तो शायद समझ पाती, मेरे समझाने से तो न समझी ।'

‘कभी अवसर मिला, तो जरूर समझाने की चेष्टा करूँगी । पुरुषों की नकेल महिलाओं के हाथ में है! आप किस मुहल्ले में रहते हैं?'

‘सआदतगंज में ।'

‘शुभ नाम?'

‘अमरकान्त ।'

युवती ने तुरन्त जरा-सा घूँघट खींच लिया और सिर झुकाकर संकोच और स्नेह से सने स्वर में बोली - आपकी पत्नी तो आपके घर में नहीं है, उसने फरमाइश कैसे की? -

अमरकान्त ने चकित होकर पूछा - आप किस मुहल्ले में रहती हैं?

‘घसियारीमंडी ।'

‘आपका नाम सुखदादेवी तो नहीं है?'

‘हो सकता है, इस नाम की कई स्त्रियाँ हैं ।'

‘आपके पिता का नाम ज्वालादत्तजी है ।'

‘उस नाम के भी कई आदमी हो सकते है ।'

अमरकान्त ने जेब से दियासलाई निकाली और वहीं सुखदा के सामने उस साड़ी को जला दिया ।

सुखदा ने कहा - आप कल आयेंगे?

अमरकान्त ने अवरुद्ध कंठ से कहा - नहीं सुखदा, जब तक इसका प्रायश्चित न कर दूंगा, न आऊंगा ।

सुखदा कुछ और कहने जा रही थी कि अमरकान्त तेजी से कदम बढ़ाकर दूसरी तरफ चले गये । ।

3

आज होली है; मगर आजादी के मतवालों के लिए न होली है न बसन्त । हाशिम की दुकान पर आज भी पिकेटिंग हो रही है, और तमाशाई आज भी जमा हैं । आज से स्वयंसेवकों में अमरकान्त भी खड़े पिकेटिंग कर रहे हैं । उनकी देह पर खद्दर का कुरता है और खद्दर की धोती । हाथ में तिरंगा झंडा लिये है ।

एक स्वयंसेवक ने कहा - पानीदारों को यों बात लगती है । कल तुम क्या थे, आज क्या हो! सुखदा देवी न आ जातीं, तो बड़ी मुश्किल होती ।

अमर ने कहा - मैं उसके लिए तुम लोगों को धन्यवाद देता हूँ । नहीं मैं आज यहाँ न होता ।

‘आज तुम्हें न आना चाहिए था । सुखदा बहन तो कहती थीं, मैं आज उन्हें न जाने दूँगी ।'

‘कल के अपमान के बाद अब मैं उन्हें मुँह दिखाने योग्य नहीं हूँ । जब वह रमणी होकर इतना करती हैं, तो हम तो हर तरह के कष्ट उठाने के लिए बने ही हैं । खासकर जब बाल-बच्चों का भार सिर पर न हो ।'

उसी वक्त पुलिस की लारी आई, एक सब इंस्पेक्टर उतरा और स्वयं सेवकों के पास आकर बोला मैं तुम लोगों को गिरफ्तार करता हूँ ।

‘वन्दे मातरम्' की ध्वनि हुई । तमाशाइयों में कुछ हलचल हुई । लोग दो-दो कदम और आगे बढ़ आये । स्वयंसेवकों ने दर्शकों को प्रणाम किया और पुकराते हुए लारी में जा बैठे । अमरकान्त सबसे आगे थे । लारी चलना ही चाहती थी, कि सुखदा किसी तरफ से दौड़ी हुई आ गई । उसके हाथ में एक पुष्पमाला थी, लारी का द्वार खुला था । उसने ऊपर चढ़कर वह अमरकान्त के गले में डाल दी । आँखों से स्नेह और गर्व की दो बूंदें टपक पड़ी । यही होली थी, यही होली का आनन्द-मिलन था ।

उसी वक्त सुखदा दुकान पर खड़ी होकर बोली - विलायती कपड़े खरीदना और पहनना देश-द्रोह है!

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