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कसैलापन-गृहलक्ष्मी की कहानियां

01:00 PM Jul 01, 2024 IST | Madhu Goel
कसैलापन गृहलक्ष्मी की कहानियां
Kaselapan
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Hindi Kahani: जयप्रकाश जब भी अपने खिड़की खोलकर दूर फैले आसमान की तरफ़ देखता है,तब पूजा उसके दिलोदिमाग़ पर छा जाती है.पश्चात्ताप की लकीरें उसके दिल पर लहराने लगतीं हैं.बेहतर ज़िंदगी की चाहत में इंसान ये क्यों भूल जाता है कि उसका अंतिम पड़ाव कैसा होगा और वो कहाँ तक पहुँचेगा?जब ये बातें उसको ज़्यादा परेशान करतीं हैं तो वो, सोचता है कि पहुँचना तो हमको भी उसी आसमान में है.और इसी बीच वो अपनी पिछली ज़िंदगी की तस्वीरें सोच सोच कर अपनी तरल आँखों से दूर तक अपने अतीत में भटकने लगता है.
ऐसे तो पूजा बहुत बार उसके ख़यालों में आकर दूर निकल जाती थी पर ,जब से उसके गाँव से आए एक रिश्तेदार ने उसको बताया कि,"उसके बड़े बेटे ने नॉएडा में एक कपड़े प्रिंट करने की फ़ैक्टरी डाली है,तब से उसका व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी तरक़्क़ी कर रहा है.अब तो उसने अपना छोटा सा बंगला भी बना लिया है.और पूजा भाभी और बाबूजी के साथ वहीं शिफ़्ट कर लिया है.पुरानावाला मकान शायद किराए पर उठा दिया है."उसने आगे बताया,
"पूजा भाभी तो बिल्क़ुल सेठानी लगने लगीं हैं.सारा दिन पोते को खिलाती रहती हैं.लगता है पुराना वाला ग़म वो पूरी तरह भूल चुकी हैं"। सुनते ही
जयप्रकाश के माथे पर जैसे हथौड़े बजने लगे.वो सोचने लगा,"बाबूजी के लिए मै इतना बेगना हो गया कि उन्होंने मेरे बेटे की शादी भी कर ली और मुझे बुलाया तक नहीं.अम्माँ की मृत्यु की ख़बर भी एक साल बाद मुझे किसी दूसरे से पता चली?"
दिल के दूसरे कोने से पुरज़ोर सवार सुनाई दिया,
"बाबूजी हेडमास्टर थे इसीलिए अपना हर निर्णय बेहद द्रढ़ता से लेते थे.देखा जाय तो वो ख़ुद भी पुराने रिश्तों को कितना निभा पाया? सारा क़सूर उसी का तो है यही सोचकर वो चुप रहा.यहाँ तक कि वो ,उस गाँव की औरत ,पूजा तक से हार गया?"बस इन्हीं बातों से उसका मन उद्विग्न रहने लगा था.सोचता रहता कि ज़िंदगी में इतना तामझाम करने के बाद भी उसे मिला ही क्या?रिटायरमेंट के बाद इस डीडीए फ़्लैट में तीन कमरों की ज़िन्दगी और खिड़की से दिखता हुआ खुला आसमान, जिसमें वो राहत के कण ढ़ूढा करता है !कहने को तो यह उसका अपना फ़्लैट है,पर इस दरबे जैसी ज़िंदगी में उसने क्या पाया,घुटनों में गठिया का दर्द,और डायबिटीज़ की बीमारी और अकेलापन?

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कहने को तो जयप्रकाश की कितनी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं.कई कहानियों की तो उसे प्रशंसा भी मिली है,कितने सारे लेख भी छपे हैं.एक पत्रिका का उसने संपादन भी किया है.लेकिन अब जब उसकी उम्र साठ साल की हो गयी है तो उसके शरीर में शिथिलता सी आने लगी है.जी करता है कि उसे कोई गर्म गर्म चाय बनाकर पिलाए,जैसे पूजा पिलाया करती थी,उसके पैरों की कोई गर्म तेल से मालिश करे जैसे पूजा करती थी,कोई उसके पास बैठकर प्यार के दो शब्द बोल दे जैसे पूजा मुस्कराकर उसके सामने खड़ी हो जाती थी,
उसकी दूसरी पत्नी मीरा तो अपने रूटीन की आदी हो चुकी है.उसके पास तो इन सब बातों के लिए समय ही नहीं है.वैसे ऐसी बात नहीं है कि मीरा से शादी करके उसने अपने आपको ऊँचाइयों तक न पहुँचाया हो,एक आधुनिक ज़िंदगी का पूरा स्वाद न चखा हो,परंतु अब ,जबकि उसको अपनी छोटी छोटी ज़रूरतों के लिए ख़ुद उठना पड़ता है तो उसके घुटनों में ज़्यादा दर्द होने लगता है.अपने आप,,अपनी अल्मारी में से कोई दर्दनिवारक ओईंटमेंट निकालकर अपनी एड़ियों में धीरे धीरे मलने लगता है.जवानी के जोश में जिन चीज़ों को वो छोड़ देना चाहता था आज बुढ़ापे के दौर में उसे वो सब चीज़ें बेतरह याद आने लगीं हैं.
पूजा जब ब्याह कर आयी थी तो वो कितनी सुंदर लगती थी.हमेशा कहा करती थी,मालिश करने से बदन छरहरा हो जाता है,हड्डियाँ मज़बूत हो जाती हैं..जयप्रकाश उसे झिड़क देता,
"जाने किस गँवार से रिश्ता जोड़ दिया बाबूजी ने,गाँव की ज़िंदगी से आगे तो इसने कुछ देखा ही नहीं है,मुझ से इस तेल फूलेल की चिपचिपाहट बर्दाश्त ही नहीं होती"कहते कहते वो साँसे भरने लगता.उसकी झुँझलाहट देखने के बाद भी पूजा मुस्कुराती रहती थी.
ऐसा भी नहीं था कि पूजा बिल्क़ुल अनपढ़ थी.गवर्न्मेंट कौलेज से उसने इंटर पास किया था.सिलाई कढ़ाई,और घर गृहस्थी के सभी कामों में वो निपुण थी.ज़मींदार पिता थे,इसलिए उसने दूध दही की भरमार देखी थी,तेल मालिश करके ह्रषट्पुष्ट शरीर देखे थे,गेहूँ चने के लहलहाते खेतों की खुली हुई हवा देखी थी.साहित्य को वो वहीं तक समझती थी जितना उसने पढ़ा था."लेखन से भी प्रशंसातमक बिंदु तक पहुँचा जा सकता है,ये बात उसकी समझ से बाहर थी,उसको सजसँवर करके अमराईयों पर झूले डालकर झूलना अच्छा लगता था,सरसों के साग के साथ मक्के की रोटियाँ बनाकर मक्खन लगा लगा कर खाना और खिलाना,पूरी कचौड़ी की दावत और मगज के लड्डू बनाना,केसर डालकर खीर बनाना,सुंदर सुंदर तकिया-गिलाफ और मेज़पोश काढ़कर प्रशंसा लूटना अच्छा लगता था.जयप्रकाश उसकी इन बातों को देखकर छटपटा जाता था,इसी सबके चलते उसका बेटा बिहू भी हो गया था.

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जयप्रकाश को हमेशा लगता ,ऐसी ठहरी हुई ज़िंदगी में उसे मिलेगा भी क्या?प्राइवेट स्कूल में हिंदी का मास्टर कब तक बना रहेगा?उसका व्यक्तित्व तो वहीं ठहर कर रह जाएगा.वो मोदीनगर से बाहर निकलना चाहता था जिससे उसके विचारों में कुछ परिवर्तन आए.मास्टरीकी मुट्ठीभर कमाई से वो वैसा कुछ नहीं कर पाता था जैसा कि वो चाहता था.
शादी के पूरे छः साल बाद उसे दिल्ली में,एक पत्रिका में एक नौकरी मिल गयी थी.वो दिल्ली चला आया लिखने का उसे शुरू से शौंक़ था.उस समय तक उसकी कई कहानियाँ चर्चित भी हो चुकी थीं.लेखकों की जमात में उसे जाना जाने लगा था.लोग प्रशंसा की दृष्टि से देखने लगे थे.छुट्टियों में वो मोदीनगर जाकर पूजा तथा अपने माता पिता और बिहू से मिल आया करता था.कई बार उसके मन में आया भी था कि पूजा को अपने साथ दिल्ली लाकर उसको यहाँ के माहौल में ढाले पर अम्माँ की आर्थराइटिस की बीमारी के विषय में सोचकर वो चुप हो जाता था.पूजा भी अपने मायके से इतनी भरी-पूरी थी कि उसको किसी चीज़ की ज़रूरत ही नहीं थी.
दूसरे दिल्ली में किराए के मकान से लेकर होटेल में खाने पीने के ख़र्चे!बचत होती ही कब थी?धीरे धीरे उसने पैसे भेजने बंद कर दिए.उन्हीं दिनों ,सम्पादकीय नौकरी के दौरान उसकी भेंट मीरा से हुई.जयप्रकाश की लेखन प्रतिभा से वो बेहद प्रभावित थी.जयप्रकाश को भी मीरा के साथ किसी भी विषय पर देर तक चर्चा करना अच्छा लगता था.बिल्क़ुल आधुनिक विचारधारा,जिसमें भारतीय विचारधारा का भी पुट रहता था.जयप्रकाश को उसका व्यक्तित्व भाने लगा.जिस तरह सम्मोहन में आदमी फँसता जाता है और उसे ध्यान ही नहीं रहता है कि आगे चलकर उसकी ज़िंदगी पर इस सम्मोहन का क्या असर पड़ेगा! बिल्क़ुल उसी तरह जयप्रकाश भी मीरा की गिरफ़्त में फँसने लगा था.मीरा भी उसके चारों तरफ़ मँडराती रहती थी.फिर शहरों की दूरियाँ जो कुछ सामने दिखता है सब कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देतीं है.
फिर एक दिन ऐसा आया जब मंदिर में जाकर दोनों ने शादी कर ली.मीरा के मातापिता देहरादून में रहते थे और वो यहाँ दिल्ली में अकेली.इसीलिए उस पर किसी का कोई बंधन भी नहीं था.उसने लेखन क्षेत्र में जयप्रकाश को बहुत सहारा दिया था,यहाँ तक कि वो एक जानी मानी पत्रिका का सम्पादक भी हो गया था.
धीरे धीरे जयप्रकाश की दूसरी शादी की बात चारों ओर फैल गयी.पूजा को जब पता चला तो बेचारी सिर्फ़ आँसू बहाकर रह गयी.बेचारी घर ग्रहस्थी वाली औरत इतनी हिम्मत भी नहीं जुटा पायी कि दिल्ली जाकर,जयप्रकाश और मीरा के विरुद्ध कोई दाँव पेंच भी लड़ा सके उस पर सास बीमार.वो सिर्फ़ इसी बात से संतुष्ट थी कि उसके पास उसका बेटा है जिसको देख देख कर वो अपनी बाक़ी ज़िंदगी काट सकेगी.दूसरे माता-पिता समान,प्यार और सहारा देने वाले सास ससुर भी उसके साथ थे.
लेकिन हेडमास्टर साहब को चैन नहीं था.बहू का दुःख उनसे देखा नहीं जाता था.एक दिन बेटे के दफ़्तर का पता ठिकाना खोजते हुए वो दिल्ली पहुँच गए थे.पिता को यूँ अचानक आया देखकर जयप्रकाश बुरी तरह सकपका गया.थोड़े बहुत ख़ानदानी संस्कार उसकी रगों में अभी तक थे.बोला ,"बाबा आने की सूचना भिजवाते तो मैं आपको लेने स्टेशन आ जाता"
"मै तुम्हारे घर ठहरने नहीं आया हूँ जयप्रकाश,सिर्फ़ चेतावनी आया हूँ .चाहे कोई कितना भी महान आदमी क्यों न बन जाय अपनी ड्योढ़ी छोड़कर किसी को न शांति मिलती है न मिलेगी.अभी भी देर नहीं हुई मेरी बात मानो और घर वापस लौट आओ वरना एक दिन पछताओगे ज़रूर."
"मै मानता हूँ कि मैंने जो कुछ किया है ग़लत किया है लेकिन बाबा,कुछ पाने के लिए कुछ छोड़ना भी पड़ता है.आज मै जो कुछ भी हूँ मीरा की वजह से ही हूँ,वरना सारी ज़िंदगी मै भी आपकी तरह हेडमास्टर ही बना रहता"
बाबा समझ गए .उनका बेटा पूरी तरह थोड़ी आधुनिकता,थोड़ी,सफलता और अपनी भावुकता के बहाव में बह चुका है.अब कोई भी तर्क उसे वापस नहीं ला सकता.नम आँखो से वो चुपचाप उठे और जयप्रकाश की पीठ थपथपाते हुए बोले,
"ईशवर तुम्हें सदा सुखी रखे"और वो,मोदीनगर वापस लौट आए .उसी समय मन ही मन उन्होंने प्रण लिया,कि अपने पोते बिहू को वो इतना लायक बनाएँगे कि जयप्रकाश देखता ही रह जाएगा.इस बात को पूरे पच्चीस साल हो गए.जयप्रकाश का मीरा से एक बेटा भी हुआ.इस बीच न वो मोदीनगर गया न वहाँ से कोई बुलावा ही आया.
जब तक जयप्रकाश रिटायर नहीं हुआ था अपने काम की व्यस्तता उसे इस क़दर घेरे रहती थी कि उसे कभी अपने बारे में भी सोचने का समय नहीं मिलता था.कभी पूजा या बिहू का ध्यान आता भी था तो वो ,मीरा और अपने बेटे इंदर को देखते ही मन बदल लेता था.उसी समय उसने किसी तरह अपने लिए एक छोटा सा फ़्लैट बुक कर लिया था.मीरा ने भी काफ़ी सहयोग दिया था ताकि रिटायर होने के बाद दोनों आराम से रह सकें.
लेकिन रिटायर होने के बाद जयप्रकाश के पास समय ही समय था.कितनी कहानियाँ पढ़े,कितनी लिखे!चश्मे का नम्बर बढ़ गया था,हाथ कांपते थे.मन में ये बात आ गयी थी कि अब पढ़ लिख कर मिलेगा भी क्या?प्रशंसा के दो तीन पत्र,थोड़ी सी वाह वाही.कोई पैरों में दवाई तो नहीं लगा सकता.दवाई तो दूर,कोई एक कप चाय भी पिलाने वाला नहीं था.ये सब उसे ख़ुद ही करना पड़ता था.
मीरा ने भी रिटायरमेंट के बाद ,ख़ुद को व्यस्त रखने के लिए बुटीक खोल लिया था.थकी हारी घर लौटती तो सोफ़ा पर लेट जाती.घर में बैठकर भी टाइम पास करने के लिए वो,नए नए डिज़ाइन बनाया करती थी.जयप्रकाश का मन करता वो ,उससे उस समय वो कुछ बात करे पर उसकी थकी-थकी हालत देखकर चुप हो जाता था.
घर में एक नौकर था जो उल्टा सीधा खाना बना दिया करता था.मीरा को अच्छा खाना बनाना नहीं आता था,इसीलिए जयप्रकाश ब्रेड ओमलेट से ही काम चला लिया करता.मीरा और उसका बेटा इंदर घर में मेहमानों की तरह रहते थे.पढ़ने में भी इंदर बहुत होशियार नहीं था.जैसे तैसे उसने इंटर पास कर लिया था.आवारा लड़कों की तरह घर आता और चला जाता.जयप्रकाश को इज़्ज़तदेना तो दूर उसकी कोई बात वो सुनता तक नहीं था.इस बात का जयप्रकाश को बेहद अफ़सोस रहता था,उसने कई बार मीरा को समझाया भी ,पर मीरा ने उसकी कोई बात नहीं मानी थी.एक तरह से सहभागी दिनों की आपसदारी में जयप्रकाश,मीरा के कहे अनकहे एहसानों से इतना दबता चला गया था कि कभी ऊपर उठकर बोल ही नहीं पाता था.ज़िंदगी का यह पासंग अपने आप ही बदल गया था.
अब कई बार जयप्रकाश का मन करता कि वो एक बार मोदीनगर हो आए . जब से उस रिश्तेदार से पूजा के बारे में सुना था,उससे मिलने की ललक उसके मन में बढ़ती ही जा रही थी.यही सब सोचकर एक दिन उसने मोदीनगर जाने का प्रोग्राम बना लिया.मीरा से उसने झूठ बोला किवो चार पाँच दिन के लिए अपने दोस्त से मिलने अलीगढ़ जा रहा है.
मोदीनगर पहुँच कर उसे लगा जैसे वो किसी स्वर्ग जैसी दुनिया में आ गया है.पत्ते पत्ते से जैसे उसकी पुरानी पहचान थी.यहाँ का खुलापन,सर्दियों की गुनगुनी धूप उसके शरीर को बहुत सुख दे रही थी.बस से उतरकर उसने रिक्शा किया और पते के अनुसार सीधे बिहू के बंगले पर पहुँच गया.बंगले में घुसते ही पूजा मिल गयी.आँगन में चारपाई पर लिटाकर वो पोते को मालिश कर रही थी,पोता किलकारियाँ मार कर हंस रहा था.
पूजा जयप्रकाश को नहीं पहचान पायी न वो ही पूजा को पहचान पाया.पच्चीस वर्ष अंतराल आ गया था दोनों के बीच.चेहरा मोहरा चाल ढाल सभी कुछ तो बदल गया था।तभी अस्सी साल के ह्रश्ट पुष्ट हेडमास्टर जी,कमरे से निकलकर बाहर निकल आए,अपनी बारीक आँखों से उन्होने जयप्रकाश को देखा तो ,तुरंत पहचान गए,
"पूजा बहू,यह तो जयप्रकाश है.तुमने इसे नहीं पहचाना?उन्होंने सोचा भी नहीं था कभी जयप्रकाश वापस भी लौटेंगे.आँसुओं की अविरलधारा निकल पड़ी थी उनकी आँखो से.जयप्रकाश भी भावुक हो उठा था.
उस समय उसे पूजा बेहद महान लग रही थी.सोच रहा था,पूजा ने कितनी समझदारी से पूरे घर को अभी तक संभाल कर रखा हुआ है.थोड़ी देर के लिए जयप्रकाश को लगा जैसे वक़्त ठहर गया था और वो उसी वक़्त में समा जाना चाहता था.
इधर हेडमास्टर साहब बहुत ख़ुश थे.जो भी मिलने आता सभी से यही कहते "हमारा जयप्रकाश वापस आ गया है"
थोड़ी देर के बाद बिहू भी वापस आ गया.उसे देखते ही जयप्रकाश की बाँछें खिल गयीं.कितना समझदार,कितना गंभीर हो गया था वो ,संस्कारों और मर्यादा की सीमा रेखा से बँधा हुआ.लेकिन बिहू अपने पिता को ऐसे देख रहा था,जैसे किसी दूर के रिश्तेदार को देख रहा हो.उसमें न ग़ुस्सा था न आत्मीयता.हेडमास्टर साहब के कहने पर उसने पिता के पैर तो छुए लेकिन कोई अतिरिक्त लगाव नहीं दिखाया.घर के अंदर गया,खाना खाया और फ़ैक्टरी के लिए निकल गया.
जयप्रकाश चार दिन मोदीनगर में रहा.पूरे घर की व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी.घर में बड़ों का आदर था मान-सम्मान था .घर का सफ़सुथरा सुपाच्य भोजन तीनों प्रहर पकता था.जयप्रकाश ऐसे खाना खा रहा था जैसे बहुत दिनों से भूखा हो.हर सुबह उसे धुले ,प्रेस किए कपड़े मिलते थे.हेडमास्टर साहब उसे बीच बीच में अपरोक्ष रूप से जतलाते भी जाते थे,कि पाकविद्या में निपुण बनाने के बाद पूजा ने अब चौके की बागडोर बहू को सौंप दी है.यह वो पूजा है जिसे तुमने अपनी नासमझी से नकारा था,आज वही अपना घर बना कर रखने में कितनी समर्थ है!
इस बीच वो बिहू की फ़ैक्टरी भी देख आया.एक बार उसके मन में आया कि इंदर को भी यहीं भेज दे,बिहू के विचार,संस्कार,कर्मठता,जैसी भावनाएँ देखकर,हो सकता है वो भी बिहू की तरह ही बन जाय लेकिन उसकी कुंठाओं ने उसे कुछ कहने ही नहीं दिया,लोगों की निगाहें उसे चुभती हुई सी प्रतीत हो रही थीं जैसे कह रही हों कि इस घर के लिए वो कितना क़सूरवार है,पर मुँह पर वो किसी से कुछ कह नहीं पाता था .वास्तव में वो ख़ुद भी यही सोचता रहता था कि,यहाँ वो कितने आराम से रह सकता है,उसकी बाक़ी ज़िंदगी भी उसी तरह आराम से कट सकती है जैसी वो चाहता है.पूजा को धोखा देकर उसने अच्छा नहीं किया .लेकिन उसकी म्रगत्रश्णा की मानसिकता ने उसको कहीं भी स्थिर नहीं रहने दिया. था.
पाँचवे दिन उसे मीरा की याद सताने लगी.वो सोचने लगा वो उसके आने की प्रतीक्षा कर रही होगी.धीरे धीरे पूजा का मोह उसके मन में सिमटने लगा था,वो जल्दी से जल्दी मीरा के पास पहुँचना चाह रहा था.उसने धीमे किंतु स्पष्ट शब्दों में सँभल सँभल कर कहा,
"बाबा अब मुझे वापस दिल्ली के लिए निकलना है.वहाँ काफ़ी कम मुझे निपटाने हैं.अब तो आना जाना लगा ही रहेगा,फिर अपने पोते को गोद में उठाकर बोला ,"इसके लिए तो मै ज़रूर आऊँगा."
हेडमास्टर साहब बहुत धीमे सवार में बोले,
"बेटा जल्दी जल्दी आते रहना.मेरी पकी हुई उम्र कब धोखा खा जाय और पूजा और बिहू अकेला रह जाय नहीं मालूम."
जयप्रकाश हाँ हूँ कहता रहा,पर धीरे धीरे वो हर बात से उखड़ रहा था.चलते समय बिहू भी आ गया,बड़े मन से बोला,
"चलिए पापा मै आपको छोड़ आऊँ"इन चार दिनों में बिहू को पिता से आत्मीयता तो नहीं हुई थी लेकिन जो संस्कार उसे विरासत में मिले थे उन का पालन तो उसे करना ही था.चलते समय बहू ने उसके पैर छुए लेकिन,जयप्रकाश को अब कोई भी मोह पकड़ नहीं पा रहा था.वो बिहू की गाड़ी में बैठ गया,और सभी परिवारजनों को हाथ हिलाता हुआ बस के अड्डे तक पहुँच गया.बस में पिता को बैठाते समय बिहू ने उसे आश्वस्त किया,
"पापा आप किसी भी बात की फ़िक्र मत करिएगा.आप जब भी कहेंगे मै आपको लेने आ जाऊँगा"जयप्रकाश को उस समय कोई भी उत्तर नहीं सूझ रहा था.बस यही सोचता रहा कि पता नहीं वो मोदीनगर दोबारा आ भी पाएगा या नहीं.
बस धीमी गति से आगे बढ़ने लगी.शाम का अँधेरा चारों तरफ़ फैलें लगा.अब उसे स्वतंत्र रूप से मीरा का ध्यान आने लगा था."अब तक वो बुटीक से वापस आ ग़यी होगी,थकी थकी सी सोफ़े पर बैठ गयी होगी.पता नहीं उसे नौकर ने चाय दी भी होगी या नहीं."
शरीर में असमर्थता सी उभर आयी.इंदर का ध्यान आते ही मन में कसैला पन आने लगा,घुटनों में पुन: दर्द होने लगा…फिर अपना फ़्लैट…अपना कमरा याद आया.सोचने लगा यदि ये बस आसमान की तरफ़ चली जाय तो उसे अपनी ग्रहस्थी के सारे बन्धनों से मुक्ति मिल जाय.जाने के बाद सभी रह लेते हैं,मीरा भी रह लेगी,पूजा तो रह ही रही है.
वो फिर आसमान की तरफ़ देखने लगा जहाँ रात और भी स्याह होने लगी थी.उसमें कई सितारे निकल आए थे.वो एक एक करके सबको याद करने लगा था.पूजा,बिहू,बाबा,मीरा और उसका छोटा बेटा इंदर .ये सभी इन्हीं सितारों की तरह चमकते तो हैं पर उसे राहत कौन दे सकता है.कोई नहीं बस यही सब सोचते सोचते उसने बस की खिड़की पर सर टिका दिया .

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