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क्षमा - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jul 05, 2024 IST | Reena Yadav
क्षमा   मुंशी प्रेमचंद
kshama by munshi premchand
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मुसलमानों को स्पेन देश पर राज्य करते कई शताब्दियाँ बीत चुकी थी। कलीसाओं की जगह मस्जिदें बनती जाती थीं, घंटों की जगह अजान की आवाजें सुनाई देती थीं। गरनाता और अलहमरा में वे समय की नश्वर गति पर हँसने वाले प्रासाद बन चुके थे, जिनके खंडहर अब तक देखने वालों को अपने पूर्व ऐश्वर्य की झलक दिखाते हैं। ईसाइयों के गण्य-मान्य स्त्री और पुरुष मसीह की शरण छोड़कर इस्लामी भ्रातृत्व में सम्मिलित होते जाते थे, और आज तक इतिहासकारों को यह आश्चर्य है कि ईसाइयों का निशान वहाँ क्यों कर बाकी रहा। जो ईसाई नेता अब तक मुसलमानों के सामने सिर न झुकाते थे, और अपने देश में स्वराज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे, उनमें एक सौदागर दाऊद भी था। दाऊद विद्वान् और साहसी था। वह अपने इलाके में इस्लाम को कदम न जमाने देता था। दीन और निर्धन ईसाई विद्रोही देश के अन्य प्रान्तों से आकर उसके शरणागत होते थे और यह बड़ी उदारता से उनका पालन-पोषण करता था। मुसलमान दाऊद से सशंक रहते थे। वे धर्म-बल से उस पर विजय न पाकर उसे शस्त्र-बल से परास्त करना चाहते थे, पर दाऊद कभी उनका सामना न करता। हां, जहाँ कहीं ईसाइयों के मुसलमान होने की खबर पाता, वहाँ हवा की तरह पहुँच जाता और तर्क या विनय से उन्हें अपने धर्म पर अचल रहने की प्रेरणा करता। अंत में मुसलमानों ने चारों तरफ से घेरकर उसे गिरफ्तार करने की तैयारी की। सेनाओं ने उसके इलाके को घेर लिया। दाऊद को प्राण-रक्षा के लिए अपने संबंधियों के साथ भागना पड़ा। वह घर से भागकर गरनाता में आया, जहाँ उन दिनों इस्लामी राजधानी थी। वहाँ सबसे अलग रहकर वह अच्छे दिनों की प्रतीक्षा में जीवन व्यतीत करने लगा। मुसलमानों के गुप्तचर उसका पता लगाने के लिए बहुत सिर मारते थे, उसे पकड़ लाने के लिए बड़े-बड़े इनामों की विज्ञप्ति निकाली जाती थी, पर दाऊद की टोह न मिलती थी।

एक दिन एकान्तवास से उकताकर दाऊ गरनाता के एक बाग में सैर करने चला गया। संध्या हो गई थी। मुसलमान नीची अबाएँ पहने, बड़े-बड़े अमामे सिर बाँधे, कमर से तलवार लटकाए रविशों में टहल रहे थे। स्त्रियाँ सफेद बुर्के ओढ़े, जरी की जूतियाँ पहने, बेंचों और कुर्सियों पर बैठी हुई थीं। दाऊद सबसे अलग हरी- हरी घास पर लेटा हुआ सोच रहा था कि वह दिन कब आएगा, जब हमारी जन्म- भूमि इन अत्याचारियों के पंजे से छूटेगी! वह अतीत काल की कल्पना कर रहा था, जब ईसाई स्त्री और पुरुष इन रविशों में टहलते होंगे, जब यह स्थान ईसाइयों के परस्पर वाग्विलास से गुलज़ार होगा।

सहसा एक मुसलमान युवक आकर दाऊद के पास बैठ गया। वह उसे सिर से पाँव तक अपमानजनक दृष्टि से देखकर बोला-क्या- अभी तक तुम्हारा हृदय इसलाम की ज्योति से प्रकाशित नहीं हुआ?

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दाऊद ने गम्भीर भाव से कहा- इसलाम की ज्योति पर्वत-श्रृंगों को प्रकाशित कर सकती है। अँधेरी घाटियों में उसका प्रवेश नहीं हो सकता।

उस मुसलमान अरब का नाम जमाल था। यह आक्षेप सुनकर तीखे स्वर में बोला- इससे तुम्हारा क्या मतलब?

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दाऊद- इससे मेरा मतलब यही है कि ईसाइयों में जो लोग उच्च श्रेणी के हैं, ये जागीरों और राज्याधिकारों के लोभ तथा राजदंड के भय से इसलाम की शरण आ सकते हैं, पर दुर्बल और दीन ईसाइयों के लिए इसलाम में वह आसमान की बादशाहत कहीं है, जो हजरत मसीह के दामन में उन्हें नसीब होगी! इसलाम का प्रचार तलवार के बल से हुआ है, सेवा के बल से नहीं।

जमाल अपने धर्म का अपमान सुनकर तिलमिला उठा। गरम होकर बोला- यह सर्वथा मिथ्या है। इसलाम की शक्ति उसका आन्तरिक मातृत्व और साम्य है, तलवार नहीं।

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दाऊद- इसलाम ने धर्म के नाम पर जितना रक्त बहाया है, उसमें उसकी सारी मस्जिदें डूब जायेंगी।

जमाल- तलवार ने सदा सत्य की रक्षा की है।

दाऊद ने अविचलित भाव से कहा- जिसको तलवार का आश्रय लेना पड़े, वह सत्य ही नहीं।

जमाल जातीय गर्व से उन्मत्त होकर बोला- जब तक मिथ्या के भक्त रहेंगे, तब तक तलवार की जरूरत भी रहेगी।

दाऊद- तलवार का मुँह ताकने वाला सत्य ही मिथ्या है।

अरब ने तलवार के कब्जे पर हाथ रखकर कहा- खुदा की कसम, अगर तुम निहत्थे न होते, तो इसलाम की तौहीन करने का मजा चखा देता।

दाऊद ने अपनी में छाती में छिपाई हुई कटार निकालकर कहा- नहीं, मैं निहत्था नहीं हूँ। मुसलमानों पर जिस दिन इतना विश्वास करूंगा, उस दिन ईसाई न रहूँगा। तुम अपने दिल के अरमान निकाल लो।

दोनों ने तलवारें खींच लीं। एक दूसरे पर टूट पड़े। अरब की भारी तलवार ईसाई की हलकी कटार के सामने शिथिल हो गई। एक सर्प की भांति फन से चोट करती थी, दूसरी नागिन, की भांति उड़ती थी। एक लहरों की भांति लपकती थी, दूसरी जल की मछलियों की भांति चमकती थी। दोनों योद्धाओं में कुछ देर तक चोटें होती रहीं। सहसा एक बार नागिन उछलकर अरब के अन्तस्तल में जा पहुँची। वह भूमि पर गिर पड़ा।

जमाल के गिरते ही चारों तरफ से लोग दौड़ पड़े। वे दाऊद को घेरने की चेष्टा करने लगे। दाऊद ने देखा, लोग तलवारें लिये दौड़े चले आ रहे हैं। प्राण लेकर भागा, पर जिधर जाता था, सामने बाग की दीवार रास्ता रोक लेती थी। दीवार ऊँची थी, उसे फांदना मुश्किल था। यह जीवन और मृत्यु का संग्राम था। कहीं शरण की आशा नहीं, कहीं छिपने का स्थान नहीं। उधर अरबों की रक्त-पिपासा प्रतिक्षण तीव्र होती जाती थी। यह केवल एक अपराधी को दंड देने की चेष्टा न थी, जातीय अपमान का बदला था। एक विजित ईसाई की यह हिम्मत कि अरब पर हाथ उठाए। ऐसा अनर्थ।

जिस तरह पीछा करने वाले कुत्तों के सामने गिलहरी इधर-उधर दौड़ती है, किसी मृदा पर चढ़ने की बार-बार चेष्टा करती है, पर हाथ-पाँव फूल जाने के कारण बार-बार गिर पड़ती है, यही दशा दाऊद की थी।

दौड़ते-दौड़ते उसका दम फूल गया, पैर मन-मन भर के हो गए। कई बार जी में आया, इन सब पर टूट पड़े और जितने महँगे प्राण बिक सकें, उतने महँगे बेचे, पर शत्रुओं की संख्या देखकर हतोत्साह हो जाता था।

लेना, दौड़ना, पकड़ना का शोर मचा हुआ था। कभी-कभी पीछा करने वाले इतने निकट आ जाते थे कि मालूम होता था, अब संग्राम का अन्त हुआ, वह तलवार पड़ी, पर पैरों की एक ही गति, एक कावा, एक कन्नी उसे खून की प्यासी तलवारों से बाल-बाल बचा लेती थी।

दाऊद को अब इस संग्राम में खिलाड़ियों का-सा आनंद आने लगा। यह निश्चय था कि उसके प्राण नहीं बच सकते, मुसलमान दया करना नहीं जानते, इसलिए उसे अपने दाँव-पेंच में मजा आ रहा था। किसी वार से बचकर उसे अब इसकी खुशी न होती थी कि उसके प्राण बच गए, बल्कि इसका आनंद होता था कि उसने कातिल को कैसा जिच किया।

सहसा उसे अपनी दाहिनी ओर बाग की दीवार कुछ नीची नजर आई। आह! यह देखते ही उसके पैरों में एक नई शक्ति का संचार हो गया, धमनियों में नया रक्त दौड़ने लगा। वह हिरन की तरह उस तरफ दौड़ा और एक छलाँग में बाग के उस पार पहुँच गया। जिंदगी और मौत में सिर्फ एक कदम का फासला था। पीछे मृत्यु थी और आगे जीवन का विस्तृत क्षेत्र। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, झाड़ियां ही नजर आती थीं। जमीन पथरीली थी, कहीं ऊँची, कहीं नीची। जगह-जगह पत्थर की शिलाएँ पड़ी हुई थी। दाऊद एक शिला के नीचे छिपकर बैठ गया।

दम-भर में पीछा करने वाले भी वहाँ आ पहुँचे और इधर-उधर झाड़ियों में, वृक्षों पर, गड्ढों में, शिलाओं के नीचे तलाश करने लगे। एक अरब उस चट्टान पर आकर खड़ा हो गया, जिसके नीचे दाऊद छिपा हुआ था। दाऊद का कलेजा धक-धक कर रहा था। अब जान गयी। अरब ने जरा नीचे को झाँका और प्राणों का अंत हुआ! संयोग-केवल संयोग पर उसका जीवन निर्भर था। दाऊद ने साँस रोक ली, सन्नाटा खींच लिया। एक निगाह पर उसकी जिंदगी और मौत में कितना सामीप्य है।

मगर अरबों को इतना अवकाश कहाँ था कि वे सावधान होकर शिलाओं के नीचे देखते। वहाँ तो हत्यारे को पकड़ने की जल्दी थी। दाऊद के सिर से बला टल गई। वे इधर-उधर ताक-झाँककर आगे बढ़ गए।

अँधेरा हो गया। आकाश में तारे निकल आये और तारों के साथ दाऊद भी शिला के नीचे से निकला। लेकिन देखा, तो उस समय भी चारों तरफ हलचल मची हुई है, शत्रुओं का दल मशालें लिये झाड़ियों में घूम रहा है, नाकों पर भी पहरा है, कहीं निकल भागने का रास्ता नहीं है। दाऊ एक वृक्ष के नीचे खड़ा होकर सोचने लगा कि अब क्यों कर जान बचे। उसे अपनी जान की वैसी परवाह न थी। वह जीवन के -दुख सब भोग चुका था। अगर उसे जीवन की लालसा थी, तो केवल यही कि इस संग्राम का अन्त क्या होगा? मेरे देशवासी हतोत्साह हो जाएँगे या अदम्य धैर्य के साथ संग्राम क्षेत्र में अटल रहेंगे?

जब रात अधिक बीत गई और शत्रुओं की घातक चेष्टा कम न होती दीख पड़ी, तो दाऊद खुदा का नाम लेकर झाड़ियों से निकला दबे-पाँव, वृक्षों की आड़ में, आदमियों की नजर बचाता हुआ, एक तरफ को चला। वह इन झाड़ियों से निकलकर बस्ती में पहुँच जाना चाहता था। निर्जनता किसी की आड़ नहीं कर सकती। बस्ती का जनबाहुल्य स्थान आड़ है।

कुछ दूर तक तो दाऊद के मार्ग में कोई बाधा न उपस्थित हुई। वन के वृक्षों ने उसकी रक्षा की, किन्तु जब यह असमतल भूमि से निकलकर समतल भूमि पर आया, तो एक अरब की निगाह उस पर पड़ गई। उसने ललकारा। दाऊद भागा। कातिल भागा जाता है। यह आवाज हवा में एक ही बार गूंजी और क्षण भर में चारों तरफ से अरबों ने उसका पीछा किया। सामने बहुत देर तक आबादी का नामोनिशान न था। बहुत दूर पर एक धुंधला-सा दीपक टिमटिमा रहा था। किसी तरह वहाँ तक पहुँच जाऊँ! वह उस की ओर इतनी तेजी से दौड़ रहा था, मानो वहाँ पहुंचते ही अभय पा जायेगा। आशा उसे उड़ाए लिये जाती थी। अरबों का समूह छूट गया, मसालों की ज्योति निष्प्रभ हो गई, केवल तारागण उसके साथ दौड़े चले आते थे। अन्त में वह आशामय दीपक सामने आ पहुँचा। एक छोटा-सा फूल का मकान था। एक बूढ़ा अरब जमीन पर बैठा हुआ रहेल पर कुरान रखे, उसी दीपक के मंद प्रकाश में पढ़ रहा था। दाऊद आगे न जा सका। उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया। वह वहीं शिथिल होकर गिर पड़ा। रास्ते की थकान घर पहुँचने पर मालूम होती है।

अरब ने उठकर पूछा- तू कौन है?

दाऊद- एक गरीब ईसाई। मुसीबत में फंस गया हूँ। अब आप ही शरण दें, तो मेरे प्राण बच सकते हैं।

अरब- खुदा-पाक तेरी मदद करेगा। तुझ पर क्या मुसीबत पड़ी हुई है? दाऊद- डरता हूँ कहीं कह दूँ तो आप भी मेरे खून के प्यासे न हो जायें।

अरब- अब तू मेरी शरण में आ गया, तो तुझे मुझसे कोई शंका न होनी चाहिए। हम मुसलमान हैं, जिसे एक बार अपनी शरण में लेते हैं, उसकी जिंदगी- भर रक्षा करते हैं।

दाऊद- मैंने एक मुसलमान युवक की हत्या कर डाली है।

वृद्ध अरब का सुख क्रोध से विकृत हो गया, बोला-उसका नाम?

दाऊद- उसका नाम जमाल था।

अरब सिर पकड़कर वहीं बैठ गया। उसकी आँखें सुर्ख हो गई, गर्दन की नसें तन गई, मुख पर अलौकिक तेजस्विता की आभा दिखाई दी, नथने फड़कने। ऐसा मालूम होता था कि उसके मन में भीषण द्वन्द्व हो रहा है और वह समस्त विचार-शक्ति से अपने मनोभावों को दबा रहा है। दो-तीन मिनट तक वह इसी उग्र अवस्था में बैठा धरती की ओर ताकता रहा। अंत को अवरुद्ध कंठ से बोला-नहीं-नहीं, शरणागत की रक्षा करनी ही पड़ेगी। आह! जालिम! तू जानता है, मैं कौन हूं?? मैं उसी युवक का अभागा पिता हूँ जिसकी आज तूने इतनी निर्दयता से हत्या की है। तू जानता है, तूने मुझ पर कितना बड़ा अत्याचार किया है? तूने मेरे खानदान का निशान मिटा दिया है। मेरा चिराग गुल कर दिया! आह! जमाल मेरा इकलौता बेटा था। मेरी सारी अभिलाषाएँ उसी पर निर्भर थीं। यह मेरी आँखों का उजाला, मुझ अंधे का सहारा, मेरे जीवन का आधार, मेरे जर्जर शरीर का प्राण था। अभी-अभी उसे कब्र की गोद में लिटाकर आया हूँ। आह! मेरा शेर आज खाक के नीचे सो रहा है। ऐसा दिलेर, ऐसा दिलदार, ऐसा सजीला जवान मेरी कौम में दूसरा न था। जालिम, तुझे उस पर तलवार चलाते जरा भी दया न आयी। तेरा पत्थर का कलेजा जरा भी न पसीजा। तू जानता है, मुझे इस वक्त तुझ पर कितना गुस्सा आ रहा है? मेरा जी चाहता है कि अपने दोनों हाथों से तेरी गर्दन पकड़कर इस तरह दबाऊँ कि तेरी जबान बाहर निकल आये, तेरी आँखें कौड़ियों की तरह बाहर निकल पड़ें। पर नहीं, तूने मेरी शरण ली है, कर्त्तव्य मेरे हाथों को बाँधे हुए हैं, क्योंकि हमारे रक्त पाक ने हिदायत की है, कि जो अपनी पनाह में आये, उस पर हाथ न उठाओ। मैं नहीं चाहता कि नबी के हुक्म को तोड़कर दुनिया के साथ अपनी आकबत भी बिगाड़ लूँ। दुनिया तूने बिगाड़ी, दीन अपने हाथों बिगाडू? नहीं। सब्र करना मुश्किल है, पर सब्र करूंगा ताकि नबी के सामने आँखें नीची न करनी पड़े। आ, घर आ। तेरा पीछा करने वाले दौड़े आ रहे हैं। तुझे देख लेंगे, तो फिर मेरी सारी मिन्नत-सलामत तेरी जान न बचा सकेगी। तू नहीं जानता कि अरब लोग खून कभी माफ नहीं करते।

यह कहकर अरब ने दाऊद का हाथ पकड़ लिया, और उसे घर में ले जाकर एक कोठरी में छिपा दिया। वह घर से बाहर निकला ही था कि अरबों का एक दल उसके द्वार आ पहुँचा।

एक आदमी ने पूछा- क्यों शेख हसन, तुमने इधर से किसी को भागते देखा है?

‘हां? देखा है।’

‘उसे पकड़ क्यों न लिया? वही तो जमाल का कातिल था! ‘

‘यह जानकर भी मैंने उसे छोड़ दिया।’

ऐं! गजब खुदा का! यह तुमने क्या किया? जमाल हिसाब के दिन हमारा दामन पकड़ेगा, तो हम क्या जवाब देंगे?’

‘तुम कह देना कि तेरे बाप ने तेरे कातिल को माफ कर दिया।’

‘अरब ने कभी कातिल का खून नहीं माफ किया।’

‘यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, मैं उसे अपने सिर क्यों लूँ?’

अरबों ने शेख हसन से ज्यादा हुज्जत न की, क़ातिल की तलाश में दौड़े। शेख हसन फिर चटाई पर बैठकर कुरान पढ़ने लगा, लेकिन उसका मन पढ़ने में न लगता था। शत्रु से बदला लेने की प्रवृत्ति अरबों की प्रवृत्ति में बद्धमूल होती थी। खून का बदला खून था। इसके लिए खून की नदियाँ बह जाती थी, कबीले- के-कबीले मर मिटते थे, शहर के शहर वीरान हो जाते थे। उस प्रवृत्ति पर विजय पाना शेख हसन को असाध्य-सा प्रतीत हो रहा था।

बार-बार प्यारे पुत्र की सूरत उसकी आँखों के आगे फिरने लगती थी, बार- बार उसके मन में प्रबल उत्तेजना होती थी कि चलकर दाऊद के खून से अपने क्रोध की आग बुझाऊं। अरब वीर होते थे। कटना-मरना उनके लिए कोई असाधारण बात न थी। मरने वालों के लिए वे आँसुओं की कुछ बूंदे बहाकर फिर अपने काम में प्रवृत्त हो जाते थे। वे मृत व्यक्ति की स्मृति को केवल उसी दशा में जीवित रखते थे, जब उसके खून का बदला लेना होता था।

अन्त, को शेख हसन अधीर हो उठा। उनको भय हुआ कि अब मैं अपने ऊपर काबू नहीं रख सकता। उसने तलवार म्यान से निकाल ली और दबे पाँव उस कोठरी के द्वार पर आकर खड़ा हो गया, जिसमें दाऊद छिपा हुआ था। तलवार को दामन में छिपाकर उसने धीरे से द्वार खोला। दाऊद टहल रहा था। बूढ़े अरब का रौद्र रूप देखकर दाऊ उसके मनोवेग को ताड़ गया। उसे बूढ़े से सहानुभूति हो गई। उसने सोचा, यह धर्म का दोष नहीं, जाति का दोष नहीं। मेरे पुत्र की किसी ने हत्या की होती, तो कदाचित मैं भी उसके खून का प्यासा हो जाता। यही मानव प्रकृति है।

अरब ने कहा- दाऊद, तुम्हें मालूम है, बेटे की मौत का कितना गम होता है।

दाऊ- इसका अनुभव तो नहीं है, पर अनुमान कर सकता हूँ। अगर मेरी जान से आपके उस गम का एक हिस्सा भी मिट सके, तो लीजिए, यह सिर हाजिर है। मैं इसे शौक से आपकी नजर करता हूँ। आपने दाऊद का नाम सुना होगा?

अरब- क्या पीटर का बेटा?

दाऊद- जी हां, मैं वही बदनसीब दाऊद हूँ। मैं केवल आपके बेटे का घातक ही नहीं, इस्लाम का दुश्मन हूँ। मेरी जान लेकर आप जमाल के खून का बदला ही न लेंगे, बल्कि अपने जाति और धर्म की सच्ची सेवा भी करेंगे।

शेख हसन ने गम्भीर भाव से कहा- दाऊद, मैंने तुम्हें माफ किया। मैं जानता हूँ मुसलमानों के हाथ ईसाइयों को बहुत तकलीफें पहुँची हैं, मुसलमानों ने उन पर बड़े-बड़े अत्याचार किए हैं, उनकी स्वाधीनता हर ली है। लेकिन यह इस्लाम का नहीं, मुसलमानों का कसूर है। विजय-गर्व ने मुसलमानों की मति हर ली है। हमारे पाक नबी ने यह शिक्षा नहीं दी थी, जिस पर आज हम चल रहे हैं। वह स्वयं क्षमा और दया का सर्वोच्च आदर्श हैं। मैं इस्लाम के नाम को बट्टा न लगाऊंगा। मेरी ऊंटनी ले लो और रातों-रात जहाँ तक भागा जाये, भागो। कहीं एक क्षण के लिए भी न ठहरना। अरबों को तुम्हारी बू भी मिल गई, तो तुम्हारी जान की खैरियत नहीं। जाओ, तुम्हें खुदा-ए-पाक घर पहुँचाये। बूढ़े शेख हसन और उसके बेटे जमाल के लिए खुदा से दुआ किया करना।

दाऊद खैरियत से घर पहुँच गया, किन्तु अब वह दाऊद न था, जो इस्लाम को जड़ से खोदकर फेंक देना चाहता था। उसके विचारों में गहरा परिवर्तन हो गया था। अब वह मुसलमानों का आदर करता और इस्लाम का नाम इज्जत से लेता था।

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