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हम कुछ चीजों को लेकर सहज होना कब सीखेंगे: Learn to be Comfortable

07:30 PM Sep 19, 2023 IST | Yasmeen Yasmeen
हम कुछ चीजों को लेकर सहज होना कब सीखेंगे  learn to be comfortable
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Learn to be Comfortable: लोगों का घूरना सच में हैरान करता है कि आखिर हम क्यों हम सरल बातों को लेकर सहज नहीं होता। क्यों एक फैंसी सी दुनिया के दबाव की वजह से हम वो करने लगते हैं जो हम करना नहीं चाहते? पिछले दिनों एक घटना इंटरनेट पर वायरल हुई थी। हुआ यह था कि एक मां बेटे एयरपोर्ट पर अचार पराठा खा रहे थे, जो वो अपने डिब्बे में घर से लाये थे। हालांकि इस घटना को समय बीत चुका है लेकिन इसे लेकर इस वायरल वीडियो के हीरो मधुर सिंह की प्रतिक्रिया अब सामने आई है। उन्होंने कहा जब हम एयरपोर्ट पर अपना डिब्बा ले जा रहे थे और खोलकर खा रहे थे तो लोग हमें बहुत अजीब नजरों से देख रहे थे। खैर हमने तो अपना घर से लाया हुआ खाना एकदम मस्त होकर खाया। वैसे भी मां ने कहा था कि घर से ही लेकर चले चलते हैं एयरपोर्ट पर तो समोसा भी 150 रुपए का मिलता है। मधुर अपनी मां को गोवा लेकर जा रहे थे।

वैसे तो हमारी अपने साथ खाना लेकर चलने की परंपरा रही है। बस और ट्रेन में तो अक्सर लोगों के साथ में उनका डिब्बा होता है लेकिन बात अगर एयरपोर्ट की होती है तो लोग वहीं पर ही कुछ लेना और खाना पसंद करते हैं। हां लेकिन कुछ राज्यों जैसे कि राजस्थान और गुजरात के लोग, शुद्ध शाकाहारी और जैन लोग अपने साथ खाना लेकर जाते हैं। वह भले ही विदेश क्यों न जा रहे हों। इस घटना ने हमें इस बात पर सोचने को मजबूर कर दिया कि जो भी कुछ हटकर होता है वह हमें अजीब क्यों लगता है? हम तो उस संस्कृति में रहते हैं जहां इतनी विभिन्नताएं हैं। आइए बात करते हैं उन बिंदुओं पर जो हमें सहज नहीं लगते।

किसी के बाल अगर रंगे हुए हैं तो

हम तो फिलहाल उस सदी में जी रहे हैं जहां हम दूसरे को उनके कपड़े से भी दो मिनिट में असहज कर देते हैं। अगर कोई इंसान बहुत छोटे कपड़े पहने है तो तो भी हमें इस बात की परेशानी है कि उसने आखिर ऐसा क्यों किया। वहीं अगर कोई महिला पल्लू अपने सिर पर रखकर निकलती है तो भी हम उसे घूरे बिना नहीं रहते। इतना ही नहीं अगर सार्वनजिक स्थल पर अगर आपको बालों को पर्पल, ब्लू पिंक जैसे दूसरे कलर लगाए है तो हमारा सारा ध्यान उसके बालों पर चला जाता है।

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रेस्त्रां में अंग्रेजी बोलना

Learn to be Comfortable
Learn to be Comfortable-English in Restaurant

अच्छी बात है कि आपको इंग्लिश बोलनी आती है लेकिन अगर आपको दूसरी भी कोई विदेशी भाषा आती है तो भी यह आपके व्यक्तित्व के लिए बहुत अच्छी बात है। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब हम किसी अच्छे रेस्त्रा में खाना खाने जाते हैं तो इंग्लिश में आपस में भी और वेटर से भी इतनी गिट-पिट करने लगते हैं जैसे वहां लिखो हो कि आपका यहां हिंदी में बात करना मना है। अरे भई न तो वो वेटर अंग्रेज है और न ही उन लोगों ने अंग्रेजी को प्रमोट करने की कोई पॉलिसी बनाई है। आप सहज रहिए और सामने वाले को भी सहज रखिए। इससे आपकी सो कॉल्ड क्लास में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

हाथ से खाना

आपने देखा है कभी साउथ के लोगों को वो लोग चाहे किसी भी ऊंची पोस्ट पर क्यों न पहुंच जाए लेकिन उनकी पोस्ट और उनका ओहदा उनकी संस्कृति के आड़े कभी नहीं आता। साउथ के लोग अपना भोजन हाथों से ही खाते हैं। हम लोगों के साथ मुसीबत यह है कि हम समाज में अच्छे बनने के इतने दबाव में हैं कि कुछ तो अच्छे रेस्त्रा में रोटी को भी कांटे से तोड़कर खाने लगते हैं। मसाला डोसे तक तो छुरी चम्मच फिर भी समझ में आता है। मानते हैं कि कुछ चाइनीज और जैपनीज कुजींस ऐसे होते हैं जिन्हें आप हाथ से नहीं खा सकते। लेकिन इंडियन खाने को हाथ से खाने में क्या परेशानी है। बस तमीज का दायरा न भूलें। जैसे कि खाना मुंह बंद करके खाएं। उसे खाने में कोई आवाज न आए। अपने गंदे हाथों से गिलास न पकड़ें आदी। इसके अलावा आपको यह भी पता होना चाहिए कि आपको नैपकिन का इस्तेमाल किस तरह करना है। अगर वैटर को अपने टेबल पर बुलाएंगे तो आप किस तरह बुलाएंगे।

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ब्रांड पर्सनेलिटी का आइना

Learn to be Comfortable
Learn to be Comfortable-Brand Personality

अगर हम किसी जगह पर जाते हैं तो मौके, समय और अपनी उम्र के अनुसार कपड़े पहनते हैं। लेकिन आजकल तो ब्रांड पर्सनेलिटी का एक आइना बनकर रह गया है। अगर आप किसी जगह पर ब्रांडेड कपड़े पहनकर नहीं जा रहे तो लोग आपको हेय दृष्टि से देखेंगे। जबकि ब्रांड पहनना या न पहनना किसी भी इंसान का एक निजी मामला है।

हम सीख सकते हैं अक्षता से

हम अपनी सोच से किस तरह आजाद हो सकते हैं यह हम अक्षता मूर्ति से सीख सकते हैं। वह ब्रिटेन की फर्स्ट लेडी हैं लेकिन भारत आगमन पर तो उन्होंने कोई जूलरी धारण कर रखी थी और न ही बहुत महंगे कपड़े पहने थे। वो जिसमें सहज थीं उन्होंने वो किया। आप अपनी सहजता की वजह से किसी भी जगह के नॉर्म्स को न भूलें। इस बात को भी समझें कि हर कोई एक जैसा नहीं होता। भिन्नता को ही स्वीकर करना सही मायनों में हमारी कामयाबी है।

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