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माता का हृदय - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jun 14, 2024 IST | Reena Yadav
माता का हृदय   मुंशी प्रेमचंद
maata ka hrday by munshi premchand
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माधवी की आँखों में सारा संसार अँधेरा हो रहा था। कोई अपना मददगार न दिखाई देता था। कहीं आशा की झलक न थी। उस निर्धन घर में यह अकेली पड़ी रोती थी और कोई आँसू पोंछने वाला न था। उसके पति को मरे हुए 22 वर्ष हो गए थे। घर में कोई सम्पत्ति न थी। उसने न-जाने किन तकलीफों से अपने बच्चे को पाल-पोस कर बढ़ा किया था। वही जवान बेटा आज उसकी गोद से छीन लिया गया था और छीनने वाले कौन थे? अगर मृत्यु ने छीना होता तो वह सब्र कर लेती। मौत से किसी को द्वेष नहीं होता। मगर स्वार्थियों के हाथों यह अत्याचार असह्य हो रहा था। इस घोर संतापों की दशा में उसका जी रह-रहकर इतना विकल हो जाता कि इसी समय चलूँ और उस अत्याचारी से इसका बदला लूँ जिसने उस पर यह निष्ठुर आघात किया है। जाऊं या मर जाऊँ। दोनों में ही सन्तोष हो जायेगा। कितना सुंदर, कितना होनहार बालक था। यही उसके पति की निशानी, उसके जीवन का आधार, उसकी उम्र भर की कमाई थी। वही लड़का इस वक्त जेल में पड़ा न जाने क्या-क्या तकलीफें झेल रहा होगा। और उसका अपराध क्या था? कुछ नहीं। सारा मुहल्ला उस पर जान देता था।

विद्यालय के अध्यापक उस पर जान देते थे। अपने-बेगाने, सभी तो उसे प्यार करते थे। कभी उसकी कोई शिकायत सुनने में नहीं आयी। ऐसे बालक की माता होने पर अन्य माताएँ उसे बधाई देती थीं। कैसा सबल, कैसा उदार, कैसा परमार्थी। खुद भूखों सो रहे, मगर क्या मजाल कि द्वार पर आने वाले अतिथि को रूखा जवाब दे। ऐसा बालक क्या इस योग्य था कि जेल में जाता। उसका अपराध यही था, वह कभी-कभी सुनने वालों को, अपने दुखी भाइयों का दुखड़ा सुनाया करता था, अत्याचार से पीड़ित प्राणियों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। क्या यही उसका अपराध था? दूसरों की सेवा करना भी अपराध है? किसी अतिथि को आश्रय देना भी अपराध है?

इस युवक का नाम आत्मानंद था। दुर्भाग्यवश उसमें वे सभी सद्गुण थे, जो जेल का द्वार खोल देते हैं। वह निर्भीक था, स्पष्टवादी था, साहसी था, स्वदेश- प्रेमी था, निःस्वार्थ था, कर्तव्यपरायण था। जेल जाने के लिए इन्हीं गुणों की जरूरत है। स्वाधीन प्राणियों के लिए ये गुण स्वर्ग का द्वार खोल देते हैं। पराधीन के लिए नरक के। आत्मानंद के सेवा-कार्य ने, उसकी वक्ताओं ने और उसके राजनीतिक लेखों ने उसे सरकारी कर्मचारियों की नजरों में चढ़ा दिया था। सारा पुलिस-विभाग नीचे-से-ऊपर तक उससे सतर्क रहता था, सबकी निगाह उस पर लगी रहती थीं। आखिर जिले में एक भयंकर डाके ने उन्हें इच्छित अवसर प्रदान कर दिया। आत्मानंद के घर की तलाशी हुई, कुछ पत्र और लेख मिले, जिन्हें पुलिस ने डाके का बीजक सिद्ध किया। लगभग 20 युवकों की एक टोली फांस ली गई। आत्मानन्द इसका मुखिया ठहराया गया। शहादत हुई। इस बेकारी और निगरानी के जमाने में आत्मा से ज्यादा सस्ती और कौन वस्तु हो सकती है! बेचने को और किसी के पास रह ही क्या गया है? नाममात्र का प्रलोभन देकर अच्छी-से-अच्छी शहादत मिल सकती हैं, और पुलिस के हाथों में पड़कर तो निकृष्ट-से-निकृष्ट गवाही भी देव-वाणी का महत्त्व प्राप्त कर लेती हैं। शहादत मिल गईं, महीने-भर तक मुकदमा चला। मुकदमा क्या चला, एक स्वाँग चलता रहा और सारे अभियुक्तों को सजाएँ दे दी गईं। आत्मानंद को सबसे कठोर दण्ड मिला, 8 वर्ष का कठोर कारावास! माधवी रोज कचहरी जाती, एक कोने में बैठी सारी कार्रवाई देखा करती। मानवीय चरित्र कितना दुर्बल, कितना निर्दय, कितना नीच है, इसका उसे तब तक अनुमान भी न हुआ था। जब आत्मानंद को सजा सुना दी गई और वह माता को प्रणाम करके सिपाहियों के साथ चला, तो माधवी मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी। दो-चार दयालु सज्जनों ने उसे एक ताँगे पर बैठाकर घर तक पहुँचाया। जब से वह होश में आई है, उसके हृदय में भूचाल-सा उठ रहा है। किसी तरह धैर्य नहीं होता। उस घोर आत्मवेदना की दशा में अब उसे अपने जीवन का केवल एक लक्ष्य दिखाई देता है, और वह है इस अत्याचार का बदला।

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अब तक पुत्र उसके जीवन का आधार था। अब शत्रुओं से बदला लेना ही उसके जीवन का आधार होगा। जीवन में अब उसके लिए कोई आशा न थी। इस अत्याचार का बदला लेकर वह अपना जन्म सफल समझेगी। इस अभागे नर- पिशाच बाग़ची ने जिस तरह उसे रक्त के आंसू लाए? हैं, उसी भांति वह भी उसे रुलाएगी। नारी-हृदय कोमल है, लेकिन केवल अनुकूल दशा में, जिस दशा में पुरुष दूसरों को दबाता है, स्त्री शील और विनय की देवी हो जाती है। लेकिन जिसके हाथों अपना सर्वनाश हो गया हो, उसके प्रति स्त्री को पुरुष से कम घृणा और क्रोध नहीं होता। अन्तर इतना ही है कि पुरुष शस्त्रों से काम लेता है, स्त्री कौशल से।

रात भागती जाती थी और माधवी उठने का नाम न लेती थी। उसका दुःख प्रतिकार के आवेश में विलीन होता जाता था। यहाँ तक कि इसके सिवा उसे और किसी बात की याद ही न रही। उसने सोचा, कैसे यह काम होगा? कभी घर से नहीं निकली। वैधव्य के 22 साल इसी घर में कट गए, लेकिन अब निकलूंगी। जबरदस्ती निकलूंगी, भिखारिन बनूँगी, टहलनी बनूँगी, झूठ बोलूँगी, सब कुकर्म करूंगी। सत्कर्म के लिए संसार में स्थान नहीं। ईश्वर ने निराश होकर कदाचित् इसकी ओर से मुँह फेर लिया है। तभी तो यहाँ ऐसे-ऐसे अत्याचार होते हैं और पापियों को दण्ड नहीं मिलता। अब इन्हीं हाथों से उसे दण्ड दूँगी।

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संध्या का समय था। लखनऊ के एक सजे हुए बँगले में मित्रों की महफ़िल जमी हुई थी। गाना-बजाना हो रहा था। एक तरफ आतिशबाजियां रखी हुई थीं। दूसरे कमरे में मेजों पर खाना चुना जा रहा था। चारों तरफ पुलिस के कर्मचारी नजर आते थे। यह पुलिस के सुपरिंटेंडेंट मिस्टर बाग़ची का बँगला है। कई दिन हुए, उन्होंने एक मार्क का मुकदमा जीता था। अफसरों ने खुश होकर उनकी तरक्की कर दी थी और उसी की खुशी में यह उत्सव मनाया जा रहा था। यहाँ आये दिन ऐसे उत्सव होते रहते थे। मुफ्त के गवैये मिल जाते थे, मुफ्त की आतिशबाजी, फल, मेवे और मिठाइयाँ आधे दामों पर बाजारों से आ जाती थीं और चट दावत हो जाती थी। दूसरों के जहाँ सौ लगते, यहाँ इनका दस से काम चल जाता था। दौड़-धूप करने को सिपाहियों की फौज थी ही। और यह मार्के का मुकदमा क्या था? वही, जिसमें निरपराध युवकों को बनावटी शहादत से जेल में ठूंस दिया था।

गाना समाप्त होने पर लोग भोजन करने बैठे। बेगार के मजदूर और पल्लेदार जो बाजार से दावत और सजावट के सामान लाये थे, रोते या दिल में गालियाँ देते चले गये, पर एक बुढ़िया अभी तक द्वार पर बैठी हुई थी। अन्य मजदूरों की तरह वह गुनगुना कर काम न करती थी। हुक्म पाते ही खुश दिल मजदूर की तरह दौड़-दौड़कर हुक्म बजा लाती थी। यह माधवी थी, जो इसी समय मजूरनी का वेष धारण करके अपना घातक संकल्प पूरा करने आयी थी।

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मेहमान चले गये। महफिल उठ गई। दावत का सामान समेट दिया गया। चारों ओर सन्नाटा छा गया, लेकिन माधवी अभी तक यहीं बैठी थी।

सहसा मिस्टर बाग़ची ने पूछा- बुड्ढी, तू यहाँ क्यों बैठी है? तुझे कुछ खाने को मिल गया?

माधवी- हाँ हुजूर, मिल गया।

बाग़ची- तो जाती क्यों नहीं?

माधवी- कहाँ जाऊँ सरकार, मेरा कोई घर-द्वार थोड़े ही है। हुकुम हो तो यहीं पड़ रहूँ। पाव-भर आटे की परवस्ती हो जाये हुजूर।

बाग़ची- नौकरी करेगी?

माधवी- क्यों न करूंगी सरकार, यही तो चाहती हूँ।

बागची- लड़का खिला सकती है?

माधवी- हाँ हुजूर, यह मेरे मन का काम है।

बागची- अच्छी बात है। तू आज ही से रह। जा, घर में देख, जो काम बताएं वह कर।

एक महीना गुजर गया। माधवी इतना तन-मन से काम करती है कि सारा घर उससे खुश है। बहू जी का मिजाज़ बहुत ही चिड़चिड़ा है। वह दिन-भर खाट पर पड़ी रहती हैं और बात-बात पर नौकरों पर झल्लाया करती है। लेकिन माधवी उनकी घुड़कियों को भी सहर्ष सह लेती है। अब तक मुश्किल से कोई दाई एक सप्ताह से अधिक ठहरी न थी। माधवी ही का कलेजा ऐसा है कि जली-कटी सुनकर भी मुख पर मैल नहीं आने देती।

मिस्टर बाग़ची के कई लड़के हो चुके थे, पर यही सबसे छोटा बच्चा बच रहा था। बच्चे पैदा तो हृष्ट-पुष्ट होते, किन्तु जन्म लेते ही उन्हें एक-न-एक रोग लग जाता था और कोई दो-चार महीने, कोई साल-भर जीकर चल देते थे। माँ- बाप, दोनों इस शिशु पर प्राण देते थे। उसे जरा जुकाम भी हो, तो दोनों विकल हो जाते। स्त्री-पुरूष दोनों शिक्षित थे, पर बच्चे की रक्षा के लिए टोना-टोटका, दुआ-तावीज़, जंतर-मंतर, एक से भी उन्हें इनकार न था।

माधवी से यह बालक इतना हिल गया कि एक क्षण के लिए भी उसकी गोद से न उतरता। वह कहीं एक क्षण के लिए चली जाती, तो रो-रोकर दुनिया सिर पर उठा लेता। वह सुलाती, तो सोता, यह दूध पिलाती, तो पीता, वह खिलाती, तो खेलता, उसी को वह अपनी माता समझता। माधवी के सिवा उसके लिए संसार में और कोई अपना न था। बाप को तो यह दिन भर में केवल दो-चार बार देखता और समझता, यह कोई परदेशी आदमी है। मां आलसी और कमजोरी के मारे उसे गोद में लेकर चल न सकती थी। उसे यह अपनी रक्षा का भार सँभालने के योग्य न समझता था, और नौकर-चाकर उसे गोद में लेते, तो इतनी बेदर्दी से कि उसके कोमल अंगों में पीड़ा होने लगती थी। कोई उसे ऊपर उछाल देता था, यहाँ तक कि अबोध का कलेजा मुँह को आ जाता था। उन सबों से वह डरता था। केवल माधवी जो उसके स्वभाव को समझती थी। वह जानती थी कि कब क्या करने से बालक प्रसन्न होगा, इसीलिए बालक को भी उससे प्रेम था।

माधवी ने समझा था, यहाँ कंचन बरसता होगा, लेकिन उसे यह देखकर कितना विस्मय हुआ कि बड़ी मुश्किल से महीने का खर्च पूरा पड़ता है। नौकरों से एक-एक पैसे का हिसाब लिया जाता था और बहुधा आवश्यक वस्तुएँ भी टाल दी जाती थीं। एक दिन माधवी ने कहा- बच्चे के लिए कोई तेज गाड़ी क्यों नहीं मँगवा देतीं? गोद में उसकी बाढ़ मारी जाती है।

मिसेज बाग़ची ने कुंठित होकर कहा- कहाँ से मँगवा दूं। कम-से-कम 50-60 रुपये में आएगी। इतने रुपये कहां हैं?

माधवी- मालकिन, आप भी ऐसा कहती हैं।

मिसेज बाग़ची - झूठ नहीं कहती। बाबूजी की पहली स्त्री से पाँच लड़कियाँ और हैं। सब इस समय इलाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही हैं। बड़ी की उम्र 15-16 वर्ष से कम न होगी। आधा वेतन तो उधर ही चला जाता है। फिर उनकी शादी की भी तो चिन्ता है। पाँचों के विवाह में कम-से-कम 25 हजार रुपये लगेंगे। इतने रुपये कहाँ से आएँगे? मैं चिंता के मारे मरी जाती हूँ। मुझे कोई दूसरी बीमारी नहीं है, केवल यही चिन्ता का रोग है।

माधवी- घूस भी तो मिलती है।

मिसेज बाग़ची- बूढ़ी, ऐसी कमाई से बरकत नहीं होती। यही क्यों, सच पूछो तो इसी घूस ने हमारी यह दुर्गति कर रखी है। क्या जाने, औरों को कैसे हजम होती है। यहाँ तो जब ऐसे रुपये आते हैं, तो कोई-न-कोई नुकसान भी अवश्य हो जाता है। एक आता है तो दो लेकर जाता है। बार-बार मना करती हूँ, हराम की कौड़ी घर में न लाया करो, लेकिन मेरी कौन सुनता है?

बात यह थी कि माधवी को बालक से स्नेह होता जाता था। उसके अमंगल की कल्पना भी न कर सकती थी। वह अब उसी की नींद सोती और उसी की नींद जागती थी। अपने सर्वनाश की बात याद करके एक क्षण के लिए उसे बाग़ची पर क्रोध तो हो आता था और घाव फिर हरा हो जाता था, पर मन पर कुत्सित भावों का आधिपत्य न था। घाव भर रहा था, केवल ठेस लगने से दर्द हो जाता था। उसमें स्वयं टीस या जलन न थी। इस परिवार पर अब उसे दया आती थी। सोचती, बेचारे यह छीन-झपट न करें, तो कैसे गुजर हो! लड़कियों का विवाह कहां से करेंगे! स्त्री को जब देखो, बीमार ही रहती। उस पर बाबूजी को एक बोतल शराब भी रोज चाहिए। यह लोग तो स्वयं अभागे हैं। जिसके घर में 5-5 कुंवारी कन्याएं हों, बालक हो-होकर मर जाते हों, घरनी सदा बीमार रहती हो, स्वामी शराब का लती हो, उस पर तो यों ही ईश्वर का कोप है। इनसे तो मैं अभागिनी ही अच्छी।

दुर्बल बालकों के लिए बरसात बुरी बला है। कभी खाँसी है, कभी ज्वर, कभी दस्त। जब हवा में ही शीत भरी हो, तो कोई कहां तक बचाए। माधवी एक दिन अपने घर चली गयी थी। बच्चा रोने लगा तो माँ ने एक नौकर को दिया, इसे बाहर से बहला ला। नौकर ने बाहर ले जाकर हरी-हरी घास पर बैठा दिया। पानी बरसकर निकल गया था। भूमि गीली हो रही थी। कहीं-कहीं पानी भी जमा हो गया था। बालक को पानी में छपके लगाने से प्यारा और कौन खेल हो सकता है। खूब प्रेम से उमंग-उमंग कर पानी में लोटने लगा। नौकर बैठा और आदमियों के साथ गपशप करता रहा। इस तरह घण्टों गुजर गए। बच्चे ने खूब सर्दी खायी। घर आया तो उसकी नाक बह रही थी। रात को माधवी ने आकर देखा तो बच्चा खाँस रहा था। आधी रात के करीब उसके गले में खुरखुर की आवाज निकलने लगी। माधवी का कलेजा सन से हो गया। स्वामिनी को जगाकर बोली- देखो तो बच्चे को क्या हो गया है। क्या सदी-वर्दी तो नहीं लग गई? ही, सर्दी ही तो मालूम होती है।

स्वामिनी हकबकाकर उठ बैठी और बालक की खुरखुराहट सुनी, तो पाँव तले से जमीन निकल गई। यह भयंकर आवाज उसने कई बार सुनी थी और उसे खूब पहचानती थी। व्यग्र होकर बोली- जरा आग जलाओ। थोड़ा-सा चोकर लाकर एक पोटली बनाओ, सेंकने से लाभ होता है। इन नौकरों से तंग आ गई। आज कहार जरा देर के लिए बाहर ले गया था, उसी ने सर्दी में छोड़ दिया होगा।

सारी रात दोनों बालक को सेंकती रहीं। किसी तरह सवेरा हुआ। मिस्टर बाग़ची को खबर मिली, तो सीधे डॉक्टर के यहाँ दौड़े। खैरियत इतनी थी कि जल्द एहतियात की गई। तीन दिन में बच्चा अच्छा हो गया, लेकिन इतना दुर्बल हो गया था कि उसे देखकर डर लगता था। सच पूछो तो माधवी की तपस्या ने बालक को बचाया। माता सोती, पिता सो जाता, किन्तु माधवी की आँखों में नींद न थी। खाना-पीना तक भूल गई। देवताओं की मनौतियाँ करती थी, बच्चे की बलाएं लेती थी, बिलकुल पागल हो गई थी। यह वही माधवी है, जो अपने सर्वनाश का बदला लेने आयी थी। अपकार की जगह उपकार कर रही थी। विष पिलाने आयी थी, सुधा पिला रही थी। मनुष्य में देवता कितना प्रबल है।

प्रातःकाल का समय था। मिस्टर बाग़ची शिशु के पालने के पास बैठे हुए थे। स्त्री के सिर में पीड़ा हो रही थी। वह चारपाई पर लेटी हुई थी और माधवी समीप बैठी बच्चे के लिए दूध गरम कर रही थी। सहसा बाग़ची ने कहा- बूढ़ी, हम जब तक जिएंगे, तुम्हारा यश जाएंगे। तुमने बच्चे को जिला लिया।

स्त्री- यह देवी बनकर हमारा कष्ट निवारण करने के लिए आ गयी। यह न होती तो न-जाने क्या होता। बूढ़ी, तुमसे मेरी एक विनती है। यों तो मरना- जीना प्रारब्ध के हाथ है, लेकिन अपना-अपना औरा भी बड़ी चीज है। मैं अभागिनी हूँ। अबकी तुम्हारे ही पुण्य-प्रताप से बच्चा सँभल गया। मुझे डर लग रहा है कि ईश्वर इसे हमारे हाथ से छीन न लें। सच कहती हूँ मुझे इसको गोद में लेते डर लगता है। इसे तुम आज से अपना बच्चा समझो। तुम्हारा होकर शायद बच जाये, हम अभागे हैं। हमारा होकर इस पर नित्य कोई-न-कोई संकट आता रहेगा। आज से तुम इसकी माता हो जाओ। तुम इसे अपने घर ले जाओ। जहाँ चाहे ले जाओ। तुम्हारी गोद में देकर मुझे फिर कोई चिन्ता न रहेगी। वास्तव में तुम्हीं इसकी माता हो। मैं तो राक्षसी हूँ।

माधवी- बहू जी, भगवान सब कुशल करेंगे, क्यों जी इतना छोटा करती हो?

मिस्टर बाग़ची- नहीं-नहीं बूढ़ी माता, इसमें कोई हर्ज नहीं है। मैं मस्तिष्क से तो इन बातों को ढकोसला ही समझता हूँ लेकिन हृदय से इन्हें दूर नहीं कर सकता। मुझे स्वयं मेरी माताजी ने एक धोबिन के हाथ बेच दिया था। मेरे तीन भाई मर चुके थे। मैं जो बच गया तो माँ-बाप ने समझा, बेचने ही से इसकी जान बच गई। तुम इस शिशु को पालो-पोसो। इसे अपना पुत्र समझो। खर्च हम बराबर देते रहेंगे। इसकी कोई चिन्ता मत करना। कभी-कभी जब हमारा जी चाहेगा, आकर देख लिया करेंगे। हमें विश्वास है कि तुम इसकी रक्षा हम लोगों से कहीं अच्छी तरह कर सकती हो। मैं कुकर्मी हूँ। जिस पेशे में हूँ उसमें कुकर्म किए बगैर काम नहीं चल सकता। झूठी शहादतें बनानी ही पड़ती हैं, निरपराधों को फंसाना ही पड़ता है। आत्मा इतनी दुर्बल हो गई है कि प्रलोभन में पड़ ही जाता हूँ। जानता हूँ कि बुराई का अंत बुरा ही होता है, पर परिस्थिति से मजबूर हूँ। अगर न करूँ तो आज नालायक बनाकर निकाल दिया जाऊँ। अंग्रेज हजारों भूल करें, कोई नहीं पूछता। हिन्दुस्तानी एक भूल भी कर बैठे, तो सारे अफसर उसके सिर हो जाते हैं। हिन्दुस्तानियों को तो कोई बड़ा पद न मिले, वही अच्छा। पद पाकर तो उसकी आत्मा का पतन हो जाता है। उनको अपनी हिन्दुस्तानियत का दोष मिटाने के लिए कितनी ही ऐसी बातें करनी पड़ती हैं, जिनका अंग्रेज के दिल में कभी खयाल ही नहीं पैदा हो सकता। तो बोलो, स्वीकार करती हो?

माधवी गदगद होकर बोली- बाबूजी आपकी इच्छा है तो भी जो कुछ बन पड़ेगा, आपकी सेवा कर दूँगी। भगवान बालक को अमर करें, मेरी तो उनसे यही बिनती है।

माधवी को ऐसा मालूम हो रहा था कि स्वर्ग के द्वार सामने खुले हैं और स्वर्ग की देवियाँ उसे आंचल फैलाकर आशीर्वाद दे रही हैं मानों उसके अन्तस्तल में प्रकाश की लहरें-सी उठ रही हैं। इस स्नेहमय सेवा में कितनी शान्ति थी।

बालक अभी तक चादर ओढ़े सो रहा था। माधवी ने दूध गरम हो जाने पर उसे झूले पर से उठाया, तो चिल्ला पड़ी। बालक की देह ठंडी हो गई थी और मुख पर वह पीलापन आ गया था, जिसे देखकर कलेजा हिल जाता है, कंठ से आह निकल आती है और आँखों से आँसू बहने लगते हैं। जिसने उसे एक बार देखा है, फिर कभी नहीं भूल सकता। माधवी ने शिशु को गोद से चिपटा लिया, हालांकि नीचे उतार देना चाहिए था।

कुहराम मच गया। माँ बच्चे को गले से लगाए रोती थी, पर उसे जमीन पर न सुलाती थी। क्या बातें हो रही थीं और क्या हो गया। मौत को धोखा देने में आनन्द आता है। वह उस वक्त कभी नहीं आती, जब लोग उसकी राह देखते होते हैं। रोगी जब संभल जाता है, जब वह पथ्य लेने लगता है, उठने-बैठने लगता है, घर-भर खुशियाँ मनाने लगता है, सबको विश्वास हो जाता है कि संकट टल गया, उस वक्त घात में बैठी हुई मौत सिर पर आ जाती है। यही उसकी निष्ठुर लीला है।

आशाओं के बाग लगाने में हम कितने कुशल हैं। यहाँ हम रक्त के बीज बोकर सुधा के फल खाते हैं। अग्नि से पौधों को सींचकर शीतल छाँह में बैठते हैं। हाय मंद बुद्धि।

दिन-भर मातम होता रहा, बाप रोता था, माँ तड़पती थी और माधवी बारी- बारी से दोनों को समझाती थी। यदि अपने प्राण देकर वह बालक को जिला सकती, तो इस समय अपना धन्य भाग्य समझती। वह अहित का संकल्प करके यहाँ आयीं थी और आज जब उसकी मनोकामना पूरी हो गई और उसे खुशी से फूला न समाना चाहिए था, उसे उससे कहीं घोर पीड़ा हो रही थी, जो अपने पुत्र की जेल-यात्रा से हुई थी। रुलाने आयी थी और खुद रोती जा रही थी। माता का हृदय दया का आगार है। उसे जलाओगे तो उसमें से दया की ही सुमन निकलती है, पीसो तो दया का ही रस निकलता है। वह देवी है। विपत्ति की क्रूर लीलाएँ भी उस स्वच्छ और निर्मल स्त्रोत कोमलिन नहीं कर सकतीं।

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