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गांधीजी का जन्म व जीवन के प्रारंभिक वर्ष - जीवन परिचय

02:00 PM Nov 27, 2023 IST | Guddu KUmar
गांधीजी का जन्म व जीवन के प्रारंभिक वर्ष   जीवन परिचय
Birth and early years of Gandhiji's life - Biography
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महात्मा गांधी भारतीय इतिहास के आदरणीय नामों में से एक हैं। वे भारत के राजनीतिक व आदर्शवादी नेता होने के साथ-साथ राष्ट्रपिता के रूप में भी स्मरणीय हैं। वे मुक्त भारत के अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक बने। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाईं। उन्हें प्यार से ‘बापू’ कहा जाता है। उनके दवारा सत्य व अहिंसा की जो शिक्षा दी गई, उससे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का दृष्टिकोण ही बदल गया।

महात्मा गांधी का पूरा नाम ‘मोहनदास करमचंद गांधी’ है। उनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात, पोरबंदर के एक हिंदू परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी व मां का नाम पुतली बाई था।

उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर के दीवान थे। गांधीजी की माता एक धार्मिक व पवित्र महिला थीं। गांधीजी ने अपने माता-पिता से नैतिक व सामाजिक मूल्य पाए। बचपन से ही वे अहिंसा, सत्य, शुद्धता व सादा जीवनशैली में विश्वास रखते थे।

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Birth and early years of Gandhiji's life - Biography
Birth and early years of Gandhiji's life - Biography

13 वर्ष की आयु में उनका विवाह कस्तूरबा गांधी से हुआ। उनके चार पुत्र हुए। गांधीजी ने पोरबंदर से शिक्षा आरंभ की। आगे की पढ़ाई के लिए राजकोट गए। फिर 1887 में, बंबई विश्वविद्यालय पढ़ने गए। परिवार चाहता था कि वे एक वकील बनें।

1888 में वे उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए व 1891 में कानून की पढ़ाई पूरी की। फिर वे भारत लौट आए। अगले दो वर्षों तक भारत में कानून की प्रैक्टिस की फिर वे एक भारतीय व्यवसायी के कानूनी सलाहकार के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए।

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तेईस वर्ष की आयु में गांधीजी ने परिवार को भारत में छोड़ा व कानूनी सलाहकार के रूप में दक्षिण अफ्रीका चले गए। वहां उन्होंने पाया कि काले व गोरे समुदायों के बीच रंगभेद की नीति थी। काले लोगों को गहरे भेदभाव का सामना करना पड़ता, उन पर कई तरह के अत्याचार होते। गांधीजी को यह सब देख बहुत बुरा लगा।

Gandhiji in South Africa
Gandhiji in South Africa

पहले सप्ताह में ही उन्हें भी रंगभेद का शिकार होना पड़ा। एक दिन वे ट्रेन में पहले दर्जे की टिकट के साथ फर्स्ट-क्लास के कंपार्टमेंट में सफर कर रहे थे तभी पिट्मार्टिजबर्ग स्टेशन पर उन्हें थर्ड-क्लास के कंपार्टमेंट में जाने को कहा गया। टिकट चेकर ने उन्हें कहा कि वह कंपार्टमेंट गोरे लोगों के लिए ही आरक्षित था। गांधीजी ने विरोध किया तो उन्हें गाड़ी से बाहर धकेल दिया गया।

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इसी यात्रा के दौरान, उन्होंने जाना कि यह तो एक आम

अभ्यास था। वहां काले लोग व भारतीय ‘कुली’

कहलाते थे।

इस घटना के बाद गांधीजी ने तय किया कि वे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएंगे। उन्होंने उच्च अधिकारियों को पत्र लिखे व दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति का विरोध किया। गांधीजी अगले तीन साल तक निरंतर लड़ते रहे। शीघ्र ही वे भारतीय समुदाय के नेता बन गए।

Gandhiji in South Africa
Gandhiji in South Africa

22 मई 1894 को उन्होंने वहां नैटल इंडिया कांग्रेस (एन. आई. सी.) की स्थापना की। यह संगठन वहां रह रहे भारतीयों के अधिकारों की रक्षा करता था। उस दौरान गांधीजी को दूसरे समुदायों का रोष सहना पड़ा। उन पर कई बार हमले भी किए गए।

गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में 20 वर्ष बिताए। 1915 में वे भारत लौटे।

दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के संघर्ष व सफलता का समाचार भारत भी पहुंच चुका था। वे भारतीयों के लिए किसी राष्ट्रीय नायक से कम नहीं थे। गांधीजी भारत में भी सुधार की ऐसी लहर लाना चाहते थे। वे भारतीयों की असली दशा जानने के लिए भारत भ्रमण

पर निकले।

mahatma gandhi in bharat
mahatma gandhi in bharat

इस यात्रा के दौरान वे एक धोती व लकड़ी के खड़ाऊ में थे। वे सभी सुख-सुविधाएं

त्याग कर सादा जीवन जीने लगे।

उन्होंने अहमदाबाद (गुजरात में) साबरमती आश्रम की स्थापना की। वे अपने परिवार व समर्थकों के साथ आश्रम में रहने लगे। सभी उन्हें बेहद चाहते थे।

लोग उनकी अहिंसा व सत्य की सीख पर विश्वास करने लगे, वे महात्मा कहलाने लगे।

भारत उस समय अंग्रेजों के कब्जे में था। अनेक स्वतंत्रता सेनानी भारत के लिए युद्ध कर रहे थे। गांधीजी भी देश की आजादी चाहते थे किंतु उन्होंने दूसरा ही मार्ग चुना। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ एक अहिंसक आंदोलन चलाया जिसे सत्याग्रह का नाम दिया गया।

सत्याग्रह का अर्थ था - अहिंसक विरोध। गांधीजी लोगों को समझाते कि वे शांत भाव से न्याय की मांग करें। यह आंदोलन एक लहर की तरह फैला व सफल रहा।

Indian independence movement
Indian independence movement

1919-1920 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन चलाया। अंग्रेजों ने उन्हें कई बार कैदी बनाया किंतु उनका मिशन नहीं रुका। उन्होंने भारतीयों से कहा कि वे विदेशी वस्त्रों व वस्तुओं का प्रयोग बंद कर दें। उन्होंने कहा कि चरखे पर बना सूती कपड़ा प्रयोग किया जाए। चरखे की यह छवि बाद में, भारतीय आजादी का प्रतीक बनी।

12 मार्च, 1930 को गांधीजी ने नमक कानून के विरुद्ध दांडी मार्च किया। वे अपने अनुयायियों के साथ 200 मील तक चलकर, साबरमती आश्रम से समुद्रतट तक गए व नमक कानून तोड़ा।

Indian independence movement
Indian independence movement

वहां गांधीजी ने सबको समुद्र के पानी से नमक बनाना सिखाया। वे बंदी बनाए गए पर आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। अंग्रेज सरकार व गांधीजी के बीच दिल्ली पैक्ट के बाद ही इसे रोका जा सका। इसके अनुसार उन्हें सीमित नमक उत्पादन की अनुमति मिली व आंदोलन छोड़ दिए गए।

1942 में गांधीजी ने नारा दिया, ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’। उन्होंने अगस्त क्रांति आंदोलन छेड़ा। उसके फौरन बाद 'भारत छोड़ो आंदोलन' आरंभ कर दिया गया। लंबे संघर्षों व बलिदानों के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। आजादी मिलते ही भारत को विभाजन का दंश झेलना पड़ा। गांधीजी ने विभिन्न समुदायों से आपसी प्रेम व शांति बनाए रखने की अपील की।

Indian independence movement
Indian independence movement

पूरे देश में गड़बड़ी चल रही थी। सांप्रदायिक हिंसा जोरों पर थी। इस हिंसा को रोकने के लिए गांधीजी ने 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन शुरू किया, जो सफल रहा। 18 जनवरी 1948 को इसी आश्वासन पर उपवास तोड़ा कि सांप्रदायिक हिंसा रोक दी जाएगी।

कुछ भारतीयों का मानना था कि उस विभाजन के लिए गांधीजी ही उत्तरदायी थे। उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। 30 जनवरी, 1948 का दिन, गांधीजी प्रार्थना सभा की ओर जा रहे थे। उनकी दो सहायिकाएं आभा एवं मनु साथ थीं। तभी नाथूराम गोडसे नामक व्यक्ति सामने आया और उन पर गोलियां चला दीं। गांधीजी धरती पर गिर पड़े व उनके मुंह से निकला - ‘हे राम ! हे राम!’ यही उनके अंतिम शब्द थे।

assassination of gandhiji
assassination of gandhiji

महान आत्मा, राष्ट्र का प्रकाश जा चुका था। पूरा देश प्रिय बापू की हत्या का समाचार पाकर शोक मना रहा था। दूसरे देश भी यह समाचार पाकर स्तब्ध हो उठे।

महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद; पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा -

"दोस्तो व कॉमेरेड, हमारे जीवन से प्रकाश जा चुका है और चारों ओर अंधकार छाया है। मैं नहीं जानता कि आपसे क्या व कैसे कहूं। हमारे प्रिय बापू, राष्ट्रपिता, इस दुनिया में नहीं रहे।

assassination of gandhiji
assassination of gandhiji

संभवतः मैं गलत कह रहा हूं किंतु हम उन्हें अब उस रूप में नहीं देख पाएंगे, जैसे वर्षों से देखते आ रहे थे। हम उनसे सलाह व मन की शांति पाने के लिए, उनके पास नहीं जाएंगे और यह न केवल मेरे लिए बल्कि इस देश के लाखों-लाख लोगों के एक बड़ी चोट है।

इस चोट व पीड़ा के दर्द को घटाने के लिए मेरी या किसी दूसरे की कोई सलाह आपके काम नहीं आएगी----।"

दिल्ली के राजघाट में महात्मा गांधी की समाधि है। पूरे देश से हजारों श्रद्धालु इस महात्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं।

In memory of Mahatma Gandhi
In memory of Mahatma Gandhi

2 अक्टूबर का दिन, गांधीजी का जन्म दिवस, गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह भारत के तीन राष्ट्रीय त्योहारों में से है। भारतवासी आज भी उन्हें बड़े प्यार व आदर-मान से बापू कहते हैं।

प्रतिवर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है ताकि देश के नाम पर शहीद होने वालों को श्रद्धांजलि दी जा सके। भारत के करेंसी नोटों पर भी बापू की छवि अंकित है।

महात्मा गांधी एक महान लेखक भी थे। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक लेख व पत्रें का लेखन-संपादन किया। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा - ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ भी शामिल है।

In memory of Mahatma Gandhi
In memory of Mahatma Gandhi

वर्ष 1930 में टाइम पत्रिका ने उन्हें ‘मैन ऑफ द ईयर’ घोषित किया। गांधीजी और उनकी शिक्षाओं पर अनेक पुस्तकें लिखी गईं। भारतीय साहित्य, थियेटर व फिल्मों में भी उनके जीवन को कई बार दर्शाया गया है।

गांधीजी ने भारतीयों के कल्याण के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। वे सभी भारतीयों के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं। आज भी, न केवल भारत बल्कि विदेशो में भी उनकी शिक्षाओं - सत्य, अहिंसा व शांति का पालन किया जाता है।

In memory of Mahatma Gandhi
In memory of Mahatma Gandhi

राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहें तो उसका एक ही उपाय है - उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारें। हमें महात्मा गांधी के महान जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए।

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