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विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति: Makar Sankranti 2023

09:00 AM Jan 12, 2023 IST | grehlakshmi hindi
विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति  makar sankranti 2023
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Makar Sankranti 2023: भारत त्योहारों का देश है, यहां प्रत्येक त्योहार को हर्ष-उल्लास के साथ मनाया जाता है। उन्हीं में से एक त्योहार है मकर संक्रांति जिसे भारत के प्रत्येक राज्य के लोग अपनी परंपरा, संस्कृति के अनुसार मनाते हैं। कैसे मनाया जाता है भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्राति का त्योहार आइए जानते हैं-

भारतीय रीति-रिवाज के अंतर्गत जन मानस के साथ त्योहारों का घनिष्ठ रिश्ता रहा है। कृषि प्रधान होने की वजह से ज्यादातर त्योहारों की पृष्ठभूमि में कृषि रही है। विश्लेषण करने से विदित होता है कि भारतवर्ष के पर्व-त्योहार, नक्षत्र, महीने मौसम के ऊपर आधारित हैं। धरा पर रहने वाले मानव, जीव-जन्तु पक्षी और कीड़े अनेक वजहों से सूर्य के प्रति कृतज्ञ हैं। सूर्याेदय और सूर्यास्त की वजह से धरा पर तमाम प्रकार के बदलाव होते हैं। चूंकि सूर्य प्रकाश और ऊष्मा देता है। प्रकाश तथा ऊष्मा की सहायता से वनस्पतियों का भोजन उपलब्ध हो पाता है। भारतीय त्योहारों के पीछे सूर्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। हिन्दू काल गणना के मुताबिक माघ माह के शुरू में अर्थात् जनवरी के मध्य में सूर्य क्रमशरू उत्तर की दिशा में उदय होने लगता है, जिसे उत्तरायण कहते हैं। सूर्य का उत्तरायण होना लोक मंगलकारी शुभ क्षण माना जाता है। इसके प्रारंभिक दिवस को बेहद पवित्र माना जाता है। उसी दिन को भारतीय रीति-रिवाज में मकर संक्रांति पर्व के रूप में मनाया जाता है।

  • उत्तर भारत में इसको श्खिचड़ी पर्व्य कहते हैं। मकर संक्रांति के मौके पर लोग सामूहिक रूप से गंगा-यमुना या पवित्र सरोवरों, नदियों में स्नान करते हैं। इस दिन गंगा नदी में स्नान कर सूर्य को अघ्र्य देना अत्यंत पुण्य का कार्य माना जाता है। सूर्य का प्रतिनिधि ताम (तांबा) या स्वर्ण है। अतरू अघ्र्य प्रदत्त करने के लिए तामपात्र ही श्रेयस्कर होता है। जनश्रुति है कि प्रयाग के कुंभ मेले में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य मकर संक्रांति के दिन नदी में स्नान करने से प्राप्त होता है। ठंड के बावजूद भारी तादाद मे लोग गंगा नदी में स्नान करते हैं। सूर्य उदय होने से पहले स्नान कर सूर्याेदय के साथ-साथ सूर्य की आराधना करते हैं। स्नान के साथ तिल-गुड़ के लड्ड्ढडू एवं खिचड़ी देने और खाने की रीति रही है।
Makar Sankranti 2023
Makar Sankranti 2023 Celebration
  • मकर संक्रांति का पर्व एक प्रकार से पतंगबाजी का भी त्योहार है। इस दिन आधे नभ में पतंगे छा जाती हैं। पतंगबाजी में लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के पतंगबाजों ने दूर-दूर तक नाम कमाया। आज भी प्रतियोगिताओं में यहां के पतंगबाज आगे रहते हैं। उत्तराखंड में मकर संक्रांति पर्व श्घुघुतिया्य या श्पुसुड़िया्य के नाम से जाना जाता है। जम्मू एवं पंजाब में इस पर्व को श्लोहड़ी्य के नाम से जाना जाता है।
  • पंजाब तथा हरियाणा में भी मकर संक्रांति से एक दिन पहले अर्थात् 13 जनवरी को हंसी-खुशी तथा उल्लास का विशिष्ट उत्सव लोहड़ी मनाने का रिवाज है। एक मान्यता के अनुसार इस दिन पापी कंस ने बाल गोपाल कृष्ण का वध करने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को मथुरा भेजा था जिसे कृष्ण ने खेल ही खेल में मार डाला, कदाचित तभी से लोहित का अपभ्रंश लोहड़ी प्रसिद्ध हो गया। इस बहाने शीतकाल में उस दिन शाम के समय लोग आग जलाकर उसके ईर्द-गिर्द नाचते-गाते हैं तथा तिल-गुड़, मूंगफली खाने की परंपरा है। अलाव में ईख के टुकड़े डाल दिए जाते हैं जो आवाज के साथ फटते हैं। जिस परिवार में नववधू अथवा नवशिशु हो, उस परिवार में विशेष रूप से यह उत्सव मनाया जाता है।
  • असम में इस दिन श्माघ बिहू्य या श्भोगाली बिहू्य हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाता है। असम में इसे फसल की कटाई का उत्सव माना जाता है। फसल की कटाई के पश्चात किसानों के खलिहानों में अनाज का ढेर एकत्र होता है, तब खुशी का इजहार करने के लिए सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।
  • बिहू से एक दिन पहले श्उरुका पर्व्य का आयोजन किया जाता है। रात श्मेजी्य या श्भेला घर्य (अलाव) जलाकर भोज का आयोजन किया जाता है। नृत्य-गीत के साथ रात्रिभर आनंदोत्सव मनाया जाता है। सवेरे सूर्याेदय से पूर्व सभी स्नान करते हैं। किसान इस पर्व पर बैलों को खास महत्त्व देते हैं। उनकी पूजा की जाती है तथा उन्हें जायकेदार भोजन दिया जाता है।
  • असम में श्बोडो समुदाय्य के लोग भी मकर संक्रांति के मौके पर श्दमाही पर्व्य का आयोजन करते हैं। इस मौके पर भांति-भांति के जायकेदार पकवान तैयार किए जाते हैं। युवा खुली जगह पर बैलागुर (अलाव) तैयार करते हैं जहां रात्रिभर नृत्य गीत का क्रम शुरू रहता है। सुबह सूर्याेदय से पहले सभी स्नान करते हैं।
  • दक्षिण भारत में दूध तथा चावल की खीर तैयार कर श्पोंगल्य या श्पाकोत्सव्य मनाया जाता है। तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश में इस अवसर पर तीन दिवसीय मंगल उत्सव धूमधाम के साथ मनाया जाता है। प्रथम दिन भोगी मंगल मनाया जाता है। यह पारिवारिक उत्सव होता है। सूर्य के नाम उत्सर्गित इस उत्सव के लिए लोग मंगल तैयार करते हैं। चावल, दूध तथा गुड़ से इससे तैयार किया जाता है। इस पकवान को सूर्य के नाम उत्सर्गित किया जाता है। तीसरे दिन मट्ट मंगल मनाया जाता है।
  • यह दिवस बैलों, गायों और भैसों के नाम अर्पित होता है। चूंकि भारतीय परंपरा में गाय पूजनीय मानी जाती है। वहीं बैल तथा भैंस के प्रति किसान कृतज्ञ होते हैं। इसलिए उनके प्रति कृतज्ञता भाव व्यक्त करने के लिए इस दिवस को मनाया जाता है। उनकी सींगों को साफ कर रंगीन बनाया जाता है। उनके गले में फूलों के हार पहनाए जाते हैं।
  • गुजरात और सौराष्ट्र में मकर संक्रांति को श्उत्तरायगण्य के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति को अंधकार पर प्रकाश की विजय के रूप में भी मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन सूर्य मकर राशि में पदार्पण करता है। मकर संक्रांति पर महिलाओं द्वारा हल्दी कुमकुम लगाने का रिवाज प्रचलित है।
  • कर्नाटक मेें मकर संक्रांति को फसल की कटाई के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोग एक-दूसरे को भुना हुआ तिल, चना, काजू, बादाम और सूखे नारियल भेंट करते हैं ताकि उनकी मैत्री और भी दृढ़ हो। इस मौके पर मवेशियों की अर्चना की जाती है। बैलों तथा भैंसों की शोभा यात्रा भी धूमधाम के साथ निकाली जाती है।
  • महाराष्ट्र में भी इस त्योहार को सद्भाव और भाई-चारे के पर्व के रूप में मनाया जाता है। लोग एक-दूसरे को तिल, गुड़ देते हैं। वहां इस मौके पर कहा जाता है, श्तिल-गुड़ लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए।्य
  • उड़ीसा में इस पर्व को श्बिशु्य कहते हैं। भारतीय पर्व संस्कृति मूल रूप से शाकाहारी संस्कृति है, क्योंकि उत्सव के मौके पर जो व्यंजन और दूसरे भोज्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं, वे अलग-अलग प्रांतों में शाकाहारी पदार्थ ही होते हैं।
  • इसके अतिरिक्त मवेशियों के प्रति दया और प्रेम की भावना से स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में सभी जीवों के प्रति करुणा और दया का दृष्टिकोण शुरू से ही अनुसरण किया जाता है।
  • इस प्रकार देश के भिन्न-भिन्न भागों में मकर संक्रांति को अनेक तरीके से मनाया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत विभिन्नताओं में एकता का देश है। संस्कृतियां अलग-अलग होने के बावजूद जनमानस आपस में एक सूत्र में बंधा हुआ है।
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