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चिंतन और मनन का पर्व मकर संक्रांति: Makar Sankranti Festival

08:00 AM Jan 13, 2023 IST | grehlakshmi hindi
चिंतन और मनन का पर्व मकर संक्रांति  makar sankranti festival
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Makar Sankranti Festival: मकर संक्रांति का दिन न केवल धार्मिक रूप से महतवपूर्ण है, अपितु वैज्ञानिक आधार पर भी काफी महत्व रखता है। इस दिन सूर्य का प्रकाश प्रत्यक्ष हम प्राणियों पर पड़ता है जिसका हमारी सेहत पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है इसलिए भारतीयों के लिए इस पर्व की बड़ी मान्यता है।

मकर संक्रांति के विषय में कोई एक बात कह पाना थोड़ा कठिन है क्योंकि ये पर्व धर्म विशेष न होकर, चिंतन-मनन एवम् परिश्रम का है। चूंकि, सूर्य के उत्तर दिशा की ओर गोचर होने से कई महत्वपूर्ण कार्य प्रारम्भ होते हैं। इस दिन सूर्य का प्रकाश धरती पर प्रत्यक्ष पड़ता है। इस कारणवश आलस्य और निद्रा का प्रभाव भी शरीर से कम होता चला जाता है। अतएव दिनांक 14 जनवरी भारतवासियों के लिए असाधारण रूप से महत्व रखती है। हालांकि, पिछले दो सालों से खरमास के कारण मकर संक्रांति दिनांक 15 को पड़ रही है।

Makar Sankranti Festival:क्या है खरमास

मकर संक्रांति का अर्थ सबसे पहले समझने की आवश्यकता है। सूर्य देव धनु राशि से जब मकर राशि पर आते हैं तो वह समय संक्रमण काल कहलाता है। सीधे अर्थों में एक विशेष अवधि से दूसरी अवधि या काल में जाना अथवा प्रवेश करना संक्रमण कहलाता है। वहीं इसके पहले का पूरा एक माह खरमास कहलाता है। ये खरमास तब भी आता है जब सूर्य देव मिथुन राशि से कर्क राशि पर प्रवेश करते हैं। उस समय सूर्य दक्षिणायन हो जाते हैं। दक्षिणायन को देवताओं का एक रात और उत्तरायण काल को एक दिन कहा जाता है। कहते हैं कि सूर्य को कभी न रूकने का आदेश है क्योंकि रथ के रुकने ही सृष्टि का विनाश निश्चित है। इस स्थिति में उनका रथ हमेशा एक ही गति में आगे बढ़ता चला जाता है। किन्तु भूख-प्यास के कारण जब उनके रथ के सात घोड़े थक जाते हैं तो सूर्य देव द्रवित होकर उन्हें विश्राम करने के लिए एक स्थान पर छोड़ देते हैं और उनके स्थान पर दो खर (गधा) सूर्य का रथ खींचते हैं। अनुमानतरू घोड़े की तुलना में खर की गति बहुत धीमी होती है इसलिए इस समय सूर्य का प्रकाश भी बहुत मद्धम होता है। वैज्ञानिक तौर पर भी देखा जाए तो सर्दियों में प्राणी बहुत सुस्त और आलस्य से भर जाता है। इस समय कई संक्रामक रोग होने की संभावना बढ़ है। सर्दियों के साथ जुलाई का महीना भी संक्रमण काल कहलाता है, इस समय भी कई तरह बैक्टीरियल इंफेक्शन होने का खतरा बना रहता है, जिसमें सर्दी, खांसी, हैजा, मलेरिया, टायफॉइड, खसरा और डेंगू होने का डर बना रहता है। शास्त्रों के अनुसार ये समय किसी भी शुभ कार्य के लिए उचित नहीं माना जाता है। यहां तक कि संसर्ग के लिए भी ये समय सही नहीं माना जाता है क्योंकि इस दौरान गर्भ में आने वाला भ्रूण आलसी और सुस्त पैदा होता है। 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास पूरा हो जाता है।

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सूर्य का दक्षिणायन और उत्तरायण होना

Makar Sankranti Festival
Makar Sankranti Festival 2023

जितनी रुचिकर खरमास की कथा है उतनी ही रोचक सूर्य के दक्षिणायन और उत्तरायण होने की कथा है। ऋषि-मुनियों का कहना है कि सूर्य का रथ छह माह दक्षिण की तरफ और छह माह उत्तर दिशा की ओर चलता है। अर्थात जनवरी से जून तक सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि में गोचर करते हैं और जुलाई से दिसंबर तक वे कर्क से धनु राशि की ओर बढ़ते हैं। इस काल को दक्षिणायण कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा में मृत्यु के देव यम का वास माना जाता है। शनि की ही भांति यम और यमुना सूर्य की संतानें हैं। जहां शनि और सूर्य में वैचारिक मतभेद रहते हैं वहीं सूर्य और यम में विचारों के ऐसा विभेद नहीं दिखाई देता है। वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि पूरे भारतवर्ष की राशि भी मकर है इसलिए यह देश कर्म प्रधान है। इस राशि का स्वामी शनि है और शनि न्याय के देवता हैं इसलिए सूर्य हैं उर्जा के स्रोत।
यदि ज्योतिष विज्ञान की बात की जाए तो उसके अनुसार सूर्य और चन्द्र ऐसे देवता हैं जिनके विषय में कहा जाता है कि ये साक्षात हैं। चंद्र मन के कारक हैं और सूर्य ऊर्जा के। किन्तु सूर्य की ऊर्जा दोनों में सबसे अधिक उपयोगी और जागृत है। यदि सूर्य का प्रकाश सभी को प्रभावित करना छोड़ दे तो जीवन नष्ट हो जाएगा। इसी कारणवश जब सूर्य दक्षिणायण होते हैं तो भारत में गर्मी कम होने लगती है, ठीक उसी तरह जब उत्तरायण होता है तो ठंड का असर कम होने लगता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि सूर्य, पृथ्वी के निकट आने लगता है, जिससे सर्दी कम होने लगती है और लोग ज्यादा सक्रिय एवम् कर्म प्रधान हो जाते हैं। अतरू इस खगोलीय परिवर्तन को हिन्दू पंचांग में उत्तरायणी, मकर संक्रांति, पोंगल आदि कई नामों से संबोधित किया जाता है।

किसानों का पर्व है मकर संक्रांति

उत्तरायणी भारतीय किसानों के लिए सबसे बड़ा दिन होता है क्योंकि इसके बाद से फसलें पकनी शुरू हो जाती हैं। तमिलनाडु में यह समय फसल कटाई का रहता है। 14 जनवरी से 18 जनवरी तक चलने वाले इस उत्सव को पोंगल या उत्तरायण पुण्यकालम कहा जाता है। यहां चावल, गन्ना और हल्दी की विशेष रूप से खेती होती है। इस दिन वे चावल, गुड़ और गन्ने से तैयार पकवान भगवान विष्णु को अर्पित करते हैं, जिसे ये लोग पोंगल कहते हैं। इसके साथ वे सूर्य भगवान को अघ्र्य देते हैं और इंद्र देवता को धन्यवाद कहते हैं कि उनकी कृपा से आज के बाद से फसलों को पर्याप्त सूर्य का प्रकाश और वर्षा मिलेगी। वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत में रबी की फसलें जैसे गेहूं, जौ, चना, मटर और सरसों के लिए इसके बाद उचित मौसम तैयार होने लगता है। अक्टूबर से दिसंबर माह के बीच इन की बुआई की जाती है और इन्हें पकने के लिए गर्म और शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है।

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उत्तरायणी के स्वास्थ्य लाभ

मकर संक्रांति के दिन कुम्भ में लोग गंगा स्नान करते हैं। कहते हैं कि इस दिन गंगा स्नान करने से आपके सात जन्म तर जाते हैं। वहीं वैज्ञानिक आधार पर कहें तो सूर्य के सीधे प्रकाश पड़ने से नदियों का पानी कीटाणुरहित हो जाता है इसलिए लोग इस दिन गंगा में स्नान करने के कई स्वास्थ्य लाभ है। त्वचा संबंधी समस्या दूर होती हैं। इसमें दो राय नहीं है कि मकर संक्रांति किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि सूर्य का उत्तरायण होना सभी के लिए फायदेमंद है।

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