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मनुष्य का परम धर्म - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jul 08, 2024 IST | Reena Yadav
मनुष्य का परम धर्म   मुंशी प्रेमचंद
manushy ka param dharm by munshi premchand
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होली का दिन है। लड्डू के भक्त और रसगुल्ले के प्रेमी पंडित मोटेराम शास्त्री अपने आंगन में एक टूटी खाट पर सिर झुकाए, चिंता और शोक की मूर्ति बने बैठे हैं। उनकी सहधर्मिणी उनके निकट बैठी हुई उनकी ओर सच्ची सहवेदजा की दृष्टि से ताक रही हैं और अपनी मृदु वाणी से पति की चिंता को शांत करने की चेष्टा कर रही है।

पंडितजी बहुत देर तक चिन्ता में डूबे रहने के पश्चात्- उदासीन भाव से बोले- नसीबा ससुरा न जाने कहीं जाकर सो गया। होली के दिन भी न जागा।

पंडिताइन- दिन ही बुरे आ गए हैं। इहां तो जौन दिन से तुम्हारा हुक्म पावा, ओही घड़ी ते साँझ-सबेरे दोनों जून सूरजनारायन से यही वरदान मांगा करित हैं कि कहूँ से बुलौवा आवै। सैकड़न दिया तुलसी माई का चढ़ाया, मुदा सब सोय गए। गाढ़ परे कोऊ काम नाहीं आवत है।

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मोटेराम- कुछ नहीं, ये देवी-देवता सब नाम के हैं। हमारे बखत पर काम आयें, तब हम जानें कि हैं कोई देवी-देवता। सेंत-मेंत में मालपुआ और हलुवा खाने वाले तो बहुत हैं।

पंडिताइन- का सहर-भर माँ अब कोऊ भलमनई नाहीं रहा? सब मरि गए?

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मोटेराम- सब मर गए, बल्कि सड़ गए। दस-पाँच हैं तो साल-भर में दो एक बार जीते हैं। वह भी बहुत हिम्मत की, तो रुपये की तीन सेर मिठाई खिला दी। मेरा बस चलता, तो इन सभी को सीधे कालेपानी भिजवा देता। यह सब इसी अरियासमाज की करनी है।

पंडिताइन- तुमहूँ तो घर माँ बैठे रहत हो। अब ई जमाने में कोई ऐसन दानी नहीं है कि घर बैठे नेवता भेज देय। कभूँ-कभूँ जुबाज लड़ा दिया करौ।

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मोटेराम- तुम कैसे जानती हो कि मैंने जबान नहीं लड़ाई? ऐसा कौन रईस इस शहर में है, जिसके यहां जाकर मैंने आशीर्वाद न दिया हो, मगर कौन ससुरा सुनता है। सब अपने-अपने रंग में मस्त हैं।

इतने में पंडित चिन्तामणि जी ने पदार्पण किया है। यह पंडित मोटेराम जी के परम मित्र थे। हां, अवस्था कुछ कम थी और उसी के अनुकूल उनकी तोंद भी कुछ उतनी प्रतिभाशाली न थी।

मोटेराम- कहो मित्र, क्या समाचार लाये? है कहीं डौल?

चिन्तामणि- डौल नहीं, अपना सिर है! अब वह नसीबा ही नहीं रहा।

मोटेराम- घर ही से आ रहे हो?

चिन्तामणि- भाई, हम तो साधू हो जायेंगे। जब इस जीवन में कोई सुख ही नहीं रहा, तो जीकर क्या करेंगे? अब बताओ कि आज के दिन उत्तम पदार्थ न मिले, तो कोई क्यों कर जिए।

मोटेराम- हाँ भाई, बात तो यथार्थ कहते हो।

चिन्तामणि- तो अब तुम्हारा किया कुछ न होगा? साफ-साफ कहो, हम संन्यास ले लें।

मोटेराम- नहीं मित्र, घबराओ मत। जानते नहीं हो, बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता। तर माल खाने के लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है। हमारी राय है कि चलो, इसी समय गंगातट पर चलें और वहाँ व्याख्यान दें। कौन जाने, किसी सज्जन की आत्मा जाग्रत हो जाये।

चिन्तामणि- हां, बात तो अच्छी है, चलो चलें।

दोनों सज्जन उठकर गंगाजी की ओर चले। प्रातःकाल था, सहस्त्रों मनुष्य स्नान कर रहे थे। कोई पाठ करता था। कितने ही लोग पंडों की चौकियों पर बैठे तिलक लगा रहे थे। कोई-कोई तो गीली धोती ही पहने घर जा रहे थे।

दोनों महात्माओं को देखते ही चारों तरफ से ‘नमस्कार’, ‘प्रणाम’ और ‘पालागन’ की आवाजें आने लगी। दोनों मित्र इन अभिवादनों का उत्तर देते गंगातट पर जा पहुँचे और स्नानादि में प्रवृत्त हो गए। तत्पश्चात् एक पंडे की चौकी पर भजन गाने लगे। यह एक ऐसी विचित्र घटना थी कि सैकड़ों आदमी कौतूहलवश आकर एकत्रित हो गए। जब श्रोताओं की संख्या कई सौ तक पहुँच गई, तो पंडित मोटेराम गौरवयुक्त भाव से बोले- सज्जनों, आपको ज्ञात है कि जब ब्रह्मा ने इस असार संसार की रचना की, तो ब्राह्मणों को अपने मुख से निकाला। किसी को इस विषय में शंका तो कहीं है? ‘

श्रोतागण- नहीं महाराज, आप सर्वथा सत्य कहते हो। आपको कौन काट सकता है?

मोटेराम-तो ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले, यह निश्चय है। इसलिए मुख मानव शरीर का श्रेष्ठतम भाग है। अतएव मुख को सुख पहुँचाना, प्रत्येक प्राणी का परम कर्तव्य है। है या नहीं? कोई काटता है हमारे वचन को? सामने आये। हम उसे शास्त्र का प्रमाण दे सकते हैं।

श्रोतागण- महाराज, आप ज्ञानी पुरुष हो। आपको काटने का साहस कौन कर सकता है?

मोटेराम- अच्छा, तो जब यह निश्चय हो गया कि मुख को सुख देना प्रत्येक प्राणी का परम धर्म है, तो क्या यह देखना कठिन है कि जो लोग मुख से विमुख हैं, वे दुःख के भागी हैं। कोई काटता है इस वचन को?

श्रोतागण- महाराज, आप धन्य हो, आप न्याय-शास्त्र के पंडित हो।

मोटेराम- अब प्रश्न यह होता है कि मुख को सुख कैसे दिया जाये? हम कहते हैं- जैसी तुममें श्रद्धा हो, जैसी तुममें सामर्थ्य हो। इसके अनेक प्रकार हैं। देवताओं के गुण गाओ, ईश्वर-वंदना करो, सत्संग करो और कठोर वचन न बोलो। इन बातों से सुख को सुख प्राप्त होगा। किसी को विपत्ति में देखो तो उसे ढाढस दो। इससे मुख को सुख होगा, किन्तु इस सब उपायों से श्रेष्ठ, सबसे उत्तम, सबसे उपयोगी एक और ही ढंग है। कोई आप में ऐसा है, जो उसे बतला दे? है, कोई बोले।

श्रोतागण- महाराज, आपके सम्मुख कौन मुँह खोल सकता है? आप ही बताने की कृपा कीजिए।

मोटेराम- अच्छा, तो हम चिल्लाकर, गला फाड़-फाड़कर कहते हैं कि वह इन सब विधियों से श्रेष्ठ हैं-उसी भांति, जैसे चन्द्रमा समस्त नक्षत्रों में श्रेष्ठ है। श्रोतागण-महाराज, अब विलम्ब न कीजिए। यह कौन-सी विधि है?

मोटेराम- अच्छा सुनिए, सावधान होकर सुनिए। वह विधि है मुख को उत्तम पदार्थों का भोजन करवाना, अच्छी-अच्छी वस्तु खिलाना। कोई काटता है हमारी बात को? आये, हम उसे वेद-मन्त्रों का प्रमाण दें।

एक मनुष्य ने शंका की-यह समझ में नहीं आता कि सत्य भाषण से मिष्ठ-भक्षण क्यों कर मुख के लिए अधिक सुखकारी हो सकता है?

कई मनुष्यों ने कहा- हाँ-हाँ हमें भी यही शंका है। महाराज, इस शंका का समाधान कीजिए।

मोटेराम- और किसी को कोई शंका है? हम बहुत प्रसन्न होकर उसका निवारण करेंगे। सज्जनों, आप पूछते हैं कि उत्तम पदार्थों का भोजन करना और कराना क्यों कर सत्य भाषण से अधिक सुखदायी है। मेरा उत्तर है कि पहला रूप प्रत्यक्ष है और दूसरा अप्रत्यक्ष। उदाहरण कल्पना कीजिए कि मैंने कोई अपराध किया। यदि हाकिम मुझे बुलाकर नम्रतापूर्वक समझाए कि पंडितजी, आपने यह अच्छा काम नहीं किया, आपको ऐसा उचित नहीं था, तो उसका यह दंड मुझे सुमार्ग पर लाने में सफल न होगा। सज्जनों, मैं ऋषि नहीं हूँ मैं दीन-हीन मायाजाल में फंसा हुआ प्राणी हूँ। मुझ पर इस दंड का कोई प्रभाव न होगा। मैं हाकिम के सामने से हटते ही फिर उसी कुमार्ग पर चलने लगूँगा। मेरी बात समझ में आती है? कोई उसे काटता है?

श्रोतागण- महाराज! आप विद्यासागर हो, आप पंडितों के भूषण हो। आप तो धन्य हैं।

मोटेराम- अच्छा, अब उसी उदाहरण पर फिर विचार करो। हाकिम ने बुलाकर तत्क्षण कारागार में डाल दिया और वहाँ मुझे नाना प्रकार के कष्ट दिए गए। अब जब मैं छूटूगां, तो बरसों तक यातनाओं की याद करता रहेगा और संभवतः कुमार्ग को त्याग दूँगा। आप पूछेंगे, ऐसा क्यों है? दंड दोनों ही हैं, तो क्यों एक का प्रभाव पड़ता है और दूसरे का नहीं? इसका कारण यही है कि एक का रूप प्रत्यक्ष है और दूसरे का गुप्त। समझे आप लोग?

श्रोतागण- धन्य हो कृपानिधान! आपको ईश्वर ने बड़ी बुद्धि-सामर्थ्य दी है।

मोटेराम- अच्छा, तो अब आपका प्रश्न होता है उत्तम पदार्थ किसे कहते हैं? मैं इसकी विवेचना करता हूँ। जैसे भगवान् ये नाना प्रकार के रंग नेत्रों के विनोदार्थ बनाए, उसी प्रकार मुख के लिए भी अनेक रसों की रचना की, किन्तु इन समस्त रसों में श्रेष्ठ कौन है? यह अपनी-अपनी रुचि है। देवतागण इसी रस पर सम्मुख होते हैं, यहाँ तक कि सच्चिदानंद, सर्वशक्तिमान् भगवान को भी मिष्ठ पाकों ही से अधिक रुचि हैं। कोई ऐसे देवता का नाम बता सकता है, जो नमकीनजन्मकील वस्तुओं को ग्रहण करता हो? है, जो कोई ऐसी एक भी दिव्य ज्योति का नाम बता सके? कोई नहीं है। इसी भांति खट्टे, कड़वे और चरपरे, कसैले पदार्थों से देवताओं को भी प्रीति नहीं है।

श्रोतागण- महाराज, आपकी बुद्धि अपरम्पार है।

मोटेराम- तो यह सिद्ध हो गया कि मीठा पदार्थ सब पदार्थों में श्रेष्ठ हैं। अब आपका पुनः प्रश्न उठता है कि क्या समग्र मीठी वस्तुओं से मुख को समान आनन्द प्राप्त होता है। यदि मैं कह दूँ हां, तो आप चिल्ला उठोगे कि पंडितजी तुम बावले हो, इसलिए मैं कहूंगा, ‘नहीं’ और बारम्बार ‘नहीं’। सब मीठे पदार्थ समान रोचकता नहीं रखते। गुड और चीनी में बहुत भेद है। इसलिए मुख को सुख देने के लिए हमारा परम कर्तव्य है कि हम उत्तम-से-उत्तम मिष्ठ पाकों का सेवन करें और कराएँ। मेरा अपना विचार है कि यदि आपके थाल में जौनपुर की इमरतियां, आगरे के मोतीचूर, मथुरा के पेड़े, बनारस की कलाकंद, लखनऊ के रसगुल्ले, अयोध्या के गुलाब-जामुन और दिल्ली का हलुआ-सोहन हों, तो वह ईश्वर-भोग के योग्य हैं। देवतागण उस पर मुग्ध हो जाएँगे। और जो साहसी, पराक्रमी जीव ऐसे स्वादिष्ट थाल ब्राह्मणों को जिमाएगा, उसे सदेह स्वर्गधाम प्राप्त होगा। यदि आपको श्रद्धा है, तो हम आपसे अनुरोध करेंगे कि अपना धर्म अवश्य पालन कीजिए, नहीं तो मनुष्य बनने का नाम न लीजिए।

पंडित मोटेराम का भाषण समाप्त हो गया। तालियाँ बजने लगी। कुछ सज्जनों जे इस काल-वर्षा और धर्मोपदेश से मुग्ध होकर उन पर फूलों की वर्षा की। तब पंडित चिन्तामणि ने अपनी वाणी को विभूषित किया-

‘सज्जनों, आपने मेरे परम मित्र पंडित मोटेरामजी का प्रभावशाली व्याख्यान सुना और मेरे खड़े होने की आवश्यकता न थी, परन्तु जहाँ मैं उनसे और सभी विषयों में सहमत हूँ वहाँ उनसे मुझे थोड़ा मतभेद भी है। मेरे विचार में यदि आपके थाल में केवल जौनपुर की इमरतियाँ हों, तो यह पंचमेल मिठाइयों से कहीं सुखवर्द्धक, कहीं स्वादपूर्ण और कहीं कल्याणकारी होगा। इसे मैं शास्त्रोक्त सिद्ध कर सकता हूं।’

मोटेरामजी ने सरोष होकर कहा- तुम्हारी यह कल्पना मिथ्या है। आगरे के मोतीचूर और दिल्ली के हलुवा-सोहन के सामने जौनपुर की इमरतियों की तो कोई गणना ही नहीं है।

चिन्तामणि- प्रमाण से सिद्ध कीजिए।

मोटेराम- प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण?

चिन्तामणि-यह तुम्हारी मूर्खता है।

मोटेराम- तुम जन्म-भर खाते ही रहे, किन्तु खाना न आया।

इस पर चिन्तामणि ने अपनी आसनी मोटेराम पर चलाई। शास्त्री जी ने वार खाली कर दिया और चिन्तामणि की ओर मस्त हाथी के समान झपटे, किन्तु उपस्थित सज्जनों ने दोनों महात्माओं को अलग-अलग कर दिया।

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