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मुक्तिधन - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jul 01, 2024 IST | Reena Yadav
मुक्तिधन   मुंशी प्रेमचंद
Muktidhan by munshi premchand
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भारतवर्ष में जितने व्यवसाय हैं, उन सबमें लेन-देन का व्यवसाय सबसे लाभदायक है। आम तौर पर सूद की दर 25 रु. सैकड़ा सालाना है। प्रचुर स्थावर या जंगम सम्पत्ति पर 12 रु. सैकड़े सालाना सूद लिया जाता है। इससे कम ब्याज पर रुपया मिलना प्रायः असंभव है। बहुत कम ऐसे व्यवसाय हैं, जिनमें 15 रु. सैकड़े से अधिक लाभ हो और वह भी बिना किसी झंझट के। उस पर नजराने की रकम अलग, लिखाई अलग, दलाली अलग, अदालत का खर्चा अलग। ये सब रकम भी किसी-न-किसी तरह महाजन ही की जेब में जाती हैं। यही कारण है कि यहाँ लेन-देन का धंधा इतनी तरक्की पर है। वकील, डॉक्टर, सरकारी कर्मचारी, जमींदार, कोई भी, जिसके पास कुछ फालतू धन हो, वह व्यवसाय कर सकता है। अपनी पूँजी के सदुपयोग का यह सर्वोत्तम साधन है।

लाला दाऊदयाल भी इसी श्रेणी के महाजन थे। वह कचहरी में मुख्तारगिरी करते थे और जो कुछ बचत होती थी, उसे 25-30 रुपये सैकड़ा वार्षिक ब्याज पर उठा देते थे। उनका व्यवहार अधिकतर निम्न श्रेणी के मनुष्यों से ही रहता था। उच्च वर्ण वालों से वह चौकन्ने रहते थे, उन्हें अपने यहाँ फटकने ही न देते थे। उनका कहना था (और प्रत्येक व्यवसायी पुरुष उसका समर्थन करता है) कि ब्राह्मण, क्षत्रिय या कायस्थ को रुपये देने से यह कहीं अच्छा है कि रुपया कुएँ में डाल दिया जाये। इनके पास रुपये लेते समय तो अतुल सम्पत्ति होती है, लेकिन रुपये हाथ में आते ही वह सारी सम्पत्ति गायब हो जाती है। उस पर पत्नी, पुत्र या भाई का अधिकार हो जाता है अथवा यह प्रकट होता है कि उस सम्पत्ति का अस्तित्व ही न था। इनकी कानूनी व्यवस्थाओं के सामने बड़े-बड़े नीतिशास्त्र के विद्वान् भी मुँह की आ जाते हैं।

लाला दाऊदयाल एक दिन कचहरी से घर आ रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक विचित्र घटना देखी। एक मुसलमान खड़ा अपनी गाय बेच रहा था, और कई आदमी उसे घेरे खड़े थे। कोई उसके हाथ में रुपये रखे देता था, कोई उसके हाथ से गाय की पगहा छीनने की चेष्टा करता था, किन्तु वह गरीब मुसलमान एक बार उन ग्राहकों के मुँह की ओर देखता था और कुछ सोचकर पगहा को और भी सख्ती से पकड़ लेता था। गाय मोहिनी-रूप थी। छोटी-सी गर्दन, भारी पुट्ठे और दूध से भरे हुए थन थे। पास ही एक सुन्दर, बलिष्ठ बछड़ा गाय की गर्दन से लगा हुआ खड़ा था। मुसलमान बहुत क्षुब्ध और दुःखी मालूम होता था। वह करुण नेत्रों से गाय की ओर देखता और दिल मसोस कर रह जाता था। दाऊदयाल गाय को देखकर रीझ गए। पूछा- क्यों जी, यह गाय बेचते हो? क्या नाम है तुम्हारा? मुसलमान ने दाऊदयाल को देखा, तो प्रसन्नमुख उनके समीप जाकर बोला-, ही हुजूर, बेचता हूँ।

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दाऊदयाल- कहां से लाये हो? तुम्हारा नाम क्या है?

मुसलमान- नाम तो है रहमान। पचौली में रहता हूँ।

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दाऊ- दूध देती है?

मुसलमान- हां हुजूर, एक बेला में तीन सेर दुह लीजिए। अभी दूसरा ही तो बेला है। इतनी सीधी है कि बच्चा भी दुह ले। बच्चे पैर के पास खेलते रहते हैं, पर क्या मजाल कि सिर भी हिला दे।

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दाऊ- कोई तुम्हें यहाँ पहचानता है?

मुख्तार- साहब को शुबहा हुआ कि कहीं चोरी का माल न हो।

मुसलमान- नहीं हुजूर, गरीब आदमी हूँ, मेरी किसी से जान-पहचान नहीं है।

दाऊ- क्या दाम माँगते हो?

रहमान ने 50 रुपए बतलाए। मुख्तार साहब को 30 रु. का माल जंचा। कुछ देर तक दोनों ओर से मोल-भाव होता रहा। एक को रुपयों की गरज थी और दूसरे को गाय की चाह। सौदा पटने में कोई कोताही न हुई। 35 रु. पर सौदा तय हो गया।

रहमान ने सौदा तो चुका लिया, पर अब भी वह मोह के बंधन में पड़ा हुआ था। कुछ देर तक सोच में डूबा खड़ा रहा, फिर गाय को लिये मंद गति से दाऊदयाल के पीछे-पीछे चला। तब एक आदमी ने कहा- अबे हम 36 रु. देते हैं। हमारे साथ चल।

रहमान- नहीं देते तुम्हें, क्या कुछ जबरदस्ती है?

दूसरे आदमी ने कहा- हमसे 40 रु. ले ले, अब तो खुश हुआ।

यह कहकर उसने रहमान के हाथ से गाय को ले लेना चाहा, मगर रहमान ने हामी न भरी। आखिर उन सबने निराश होकर अपनी राह ली।

रहमान जब जरा दूर निकल आया, तो दाऊदयाल से बोला- हुजूर, आप हिन्दू, हैं, इसे लेकर आप पालेंगे, इसकी सेवा करेंगे। ये सब कसाई हैं, इनके हाथ मैं 50 रु. की भी कभी न बेचता। आप बड़े मौके से आ गए, नहीं तो ये सब जबरदस्ती गाय को छीन ले जाते। बड़ी विपत्ति में पड़ गया हूँ सरकार, तब यह गाय बेचने निकला हूं। नहीं तो घर की इस लक्ष्मी को कभी न बेचता। इसे अपने हाथों से पाला-पोसा है। कसाइयों के हाथ कैसे बेच देता? सरकार इसे जितनी ही खली देंगे, उतना ही यह दूध देगी। भैंस का दूध भी इतना मीठा और गाढ़ा नहीं होता। हुजूर से एक अरज और है, अपने चरवाहे को डाँट दीजिएगा कि इसे मारे-पीटे नहीं।

दाऊदयाल ने चकित होकर रहमान की ओर देखा। भगवान! इस श्रेणी के मनुष्य में भी इतना सौजन्य, इतनी सहृदयता है! यहाँ तो बड़े-बड़े तिलक- त्रिपुण्डधारी महात्मा कसाइयों के हाथ गायों को बेच जाते हैं, एक पैसे का घाटा भी नहीं उठाना चाहते। और यह गरीब 5 रु. का घाटा सहकर इसलिए मेरे हाथ गाय बेच रहा है कि यह किसी कसाई के हाथ न पड़ जाये। गरीबों में भी इतनी समझ हो सकती है।

उन्होंने घर आकर रहमान को रुपये दिये। रहमान ने रुपये गाँठ में बाँधे, एक बार फिर गाय को प्रेम-भरी आँखों से देखा और दाऊदयाल को सलाम करके चला गया।

रहमान एक गरीब किसान था और गरीब के सभी दुश्मन होते हैं। जमींदार ने इजाफा-लगान का दावा दायर किया था। उसी की जवाबदेही करने के लिए रुपयों की जरूरत थी। घर में बैलों के सिवा और कोई सम्पत्ति न थी। यह इस गाय को प्राणों से भी प्रिय समझता था, पर रुपयों की कोई तदवीर न हो सकी, तो विवश होकर गाय बेचनी पड़ी।

पचौली में मुसलमानों के कई घर थे। अबकी कई साल के बाद हज का रास्ता खुला था। पाश्चात्य महासमर के दिनों में राह बंद थी। गाँव के कितने ही स्त्री- पुरुष हज करने चले। रहमान की माता भी हज के लिए तैयार हुई। रहमान बोली- बेटा, इतना सवाब करो। बस, मेरे दिल में यही एक अरमान बाकी है। इस अरमान को लिये हुए क्यों दुनिया से जाऊँ, खुदा तुमको इस नेकी की सजा (फल) देगा। मातृ-भक्ति ग्रामीणों का विशिष्ट गुण है। रहमान के पास इतने रुपये कहां थे कि हज के लिए काफी होते, पर माता की आज्ञा कैसे टालता? सोचने लगा,. किसी से उधार ले लूँ। कुछ अबकी ऊख पर फेर कर दे दूँगा, कुछ, अगले साल चुका दूँगा। अल्लाह के फजल से ऊख ऐसी हुई है कि कभी न हुई थी। यह माँ की दुआ ही का असर है। मगर किससे लूँ? कम से कम 200 रु. हों, तो काम चले। किसी महाजन से जान-पहचान भी तो नहीं है। यहाँ जो दो-एक बनिये लेन- देन करते हैं, वे तो असामियों की गर्दन ही रेतते हैं। चलूँ लाला दाख्वयाल के पास। इन सबसे तो वही अच्छे हैं। सुना है, वादे पर रुपये लेते हैं, किसी तरह नहीं छोड़ते । लोनी चाहे दीवार को छोड़ दे, दीमक चाहे लकड़ी को छोड़ दे, पर वादे पर रुपये न मिले, तो वह असामियों को नहीं छोड़ते। बात पीछे करते हैं, नालिश पहले। हां, इतना है कि असामियों की आँख में धूल नहीं झोंकते, हिसाब- किताब साफ रखते हैं। कई दिन वह इसी सोच-विचार में पड़ा रहा कि उनके पास जाऊँ या न जाऊँ। अगर कहीं वादे पर रुपये न पहुँचे, तो बिना नालिश किए न मानेंगे। घर-बार, बैल-बछिया, सब नीलाम करा लेंगे। लेकिन जब कोई वश न चला, तो हारकर दाऊदयाल के ही पास गया और रुपये कर्ज माँगे।

दाऊ- तुम्हीं ने तो मेरे हाथ गाय बेची थी न?

रहमान- हाँ हुजूर!

दाऊ- रुपये तो तुम्हें दे दूँगा, लेकिन मैं वादे पर रुपये लेता हूँ। अगर वादा पूरा न किया, तो तुम जानो। फिर मैं जरा भी रिआयत न करूंगा। बताओ, कब दोगे?

रहमान ने मन में हिसाब लगाकर कहा-सरकार, दो साल की मियाद रख ले।

दाऊ-अगर दो साल में न दोगे, तो ब्याज की दर 32 रु. सैकड़े हो जायेगी। तुम्हारे साथ इतनी सहूलियत करूंगा कि नालिश न करूंगा।

रहमान- जो चाहे कीजिएगा। हुजूर के हाथ में ही तो हूँ।

रहमान को 200 रु. के 180 रु. मिले। कुछ लिखाई कट गई, कुछ नजराना निकल गया, कुछ दलाली में आ गया। घर आया थोड़ा-सा गुड़ रखा हुआ था। उसे बेचा और स्त्री को समझा-बुझाकर माता के साथ हज को चला।

मियाद गुजर जाने पर लाला दाऊदयाल ने तकाजा किया। एक आदमी रहमान के घर भेजकर उसे बुलाया और कठोर स्वर से बोले- क्या अभी दो साल नहीं पूरे हुए। लाओ, रुपये कहाँ हैं?

रहमान ने बड़े दीन भाव से कहा- हुजूर, बड़ी गर्दिश में हूँ। अम्मा जब से हज करके आयी हैं, तभी से बीमार पड़ी हुई हैं। रात-दिन उन्हीं की दवा-दारू में दौड़ते गुजरता है। जब तक जीती हैं, हुजूर सेवा कर लूँ। पेट का धंधा तो जिन्दगी- भर लगा रहेगा। अबकी कुछ फसल नहीं हुई हुजूर। ऊख पानी बिना सूख गई। सन खेत में पड़े-पड़े सूख गया। ढोने की मोहलत न मिली। रबी के लिए खेत जोत न सका, परती पड़े हुए हैं। अल्लाह ही जानता है, किस मुसीबत से दिन कट रहे हैं। हुजूर के रुपये कौड़ी-कौड़ी अदा करूंगा, साल-भर की और मोहलत दीजिए। अम्मा अच्छी हुई और मेरे सिर से बला टली।

दाऊदयास ने कहा- 32 रु. सैकड़े ब्याज हो जायेगा।

रहमान ने जवाब दिया- जैसी हुजूर की मरजी।

रहमान यह वादा करके घर आया तो देखा, माँ का अन्तिम समय आ पहुँचा है। प्राण-पीड़ा हो रही है। दर्शन बदे थे, सो हो गए। माँ ने बेटे को एक बार वात्सल्य दृष्टि से देखा, आशीर्वाद दिया और परलोक सिधारी। रहमान अब तक गर्दन तक पानी में था, अब पानी सिर पर आ गया।

इस वक्त पड़ोसियों से कुछ उधार लेकर दफन-कफन का प्रबंध किया, किन्तु मृत आत्मा की शान्ति और परितोष के लिए जकात और फातिहे की जरूरत थी, कब्र बनवानी जरूरी थी, बिरादरी का खाना, गरीबों को खैरात, कुरान की तलावत और ऐसे कितने ही संस्कार करने परमावश्यक थे।

मातृ-सेवा का इसके सिवा अब और कौन-सा अवसर हाथ आ सकता था। माता के प्रति समस्त सांसारिक और धार्मिक कर्तव्यों का अंत हो रहा था। फिर तो माता की स्मृति-मात्र रह जायेगी, संकट के समय फरियाद सुनाने के लिए! मुझे खुदा ने सामर्थ्य दी होती, तो इस वक्त क्या कुछ न करता, लेकिन अब क्या अपने पड़ोसियों से भी गया-गुजरा हूँ।

उसने सोचना शुरू किया, रुपये लाऊँ कहां से? अब तो लाला दाऊदयाल भी न देंगे। एक बार उनके पास जाकर देखूँ तो सही, कौन जाने, मेरी विपत्ति का हाल सुनकर उन्हें दया आ जाये। बड़े आदमी हैं, कृपा-दृष्टि हो गई, तो सौ- दो-सौ उनके लिए कौन बड़ी बात है।

इस भांति मन में सोच-विचार करता हुआ यह लाला दाऊदयाल के पास चला। रास्ते में एक-एक कदम मुश्किल से उठता था। कौन मुँह लेकर जाऊँ? अभी तीन ही दिन हुए हैं, साल-भर में पिछले रुपये अदा करने का वादा करके आया हूँ। अब जो 200 रु. और मागूंगा, तो वह क्या कहेंगे। मैं ही उनकी जगह पर होता, तो कभी न देता। उन्हें जरूर सन्देह होगा कि यह आदमी नीयत का बुरा है। कहीं दुत्कार दिया, घुड़कियाँ दीं, तो? पूछें, तेरे पास ऐसी कौन-सी बड़ी जायदाद, जिस पर रुपये की थैली दे दूँ तो क्या जवाब दूँगा? जो जायदाद है, वह यही दोनों हाथ हैं। इसके सिवा यहाँ क्या है? घर को कोई सेंत भी न पूछेगा। खेत है, तो जमींदार के, उन पर अपना कोई काबू ही नहीं। बेकार जा रहा हूँ। वहाँ धक्के खाकर निकलना पड़ेगा, रही-सही आबरू भी मिट्टी में मिल जायेगी।

परन्तु इन निराशाजनक शंकाओं के होने पर भी वह धीरे-धीरे आगे चला जाता था, जैसे कोई अनाथ विधवा थाने फ़रियाद करने जा रही हो।

लाला दाऊदयाल कचहरी से आकर अपने स्वभाव के अनुसार नौकरों पर बिगड़ रहे थे- द्वार पर पानी क्यों नहीं छिड़का, बरामदे में कुर्सियाँ क्यों नहीं निकाल रखीं? इतने में रहमान सामने जाकर खड़ा हो गया।

लाला साहब झल्लाए तो बैठे थे, रुष्ट होकर बोले- तुम क्या करने आये हो जी? क्यों मेरे पीछे पड़े हो? मुझे इस वक्त बातचीत करने की फुरसत नहीं

रहमान कुछ न बोल सका। वह डाँट सुनकर इतना हताश हुआ कि उलटे पैरों लौट पड़ा। हुई न वही बात! यही सुनने तो मैं आया था। मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे।

दाऊदयाल को कुछ दया आ गई। जब रहमान बरामदे के नीचे उतर गया, तो बुलाया। जरा नर्म होकर बोले- कैसे आये थे जी, क्या कुछ काम था?

रहमान- जी हां सरकार, यों ही सलाम करने चला आया था।

दाऊदयाल- एक कहावत है-’सलामे रोस्ताई बेगरज नेस्त’-किसान बिना मतलब के सलाम नहीं करता। क्या मतलब है, कहो।

रहमान फूट-फूट कर रोने लगा। दाऊदयाल ने अटकल से समझ लिया। इसकी माँ मर गई। पूछा--क्यों रहमान, तुम्हारी माँ सिधार तो नहीं गई?

रहमान- हाँ हुजूर, आज तीसरा दिन है।

दाऊदयास- रो न, रोने से क्या फायदा? सब्र करो, ईश्वर को मंजूर था, वह हुआ। ऐसी मौत पर राज न करना चाहिए। तुम्हारे हाथों उनकी मिट्टी ठिकाने लग गई। अब और क्या चाहिए।

रहमान- हुजूर, कुछ अर्ज करने आया हूँ मगर हिम्मत नहीं पड़ती। अभी पिछला ही पड़ा हुआ है, अब और किस मुँह मांगू? लेकिन अल्लाह जानता है, कहीं से एक पैसा मिलने की उम्मीद नहीं और काम ऐसा आ पड़ा है कि अगर न करूँ, तो जिंदगी-भर पछतावा रहेगा। आपसे कुछ कह नहीं सकता। आगे आप मालिक हैं। यह समझकर दीजिए कि कुएँ में डाल रहा हूँ। जिंदा रहूँगा तो एक- एक कौड़ी मय सूद के अदा कर दूँगा । मगर इस घड़ी नहीं न कीजिएगा।

दाऊ- तीन सौ तो हो गए। दो सौ फिर माँगते हो। दो साल में कोई सात सौ रुपये हो जायेंगे। इसकी खबर है या नहीं?

रहमान- गरीबपरवर! अल्लाह दे, तो दो बीघे ऊख में पाँच सौ आ सकते हैं। अल्लाह ने चाहा, तो मियाद के अंदर आपकी कौड़ी-कौड़ी अदा कर दूँगा। दाऊदयाल ने दो-सौ रुपये फिर दे दिये। जो लोग उनके व्यवहार से परिचित थे, उन्हें उनकी इस रिआयत पर बड़ा आश्चर्य होता था।

खेती की हालत अनाथ बालक की-सी है। जल और वायु अनुकूल हुए तो अनाज के ढेर लग गए। इनकी कृपा न हुई, तो लहलहाते हुए खेत कपटी मित्र की भांति दगा दे गए। ओला और पाला, सूखा और बाढ़, टिड्डी और लाही, दीमक और आँधी से प्राण बचे, तो फसल खलिहान में आयी। और खलिहान से आग और बिजली दोनों ही का बैर है। इतने दुश्मनों से बची तो फसल, नहीं तो फैसला? रहमान ने कलेजा तोड़कर मेहनत की। दिन को दिन और रात को रात न समझा। बीवी-बच्चे दिलोजान से लिपट गए। ऐसी ऊख लगी कि हाथी घुसे, तो समा जाये। सारा गाँव दांतों उँगली दबाता था। लोग रहमान से कहते - यार, अबकी तुम्हारे पौ-बारह हैं। हारे दर्जे सात सौ कहीं नहीं गए। अबकी बेड़ा पार है। रहमान सोचा करता, अबकी ज्यों ही गुड़ के रुपये हाथ आये, सब-के-सब ले जाकर लाला दाऊदयाल के कदमों पर रख दूँगा। अगर वह उसमें से खुद दो-चार रुपये निकालकर देंगे, तो में लूँगा, नहीं तो अबकी साल और चूनी-चाकर खाकर काट दूँगा।

मगर भाग्य के लिखे की कौन मिटा सकता है? अगहन का महीना था, रहमान खेत की मेड़ पर बैठा रखवाली कर रहा था। ओढ़ने को केवल एक पुरानी गाढ़े की चादर थी, इसलिए ऊख के पत्ते जला दिये थे। सहसा हवा का एक ऐसा झोंका आया कि जलते हुए पत्ते उड़कर खेत में जा पहुँचे। आग लग गई। गाँव के लोग आग बुझाने दौड़े, मगर आग की लपटें टूटते तारों की भांति खेत के एक हिस्से से उड़कर दूसरे सिर पर जा पहुँचती थीं, सारे उपाय व्यर्थ हुए। पूरा खेत जलकर राख का ढेर हो गया, और खेत के साथ ही रहमान की सारी अभिलाषाएँ नष्ट-भ्रष्ट हो गईं। गरीब की कमर टूट गई। दिल बैठ गया। हाथ-पाँव ढीले हो गए। परोसी हुई थाली सामने से छिन गई। घर आया, तो दाऊदयाल के रुपयों की फिक्र सिर पर सवार हुई। अपनी कुछ फिक्र न थी। बाल-बच्चों की भी फिक्र न थी। भूखों मरना और नंगे रहना तो किसान का काम ही है। फिक्र थी, कर्ज की। दूसरा साल बीत रहा है। दो-चार दिन में लाला दाऊदयाल का आदमी आता होगा। उसे कौन मुँह दिखाऊंगा? चलकर उन्हीं से चिरौरी करूँ कि साल-भर की मोहलत और दीजिए। लेकिन साल-भर में तो सात सौ के नौ सौ हो जावेंगे। कहीं नालिश कर दी, तो हजार ही समझो। साल-भर में ऐसी क्या हुर बरस जायेगी। बेचारे कितने भले आदमी हैं, दो सौ रुपये उठाकर दे दिये। खेत भी तो ऐसे नहीं कि बै-रिहन करके आबरू बचाऊँ। बैल भी ऐसे कौन-से तैयार हैं कि दो-चार सौ मिल जाये। आधे भी तो नहीं रहे। अब इज्जत खुदा के हाथ है। मैं तो अपनी- सी करके देख चुका।

सुबह का वक्त था। वह अपने खेत की मेड़ पर खड़ा अपनी तबाही का दृश्य देख रहा था। देखा, दाऊदयाल का चपरासी कंधे पर लाठी रखे चला आ रहा है। प्राण सूख गए। खुदा, अब तू ही इस मुश्किल को आसान कर। कहीं आते- ही-आते गालियाँ न देने लगे। या मेरे अल्लाह! कहीं छिप जाऊँ?

चपरासी ले समीप आकर कहा-रुपये लेकर देजा नहीं चाहते? मियाद कल गुजर गई। जानते हो न सरकार को? एक दिन की भी देर हुई और उन्होंने नालिश ठोकी। बेभाव की पड़ेगी।

रहमान काँप उठा। बोला- यहाँ का हाल तो देख रहे हो न?

चपरासी-यहाँ हाल-हवाल सुनने का काम नहीं। ये चकमे किसी और को देना। सात सौ रुपये ले चलो और चुपके से गिनकर चले आओ।

रहमान- जमींदार, सारी ऊख जल गई। अल्लाह जानता है, अबकी कौड़ी- काड़ी बेवाक कर देता।

चपरासी- मैं यह कुछ नहीं जानता। तुम्हारी ऊख का किसी ने ठेका नहीं लिया। अभी चलो। सरकार बुला रहे हैं।

यह कहकर चपरासी उसका हाथ पकड़कर घसीटता हुआ चला। गरीब को घर में जाकर पगड़ी बाँधने का मौका न दिया।

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पाँच कोस रास्ता कट गया, और रहमान ने एक-बार भी सिर न उठाया, बस, रह-रहकर ‘या अली मुश्किलकुशा’ उसके मुँह से निकल जाता था। उसे अब इसी नाम का भरोसा था। वही जप हिम्मत को सँभाले हुए था, नहीं तो शायद वह यहीं गिर पड़ता। वह नैराश्य की उस दशा को पहुँच गया था, जब मनुष्य की चेतना नहीं, उपचेतना उसका शासन करती है।

दाऊदयाल द्वार पर टहल रहे थे। रहमान जाकर उनके कदमों पर गिर पड़ा और बोला-खुदावंद, बड़ी विपत्त पड़ी हुई है। अल्लाह जानता है, कहीं का नहीं रहा!

दाऊ- क्या सब ऊख जल गई?

रहमान- हुजूर सुन चुके हैं क्या? सरकार, जैसे किसी ने खेत में झाडू लगा दी हो। गाँव के ऊपर ऊख लगी हुई थी गरीबपरवर, यह दैवी आफत न पड़ी होती, तो और तो नहीं कह सकता, हुजूर से उरिन हो जाता।

दाऊ- अब क्या सलाह है? देते हो कि नालिश ही कर दूँ?

रहमान- हुजूर मालिक हैं, जो चाहे करें। मैं तो इतना ही जानता हूँ कि हुजूर के रुपये सिर पर हैं और मुझे कौड़ी-कौड़ी देनी है। अपनी सोची नहीं होती। दो बार वादे किए, दोनों बार झूठा पड़ा। अब वादा न करूंगा, जब जो कुछ मिलेगा, लाकर हुजूर के कदमों पर रख दूँगा । मेहनत-मजूरी से, पेट और तन काटकर, जिस तरह हो सकेगा, आपके रुपये भरूंगा।

दाऊदयाल ने मुस्कुराकर कहा- तुम्हारे मन में इस वक्त सबसे बड़ी कौन- सी आरजू है?

रहमान- यही हुजूर, कि आपके रुपये अदा हो जायें। सच कहता हूँ हुजूर, अल्लाह जानता है।

दाऊ- अच्छा, तो समझ लो कि मेरे रुपये अदा हो गए।

रहमाज- अरे हुजूर, यह कैसे समझ लूँ! यहाँ न दूंगा, तो वहाँ तो देने पड़ेंगे।

दाऊ- नहीं रहमान, अब इसकी फिक्र मत करो। मैं तुम्हें आजमाता था।

रहमान- सरकार, ऐसा न कहें। इतना बोझ सिर पर लेकर न मरूंगा।

दाऊ- कैसा बोझ जी, मेरा तुम्हारे ऊपर कुछ आता ही नहीं। अगर कुछ आता भी हो, तो मैंने माफ कर दिया, यहाँ भी, वहाँ भी। अब तुम मेरे एक पैसे के भी देनदार नहीं हो। असल में मैंने तुमसे जो कर्ज लिया था, वही अदा कर रहा हूँ। मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ तुम मेरे कर्जदार कहीं हो। तुम्हारी गाय अब तक मेरे पास है। उसने मुझे कम-से-कम आठ सौ रुपये का दूध दिया है! दो बछड़े नफे में अलग। अगर तुमने यह गाय कसाइयों को दे दी होती, तो मुझे इतना फायदा क्यों कर होता? तुमने उस वक्त पाँच रुपये का नुकसान उठाकर गाय मेरे हाथ बेची थी। वह शराफत मुझे याद है। उस एहसान का बदला चुकाना मेरी ताकत से बाहर है। जब तुम इतने गरीब और नादान होकर एक गाय की जान के लिए पाँच रुपये का नुकसान उठा सकते हो, तो मैं तुम्हारी सौगुनी हैसियत रख कर अगर चार-पाँच सौ रुपये माफ कर देता हूँ तो कोई बड़ा काम नहीं कर रहा हूँ। तुमने भले ही जानकर मेरे ऊपर कोई एहसान न किया हो, पर असल में वह मेरे धर्म पर एहसान था। मैंने भी तो तुम्हें धर्म के काम ही के लिए रुपये दिये थे। बस, हम-तुम दोनों बराबर हो गए। तुम्हारे दोनों बछड़े मेरे यहाँ हैं, जी चाहे लेते जाओ, तुम्हारी खेती के काम आएँगे। तुम सीधे और शरीफ आदमी हो, मैं तुम्हारी मदद करने को हमेशा तैयार रहूँगा। इस वक्त भी तुम्हें रुपयों की जरूरत हो, तो जितने चाहो, ले सकते हो।

रहमान को ऐसा मालूम हुआ कि उसके सामने कोई फरिश्ता बैठा हुआ है। मनुष्य उदार हो, तो फरिश्ता है, और नीच हो, तो शैतान। ये दोनों मानवी वृत्तियों ही के नाम हैं। रहमान के मुँह से धन्यवाद के शब्द भी न निकल सके। बड़ी मुश्किल से आँसुओं को रोककर बोला-हुजूर को इस नेकी का बदला खुदा देगा। मैं तो आज से अपने को आपका गुलाम ही समझूँगा।

दाऊ- नहीं जी, तुम मेरे दोस्त हो।

रहमान- नहीं हुजूर, गुलाम।

दाऊ- गुलाम छुटकारा पाने के लिए जो रुपये देता है, उसे मुक्तिधन कहते हैं। तुम बहुत पहले मुक्तिधन अदा कर चुके। अब भूलकर भी यह शब्द मुँह से न निकालना।

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