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नैराश्य - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jun 21, 2024 IST | Reena Yadav
नैराश्य   मुंशी प्रेमचंद
nairaashy by munshi premchand
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बाज आदमी अपनी स्त्री से इसलिए नाराज रहते हैं कि उसके लड़कियाँ ही क्यों होती हैं, लड़के क्यों नहीं होते। वह जानते हैं कि इसमें स्त्री का दोष नहीं है, या है तो उतना ही जितना मेरा, फिर भी जब देखिए, स्त्री से रूठे रहते हैं, उसे अभागिनी कहते हैं और सदैव उसका दिल दुखाया करते हैं। निरुपमा उन्हीं अभागिनी स्त्रियों में थीं और घमण्डी लाल त्रिपाठी उन्हीं अत्याचारी पुरुषों में। निरुपमा के तीन बेटियाँ लगातार हुई थी और वह सारे घर की निगाहों से गिर गई थी। सास-ससुर की अप्रसन्नता की तो उसे विशेष चिन्ता न थी, वे पुराने जमाने के लोग थे, जब लड़कियाँ गर्दन का बोझ और पूर्वजन्मों का पाप समझी जाती थीं। हां, उसे दुःख अपने पतिदेव की अप्रसन्नता का था, जो पढ़े-लिखे आदमी होकर भी उसे जली-कटी सुनाते रहते थे। प्यार करना तो दूर रहा, निरुपमा से सीधे मुँह बात न करते, -कई दिनों तक घर ही में न आते और आते भी तो कुछ इस तरह खिंचे-तने हुए रहते कि निरुपमा थर-थर काँपती रहती थी, कहीं गरज न उठें। घर में धन का अभाव न था, पर निरुपमा को कभी यह साहस न होता था कि किसी सामान्य वस्तु की इच्छा भी प्रकट कर सके। वह समझती थी, मैं यथार्थ में अभागिनी हूँ नहीं तो क्या भगवान मेरी कोख में लड़कियाँ ही रचते। पति की एक मृदु मुस्कान के लिए, एक मीठी बात रहे लिए उसका हृदय तड़प कर रह जाता था। यहाँ तक कि वह अपनी लड़कियों को प्यार करते हुए सकुचाती थी कि लोग कहेंगे, पीतल की नथ पर इतना गुमान करती है। जब त्रिपाठी जी के घर में अपने आने का समय होता, तो किसी-न-किसी बहाने से वह लड़कियों को उनकी आँखों से दूर कर देती थी। सबसे बड़ी विपत्ति यह थी कि त्रिपाठी जी ने धमकी दी थी कि अब अगर कन्या हुई तो मैं घर छोड़कर निकल जाऊंगा, इस नरक में क्षण-भर भी न ठहरूंगा। निरुपमा को वह चिंता और भी खाए जाती थी।

वह मंगल का व्रत रखती थी, रविवार, निर्जला एकादशी और न जाने कितने व्रत करती थी। स्नान-पूजा तो नित्य का नियम था, पर किसी अनुष्ठान से मनोकामना न पूरी होती थी। नित्य अवहेलना, तिरस्कार, उपेक्षा, अपमान सहते-सहते उसका चित्त संसार से विरक्त होता जाता था। जहाँ कान एक मीठी बात के लिए, आँखें एक प्रेम-दृष्टि के लिए, हृदय एक आलिंगन के लिए तरस-कर रह जाए, घर में अपनी कोई बात न पूछे, वहाँ जीवन से क्यों न अरुचि हो जाए?

एक दिन घोर निराशा की दशा में उसने अपनी बड़ी भाभी को एक पत्र लिखा। उसके एक-एक अक्षर से असह्य-वेदना टपक रही थी। भाभी ये उत्तर दिया- तुम्हारे भैया जल्द तुम्हें विदा कराने जायेंगे। यहाँ आजकल एक सच्चे महात्मा आये हुए हैं, जिनका आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं जाता। यहाँ कई संतानहीन स्त्रियाँ उनके आशीर्वाद से पुत्रवती हो गईं। पूर्ण आशा है कि तुम्हें भी उनका आशीर्वाद कल्याणकारी होगा।

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निरुपमा ने यह पत्र पति को दिखाया। त्रिपाठी जी उदासीन भाव से बोले- सृष्टि-रचना महात्माओं के हाथ का काम नहीं, ईश्वर का काम है।

निरुपमा - हाँ, लेकिन महात्माओं में भी तो कुछ सिद्धि होती है।

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घमंडी लाल- हां, होती है, पर ऐसे महात्माओं के दर्शन दुर्लभ हैं।

निरुपमा- मैं तो इस महात्मा के दर्शन करूंगी।

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घमंडी लाल- चली जाना।

निरुपमा -जब बांझिनी के लड़के हुए, तो मैं क्या उनसे भी गयी-गुजरी हूँ?

घमंडी लाल- कह तो दिया भाई, चली जाना। यह करके भी देख लो। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, पुत्र का मुख देखना हमारे भाग्य में ही नहीं है।

कई दिन बाद निरुपमा अपने भाई के साथ मैके गयी। तीनों पुत्रियाँ भी साथ थीं। भाभी ने उन्हें प्रेम से गले लगाकर कहा- तुम्हारे घर के आदमी बड़े निर्दयी हैं। ऐसे गुलाब के फूलों की-सी लड़कियाँ पाकर भी तकदीर को रोते हैं। तुम्हें भारी हों, तो मुझे दे दो। जब ननद और भाभी भोजन करने बैठी, तो निरुपमा ने कहा- वह महात्मा कहां रहते हैं?

भाभी - ऐसी जल्दी क्या है, बता दूँगी।

निरुपमा- है नगीच ही न?

भाभी- बहुत नगीच। जब कहोगी, उन्हें बुला दूँगी।

निरुपमा- तो क्या तुम लोगों पर बहुत प्रसन्न हैं?

भाभी- दोनों वक्त यही भोजन करते हैं। यहीं रहते हैं।

निरुपमा- जब घर ही वैद्य, तो मरिये क्यों? आज मुझे उनके दर्शन करा देना।

भाभी- भेंट क्या दोगी?

निरुपमा- मैं किस लायक हूँ?

भाभी- अपनी सबसे छोटी लड़की दे देना।

निरुपमा- चलो, गाली देती हो।

भाभी- अच्छा यह न सही, एक बार उन्हें प्रेमालिंगन करने देना।

निरुपमा- भाभी, मुझसे ऐसी हँसी करोगी, तो मैं चली जाऊंगी।

भाभी- वह महात्मा बड़े रसिया हैं।

निरुपमा -तो चूल्हे में जाएं। कोई दुष्ट होगा।

भाभी- उनका आशीर्वाद तो इसी शर्त पर मिलेगा। वह और कोई भेंट स्वीकार ही नहीं करते।

निरुपमा- तुम तो यों बातें कर रही हो, मानो उनकी प्रतिनिधि हो।

भाभी- हां, वह यह सब विषय मेरे ही द्वारा तय किया करते हैं। मैं ही भेंट लेती हूँ, मैं ही आशीर्वाद देती हूँ, मैं ही उनके हितार्थ भोजन कर लेती हूँ।

निरुपमा- तो यह कहो कि तुमने मुझे बुलाने के लिए यह हीला निकाला है।

भाभी- नहीं, उनके साथ ही तुम्हें कुछ ऐसे गुर बता दूँगी, जिससे तुम अपने घर आराम से रहो।

इसके बाद दोनों सखियों में कानाफूसी होने लगी। जब भाभी चुप हुई तो निरुपमा बोली- और जो कहीं कहीं कन्या ही हुई तो?

भाभी- तो क्या! कुछ दिन तो शान्ति और सुख से जीवन कटेगा। यह दिन तो कोई लौटा न लेगा। पुत्र हुआ तो कहना ही क्या, पुत्री हुई तो फिर कोई नई युक्ति निकाली जायेगी। तुम्हारे घर के जैसे अक्ल के दुश्मनों के साथ ऐसी ही चालें चलने में गुजारा है।

निरुपमा- मुझे तो संकोच मालूम होता है।

भाभी- त्रिपाठी जी को दो-चार दिन में पत्र लिख देना कि महात्माजी के दर्शन हुए और उन्होंने मुझे वरदान दिया है। ईश्वर ने चाहा, तो उसी दिन से तुम्हारी मान-प्रतिष्ठा होने लगेगी। घमंडी लाल दौड़े हुए आएँगे और तुम्हारे ऊपर प्राण निछावर करेंगे। कम-से-कम साल-भर तो चैन की वंशी बजाना। इसके बाद देखी जायेगी। निरुपमा-पति से कपट करूँ, तो पाप न लगेगा?

भाभी- ऐसे स्वार्थियों से कपट करना पुण्य है।

तीन-चार महीने के बाद निरुपमा अपने घर आयी। घमंडी लाल उसे विदा कराने गये थे। सलहज ने महात्माजी का रंग और भी चोखा कर दिया। बोली- ऐसा तो किसी को देखा ही नहीं कि इन महात्माजी ने वरदान दिया हो और वह पूरा न हो गया हो। हां, जिसका भाग्य ही फूट जाये, उसे कोई क्या कर सकता है?

घमंडी लाल प्रत्यक्ष तो वरदान और आशीर्वाद की उपेक्षा ही करते रहे, इन बातों पर विश्वास करना आजकल संतोषजनक मालूम होता है, पर उनके दिल पर असर जरूर हुआ।

निरुपमा की खातिरदारियाँ होनी शुरू हुई। जब वह गर्भवती हुई, तो सबके दिलों में नई-नई आशाएँ हिलोरें लेने लगीं। सास, जो उठते गाली और बैठते व्यंग्य से बातें करती थी, अब उसे पान की तरह पालती-बेटी, तुम रहने दो, मैं ही रसोई बना लूँगी, तुम्हारा सिर दुखने लगेगा। कभी निरुपमा कलसे का पानी या कोई चारपाई उठाने लगती, तो सास दौड़ती- बहू रहने दो, मैं आती हूँ। तुम कोई भारी चीज मत उठाया करो। लड़कियों की बात और होती है, उन पर किसी बात का असर नहीं होता। लड़के तो गर्भ ही में मान करने लगते हैं। अब निरुपमा के लिए दूध का उठौना किया गया, जिसमें बालक पुष्ट और गोरा हो। घमंडी लाल वस्त्राभूषण पर उतारू हो गए। हर महीने में एक न एक नई चीज लाते। निरुपमा का जीवन इतना सुखमय कभी न था। उस समय भी नहीं, जब यह नयी-नवेली वधू थी।

महीने गुजरने लगे। निरुपमा को अनुभूत लक्षणों से विदित होने लगा कि यह भी कन्या ही है, पर वह इस भेद को गुप्त रखती थी। सोचती, सावन की धूप है, इसका क्या भरोसा! जितनी चीज धूप में सुखानी हो सुखा लो, फिर तो घटा छाएगी ही। बात-बात पर बिगड़ती। वह कभी इतनी मानशीला न थी। पर घर में कोई चूं तक न करता कि कहीं बहू का दिल न दुखे, नहीं बालक को कष्ट होगा। कभी-कभी निरुपमा केवल घरवालों को जलाने के लिए अनुष्ठान करती, उसे उन्हें जलाने में मजा आता था। वह सोचती, तुम स्वार्थियों को जितना जलाओ, उतना अच्छा, तुम मेरा आदर इसलिए करते हो न कि मैं बच्चा जनूंगी, जो तुम्हारे कुल का नाम चलाएगा। मैं कुछ नहीं हूँ बालक ही सब-कुछ है। मेरा अपना कोई महत्त्व नहीं, जो कुछ है, वह बालक के नाते। यह मेरे पति हैं। पहले इन्हें मुझसे कितना प्रेम था, तब इतने संसार-लोलुप न हुए थे। अब क्या प्रेम केवल स्वार्थ का स्वाँग है। मैं भी पशु हूँ जिसे दूध के लिए चारा-पानी दिया जाता है। खैर यही सही, इस वक्त तो तुम मेरे काबू में आये हो। जितने गहने बन सके, बनवा लूँ। इन्हें तो छीन न लोगे।

इस तरह दस महीने पूरे हो गए। निरुपमा की दोनों ननदें ससुराल से बुलायी गईं। बच्चे के लिए पहले ही से सोने के गहने बनवा लिए गए, दूध के लिए एक सुंदर दुधारू गाय मोल ले ली गई। घमंडी लाल उसे हवा खिलाने को एक छोटी- सी सेजगाड़ी लाये। जिस दिन निरुपमा को प्रसव-वेदना होने लगी, द्वार पर पंडितजी मुहूर्त देखने के लिए बुलाए गए। एक मीर-शिकार बन्दूक छोड़ने को बुलाया गया, गायने मंगल-गान के लिए बटोर ली गईं। घर में से तिल-तिल पर खबर मँगाई जाती थी, क्या हुआ? लेडी डॉक्टर भी बुलायी गई। बाजे वाले हुक्म के इन्तजार में बैठे थे। पामर भी अपनी सारंगी लिये ‘जच्चा मान करे नंदलाल सो’ का तान सुनाने को तैयार बैठा था।

सारी तैयारियाँ, सारी आशाएँ, सारा उत्साह, सारा समारोह एक शब्द पर अवलम्बित। ज्यों-ज्यों देर होती थी, लोगों में उत्सुकता बढ़ती जाती थी। घमंडी लाल अपने मनोभावों को छिपाने के लिए एक समाचार पत्र देख रहे थे, मानो उन्हें लड़का या लड़की, दोनों ही बराबर हैं। मगर उनके बूढ़े पिताजी इतने सावधान न थे। उनकी बाँछें खिली जाती थी, हँस-हँसकर सबसे बात कर रहे थे और पैसों की एक थैली को बार-बार उछालते थे।

मीर-शिकार ने कहा- मालिक से अबकी पगड़ी-दुपट्टा लूँगा।

पिताजी ने खिलकर कहा- अबे कितनी पगड़ियाँ लेगा? इतनी बेभाव की दूँगा कि सर के बाल गंजे हो जायेंगे।

पामर बोला- सरकार से अब की कुछ जीविका लूँगा।

पिताजी खिलकर बोले- अबे कितना खाएगा, खिला-खिलाकर पेट फाड़ दूँगा।

सहसा महरी घर में से निकली। कुछ घबराई-सी थी। वह अभी कुछ बोलने भी न पाई थी कि मीर-शिकार ने बंदूक फायर कर ही तो दी। बंदूक छूटने की देर थी कि रोशन चौकी की तान भी छिड़ गई, पामर भी कमर कसकर नाचने को खड़ा हो गया।

महरी- अरे, तुम सब-के-सब भंग या गए हो क्या?

मीर-शिकार- क्या हुआ, क्या?

महरी- हुआ क्या, लड़की ही तो फिर हुई है।

पिताजी- लड़की हुई है?

यह कहते-कहते वह कमर थाम कर बैठ गए, मानो वज्र गिर पड़ा। घमंडी लाल कमरे से निकल आये और बोले- जाकर लेडी डॉक्टर से तो पूछ। अच्छी तरह देख ले। देखा न सुना, चल खड़ी हुई।

महरी- बाबूजी, मैंने तो आँखों देखा है।

घमंडी लाल- कन्या ही है?

पिता- हमारी तकदीर ही ऐसी है बेटा! जाओ रे, सबके सब! तुम सभी के भाग्य में कुछ पाना न लिखा था, तो कहां से पाते? भाग जाओ। सैकड़ों रुपये पर पानी फिर गया, सारी तैयारी मिट्टी में मिल गई।

घमंडी लाल- उस महात्मा से पूछना चाहिए। मैं आज डाक से जरा बच्चू की खबर लेता हूँ।

पिता- धूर्त है, धूर्त?

घमंडी लाल- मैं उनकी सारी धूर्तता निकाल दूँगा। मारे डंडों के खोपड़ी न तोड़ दूँ तो कहिएगा, चांडाल कहीं का। उसके कारण मेरे सैकड़ों रुपये पर पानी फिर गया। यह सेजगाड़ी, यह गाय, यह पालना, सोने के गहने किसके सिर पटकूं? ऐसे ही उसने कितनों को ठगा होगा। एक दफा बच्चू की मरम्मत हो जाती, तो ठीक हो जाते।

पिताजी- बेटा, उसका दोष नहीं, अपने भाग्य का दोष है।

घमंडी लाल- उसने क्यों कहा कि ऐसा नहीं होगा। औरतों से इस पाखंड के लिए कितने ही रुपये ऐंठे होंगे। यह सब उन्हें उगलना पड़ेगा, नहीं तो पुलिस में मुकदमा दर्ज करा दूंगा। कानून में पाखंड का भी तो दण्ड है। मैं पहले ही चौंका था कि हो-न-हो पाखंडी है, लेकिन मेरी सलहज ने धोखा दिया, नहीं तो मैं ऐसे पाखंडियों के पंजे में कब आने वाला था? एक ही सुअर है।

पिताजी- बेटा, सब्र करो। ईश्वर को जो कुछ मंजूर था, वह हुआ। लड़का- लड़की दोनों ही ईश्वर की देन हैं। जहाँ तीन हैं, यहाँ एक और सही।

पिता और पुत्र में तो यह बातें होती रहीं। पामर, मीर-शिकार आदि ने अपने- अपने डंडे सँभाले और अपनी राह चले। घर में मातम-सा छा गया। लेडी डॉक्टर भी विदा कर दी गई। सौर में जच्चा और दाई के सिवा कोई न रहा। वृद्धा माता तो इतनी हताश हुईं कि उसी वक्त अटवास-खटवास लेकर पड़ रहीं ।

जब बच्चे की बरही हो गई, तो घमंडी लाल स्त्री के पास गये और संतोष भाव से बोले-फिर लड़की हो गई

निरुपमा- क्या करूँ, मेरा क्या बस?

घमंडी लाल- उस पापी धूर्त ने बड़ा चकमा दिया।

निरुपमा- अब क्या कहूं, मेरे भाग्य ही में न होगा, नहीं तो वहाँ कितनी औरतें बाबाजी को रात-दिन घेरे रहती थी। वह किसी से कुछ लेते तो कहती कि धूर्त हैं, कसम ले लो, जो मैंने एक कौड़ी भी उन्हें दी हो।

घमंडी लाल- उसने लिया, या न लिया, यहाँ तो दिवाला निकल गया, मालूम हो गया, तक़दीर में पुत्र नहीं लिखा है। कुल का नाम डूबना ही है तो क्या आज डूबा, क्या दस साल बाद डूबा। अब कहीं चला जाऊंगा, गृहस्थी में कौन-सा सुख रखा है।

वह बहुत देर तक खड़े-खड़े अपने भाग्य को रोते रहे, पर निरुपमा ने सिर तक न उठाया।

निरुपमा के सिर फिर वही विपत्ति आ पड़ी, फिर वही ताने, वही अपमान, वही अनादर, वही छीछालेदर। किसी को चिन्ता न रहती कि खाती-पीती है या नहीं, अच्छी है या बीमार, दुखी है या सुखी। घमंडी लाल यद्यपि कहीं न गये, पर निरुपमा को यह धमकी प्रायः मिलती ही रहती थी। कई महीने यों ही गुजर गये, तो निरुपमा ने फिर भाभी को लिखा कि तुमने और भी मुझे विपत्ति में डाल दिया। इससे तो पहले ही भली थी। अब तो कोई बात भी नहीं पूछता कि मरती है या जीती है। अगर यही दशा रही, तो स्वामी जी चाहे संन्यास लें या न लें, लेकिन मैं संसार को अवश्य त्याग दूंगी।

भाभी यह पत्र पाकर परिस्थिति समझ गई। अबकी उसने निरुपमा को बुलाया नहीं। जानती थी कि लोग विदा ही न करेंगे। पति को लेकर स्वयं आ पहुँची। उसका नाम सुकेशी था। बड़ी मिलनसार, चतुर, विनोद शील स्त्री थी। आते ही आते निरुपमा की गोद में कन्या देखी तो बोली- अरे यह क्या?

सास- भाग्य है और क्या!

सुकेशी- भाग्य कैसा? इसने महात्माजी की बात भुला दी होगी। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि यह मुँह से जो कुछ कह दें, यह न हो। क्योंजी, तुमने मंगल का व्रत रखा?

निरुपमा- बराबर, एक व्रत भी न छोड़ा ।

सुकेशी- पाँच ब्राह्मणों को मंगल के दिन भोजन कराती रही?

निरुपमा- यह तो उन्होंने नहीं कहा था।

सुकेशी- तुम्हारा सिर! मुझे खूब याद है, मेरे सामने उन्होंने बहुत जोर देकर कहा था। तुमने सोचा होगा, ब्राह्मणों को भोजन कराने से क्या होता है। यह न समझा कि कोई अनुष्ठान सफल नहीं होता, जब तक विधिवत् उसका पालन न किया जाये।

सास- इसने कभी इसकी चर्चा ही नहीं की, नहीं, तो पाँच क्या, दस ब्राह्मणों को जिमा देती। तुम्हारे धर्म से कमी नहीं है।

सुकेशी- कुछ नहीं, भूल गई और क्या। रानी, बेटे का मुँह यों देखना नसीब नहीं होता। बड़े-बड़े जप-तप करने पड़ते हैं, तुम मंगल के एक व्रत ही से घबरा गई?

सास- अभागिनी है और क्या!

घमंडी लाल- ऐसी कौन-सी बड़ी बातें थीं, जो याद न रहीं? यह खुद हम लोगों को जलाना चाहती है।

सास- वही तो कहूँ कि महात्मा की बात कैसे निष्फल हुई। यहाँ सात बरसों तक ‘तुलसी माई’ को जोत चढ़ाया, जब जाके बच्चे का जन्म हुआ।

घमंडीलाल- इन्होंने समझा था, दाल-भात का खाना है।

सुकेशी- खैर, अब जो हुआ, सो हुआ। कल मंगलवार है, फिर व्रत रखो और अबकी सात ब्राह्मणों को जिमाओ। देखें, कैसे महात्माजी की बात नहीं पूरी होती।

घमंडी लाल- व्यर्थ है, इनके किए कुछ न होगा।

सुकेशी- बाबूजी, आप विद्वान्, समझदार होकर इतना दिल छोटा करते हैं। अभी आप की उम्र ही क्या है। कितने पुत्र लीजिएगा? नाकों दम न हो जाये तो कहिएगा।

सास- बेटी, दूध-पूत से भी किसी का मन भरा है।

सुकेशी- ईश्वर ने चाहा तो आप लोगों का मन भर जायेगा। मेरा तो भर गाया।

घमंडी लाल- सुनती हो महारानी, अबकी कोई गोलमाल मत करना। अपनी भाभी से सब ब्योरा अच्छी तरह पूछ लेना।

सुकेशी- आप निश्चिंत रहें, मैं याद करा दूँगी, क्या भोजन करना होगा, कैसे रहना होगा, कैसे स्नान करना होगा, यह सब सिखा दूँगी और अम्मा जी आज के अठारह मास बाद आपसे कोई भारी इनाम लूंगी।

सुकेशी एक सप्ताह यहाँ रही और निरुपमा को खूब सिखा-पढ़ाकर चली गयी।

निरुपमा का एक वर्ष फिर चमका, घमंडी लाल अबकी इतने आश्वस्त हुए कि भविष्य ने भूत को भुला दिया। निरुपमा फिर बांदी से रानी हुई, सास फिर उसे पान की भांति पालने लगी, लोग उसका मुँह जोहने लगे।

दिन गुजरने लगे, निरुपमा कभी कहती, अम्मा जी, आज मैंने स्वप्न देखा कि एक वृद्धा स्त्री ने आकर मुझे पुकारा और एक नारियल देकर बोली- यह तुम्हें दिये जाती हूँ। कभी कहती, अम्मा जी अबकी न जाने क्यों, मेरे दिल में बड़ी-बड़ी उमंगें पैदा हो रही हैं, जी चाहता है खूब गाना सुनूं, नदी में खूब स्नान करूँ, हरदम नशा-सा छाया रहता है, सास सुनकर मुस्कुराती और कहती- बहू ये शुभ लक्षण हैं।

निरुपमा चुपके-चुपके माजनू मँगाकर खाती और अपने आलस नेत्रों से ताकते हुए घमंडी लाल से पूछती- मेरी आँखें लाल हैं क्या?

घमंडी लाल खुश होकर कहते- मालूम होता है, नशा चढ़ा हुआ है। ये शुभ लक्षण हैं।

निरुपमा को सुगंधों से कभी इतना प्रेम न था, फूलों के गजरों पर अब वह जान देती थी।

घमंडी लाल अब नित्य सोते समय उसे महाभारत की वीर कथाएँ पढ़कर सुनाते, कभी गुरु गोविन्दसिंह की कीर्ति का वर्णन करते। अभिमन्यु की कथा से निरुपमा को बड़ा प्रेम था। पिता अपने आने वाले पुत्र को वीर-संस्कारों से परिपूर्ण कर देना चाहता था।

एक दिन निरुपमा ने पति से कहा- नाम क्या रखोगे?

घमंडी लाल- यह तो तुमने खूब सोचा। मुझे तो इसका ध्यान ही न रहा था। ऐसा नाम होना चाहिए, जिससे शौर्य और तेज टपके। सोचो कोई नाम।

दोनों प्राणी नामों की व्याख्या करने लगे। जोरावरलाल से लेकर हरिश्चन्द्र तक सभी नाम गिनाए गए, पर उस असामान्य बालक के लिए कोई नाम न मिला। अंत में पति ने कहा-तेज बहादुर कैसा नाम है?

निरुपमा- बस-बस, यही नाम मुझे पसंद है।

घमंडीलाल- नाम तो बढ़िया है। तेगबहादुर की कीर्ति सुन ही चुकी हो। नाम का आदमी पर बड़ा असर होता है।

निरुपमा- नाम ही तो सब-कुछ है। दमड़ी, छकौड़ी, घुरहू, कतवारू जिसके नाम देखे, उसे भी ‘यथा नाम तथा गुण’ ही पाया। हमारे बच्चे का नाम होगा तेगबहादुर।

प्रसव-काल आ पहुँचा। निरुपमा को मालूम था कि क्या होने वाला है, लेकिन बाहर मंगलाचरण का पूरा सामान था। अबकी किसी को लेशमात्र भी सन्देह न था। नाच- गाने का प्रबन्ध किया गया था। एक शामियाना खड़ा किया गया था और मित्रगण उसमें बैठे खुश-गप्पियाँ कर रहे थे। हलवाई कड़ाह से पूरियाँ और मिठाइयाँ निकाल रहा था। कई बोरे अनाज के रखे हुए थे कि शुभ समाचार पाते ही भिक्षुओं को बांटे जाएँ। एक क्षण का भी विलम्ब न हो, इसलिए बोरों के मुँह खोल दिए गए थे।

लेकिन निरुपमा का दिल प्रतिक्षण बैठा जाता था। अब क्या होगा? तीन साल किसी तरह कौशल से कट गए और मजे में कट गए, लेकिन अब विपत्ति सिर पर मँडरा रही है। हाय! कितनी परवशता है! निरपराध होने पर भी यह दंड! अगर भगवान की इच्छा है कि मेरे गर्भ से कोई पुत्र न जन्म ले, तो मेरा क्या दोष! लेकिन कौन सुनता है? मैं ही अभागिनी हूँ, मैं ही त्याज्य हूँ, मैं ही कलमुँही हूँ इसीलिए न कि परवश हूँ! क्या होगा? अभी एक क्षण में यह सारा आनन्दोत्सव शोक में डूब जायेगा, मुख पर बौछारें पड़ने लगेंगी, भीतर से बाहर तक मुझी को कोसेंगे। सास-ससुर का भय नहीं, लेकिन स्वामीजी शायद फिर मेरा मुँह न देखें, शायद निराश होकर घर-बार त्याग दें। चारों तरफ अमंगल-ही-अमंगल है। मैं अपने घर की, अपनी संतान की दुर्दशा देखने के लिए क्यों जीवित हूँ! कौशल बहुत हो चुका, अब उससे कोई आशा नहीं। मेरे दिल में कैसे-कैसे अरमान थे। अपनी प्यारी बच्चियों का लालन-पालन करती, उन्हें ब्याहती, उनके बच्चों को देखकर सुखी होती। पर आह! यह सब अरमान खाक में मिले जाते हैं। भगवान! तुम्हीं अब इनके पिता हो, तुम्हीं इनके रक्षक हो। मैं तो अब जाती हूँ।

लेडी डॉक्टर ने कहा- हाय! फिर लड़की है।

भीतर-बाहर कुहराम मच गया, पिट्टस पड़ गई। घमंडी लाल ने कहा- जहन्नुम में जाये ऐसी जिंदगी, मौत भी नहीं आ जाती।

उनके पिता भी बोले- अभागिनी है, वज्र अभागिनी।

भिक्षुकों ने कहा- रोओ अपनी तकदीर को, हम कोई दूसरा द्वार हेरते हैं। अभी यह शोकोद्गार शांत न होने पाया था कि लेड़ी डॉक्टर ने कहा- माँ का हाल अच्छा नहीं है। वह अब नहीं बच सकती। उसका दिल बन्द हो गया है।

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