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प्रेम की होली - मुंशी प्रेमचंद की कहानी

07:00 PM Dec 27, 2023 IST | Reena Yadav
प्रेम की होली   मुंशी प्रेमचंद की कहानी
gangajal
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गंगी का सत्रहवीं साल था, पर वह तीन साल से विधवा थी, और जानती थी कि मैं विधवा हूँ । मेरे लिए संसार के सुखों के द्वार बन्द हैं । फिर वह क्यों रोये और कलपे ? मेले से सभी तो मिठाई के दोने और फूलों के हार लेकर नहीं लौटते? कितनों ही का तो मेले की सजी हुई दुकानें और उन पर खड़े नर-नारी देखकर ही मनोरंजन हो जाता है । गंगी खाती-पीती थी, हँसती-बोलती थी, किसी ने उसे मुँह लटकाये, अपने भाग्य को रोते नहीं देखा । घड़ी रात को उठकर गोबर निकालकर, गाय बैलों को सानी देना, फिर उपले पाथना, उसका नित्य का नियम था । तब वह अपने भैया को गाय दुहने के लिए जगाती थी । फिर कुएँ से पानी लाती, चौके का धंधा शुरू हो जाता । गाँव की भावजें उससे हँसी करती, पर एक विशेष प्रकार की हँसी छोड़कर । सहेलियाँ ससुराल से आकर उससे सारी कथा कहती, पर एक विशेष प्रसंग बचाकर । सभी उसके वैधव्य का आदर करते थे । जिस छोटे-से अपराध के लिए उसकी भावज पर कुर्सियों पड़ती, उसकी माँ को गतलइयाँ मिलती, उसके भाई पर मार पड़ती, वह उसके लिए क्षम्य था । जिसे ईश्वर ने मारा है, उसे क्या कोई मारे! जो बातें उसके लिए वर्जित थी उनकी ओर उसका मन ही न जाता था । उसके लिए उसका अस्तित्व ही न था । जवानी के इस उमड़े हुए सागर में मतवाली लहरें न थी, डरावनी गरज न थी, अचल शान्ति का साम्राज्य था ।

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होली आयी, सबने गुलाबी साड़ियाँ पहनी । गंगा की साड़ी न रंगी गई । माँ ने पूछा - बेटी, तेरी साड़ी भी रंग दूँ? गंगी ने कहा - अम्मा, यों ही रहने दो । भावज ने फाग गाया । वह पकवान बनाती रही । उसे इसी में आनन्द था ।

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तीसरे पहर दूसरे गाँवों के लोग होली खेलने आये । यह लोग भी होली लौटाने जायेंगे । गाँवों में यही परस्पर व्यवहार है । मैकू महतो ने भंग बनवा रखी थी, चरस-गाँजा, माजून सब कुछ लाये थे । गंगी ने ही भंग पीसी थी, मीठी अलग बनाई थी, नमकीन अलग । उसका भाई पिलाता था, वह हाथ धुलाती थी । जवान सिर नीचे किये पीकर चले जाते, हे गंगी से पूछ लेते - अच्छी तरह हो न बेटी, या चुहल करते - क्यों री गंगिया, भावज तुझे खाना नहीं देती क्या, जो इतनी दुबली हो गई है! गंगिया हँसकर रह जाती । देह क्या उसके बस की थी । न-जाने क्यों वह मोटी हुई थी ।

भंग पीने के बाद फाग गाने लगे । गंगिया अपनी चौखट पर खड़ी सुन रही थी । एक जवान ठाकुर गा रहा था । कितना अच्छा स्वर था, कैसा मीठा! गंगिया को बड़ा आनन्द आ रहा था । माँ ने कई बार पुकारा - सुन जा, वह न गई । एक बार गई भी तो जल्दी से लौट आई । उसका ध्यान उसी गाने पर था । न जाने क्या बात उसे खींचे लेती थी, बाँधे लेती थी । जवान ठाकुर भी बार-बार गंगिया की ओर देखता और मस्त हो-होकर गाता । उसके साथ वालों को आश्चर्य हो रहा था । ठाकुर को यह सिद्धि कहाँ मिल गई! वह लोग बिदा हुए तब भी गंगिया चौखट पर खड़ी थी । जवान ठाकुर ने भी उसकी ओर देखा और चला गया ।

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गंगिया ने अपने बाप से पूछा - कौन गाता था दादा?

मैकू ने कहा - कोठार के बुद्धू सिंह का लड़का है, गरीब सिंह । बुद्धु रीति-व्यवहार में आते-जाते थे । उनके मरने के बाद अब वही लड़का आने-जाने लगा ।

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गंगी - यहाँ तो पहले-पहल आया है?

मैकू - हाँ, और तो कभी नहीं देखा । मिज़ाज बिलकुल बाप का-सा है और वैसी ही मीठी बोली है । घमंड तो छू नहीं गया, बुद्धु के बखार में अनाज रखने की जगह न थी, पर चमार को भी देखते तो पहले हाथ उठाते । वही इसका स्वभाव है । गोरू आ रहे थे । गंगी पगहिया लेने भीतर चली गई । वही स्वर उसके कानों में गूँज रहा था ।

कई महीने गुजर गये । एक दिन गंगी गोबर पाथ रही थी । सहसा उसने देखा, वही ठाकुर सिर झुकाये द्वार पर से चला जा रहा था । वह गोबर छोड़कर उठ खड़ी हुई । घर में कोई मर्द न था । सब बाहर चले गये थे । यह कहना चाहती थी - ठाकुर! बैठो, पानी पीते जाव । पर उसके मुख से बात न निकली । उसकी छाती कितने जोर से धड़क रही थी । उसे एक विचित्र घबराहट होने लगी - क्या करे, कैसे उसे रोक ले । गरीब सिंह ने उसकी ओर एक बार ताका और फिर आँखें नीची कर ली । उस दृष्टि में क्या बात थी कि गंगी के रोएँ खड़े हो गये । वह दौड़ी घर में गई और माँ से बोली - अम्माँ, वह ठाकुर जा रहे हैं, गरीबसिंह । माँ ने कहा - किसी काम से आये होंगे । गंगी बाहर आई तो ठाकुर चला गया था । वह फिर गोबर पाथने लगी, पर उपले टूट-टूट जाते थे, आप ही आप हाथ बन्द हो जाते, मगर फिर चौंककर पाथने लगती, जैसे कहीं दूर से उसके कानों में आवाज आ रही हो । वही दृष्टि आँखों केर सामने थी । उसमें क्या जादू था? क्या मोहिनी थी? उसने अपनी मूक भाषा में कुछ कहा । गंगी ने भी कुछ सुना । क्या कहा? यह वह नहीं जानती, पर वह दृष्टि उसकी आँखों में बसी हुई थी ।

रात को लेटी तब भी वही दृष्टि सामने थी । स्वप्न में भी वही दृष्टि दिखाई दी ।

फिर कई महीने गुजर गये । एक दिन सभा समय मैकू द्वार पर बैठे सन कात रहे थे और गंगी बैलों को सानी चला रही थी कि सहसा चिल्ला उठी - दादा, दादा, ठाकुर ।

मैकू ने सिर उठाया तो द्वार पर गरीबसिंह चला आ रहा था । राम-राम हुआ ।

मैकू ने पूछा - कहाँ गरीबसिंह ! पानी तो पीते जाव ।

गरीब आकर एक माची पर बैठ गया । उसका चेहरा उतरा हुआ था । कुछ वह बीमार-सा जान पड़ता था ।

मैकू ने कहा - कुछ बीमार थे क्या?

गरीब - नहीं तो दादा!

मैकू - कुछ मुँह उतरा हुआ है, क्या सूद-ब्याज की चिन्ता में पड़ गये?

गरीब - तुम्हारे जीते मुझे क्या चिन्ता है दादा!

मैकू - बाकी दे दी ना ।

गरीब - हाँ दादा, सब बेबाक कर दिया ।

मैकू ने गंगी से कहा - बेटी जा, कुछ ठाकुर को पानी पीने को ला । भैया हो तो कह देना चिलम दे जाये ।

गरीब ने कहा - चिलम रहने दो दादा! मैं नहीं पीता ।

मैकू - अबकी घर ही तमाकू बनी है, सवाद तो देखो । पीते तो हो?

गरीब - इतना बेअदब न बनाओ दादा । काका के सामने चिलम नहीं छुई । मैं तुमको उन्हीं की जगह देता हूँ ।

यह कहते-कहते उसकी आँखें भर आई । मैकू का हृदय भी गद्गद् हो उठा । गंगी हाथ की टोकरी लिये मूर्ति के समान खड़ी थी । उसकी सारी चेतना, सारी भावना, गरीब सिंह की बातों की ओर खिंची हुई थी! उसमें और कुछ सोचने की, और कुछ करने की शक्ति न थी । ओह! कितनी नम्रता है, कितनी सज्जनता, कितना अदब ।

मैकू ने फिर कहा - सुना नहीं बेटी, जाकर कुछ पानी पीने को लाव ! गंगी चौंक पड़ी । दौड़ी हुई घर में गई। कटोरा मांजा, उसमें थोड़ी-सी राब निकाली । फिर लोटा-गिलास माँजकर शर्बत बनाया ।

माँ ने पूछा - कौन आया है गंगिया?

गंगी - वह है, ठाकुर गरीब सिंह । दूध तो नहीं है अम्मां, रस में मिला देती ।

माँ - है क्यों नहीं, हाँड़ी में देख ।

गंगी ने सारी मलाई उतारकर रस में मिला दी और लोटा गिलास लिये बाहर निकली । ठाकुर ने उसकी ओर देखा । गंगी ने सिर झुका लिया । यह संकोच उसमें कहाँ से आ गया?

ठाकुर ने रस पिया और राम-राम करके चला गया ।

मैकू बोला - कितना दुबला हो गया!

गंगी - बीमार है क्या?

मैकू - चिन्ता है और क्या? अकेला आदमी है, इतनी बड़ी गृहस्थी, क्या करे ।

गंगी को रात-भर नींद नहीं आई । उन्हें कौन-सी चिन्ता है । दादा से कुछ कहा भी तो नहीं । क्यों इतने सकुचाते हैं । चेहरा कैसा पीला पड़ गया है ।

सवेरे गंगी ने माँ से कहा - गरीबसिंह अबकी बहुत दुबले हो गये हैं अम्मां ।

माँ - अब वह बेफिक्री कहीं है बेटी । बाप के जुमाने में खाते थे और खेलते थे । अब तो गिरस्ती का जंजाल सिर पर है ।

गंगी को इस जवाब से सन्तोष न हुआ । बाहर जाकर मैकू से बोली - दादा, तुमने गरीबसिंह को समझा नहीं दिया - क्यों इतनी चिन्ता करते हो?

मैकू ने आँखें फाड़कर देखा और कहा - जा, अपना काम कर ।

गंगी पर मानो वज्रपात हो गया । यह कठोर उत्तर और दादा के मुँह से । हाय! दादा को भी उनका ध्यान नहीं । कोई उनका मित्र नहीं । उन्हें कौन समझेगा! अबकी वह आयेंगे तो मैं खुद उन्हें समझाऊँगी ।

गंगी रोज सोचती - वह आते होंगे, पर ठाकुर न आये । फिर होली आई । फिर गाँव में फाग होने लगा । रमणियों ने फिर गुलाबी साड़ियाँ पहनी । फिर रंग दोला गया मैकू ने भंग, चरस, गांजा मँगवाया । गंगी ने फिर मीठी और नमकीन भंग बनाई! द्वार पर टाट बिछ गया । व्यवहारी लोग आने लगे । मगर कोठार से कोई नहीं आया । शाम हो गई । किसी का पता नहीं! गंगा बेकरार थी । कभी भीतर जाती, कभी बाहर आती । भाई से पूछती - क्या कोठारवाले नहीं आये? भाई कहता - नहीं । दादा से पूछती - भंग तो नहीं बची, कोठारवाले आवेंगे तो क्या पीयेंगे । दादा कहते - अब क्या रात को आवेंगे, सामने तो गाँव है । आते होते तो दिखाई देते ।

रात हो गई, पर गंगी को अभी तक आशा लगी हुई थी । वह मन्दिर के ऊपर चढ़ गई और कोठार की ओर निगाह दौड़ाई । कोई न आता था ।

सहसा उसे उसी सिवाने की ओर आग दहकती दिखाई दी । देखते-देखते ज्वाला प्रचण्ड हो गई । यह क्या! वहाँ आज होली जल रही है । होली तो कल ही जल गई । कौन जाने वहाँ पण्डितों ने आज होली जलाने की सायत बताई हो । तभी वे लोग आज नहीं आये । कल आयेंगे ।

उसने दर आकर मैकू से कहा - दादा, कोठार में तो आज होली जली है ।

मैकू - दुत् पगली! होली सब जगह कल जल गई ।

गंगी - तुम मानते नहीं हो, मैं मन्दिर पर से देख आई हूँ । होली जल रही है । न पतियाते हो तो चलो, मैं दिखा दूँ

मैकू - अच्छा चल देखूं ।

मैकू ने गंगी के साथ मन्दिर की छत पर आकर देखा । एक मिनट तक देखते रहे । फिर बिना कुछ बोले नीचे उतर आये ।

गंगी ने कहा - है होली कि नहीं, तुम न मानते थे?

मैकू - होली नहीं पगली - चिता है । कोई मर गया है । तभी आज कोठारवाले नहीं आये ।

गंगी का कलेजा एक-से हो गया । इतने में किसी में नीचे-से पुकारा - मैकू महतो, कोठार के गरीबसिंह गुजर गये ।

मैकू नीचे चले गये, पर गंगी वहीं स्तम्भित खड़ी रही । कुछ खबर न रही - मैं कौन हूँ कहाँ हूँ । मालूम हुआ जैसे गरीबसिंह उस सुदूर चिता से निकलकर उसकी ओर देख रहा है - वही दृष्टि थी, वही चेहरा । क्या उसे वह भूल सकती थी? उस दिवस से फिर कभी होली देखने नहीं गई । होली हर साल आती थी, हर साल उसी तरह भंग बनती थी, हर साल उसी तरफ फाग होता था, हर साल अबीर-गुलाल उड़ती थी, पर गंगी के लिए होली सदा के लिए चली गई ।

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