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श्वेता की सूझ-बूझ - 21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश

07:00 PM Jul 02, 2024 IST | Reena Yadav
श्वेता की सूझ बूझ   21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां हिमाचल प्रदेश
Shweta kee soojh-boojh
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

श्वेता और अमित भाई-बहन हैं। श्वेता नौ वर्ष की है और वह चौथी में पढ़ती है जबकि उसका सात वर्ष का भाई अमित दूसरी कक्षा का छात्र है। दोनों का स्कूल एक ही है। वे दोनों सुबह मुहल्ले के तीन अन्य बच्चों के साथ एक सरकारी बस में चार किलोमीटर दूर स्कूल जाया करते हैं। सुबह बस में भीड़ होने के कारण उन्हें बैठने की जगह नहीं मिलती है। पर दोपहर बाद स्कूल से लौटते समय उन्हें अक्सर सीट मिल जाती है।

श्वेता की एक आदत-सी बन गयी है कि जब भी वह बस पर चढ़ती है तो अपने सीट के आस-पास, नीचे-ऊपर ध्यान से देख लेती है कि कहीं कोई लावारिस वस्तु तो नहीं पड़ी है। यह चेतावनी बस में भी लिखी होती है कि यदि आप कोई लावारिस वस्तु बस में कहीं पड़ी देखें तो उन्हें हाथ न लगाएं और परिचालक को सूचित कर दें। हो सकता है कि वह कोई बम हो। आए दिन देश में ऐसी आतंकवादी घटनाएं होती आई हैं। इससे कई लोगों को बम-धमाके के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। आतंकवादी संगठन खिलौनों, टिफिन-बॉक्सों तथा ट्रांजिस्टरों में बम रखकर बसों में या कहीं भी भीड़-भाड़ वाली जगह पर छोड़ जाते हैं। ऐसी खतरनाक वस्तुएं पार्कों-सड़कों पर भी पड़ी रहती हैं। श्वेता के मम्मी-पापा ने उन्हें समझा रखा है कि वे कहीं भी किसी लावारिस वस्तुओं का न छुएं।

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अतः बस पर चढ़ते ही श्वेता का ध्यान अपने-आप चेतावनी की ओर चला जाता है। वह अपनी गर्दन झुकाकर सीट के आस-पास अवश्य देख लेती है।

उस दिन भी श्वेता हमेशा की तरह स्कूल की छुट्टी के बाद अपने भाई अमित और मुहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ बस-स्टॉप पर खड़ी बस की प्रतीक्षा कर रही थी। थोड़ी देर में एक बस भी आ गई। कुछ सवारियों के उतरने पर उन्हें बस में बैठने की जगह भी मिल गई। ज्योंहि बस चली कि श्वेता ने अपना सिर झुकाकर सीट के नीचे देखने के साथ-साथ बस में चारों ओर निगाह दौड़ा ली। कई जोड़े पैरों के बीच उसे अपनी सीट के पीछे दूसरी कतार में एक पोटली-सी नजर आई। उसने वहां बैठे एक अधेड़ व्यक्ति से पूछा, “अंकल, सीट के नीचे जो सामान पड़ा है, वह क्या आपका है?”

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उस व्यक्ति ने मुस्कराकर कहा, “नहीं बेटे, मेरा तो नहीं किसी और का होगा। मैं तो आज अपने साथ कोई सामान भी नहीं लाया हूं।”

यह सुनकर श्वेता ने पुनः कहा, “पता तो कीजिए अंकल, यह किसका है?”

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वे बोले, ‘अरे बेटी, तुम क्यों परेशान होती हो, जिसका होगा वह अपने आप ले लेगा।”

परन्तु श्वेता के मन में खटका हुआ और उसने झट से परिचालक को उस लावारिस वस्तु के बारे में सूचना दे दी। परिचालक ने बच्ची की बात को गंभीरता से लिया और उसी समय बस रुकवाकर सवारियों से पूछा, “यह सामान किसका है भाई?”

सभी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। बार-बार पूछे जाने पर भी जब किसी ने उस वस्तु की जिम्मेवारी नहीं ली तो परिचालक ने सभी सवारियों को बस से उतर जाने का आदेश दिया। देखते ही देखते बस खाली हो गई और एक आशंका में उस सड़क पर आवागमन भी अवरुद्ध हो गया। इसी बीच पुलिस कंट्रोल-रूम में भी सूचना दे दी गयी और पलक झपकते ही विस्फोटक पदार्थ को निष्क्रिय करने वाला पुलिस का विशेष दस्ता वहां आ पहुंचा। लोग बस से बहुत दूर जाकर खड़े हो गए थे। पुलिस ने उस लावारिस वस्तु की जांच की तो वह कपड़े में लिपटा एक टिफिन-बॉक्स की शक्ल का बम निकला। जिसे एकदम निष्क्रिय कर दिया गया।

पुलिस कार्यवाही समाप्त होने के बाद लोग बस के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे और सबने श्वेता की मुक्त कंठ से भूरी-भूरी प्रशंसा की। उसके कारण ही तो कई व्यक्तियों की अनमोल जाने बच गई
थीं। पुलिस के अधिकारी ने श्वेता का नाम-पता नोट किया और उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “बेटी, हम तुम्हारे नाम का प्रस्ताव यथोचित पुरस्कार के लिए करेंगे। तुमने बहुत बड़ा काम किया है।” फिर पुलिस अधिकारी ने वहां उपस्थित लोगों से कहा, “देखा आप लोगों ने। अगर हम थोड़ी-सी सावधानी बरतें जैसा कि इस बच्ची ने किया तो कई जाने बचा सकते हैं और देश का भला कर सकते हैं। अपनी सीट के नीचे और आस-पास किसी लावारिस वस्तु पर संदेह करने में शर्म कैसी? हम थोड़ी-सी सावधानी बरतें तो कई हादसों से स्वयं तो बच ही सकते हैं अन्य कई लोगों की जाने भी बचा सकते हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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