For the best experience, open
https://m.grehlakshmi.com
on your mobile browser.

तेंतर - मुंशी प्रेमचंद

07:00 PM Jun 19, 2024 IST | Reena Yadav
तेंतर   मुंशी प्रेमचंद
Tentar by munshi premchand
Advertisement

आखिर वही हुआ, जिसकी आशंका थी, जिसकी चिंता में घर के सभी लोग और विशेषतः प्रसूता पड़ी हुई थी। तीन पुत्रों के पश्चात् कन्या का जन्म हुआ। माता सौर में सूख गई, पिता बाहर आंगन में सूख गए और पिता की वृद्धा माता सौर-द्वार पर सूख गई। अनर्थ, महा-अनर्थ! भगवान ही कुशल करें तो हो। यह पुत्री नहीं, राक्षसी है। इस अभागिनी को इसी घर में आना था! आना ही था तो कुछ दिन पहले क्यों न आयी? भगवान सातवें शत्रु के घर भी तेंतर का जन्म न दें।

पिता का नाम था पण्डित दामोदर दत्त, शिक्षित आदमी थे। शिक्षा विभाग ही में नौकर भी थे, मगर इस संस्कार को कैसे मिटा देते, जो परंपरा से हृदय में जमा हुआ था, कि तीसरे बेटे की पीठ पर होने वाली कन्या अभागिनी होती है- या पिता को लेती है या माता को, या अपने को। उसकी वृद्धा माता लगी नवजात कन्या को पानी पी-पीकर कोसने, कलमुंही है कलमुंही। न जाने क्या करने आयी है। यों ही किसी बाँझ के घर जाती तो उसके दिन फिर जाते।

दामोदर दत्त दिल में तो घबराए हुए थे, पैर माता को समझाने लगे- अम्मा, तेंतर-बेंतर कुछ नहीं, भगवान की जो इच्छा होती है, वही होता है। ईश्वर चाहेंगे तो सब कुशल ही होगा। गाने वालियों को बुला लो, नहीं लोग कहेंगे, तीन बेटे हुए तो कैसे फूली फिरती थीं, एक बेटी हो गई तो घर में कुहराम मच गया।

Advertisement

माता-अरे बेटा, तुम क्या जानो इन बातों को। मेरे सिर तो बीत चुकी है, प्राण नहीं में समाया हुआ है। तेंतर ही के जन्म से तुम्हारे दादा का देहान्त हुआ। तभी से तेंतर का नाम सुनते ही मेरा कलेजा काँप उठता है।

दामोदर- इस कष्ट के निवारण का भी तो कोई उपाय होगा?

Advertisement

माता- उपाय बताने को तो बहुत हैं। पंडितजी से पूछो तो कोई-न-कोई उपाय बता देंगे, पर इससे कुछ होता नहीं। मैंने कौन-से अनुष्ठान नहीं किए, पर पण्डितजी की तो मुट्ठियाँ गरम हुई, यहाँ जो सिर पर पड़ना था, वह पड़ ही गया। अब टके के पंडित रह गाए हैं। यजमान मरे या जिए, उनकी बला से, उनकी दक्षिणा मिलनी चाहिए। (धीरे से) लड़की दुबली-पतली भी नहीं है। तीनों लड़कों से हृष्ट-पुष्ट। बड़ी-बड़ी आँखें हैं, पतले-पतले लाल-लाल होंठ हैं, जैसे गुलाब का पत्ता। गोरा-चिट्ठा रंग है, लम्बी-सी नाक। कलमुंही नहलाते समय रोयी भी नहीं, टुकुर-टुकुर ताकती रही, यह सब लच्छन कुछ अच्छे थोड़े ही हैं।

दामोदर दत्त के तीनों लड़के साँवले थे। कुछ विशेष रूपवान भी न थे। लड़की के रूप का बखान सुनकर उनका चित्त कुछ प्रसन्न हुआ। बोले-अम्मा, तुम भगवान का नाम लेकर गाने वालियों को बुला भेजो, गाना-बजाना होने दो। भाग्य में जो कुछ है, यह तो होगा ही।

Advertisement

माता- जी तो हुलसता नहीं, करूँ क्या।

दामोदर- गाना न होने से कष्ट का निवारण तो होगा नहीं, कि हो जायेगा? अगर इतने सस्ते जान छूटे, तो न कराओ गाना।

माता- बुलाए लेती हूँ बेटा! जो कुछ होना था, वह तो हो गया।

इतने में दाई ने सौर में से पुकार कर कहा-बहू जी कहती हैं, गाना-वाना कराने का काम नहीं है।

माता- भला, उनसे कहो बैठी रहें, बाहर निकलकर मनमानी करेंगी। बारह ही दिन हैं, बहुत दिन हैं, बहुत इतराती फिरती थी- यह न करूंगी, वह न करूंगी, देवी क्या है, देवता क्या है, मर्दों की बातें सुनकर यही रट लगाने लगती थीं, तो अब चुपके से बैठती क्यों नहीं। मेमें तो तेंतर को अशुभ नहीं मानती और सब बातों में मेमों की बराबरी करती हैं, तो इस बात में भी करें।

यह कहकर माताजी ने नाइन को भेजा कि जाकर गानेवालियों को बुला ला, पड़ोस में भी कहती जाना।

सवेरा होते ही बड़ा लड़का सोकर उठा और आँखें मलता हुआ आकर दादी से पूछने लगा- बड़ी अम्मा, कल अम्मा को क्या हुआ?

माता- लड़की तो हुई है!

बालक खुशी से उछलकर बोला- ओ-हो-हो, पैजनियाँ पहन-पहनकर छुन-छुन चलेगी, जरा मुझे दिखा दो दादी जी।

माता- अरे क्या सौर में जायेगा, पागल हो गया है क्या?

लड़के की उत्सुकता न मानी। सौर के द्वार पर जाकर खड़ा हो गया और बोला- अम्मा, जरा बच्ची को मुझे दिखा दो।

दाई ने कहा- बच्ची अभी सोती है।

बालक- जरा दिखा दो, गोद में लेकर।

दाई ने कन्या उसे दिखा दी, तो वहाँ से दौड़ता हुआ अपने छोटे भाइयों के पास पहुँचा और उन्हें जगा-जगाकर खुशखबरी सुनायी।

एक बोला- नन्ही-सी होगी।

बड़ा- बिलकुल नन्ही-सी। बस, जैसी बड़ी गुड़िया! ऐसी भोली है कि क्या किसी साहब की लड़की होगी। यह लड़की मैं लूँगा।

सबसे छोटा बोला- हमको भी दिखा दो।

तीनों मिलकर लड़की को देखने आये और वहाँ से बगलें बजाते उछलते- कूदते बाहर आये।

बड़ा- देखा, कैसी है?

मझला- कैसी आँखें बंद किए पड़ी थी।

छोटा- इसे हमें तो देना।

बड़ा- खूब! द्वार पर बारात आएगी, हाथी, घोड़े, बाजे, आतिशबाजी।

मझला और छोटा ऐसे मगन हो रहे थे, मानो यह मनोहर दृश्य आँखों के सामने है। उनके सरल नेत्र मनोल्लास से चमक रहे थे।

मझला बोला- फुलवारियाँ भी होंगी।

छोटा- अम बी फूल लेंगे।

छठी भी हुई, बरही भी हुई, गाना-बजाना, खाना-खिलाना, देना-दिलाना सब-कुछ हुआ, पर रस्म पूरी करने के लिए, दिल से नहीं, खुशी से नहीं। लड़की दिन- दिन दुर्बल और अस्वस्थ होती जाती थी। माँ उसे दोनों वक्त अफीम खिला देती और बालिका दिन और रात नशे में बेहोश पड़ी रहती। जरा भी नशा उतरता तो भूख से विकल होकर रोने लगती। माँ कुछ ऊपरी दूध पिलाकर अफीम खिला देती। आश्चर्य की बात तो यह थी कि अबकी उसकी छाती में दूध ही नहीं उतरा। यों भी उसे दूध देर में उतरता था, पर लड़कों की बेर उसे नाना प्रकार की दूध-वर्द्धक औषधियाँ खिलाई जातीं, बार-बार शिशु को छाती से लगाया जाता, यहाँ तक कि दूध उतर ही आता था, पर इस बार यह आयोजनाएँ न की गईं। फूल- सी बच्ची कुम्हलाती जाती थी। माँ तो कभी उसकी ओर ताकती भी न थी। हां बाई कभी चुटकियाँ बजाकर पुचकारती तो शिशु के मुख पर ऐसी दयवीय, ऐसी करुण वेदना अंकित दिखाई देती कि वह आँखें पोंछती हुई चली जाती थी। बहू से कुछ कहने-सुनने का साहस न पड़ता था। बड़ा लड़का सिद्धू बार-बार कहता- अम्मा बच्ची को दो, तो बाहर से खिला लाऊँ। पर माँ उसे झिड़क देती थी।

तीन-चार महीने हो गए। दामोदर दत्त रात को पानी पीने उठे तो देखा कि बालिका जाग रही है। सामने ताख पर मिट्टी-तेल का दीपक जल रहा था, लड़की टकटकी बाँधे उसी दीपक की ओर देखती थी, और अपना अँगूठा चूसने में मग्न थी। चुभ-चुभ की आवाज आ रही थी। उसका मुख मुरझाया हुआ था, पर वह न रोती थी, न हाथ-पैर फेंकती थी, बस अँगुली पीने में ऐसी मग्न थी, मानों उसमें सुधा-रस भरा हुआ है। वह माता के स्तनों की ओर मुँह भी नहीं फेरती थी, मानो उसका उन पर कोई अधिकार नहीं, उसके लिए वहाँ कोई आशा नहीं। बाबू साहब को उस पर दया आयी। इस बेचारी का मेरे घर जन्म लेने में क्या दोष है? मुझ पर या इसकी माता पर जो कुछ भी पड़े, उसमें इसका क्या अपराध? हम कितनी निर्दयता कर रहे हैं कि एक कल्पित अनिष्ट के कारण उसका इतना तिरस्कार कर रहे हैं। माना कि कुछ अमंगल हो भी जाये, तो भी क्या उसके भय से इसके प्राण ले लिये जाएँगे? अगर अपराधी है, तो मेरा प्रारब्ध है। इस नन्हें-से बच्चे के प्रति हमारी कठोरता क्या ईश्वर को अच्छी लगती होगी? उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमने लगे। लड़की को कदाचित पहली बार सच्चे स्नेह का ज्ञान हुआ। वह हाथ-पैर उछाल कर ‘गूं-गूं’ करने लगी और दीपक की ओर हाथ फैलाने लगी। उसे जीवन-ज्योति-सी मिल गई।

प्रातःकाल दामोदर दत्त ने लड़की को गोद में उठा लिया और बाहर लाये। स्त्री ने बार-बार कहा- उसे पड़ी रहने दो, ऐसी कौन-सी बड़ी सुन्दर है, अभागिन रात-दिन तो प्राण खाती रहती है, मर भी नहीं जाती कि जान छूट जाये, किन्तु दामोदर दत्त ने न माना। उसे बाहर लाये और अपने बच्चों के साथ बैठकर खिलाने लगे। उनके मकान के सामने थोड़ी-सी जमीन पड़ी हुई थी। पड़ोस के किसी आदमी की एक बकरी उसमें आकर चरा करती थी। इस समय भी वह चर रही थी। बाबू साहब ने बड़े लड़के से कहा- सिद्धू, जरा उस बकरी को पकड़ो, तो इसे दूध पिलाएं, शायद भूखी है बेचारी। देखो, तुम्हारी नन्ही-सी बहन है न? इसे रोज हवा में खिलाया करो।

सिद्धू को दिल्लगी हाथ आयी। उसका छोटा आई भी दौड़ा। दोनों ने घेरकर बकरी को पकड़ा और उसका कान पकड़े हुए सामने लाये। पिता ने शिशु का मुँह बकरी के थन में लगा दिया। लड़की चुभलाने लगी और एक क्षण में दूध की धार उसके मुँह में जाने लगी, मानो टिमटिमाते दीपक में तेल पड़ जाये। लड़की का मुँह खिल उठा। आज शायद पहली बार उसकी क्षुधा तृप्त हुई थी। वह पिता की गोद में हुमक-हुमक कर खेलने लगी। लड़कों ने भी उसे खूब नचाया-कुदाया। उस दिन से सिद्धू को मनोरंजन का एक नया विषय मिल गया। बालकों को बच्चों से बहुत प्रेम होता है। अगर किसी घोंसले में चिड़िया का बच्चा दिख जाए, तो बार-बार वहाँ जायेंगे। देखेंगे कि माता बच्चे को कैसे दाना चुगाती है। बच्चा कैसे चोंच खोलता है, कैसे दाना लेते समय पैरों को फड़फड़ा कर चें-चें करता है। आपस में बड़े गम्भीर भाव से उसकी चर्चा करेंगे, अपने अन्य साथियों को ले जाकर उसे दिखाएँगे। सिद्धू ताक में लगा रहता, ज्यों ही माता भोजन बनाने या स्नान करने जाती, तुरन्त बच्ची को लेकर आता और बकरी को पकड़कर उसके थन से शिशु का मुँह लगा देता, कभी-कभी दिन में दो-दो तीन-तीन बार पिलाता। बकरी को भूसी-चोकर खिलाकर ऐसा परचा लिया कि वह स्वयं चोकर के लोभ से चली आती और दूध देकर चली जाती। इस भांति कोई एक महीना गुजर गया, लड़की हृष्ट-पुष्ट हो गई, मुख पुष्प के समान विकसित हो गया। आँखें जाग उठीं, शिशु काल की सरल आभा मन को हरने लगी।

माता उसे देख-देखकर चकित होती थी। किसी से कुछ कह तो न सकती, पर दिल में उसे आशंका होती थी कि अब यह मरने की नहीं, हमीं लोगों के सिर जाएगी। कदाचित ईश्वर इसकी रक्षा कर रहे हैं, तभी तो दिन-दिन निखरती आती है, नहीं अब तक तो ईश्वर के घर पहुँच गई होती।

मगर दादी माता से कहीं ज्यादा चिंतित थी। उसे श्रम होने लगा कि वह बच्ची को खूब दूध पिला रही है, साँप को पाल रही है। शिशु की ओर आँख उठाकर भी न देखती । यहाँ तक कि एक दिन कह ही बैठी-लड़की का बड़ा छोह करती हो? हाँ भाई, माँ हो कि नहीं, तुम न छोह करोगी तो करेगा कौन?

‘अम्मा जी, ईश्वर जानते हैं, जो मैं इसे दूध पिलाती होऊँ?’

‘अरे, तो मैं मना थोड़े ही करती हूँ। मुझे क्या गरज पड़ी है कि मुफ्त में अपने ऊपर पाप लूँ, कुछ मेरे सिर तो जायेगी नहीं।’

‘अब आपको विश्वास ही न आये तो कोई क्या करे?’

‘मुझे पागल समझती हो, यह हवा पी-पीकर ऐसी हो रही है?’

‘भगवान जाने अम्मा मुझे तो आप ही आश्चर्य होता है।’

बहू ने बहुत निर्दोषिता जताई, किन्तु वृद्धा सास को विश्वास न आया। उसने समझा, यह शंका को विरुद्ध समझती है, मानो मुझे इस बच्ची से कोई बैर है। उसके मन में यह भाव अंकुरित होने लगा कि इसे कुछ हो जाये, तब यह समझे कि मैं झूठ नहीं कहती थी। यह जिन प्राणियों को अपने प्राणों से भी प्रिय समझती थी, उन्हीं लोगों की अमंगल कामना करने लगी, केवल इसलिए कि मेरी शंकाएँ सत्य हो जायें। वह यह तो नहीं चाहती थी कि कोई मर जाये, पर इतना अवश्य चाहती थी कि किसी बहाने से मैं चेता दूँ कि देखा, तुमने मेरा कहा न माना, यह उसी का फल है।

उधर सास की ओर से ज्यों-ज्यों यह द्वेष-भाव प्रकट होता था, बहू का कन्या के प्रति स्नेह बढ़ता था। ईश्वर से मनाती रहती थी कि किसी भांति एक साल कुशल से कट जाता तो इनसे पूछती। कुछ लड़की का भोला-भाला चेहरा, कुछ अपने पति का प्रेम-वात्सल्य देखकर भी उसे प्रोत्साहन मिलता था। विचित्र दशा हो रही थी, न दिल खोलकर प्यार ही कर सकती थी, न सम्पूर्ण रीति से निर्दय होते ही बनता था। न हंसते बनता था, न रोते।

इस भांति दो महीने और गुजर गए और कोई अनिष्ट न हुआ। तब तो वृद्धा सारा के पेट में चूहे दौड़ने लगे। बहू को दो-चार दिन ज्वर भी नहीं आ जाता कि मेरी शंका की मर्यादा रह जाये, पुत्र भी किसी दिन पैर-गाड़ी पर से नहीं गिर पड़ता, न बहू के मैके ही से किसी के स्वर्गवास की सुनावनी आती है। एक दिन दामोदर दत्त ने खुले तौर पर कह ही दिया कि अम्मा, यह सब ढकोसला है, तेंतर लड़कियाँ क्या दुनिया में होती ही नहीं, तो सबके माँ-बाप मर ही जाते हैं? अन्त में उसने अपनी शंकाओं को यथार्थ सिद्ध करने की एक तरकीब सोच निकाली। एक दिन दामोदर दत्त स्कूल से आये, तो देखा कि अम्मा जी खाट पर अचेत पड़ी हुई हैं, स्त्री अँगीठी में आग रखे उनकी छाती सेंक रही है और कोठरी के द्वार और खिड़कियाँ बन्द हैं। घबराकर कहा- अम्मा, क्या हुआ है?

स्त्री- दोपहर ही से कलेजे में एक शूल उठ रहा है, बेचारी बहुत तड़प रही है।

दामोदर- मैं जाकर डॉक्टर साहब को बुला लाऊँ? देर करने से शायद रोग बढ़ जाये। अम्मा जी, कैसी तबीयत है?

माता ने आँखें खोली और कराहते हुए बोली- बेटा, तुम आ गये? अब न बचूँगी, हाय भगवान, अब न बचूंगी। जैसे कोई कलेजे में बरछी चुभा रहा हो। ऐसी पीड़ा कभी न हुई थी। इतनी उम्र बीत गई, ऐसी पीड़ा नहीं हुई।

स्त्री- यह कलमुंही छोकरी न जाने किस मनहूस घड़ी में पैदा हुई।

सास- बेटा, सब भगवान करते हैं, वह बेचारी तो क्या जाने! देखो, मैं मर जाऊँ तो उसे कष्ट मत देना। अच्छा हुआ, मेरे सिर आयी। किसी के सिर तो जाती ही, मेरे ही सिर सही। हाय भगवान, अब न बचूंगी।

दामोदर- जाकर डॉक्टर बुला लाऊँ? अभी लौटा आता हूँ।

माताजी को केवल अपनी बात की मर्यादा निभानी थी, रुपये न खर्च कराने थे। बोली- नहीं बेटा, डॉक्टर के पास जाकर क्या करोगे? अरे, वह कोई ईश्वर है? डॉक्टर क्या अमृत पिला देगा, दस-बीस वह भी ले जायेगा। डॉक्टर- वैद्य से कुछ न होगा। बेटा, तुम कपड़े उतारो, मेरे पास बैठकर भागवत पढ़ो। अब न बचूँगी, हाय राम!

दामोदर- तेंतर बुरी चीज है। मैं समझता था कि ढकोसला-ही-ढकोसला है।

स्त्री- इसी से मैं उसे मुँह नहीं लगाती थी।

माता- बेटा, बच्चों को आराम से रखना, भगवान तुम लोगों को सुखी रखे। अच्छा हुआ, मेरे ही सिर गयी, तुम लोगों के सामने मेरा परलोक हो जायेगा। कहीं किसी दूसरे के सिर जाती, तो क्या होता राम। भगवान ने मेरी विनती सुन ली। हाथ! हाय!

दामोदर दत्त को निश्चय हो गया कि अब अम्मा न बचेंगी। बड़ा दुःख हुआ। उनके मन की बात होती, तो वह माँ के बदले तेंतर को न स्वीकार करते। जिस जननी ने जन्म दिया, नाना प्रकार के कष्ट झेलकर उनका पालन-पोषण किया, अकाल वैधव्य को प्राप्त होकर भी उनकी शिक्षा का प्रबंध किया, उसके सामने एक दुधमुंही बच्ची का क्या मूल्य था, जिसके हाथ का एक गिलास पानी भी वह न जानते थे। शोकातुर हो कपड़े उतारे और माँ के सिरहाने बैठकर भागवत की कथा सुनाने लगे।

रात को बहू भोजन बनाने चली, तो सास से बोली- अम्मा जी, तुम्हारे लिए थोड़ा-सा साबूदाना छोड़ दूँ?

माता ने व्यंग्य करके कहा- बेटी, अन्न बिना मारो, भला साबूदाना मुझसे खाया जायेगा, जाओ, थोड़ी पूरियाँ छान लो। पड़े-पड़े जो कुछ इच्छा होगी, खा लूँगी। कचौरियाँ भी बना लेना। मरती हूँ तो भोजन को तरस-तरस क्यों मरूँ? थोड़ी मलाई भी मँगवा लेना, चौक की हो। फिर थोड़ी खाने आऊंगी बेटी! थोड़े- से केले मँगवा लेना, कलेजे के दर्द में केले खाने से आराम होता है।

भोजन के समय पीड़ा शान्त हो गई, लेकिन आधे घण्टे बाद फिर जोर से होने लगी। आधी रात के समय कहीं जाकर उनकी आँख लगी। एक सप्ताह तक उनकी यही दशा रही, दिन-भर पड़ी कराह करती, बस भोजन के समय जरा वेदना कम हो जाती। दामोदर दत्त सिरहाने बैठे पंखा झलते और मातृ-वियोग के आगत शोक से रोते। घर की महरी ने मुहल्ले-भर में यह खबर फैली दी। पड़ोसिने देखने आयीं और सारा इल्जाम उसी बालिका के सिर गया।

एक ने कहा- यह तो कहो, बड़ी कुशल हुई कि बुढ़िया के सिर गई, नहीं तो तेंतर माँ-बाप, दो में से एक को लेकर तभी शान्त होती है। दैव न करे कि किसी के घर तेंतर का जन्म हो।

दूसरी बोली- मेरे तो तेंतर का नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भगवान बाँझ रखे, पर तेंतर न दे।

एक सप्ताह के बाद वृद्धा का कष्ट निवारण हुआ, मरने में कोई कसर न थी, यह तो कहो, पुरुखों का पुण्य-प्रताप था। ब्राह्मणों को गो-दान दिया गया। दुर्गा- पाठ हुआ, तब कहीं जाके संकट कटा।

□□□

Advertisement
Tags :
Advertisement