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इस शनि मंदिर में होती हैअनोखी परंपरा, भक्त लगाते हैं शनिदेव को गले: Shani Dev Temple

06:30 AM Jun 25, 2024 IST | Ayushi Jain
इस शनि मंदिर में होती हैअनोखी परंपरा  भक्त लगाते हैं शनिदेव को गले  shani dev temple
Shani Dev Temple
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Shani Dev Temple: देशभर में शनिदेव के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें से कुछ अपनी अनोखी विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं। ऐसा ही एक अनोखा मंदिर मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित ऐंति गांव अपनी धार्मिक धरोहर के लिए जाना जाता है। इस गांव में शनिदेव का एक प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसे ऐंति शनि मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां भक्तगण शनिदेव की प्रतिमा को गले लगाकर दर्शन करते हैं। यह मंदिर अपनी इस अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, जो इसे अन्य शनिदेव मंदिरों से अलग बनाता है। आइए, इस लेख में हम इस मंदिर की कहानी, यहाँ की मान्यताओं और इसकी विशेषताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

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शनि देव को क्यों लगाया जाता है गले

कई लोगों का मानना ​​है कि शनिदेव को गले लगाने से शनि की साढ़े साती और कुंडली में दोषों से राहत मिलती है। शनि ग्रह को कर्मों का ग्रह माना जाता है, और साढ़े साती के दौरान ग्रह का नकारात्मक प्रभाव जीवन में अनेक बाधाएं ला सकता है।

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एक अन्य मान्यता यह है कि शनिदेव को गले लगाने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शनिदेव को न्याय और सत्य का देवता भी माना जाता है, और यह माना जाता है कि वे भक्तों की सच्ची प्राथना को सुनते हैं और उन्हें पूरा करते हैं।

कुछ लोगों का मानना ​​है कि शनिदेव को गले लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शनिदेव को अंधकार और नकारात्मकता का नाश करने वाला देवता माना जाता है, और उनका स्पर्श भक्तों को इन नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।

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अंत में, ऐसा माना जाता है कि शनिदेव को गले लगाने से भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। शनिदेव को ग्रहों का अधिपति माना जाता है, और उनका आशीर्वाद जीवन में सफलता, समृद्धि और खुशी लाता है।

मंदिर से जुड़ी मान्यता

इस मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि यहां शनिदेव की मौजूद प्रतिमा त्रेता युग से विराजमान है। कहा जाता है कि यह मंदिर नेता नामक एक ऋषि ने स्थापित किया था। मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। इस कथा के अनुसार, जब रावण ने सभी नव ग्रहों को बंदी बनाकर अपने महल में कैद कर लिया था, तब उसने शनिदेव को एक विशेष स्थान पर रखा था। रावण चाहता था कि शनिदेव की दृष्टि उस पर या उसके राज्य पर न पड़ सके।

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रामायण के अनुसार, लंका दहन के समय हनुमान जी ने शनिदेव को रावण के चंगुल से मुक्त कराया था। जब हनुमान जी शनिदेव को लंका दहन करने के बाद रावण के चंगुल से छुड़ा लाये थे, तब उन्होंने शनिदेव को ऐंति पर्वत पर विश्राम करने के लिए छोड़ दिया था। तब यहां पहले पर्वत हुआ करता था। यहां रहते हुए शनिदेव ने घोर तपस्या की। ऐसा माना जाता है कि हनुमान जी ने स्वयं शनिदेव की पूजा का विधान ऐंति पर्वत पर स्थापित किया था। हनुमान जी द्वारा पूजे जाने पर शनिदेव भावुक हो गए थे। शनिदेव के नेत्रों में आंसुओं को देखकर हनुमान जी ने पूजा करने के बाद उन्हें गले लगा लिया था।

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