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वापसी संभव नहीं!-गृहलक्ष्मी की कहानियां

01:00 PM Jun 15, 2024 IST | Sapna Jha
वापसी संभव नहीं  गृहलक्ष्मी की कहानियां
Wapsi Sambhav Nahi
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Story in Hindi निधि को एक सेमिनार के लिए देहरादून जाना था। मम्मी ने भी साथ आने की इच्छा जताई। देहरादून पहुंचते ही मौसी एयरपोर्ट आ गईं और माँ को साथ ले गई। इस तरह निधि के काम के साथ माँ और मौसी का मिलना हो गया। अगले दिन हरिद्वार चलने का कार्यक्रम बना। सुबह- सुबह तीनों हरिद्वार के लिए निकल गए। आह! क्या स्थान था और कितनी शांति थी. दिल करता था सब छोड़कर वहीं रुक जाए मगर गृहस्थ जीवन से पलायन भी कहां संभव है।
विकास बार बार निर्देश देते हुए फोन कर रहा था। निधि ने आखिरी मैसेज लिख कर फोन को पर्स में डाल दिया।
"पतिदेव! माना कि बच्चों की जिम्मेदारी निभाकर आप बेहतरीन काम कर रहे हैं मगर एक दिन की शांति मुझे भी दें ताकि सशरीर जहां आई हूं उस जगह को पूरी तरह जी तो लूं!"
ऐसा लिखना नहीं चाहती थी मगर वह भी क्या करे..उसका काम ही कुछ ऐसा है थोड़े समय की छुट्टी न ले तो दिमाग पर असर पड़ जाए..इधर उसे गुमसुम देख कर मौसी ने पूछ लिया,
"क्या हुआ बिटिया..परेशान लग रही हो…?"
"इतनी सुन्दर जगह देख कर सारी परेशानी खत्म हो गई मौसी.. अब आप दोनों मुस्कुराओ..कुछ फोटोज लेकर इन नजारों को हमेशा के लिए कैद कर लूं "
ये कह कर एक- दो नहीं उसने पचासों फोटोज लिया। पहाड़ की खूबसूरत वादी, पवित्र गंगा की कलकल,भक्ति में ओतप्रोत लोग और बिना लहसुन प्याज के शुद्ध सात्विक भोजन जीने के लिए भला और क्या चाहिए। मन इस रम्य वातावरण में रम गया था। कुछ भूख सी लग आई तो नजदीक के होटल में खाने का ऑर्डर दे दिया।
"फोटो दिखा बेटा.. जो अच्छी आई हों वही फैमिली ग्रुप में डालना वरना फोन को भी खाली करना एक काम हो जाता है। "
व्हाट्स अप मैसेज से परेशान मम्मी ने जब कहा तो वाकई उनकी समस्या समझ में आई। सचमुच हमलोग का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। बचपन से पढ़ाई करते हुए कितना कुछ सीखते हैं उसमें कितना कम काम में आता है बाकी की सारी बातें मेमोरी डिस्क बेकार ही पड़ी रहती हैं काश कि दिमाग का कोई डिलीट बटन होता तो सब फालतु बातों को डिलीट कर डालती यही सोचती फैमिली ग्रुप के लिए फ़ोटोज चुनती हुई अचानक चौंक पड़ी।
"डॉक्टर निहारिका …यहां कैसे…?"
वही दूधिया रंगत,वही कद काठी,चेहरे पर वही ओज गंगा किनारे की कई तस्वीरों में वह कैद हो गई थी। उसने तुरंत वह तस्वीर विकास को भेजी तो उसका जवाब आया।
"अरे हां ये तो वही है मगर वहां कैसे .. न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के ऑनकोलॉजी डिपार्टमेंट से उनका ऑफर लेटर आया था .."

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"तुम्हें कैसे पता…?"

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"यहां से इस्तीफा देते वक्त कॉल लेटर जमा किया था …"
निधि ने मन ही मन कुछ तय कर लिया और मम्मी और मौसी के साथ मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गई.. लोगों की आवाजाही लगी हुई थी मगर उसे वह चेहरा अब भी नहीं दिखा जिसे देखने के लिए यात्रा से अल्पविराम लिया था..आधे घंटे के बाद मौसी भी जोर देने लगीं,
"समय रहते निकल लो बिटिया फिर शाम हो जाएगा.." तब उसने मौसी को डॉक्टर निहारिका की तस्वीर दिखाई और कहा,
"मौसी .. ये बहुत बड़ी डॉक्टर है यहां आपकी तस्वीरें लेते वक्त इनकी झलक मिली बस मिलकर कुछ बातें कर लूं फिर चलती हूं.."
"अरे! इसकी खातिर रुकी हो तो पहले बताती … इ तो यहां रुद्राक्ष और स्फटिक के माला की दुकान करती हैं..देश विदेश के लोग उनसे ही माला खरीदते हैं… दो साल से ही दुकान खुला है..मगर बिजनेस खूब चलता है..!"
और कुछ ही मिनटों में हम डॉक्टर निहारिका के सामने थे। हमेशा बूटीक की ड्रेसेस पहनने वाली ने नारंगी रंग का कफ्तान पहन रखा था। गले में पड़ी स्फटिक की माला उनके रूप को खूब निखार रही थी।
"डॉक्टर निहारिका….?"
"ओह! तो तुमने मुझे पहचान ही लिया..?"निधि के यह बोलते ही वह जैसे गहरी नींद से जागी।
"आप जैसी प्रतिभावान व्यक्तित्व को भला कोई कैसे भूल सकता है.."
"मैं अपने आपको ही भूलने की कोशिश में लगी हूं तभी तो प्रकृति की गोद में आ पहुंची.. मगर इंसान अपने अतीत से चाहे जितना भी भागना चाहे.. भाग नहीं पाता है..अतीत से मुंह मोड़ना आसान नहीं है!"

"आप ये बताएं कि न्यूयॉर्क से यहां क्यों और कैसे..?"
"ये न्यूयॉर्क से हरिद्वार का सफ़र नहीं बल्कि मेरा स्वयं से पलायन का सफ़र है…!"
"माफ़ कीजिए डॉक्टर.. मैं कुछ समझी नहीं…!

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"देखो! तुमने रेडियोलॉजी में रिसर्च किया है और तुम उनसे कैंसर का इलाज करती हो मगर कब तक अपने मरीज को बचा पाती हो?"

"कीमोथेरेपी के बाद पांच से दस साल अमूमन जी ही लेते हैं..मगर रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी हुई तो और ज्यादा भी!"
"मरीज की औसत आयु अगर पांच साल बढ़ती है तो भी घर परिवार की बचत का एक बड़ा हिस्सा उसके इलाज में जाता है.. अस्पताल को नजदीक से जानने के बाद तो यही कह सकते हैं कि उस समस्त धनराशि का पच्चीस प्रतिशत इलाज में खर्च होता है बाकी का पचहत्तर प्रतिशत अस्पताल का मुनाफा..यह सब देख कर मैं बहुत दुखी होती थी.. मैंने मरीजों के साथ आए उनके परिजनों को हाथ जोड़े विनती करते देखा..बड़े बड़े घरों के लोगों को सड़क पर आता देखा तब से से संसार से ऐसी वितृष्णा हुई कि अध्यात्म के सफर पर निकल पड़ी.."

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"तो आप न्यूयार्क नहीं गईं?"

"मैं नहीं चाहती थी कि मुझे कोई ढूंढे इसलिए ही उस ऑफर लेटर के बहाने इस्तीफा देकर यहां …
"फिर ये रुद्राक्ष का बिजनेस?"
"बस मन रमाने के लिए..कैंसर के कीटाणु और इनमें क्या फर्क…कैंसर इंसान को जीने से पहले मार देता है और ये किसी को भी बड़ी से बड़ी बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है..तुम्हें शायद पता नहीं कि रुद्राक्ष का इस्‍तेमाल विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है और इसका मन और शरीर पर शांत प्रभाव पड़ता है। रुद्राक्ष मानसिक धैर्य को मजबूत करता है एक ऊर्जा का प्रवाह करता है जो मन और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।"
देश के टॉप लेवल के मेडिकल कॉलेज से पढ़ी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलनेवाली 'डॉक्टर निहारिका सुप्रसिद्ध ऑनकोलॉजिस्ट' की कोई छाप उस वक्त उनमें नज़र नहीं आ रही थी। लेकिन उनके अद्भुत प्रतिभा को देश विदेश के डॉक्टर्स पहचानते थे। ये बात निधि कैसे भूल सकती थी।
ख़ैर उसे तो वापस लौटना भी था। माँ और मौसी काफी थक गईं थीं मगर निधि उन्हें पूरा समझे बिना लौटने को तैयार न थी तो आखिरी बार आग्रह किया,"आप डॉक्टर हैं आपने मरीजों के मदद की शपथ ली थी..इसे कैसे भूल सकती हैं..कितने डॉक्टर्स इतने ज़हीन होते हैं..आप अपने प्रतिभा को जाया कैसे कर सकती हैं?"

निधि की बातों ने उस मासूम चेहरे की भाव-भंगिमा को पूरा ही बदल दिया। उनकी आँखों में निराशा के बादल छा गए।

"मेरी आँखों ने सदा कैंसर के सूक्ष्म से सूक्ष्म कीटाणुओं को देखा है अब मुझे वापस उस दुनिया में नहीं जाना है..जीवन और मृत्यु मेरे नहीं ऊपर वाले के हाथ में है उसका व्यापार नहीं करना है.. ज़रा सोचो उनके बारे में जो कैंसर डिटेक्ट होने के बाद अपना जीवन जीना छोड़ देते हैं और उनके साथ उनका पूरा परिवार भी उस तकलीफ को झेलता जीते जी मर जाता है अगर उन्हें पता ही न हो कि उन्हें कैंसर है तब वे सभी स्वाभाविक जीवन जीते और सहज मौत ही मरते। भय व दहशत में तिल- तिल कर तो नहीं। क्या यह उनके लिये बेहतर न होता। मैंने इतने सारे लोगों के रिपोर्ट पर कैंसर लिखा और जीते जी उन्हें मौत के करीब ले आई। अब मुझसे ये सब न हो सकेगा!"

कहकर उन्होंने मुंह फेर लिया। आवाज में
असहनीय पीड़ा थी। निधि जिन्हें डॉक्टर और मरीजों की दुनिया में वापस लाने चली थी उसने लौटकर न आने की कसम खाई थी।
उनसे मिलकर यही लगा कि यह जीवन तो एक मायाजाल है जहां सभी किसी न किसी उधेड़बुन में लगे हैं जो एक बार इससे मुक्त होकर निकल गया उसकी वापसी संभव नहीं!

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