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राजर्षि - रवीन्द्रनाथ टैगोर

12:45 PM Feb 15, 2024 IST | Reena Yadav
राजर्षि   रवीन्द्रनाथ टैगोर
Rajarshi by Rabindranath Tagore
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"राजर्षि" एक उपन्यास है जो रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन और उनके साहित्यिक योगदान पर आधारित है। यह उपन्यास उनके सोच, उनके लेखन, और उनके विचारों को विस्तार से वर्णित करता है।

"राजर्षि" कहानी उनके जीवन की ऊँचाइयों और गहराईयों को दर्शाती है, जैसे कि उनके साहित्यिक सफलताओं के पीछे की कठिनाइयाँ, उनकी विचारशीलता, और समाज में उनके दृष्टिकोण की महत्वपूर्ण प्रतिष्ठा।

इस उपन्यास में, टैगोर के विचार, उनकी कल्पना, और उनके साहित्य के महत्वपूर्ण कार्यों की गहराई को अद्वितीय रूप से प्रकट किया गया है। उपन्यास में उनके संघर्ष, संघर्षों को पार करने के उनके साहसिकता और उनके विचारों के प्रभाव को संजीव किया गया है।

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"राजर्षि" एक उपन्यास है जो रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन, कार्य, और विचारों को एक महत्वपूर्ण और समर्पित धारावाहिक रूप में प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास उनके साहित्य के प्रेमी और उनके शिष्यों के लिए एक अद्वितीय संदर्भ है।

रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के एक अग्रणी कवि, लेखक, और दार्शनिक थे। उनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ था। टैगोर को 'गुरुदेव' के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें, कविताएं, नाटक, और गीत लिखे।

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रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं में गांधीवाद, भारतीय संस्कृति, प्रकृति, और मानवता के प्रति प्रेम का विविध रूप से व्यक्तित्व किया गया है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए, जैसे कि स्त्री शिक्षा, धर्म, स्वतंत्रता, और समाजिक बदलाव।

उन्होंने भारतीय साहित्य को नई दिशा दी और उनके काव्य में सरलता, गंभीरता, और विचारों की गहराई थी। उनका काव्य आधुनिक भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है और उनके योगदान को सम्मान और स्मृति मिलती रहेगी।

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रवींद्रनाथ टैगोर ने 13 अगस्त 1941 को अपने विचारों और साहित्य के प्रेमियों के बीच अपने अंतिम समय बिताया। उनका योगदान भारतीय समाज और साहित्य में अमर रहेगा।

भुवनेश्वरी मंदिर का पत्थर से बना घाट गोमती नदी से मिला हुआ है। त्रिपुरा के महाराजा गोविन्दमाणिक्य ग्रीष्मऋतु की एक सुबह स्नान करने आये हैं, उनके साथ उनके छोटे भाई नक्षत्रराय भी आये हैं। उसी समय एक छोटी सी लड़की अपने छोटे भाई के साथ घाट पर आयी। राजा की धोती पकड़ कर पूछने लगी, “कौन हो तुम?”

राजा मुस्कुराकर बोले, “मां, मैं तुम्हारी संतान हूं।”

वह लड़की बोली, “मुझे पूजा के लिये फूल तोड़कर दे दो।”

राजा ने कहा, “ठीक है, चलो।”

राजा के सिपाही बेचैन हो उठे। उन्होंने कहा “महाराज, आप क्यों जाते हैं, हम तोड़ लाते हैं।”

राजा ने कहा, “नहीं जब इसने मुझसे कहा है, तो मैं ही तोड़ कर दूंगा।”

राजा ने उस बालिका की ओर देखा। सुबह की विमल उषा जैसा बालिका का चेहरा था। जब वह राजा का हाथ पकड़ कर मंदिर के पास वाले फूलों के बगीचे में घूम रही थी। तब चारों ओर के सफेद बेल फूलों जैसे उसके चेहरे से एक विमल सौरभ का भाव सुबह इस बगीचे में व्याप्त हो रहा था। छोटा भाई अपनी बहन का पल्लू पकड़े साथ-साथ घूम रहा था। वह सिर्फ अपनी दीदी को पहचानता था। राजा से उसकी ज्यादा बातचीत नहीं हुई। राजा ने बालिका से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है बेटा?”

बालिका ने उत्तर दिया, “हंसी।”

राजा ने उसके भाई से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

वह बड़ी-बड़ी आंखों से अपनी बहन को देखने लगा, कोई उत्तर नहीं दिया।

हंसी ने उसे सहलाकर कहा, “बोल ना भाई, मेरा नाम ताता है।”

उस बच्चे ने बड़े ही गंभीर भाव से अपने छोटे-छोटे होंठ खोले और अपनी दीदी की प्रतिध्वनि की तरह कहा, “मेरा नाम ताता है।” कहकर दीदी का आंचल और जोर से पकड़ लिया।

हंसी ने राजा को समझाते हुए कहा, “यह अभी छोटा है न, इसलिये सब इसे ताता कहते हैं।” छोटे से भाई की ओर देखकर बोली, “अच्छा, बोल तो, मंदिर।”

वह बच्चा दीदी की ओर देखकर बोला, “लदद।

हंसी हंसती हुई बोली, ‘ताता मंदिर नहीं बोल पाता। कहता है लदद’

‒अच्छा बोल तो ”कड़ाही।“

वह बच्चा गंभीर भाव से बोला ”बड़ाही।“

हंसी फिर से हंसकर बोली, ”हमारा ताता कड़ाही भी नहीं बोल पाता, कहता है बड़ाही। कहकर उसे बार चूमने लगी।

अचानक दीदी की इतनी हंसी और प्यार करने का कोई कारण ताता को समझ नहीं आया। वह तो सिर्फ टुकुर-टुकुर देखता रहा। यह सच है कि मंदिर और कड़ाही ताता ठीक से बोल नहीं पाता था। ताता जितनी उम्र में हंसी मंदिर को कभी भी लदद नहीं कहती थी, वह मंदिर को पालु कहती थी, और वह कड़ाही को बड़ाही कहती थी या नहीं यह तो नहीं पता मगर कड़ी को थई कहती थी, इसलिए ताता के विचित्र उच्चारण सुनकर उसे अगर हंसी आती है तो इसमें आश्चर्य क्या है? ताता के विषय में बहुत सी घटनाएं वह राजा को सुनाने लगी। एक बार एक बुड्ढा कंबल ओढ़कर आया था। ताता ने उसे भालू कहा था, ताता में अक्ल ही इतनी कम है। और एकबार पेड़ पर पपीते लगे देख उन्हें पक्षी समझ कर अपने मोटे-मोटे छोटे हाथों से ताली बजाकर उन्हें उड़ाने की कोशिश कर रहा था। ताता हंसी से बहुत छोटा और भोला है, यह बात ताता की दीदी ने बहुत से उदाहरण देकर प्रमाणित कर दी। ताता अपनी बुद्धि के विषय में यह सारी बातें अविचलित चित्त से सुन रहा था, जितनी उसे समझ आया उसमें उसे नाराज होने का कोई कारण नजर नहीं आया। इस तरह उस दिन सुबह फूल तोड़ना समाप्त हुआ। राजा ने जब छोटी लड़की के आंचल में फूल भर दिये तब राजा को लगा जैसे उनकी पूजा समाप्त हुई। इन दोनों में सरल स्नेह का दृश्य देखकर, इस पवित्र हृदय की आस मिटाकर फूल तोड़कर जैसे उन्होंने देवपूजा कर ली हो।


अगले दिन से सुबह उठने के पश्चात सूर्य के उदय होने पर भी राजा की प्रभात नहीं होती थी, छोटे-छोटे दोनों भाई-बहन की सूरत देखकर ही उनकी सुबह होती, रोज उनको फूल तोड़कर देने के पश्चात ही वे स्नान करते; दोनों भाई-बहन घाट पर बैठकर उनको स्नान करते हुए देखते। जिस दिन यह भाई-बहन नहीं आते उस दिन राजा की पूजा जैसे अधूरी रह जाती।

हंसी और ताता के माता-पिता नहीं थे। सिर्फ एक चाचा है। चाचा का नाम केदारेश्वर था। यह दो बच्चे ही उनके जीवन का समस्त सहारा और सुख थे।

एक साल बीत गया। ताता अब मंदिर ठीक से कह पाता है, मगर अभी भी कड़ाही को बड़ाही कहता है। वह ज्यादा बातें नहीं करता। गोमती नदी के तट पर उस बड़े से पेड़ के नीचे पैर फैलाकर बैठकर उसकी दीदी उसे जो भी कहानी सुनाती, वह डबडबायी आँखों से अवाक् रहकर सुनता। उस कहानी का कोई सिर-पैर नहीं होता, मगर उसे क्या समझ आता यह तो वही जाने। कहानी सुन-कर उस पेड़ के नीचे, उस सूर्य के प्रकाश में, उस खुली हवा में, इस छोटे से बच्चे के छोटे से हृदय में कितनी बातें, कितनी तस्वीर उभरती, यह हम क्या जाने। ताता किसी और बच्चे के साथ नहीं खेलता था, अपनी बहन के साथ छाया की तरह रहता।

आषाढ़ का महीना था। सुबह से ही घने बादल छाये हुए थे। अभी भी बारिश शुरू नहीं हुई थी, मगर लग रहा था कि बस अभी बरसात होने ही वाली है। बारिश की हल्की बूंदें लिए ठंडी हवा बह रही थी। गोमती नदी के पानी पर और उसके दोनों तटों के पार के जंगल में अंधेरे आसमान की छाया पड़ रही थी। कल रात अमावस थी, कल भुवनेश्वरी की पूजा भी हो चुकी थी।

रोज की तरह हंसी और ताता का हाथ पकड़कर राजा नहाने आये हैं। सफेद पत्थर पर से कुछ खून बहकर पानी की ओर गया हुआ है। कल रात जो एक सौ एक भैरों की बलि हुई थी यह उन्हीं का खून था।

हंसी वह खून देखकर अचानक संकोच से दूर हट कर बोली, “यह कैसा निशान है पिताजी?”

राजा ने कहा, “खून का निशान है बेटी।”

वह बोली, “इतना खून क्यों?”

बालिका के इस प्रश्न में इतना दर्द था कि राजा के हृदय में बार-बार यह सवाल उठने लगा “इतना खून क्यों?” उनका शरीर बार-बार सिहर उठता।

काफी सालों से प्रत्येक वर्ष इसी तरह खून देखते आये थे। मगर इस छोटी-सी बालिका के प्रश्न को सुनकर उनके मन में भी बार-बार यही उदय होने लगा ‘इतना खून क्यों।’ वे उत्तर देना भूल गए। अनमने से नहाते नहाते इसी प्रश्न के विषय में सोचने लगे।

हंसी अपना आंचल पानी में भिगोकर सीढ़ियों में बैठकर धीरे-धीरे उस खून के निशान को धोने लगी, उसको ऐसा करते देख छोटा भाई भी अपने छोटे-छोटे हाथों से वही करने लगा, हंसी का आंचल खून से लाल हो गया। राजा जब नहाकर आये तो देखा कि दोनों भाई-बहन ने मिलकर खून साफ कर दिया था।

उस दिन घर लौटकर हंसी को बुखार हो गया। ताता अपनी दीदी के पास बैठकर अपनी अंगुलियों से उसकी बंद आंखों को खोलने की कोशिश करते हुए पुकार रहा था “दीदी।” दीदी रह-रहकर चौंक उठती।

“क्या है ताता” कहकर उसे अपने पास खींच लेती और फिर उसकी आंखें बंद हो जाती। ताता चुपचाप बैठकर दीदी के चेहरे को देखता रहता, कुछ नहीं कहता। अन्ततः काफी देर बाद धीरे-धीरे अपनी दीदी से लिपटकर धीरे से बोला, ‘दीदी, तुम उठोगी नहीं?’ हंसी चौंककर जागकर उसे छाती से लगाकर बोली ‘क्यों नहीं उठूंगी भाई।’ मगर हंसी उठ नहीं पा रही थी। उसके क्षुद्र हृदय में जैसे अंधेरा और घर की छत पर लगातार बरसात की आवाज आ रही थी आंगन में इमली का पेड़ भी रहा था, रास्ते पर कोई पथिक नहीं था। केदारेश्वर एक वैद्य को साथ लेकर आये। वैद्य ने नाड़ी देखी, हालात अच्छे नहीं थे।

अगले सुबह राजा जब स्नान करने आये तो उन्होंने देखा कि भाई-बहन उनके इंतजार में नहीं बैठे थे। उन्होंने सोचा शायद बरसात के कारण वह नहीं आये होंगे। स्नान और पूजा के बाद राजा जब पालकी में बैठे तो उन्होंने वाहकों को पालकी केदारेश्वर की कुटिया की ओर ले जाने को कहा। सिपाही चकित रह गये। मगर राजा की आज्ञा के आगे कुछ नहीं कह पाये।

राजा की पालकी जब कुटिया पर पहुंची तो वहां भगदड़ मच गई। उस भगदड़ में हंसी की बीमारी के विषय में सभी भूल गए। सिर्फ ताता अपनी जगह से नहीं हिला। वह अपनी बेहोश दीदी के पास बैठकर उसके आंचल को अपने मुंह में दबाकर चुप बैठा उसे देखता रहा।

राजा को कमरे में आता देखकर ताता ने पूछा, “क्या हुआ है?” परेशान राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया। ताता गरदन हिला-हिलाकर फिर से पूछने लगा, “दीदी को चोट लगी है क्या?”

चाचा केदारेश्वर ने परेशान होकर जवाब दिया, “हां चोट लगी है।” ताता उसी पल दीदी के पास जाकर उसका चेहरा उधर करने की कोशिश करने लगा, और उससे लिपटकर पूछने लगा, “दीदी, तुम्हें कहां चोट लगी है?” उसका अभिप्राय यह था कि वह उस जगह फूंक मारकर वहां सहलाकर उसकी सारी पीड़ा दूर करेगा। मगर जब दीदी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो उसे सहन नहीं हुआ, छोटे-छोटे होंठ फूलने लगे, अभिमान से रोने लगा। कल से बैठा है, दीदी बोल क्यों नहीं रही? ताता ने किया क्या है जो दीदी उससे बात नहीं कर रही? राजा के सामने ताता का यह व्यवहार देखकर केदारेश्वर परेशान हो उठे। वह परेशान होकर ताता का हाथ पकड़कर उसे दूसरे कमरे में ले गए। फिर भी दीदी कुछ नहीं बोली।

राजवैद ने भी चिंता जताई। शाम के समय राजा दो बार हंसी को देखने आये। उस समय बालिका बड़बड़ा रही थी। कह रही थी, “ओ माँ, इतना खून क्यों?”

राजा बोले, “बेटी, यह खून-खराबा मैं रुकवा दूंगा।”

बालिका बोली, “आ भाई, हम दोनों खून धो देते हैं।”

राजा बोला, “आ बेटी, मैं भी धोता हूं।”

शाम के बाद हंसी ने थोड़ी देर के लिए आंखें खोली थी। एक बार चारों ओर देखकर न जाने किसे ढूंढा। तब तक ताता दूसरे कमरे में रोते-रोते सो चुका था। उसे न देखकर हंसी ने फिर से आंखें मूंद ली। फिर नहीं खोली। रात के दूसरे प्रहर में राजा की गोद में हंसी की मौत हो गई।

हंसी को जब हमेशा के लिए कुटिया से ले जाया जा रहा था तब ताता दूसरे कमरे में सोया पड़ा था। उसे अगर पता चलता तो वह भी शायद दीदी के साथ-साथ छोटी छाया की तरह चला जाता।


राजसभा सजी हुई है। भुवनेश्वरी देवी के मंदिर के पुरोहित किसी काम से राजा से मिलने आये हैं।

पुरोहित का नाम रघुपति था। हमारे देश में पुरोहित को “चोन्ताई” भी कहा जाता है। भुवनेश्वरी देवी की पूजा के चौदह दिन पश्चात आधी रात को चतुर्दश देवता की पूजा होती है। इस पूजा के समय एक दिन दो रातों तक कोई अपने घर से बाहर नहीं जा सकता, राजा भी नहीं। अगर राजा को बाहर आना हो तो “चोन्ताई” को दण्ड स्वरूप अर्थ देना पड़ता है। कहा तो यही जाता है कि इस पूजा को रात को मंदिर में नरबलि दी जाती है। इस पूजा में प्रथम जो पशुओं की बलि दी जाती है उसे राजमहल का दान कहा जाता है। इस बलि के लिये पशु लेने आज पुरोहित राजा के पास आये हैं। पूजा में अभी बारह दिन और रहते हैं।

राजा ने कहा, “इस साल से मंदिर में जीव-बलि नहीं होगी।” पूरी सभा यह सुनकर अवाक् रह गई। राजा के छोटे भाई नक्षत्रराय के तो सिर के बाल खड़े हो गए।

पुरोहित रघुपति ने कहा “मैं यह कैसा स्वप्न देख रहा हूं।”

राजा बोले, “नहीं पुरोहित जी, स्वप्न तो अबतक हम देख रहे थे, आज मुझे होश आया है। मां ने एक बालिका का रूप धरकर मुझे दर्शन दिये थे। वे कहकर गई हैं, करुणामयी जननी होकर वे अपने ही जीवों का रक्त नहीं देख सकती।”

रघुपति बोले, “तो अबतक मां जीवों का रक्त कैसे पान करती रही?”

राजा बोले, “नहीं, उन्होंने खून नहीं चाहा, तुम लोग जब रक्तपात करते थे तो वे मुंह फेर लेती थी।”

रघुपति बोले, “महाराज, आप राजकार्य बहुत अच्छा जानते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। मगर पूजा के विषय में आप कुछ नहीं जानते। देवी को अगर जरा सी भी नाराजगी होती इस बात पर तो मुझे पहले ही पता चल जाता।”

नक्षत्रराय बुद्धिमानों की तरह सिर हिलाकर बोला, “हां, यह बात ठीक है, देवी को अगर थोड़ी भी नाराजगी होती तो पुरोहित जी को पहले पता चल जाता।”

राजा बोले, “जिसका हृदय कठोर हो गया हो उसे देवी की बातें नहीं सुनाई देती।”

नक्षत्रराय ने पुरोहित की ओर देखा‒भाव कुछ ऐसा था कि इस बात का उत्तर देना जरूरी है।

रघुपति गुस्से में लाल होकर बोले, “महाराज, आप नास्तिकों की तरह बोल रहे हैं।”

गोविन्दमाणिक्य ने गुस्से से लाल, पुरोहित की ओर देखकर कहा “पुरोहित जी, राजसभा में बैठकर आप बेकार समय नष्ट कर रहे हैं। मंदिर के काम का समय हो गया है। आप मंदिर चले जाइये। जाते समय पथ पर जो भी मिले उसे बता दीजिए कि मेरे राज्य में जो भी देवी के लिए जीव-बलि देगा उसे देश निकाला दिया जाएगा।”

तब रघुपति कांपते हुए उठे और अपना जनेऊ छूकर बोले, “तो तुम भाड़ में जाओ। चारों ओर बैठे समान पद पुरोहित की ओर बढ़ने लगे। राजा ने इशारे से उन्हें रोक दिया। रघुपति कहने लगे, ”तुम राजा हो, तुम चाहो तो प्रजा का सबकुछ ले सकते हो। इसलिये क्या तुम मां की बलि हरण करोगे? ठीक है! तुम्हारी हिम्मत देखता हूं। मैं रघुपति-मां के सेवक के रहते तुम कैसा पूजा में विघ्न डालते तो, मैं देखता हूं।“

मंत्री राजा के स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे। वे जानते से राजा को अपने संकल्प से हिलाना इतना सहज नहीं है। वे डरते हुए धीरे से बोले, ”महाराज, आपने स्वर्गीय पिता-दादा-पर हमेशा नियमित रूप से देवी को बलि देते आये हैं। कभी एक दिन के लिए भी यह काम नहीं रुका।“

मंत्री चुप हो गए। राजा भी चुप रहे। मंत्री बोले, ”आज इतने दिनों बाद अपने पूर्वजों द्वारा प्रतिष्ठित पूजा में विघ्न डालने पर स्वर्ग में वे असंतुष्ट हो जाएंगे। राजा सोच में पड़ गए। नक्षत्रराय बुद्धिमानी दिखाते हुए बोले, “हां, वे स्वर्ग में असंतुष्ट होंगे। मंत्री ने फिर कहा, ”महाराज, एक काम करें, जहां हजारों बलि होती हैं वहां सिर्फ एक सौ बलि का आदेश दे दें।“ सभा अवाक् बैठी रही, राजा भी सोच में डूब गए। क्रुद्ध पुरोहित अधीर होकर सभा से जाने लगे।

उसी समय न जाने कैसे पहरेदारों से नजर बचाकर नंगे शरीर और नंगे पैर एक बच्चे ने सभा में प्रवेश किया। राजसभा के बीचों-बीच खड़े होकर राजा की ओर अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से देखते हुए उसने पूछा, ”दीदी कहां है?“

विशाल राजसभा अचानक शांत हो गई। सभा गृह में सिर्फ उस बच्चे के शब्द प्रतिध्वनित होने लगे, ”दीदी कहां है?“

उसी पल राजा सिंहासन से उठे और उस बच्चे को गोद में उठाकर बोले, ”आज से मेरे राज्य में बलि नहीं होगी और मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।“

मंत्री ने कहा, ”जी अच्छा।“

ताता ने राजा से पूछा, ”मेरी दीदी कहां है?“

राजा ने कहा, ”मां के पास।“

ताता काफी देर तक मुंह पर अंगुल रखें चुप रहा, जैसे उसे दीदी का पता मिल गया हो। आज से ताता को राजा ने अपने पास रख लिया। उसका चाचा केदारेश्वर को भी महल में स्थान मिल गया।

सभासद आपस में बातचीत करने लगे, ”यह तो भिक्षुकों का देश हो गया। हम जानते हैं बौद्ध भिक्षुक रक्तपात नहीं करते। अन्ततः हमारे हिन्दू देश में भी यह नियम चलेगा।“

नक्षत्रराय उनसे सहमत होकर बोले, ”हां, हिन्दू देश में भी वही नियम चलेगा क्या?“

सबने सोचा, सर्वनाश के और क्या लक्षण हो सकते हैं? भिक्षुक और हिन्दुओं में क्या भेद रहा?


भूवनेश्वरी देवी मंदिर का नौकर जयसिंह राजपूत, क्षत्रिय था। उनके पिता सुचेतसिंह त्रिपुरा के राजमहल के पुराने नौकर थे। सुचेतसिंह की मृत्यु जब हुई थी तो जयसिंह छोटा सा बच्चा था। इस अनाथ बालक को राजा ने मंदिर के काम में नियुक्त किया था। पुरोहित रघुपति ने ही जयसिंह को पाला और पढ़ाया। बचपन से ही मंदिर में पल-बढ़कर जयसिंह मंदिर को घर की तरह प्यार करते थे। मंदिर के कोने-कोने से उसका परिचय था। उनकी मां भी नहीं थी। भूवनेश्वरी की मूरत को ही वे मां की तरह देखते थे। मूर्ति के सम्मुख बैठकर वे बातें करते, उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होता। उनके कुछ और साथी भी थे। मंदिर के बगीचे के बहुत से पेड़-पौधों को उन्होंने अपने हाथों से पाला था। उनके चारों ओर उनके लगाये हुए पेड़ बढ़ रहे थे, बेलें बढ़ रही हैं, शाखाओं पर फूल खिल रहे हैं, छाया बढ़ रही है, हरे-भरे पेड़ों के पत्ते यौवन से भर गए हैं। मगर जयसिंह की प्यार की यह बातें कोई नहीं जानता था। अपने बल और साहस के लिए ही वे जाने जाते थे।

मंदिर का काम निपटा कर जयसिंह अपनी कुटिया के द्वार पर बैठे थे। सामने ही मंदिर का बगीचा है। शाम हो गई है, चारों ओर बादल गरज रहे हैं, बरसात हो रही है। बरसात के पड़ने से पेड़-पौधे नहा रहे हैं। बरसात की बूंदों से वहां पत्ता-पत्ता उत्सव में डूबा है। बरसात का पानी छोटे-छोटे जल प्रवाह से गोमती नदी में जाकर मिल रहा है। जयसिंह बड़े भाव से अपने बगीचे को देख रहे हैं। चारों ओर बादलों का स्निग्ध अंधेरा, वन की छाया, घने पत्तों वाले पेड़, मेढ़कों की टर्र-टर्र, बरसात की बूंदों की ध्वनि‒बगीचे में बरसात का रूप देख कर उसके प्राण नाच रहे थे।

इसी बीच भीगते हुए रघुपति आ पहुंचे। जयसिंह जल्दी से उठे और पैर धोने के लिए पानी और सूखे कपड़े ले आये।

रघुपति परेशान होकर बोले, ”तुमसे कपड़े लाने को किसने कहा?“ कहकर कपड़े गिरा दिये।

जयसिंह पैर धोने का पानी लेकर आगे बढ़े। रघुपति और ज्यादा परेशान होकर बोले, ”रहने दो, अपना वह पानी रख दो।“ कहकर लात मारकर पानी का लोटा गिरा दिया।

अचानक ऐसा व्यवहार का कारण न समझने के कारण जयसिंह अवाक् रह गये। जमीन से कपड़े उठाकर यथास्थान रखने लगे तो रघुपति ने फिर कठोरता पूर्वक कहा, ”मैंने कहा न रहने दो, उन कपड़ों को हाथ मत लगाओ।“ कहकर खुद उठे पानी लेकर पैर धोए और कपड़े बदल कर आये। जयसिंह ने धीरे से कहा, ”मुझसे कोई गलती हो गई प्रभु?“

रघुपति थोड़ा तेज स्वर में बोले, ”कौन कह रहा है कि तुमने गलती की है?“

व्यथित होकर जयसिंह चुपचाप बैठ गए।

बेचैन होकर रघुपति कुटिया के बरामदे में घूमने लगे। इस तरह रात बीत गई। लगातार बरसात होती रही। अन्ततः रघुपति ने जयसिंह की पीठ पर हाथ रखकर कोमल स्वर में कहा, ”बेटा, तुम को बहुत रात हो गई है।“

रघुपति के स्नेह भरे स्वर से विचलित होकर जयसिंह ने कहा, ”आप जाकर पहले सो जायें, मैं उसके बाद सोऊंगा।“ रघुपति बोले, ”मुझे समय लगेगा। देखो पुत्र, मैंने आज तुमसे जो व्यवहार किया, तुम कुछ मत सोचना। मेरा मन ठीक नहीं था। सारी बातें मैं तुम्हें कल सुबह बताऊंगा। आज तुम जाकर सो जाओ।“

जयसिंह बाले, ”जी, ठीक है।“ कहकर सोने चले गये। रघुपति सारी रात यूहीं टहलते रहे।

सुबह जयसिंह ने आकर गुरु को प्रणाम किया। रघुपति ने कहा, ”जयसिंह, मां की बलि बंद हो गयी है।“

जयसिंह चौंककर बोले, ”यह क्या कह रहे हैं प्रभु आप?“

रघुपति‒राजा का यही आदेश है।

जयसिंह ‒कौन से राजा का?

रघुपति‒परेशान होकर बोले, ”यहां कितने राजा हैं? महाराज गोविन्द-

माणिक्य ने आदेश दिया है, मंदिर में जीव-बलि नहीं होगी“

जयसिंह‒नरबलि?

रघुपति‒ओह! क्या हुआ है तुम्हें? मैं कह रहा हूं जीव-बलि, तुम सुन रहे हो नरबलि।

जयसिंह‒कोई भी जीव-बलि नहीं होगी?

रघुपति‒नहीं।

जयसिंह‒महाराज गोविन्दमाणिक्य ने ऐसा आदेश दिया?

रघुपति‒हां-हां, एक बात कितनी बार कहूं।

जयसिंह बहुत देर तक कुछ नहीं बोले, अपने मन में कहने लगे-महाराज गोविन्दमाणिक्य, जयसिंह बचपन से गोविन्दमाण्क्यि को देवता स्वरूप जानते थे। आसमान के पूर्ण चन्द्रमा पर बच्चों की जैसी आसक्ति होती है,

गोविन्दमाणिक्य के प्रति जयसिंह के वैसे ही भाव थे, गोविन्दमाणिक्य के सुंदर चेहरे पर जयसिंह प्राण देने को तैयार थे। रघुपति बोले, ”इस बात का कोई विधान तो करना ही होगा।

जयसिंह बोले, “हां जरूर। मैं महाराज के पास जाता हूं, उनसे प्रार्थना करता हूं‒

रघुपति‒यह कोशिश बेकार है।

जयसिंह‒तो क्या करना पड़ेगा?

कुछ देर सोचकर रघुपति बोले, ”कल बताऊंगा। कल सुबह तुम राजकुमार नक्षत्रराय से जाकर छिपकर मुझसे मिलने का अनुरोध करोगे।“


सुबह नक्षत्रराय ने आकर रघुपति को प्रणाम करके कहा ”पुरोहित जी, क्या आदेश है?“

रघुपति बोले, ”मां का आदेश है तुम्हारे लिए। पहले मां को प्रणाम करो, चलो।“

दोनों मंदिर में चले गये। जयसिंह भी साथ-साथ गये। नक्षत्रराय ने भूवनेश्वरी देवी की मूरत को साष्टांग प्रणाम किया। रघुपति ने नक्षत्रराय से कहा, ”राजकुमार, तुम राजा बनोगे?“

नक्षत्रराय बोले, ”आप कह रहे हैं। मैं राजा बनूंगा!“ कहकर रघुपति के चेहरे की ओर देखने लगे।

रघुपति बोले, ”मैं क्या झूठ बोल रहा हूं?“

नक्षत्रराय बोले, ”आप क्या झूठ बोल रहे हैं? यह कैसे हो सकता है? देखिये पुरोहित जी, कल रात मुझे सपने में मेंढक दिखाई दिया। अच्छा मेढ़क का सपना देखने पर क्या होता बताइए तो।“

रघुपति अपनी हंसी रोकते हुए बोले, ”कैसा मेढ़क, उससे माथे पर निशान तो था?“

नक्षत्रराय ने गर्व पूर्वक कहा, ”हां, उसके माथे पर निशान था, बिना निशान के कैसे होगा?“

रघुपति बोले, ”तभी तो तुम्हारा राजतिलक होगा।“

नक्षत्रराय बोले, ”तभी मेरा राजतिलक होगा। आप कह रहे हैं मुझे राजतिलक लगेगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो?“ रघुपति बोले, ”मेरी कही गयी बात व्यर्थ जायेगी, क्या कह रहे हो तुम?“

नक्षत्रराय बोले, ”नहीं, नहीं यह बात नहीं है। आप तो कह रहे हैं मुझे राजतिलक लगेगा। सोचिये अगर ऐसा नहीं हुआ है? अचानक ऐसा नहीं हुआ तो‒

रघुपति बोले, “नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा।”

नक्षत्रराय‒ऐसा कुछ नहीं होगा। आप कह रहे हैं, ऐसा कुछ नहीं होगा। देखिए पुरोहित जी, मैं अगर राजा बन गया तो आपको मंत्री बनाऊंगा।

रघुपति‒मैं मंत्री पद पर लात मारता हूं।

नक्षत्रराय उदार भाव से बोले, “ठीक है, जयसिंह को मंत्री बनाऊंगा।”

रघुपति बोले, “यह सब बातें बाद में होंगी। राजा बनने से पहले क्या करना है, पहले यह सुनो। मां राज-रक्त चाहती हैं। स्वप्न में उन्होंने मुझे यह आदेश दिया है।

नक्षत्रराय बोले, ”तुम्हें गोविन्दमाणिक्य का खून लाना पड़ेगा।“

नक्षत्रराय का मुंह खुला रह गया, यह बात उतनी अच्छी नहीं लगी।

रघुपति तेज स्वर में बोले, ”अचानक भाई के प्रति प्यार उमड़ आया क्या?“

नक्षत्रराय झूठी हंसी हंसते हुए बोले, ”हा-हा भाई के प्रति प्यार! आपने यह अच्छी कही, जो भी हो, भाई के प्रति प्यार।“

इतनी मजेदार और हंसने की बात जैसे दूसरी हो ही नहीं सकती। भाई के प्रति प्यार! कितनी शर्म की बात है! मगर अंतर्यामी जानते हैं नक्षत्रराय के मन में भाई के प्रति प्यार जाग रहा था, वह हंसकर उड़ाया नहीं जा सकता।

रघुपति ने कहा, ”तो बोलो, क्या करोगे?

नक्षत्रराय बोले, “क्या करूं, बताइए”

रघुपति‒मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हें गोविन्दमाणिक्य का रक्त मां के लिये लाना होगा।“

नक्षत्रराय मंत्री की तरह बोले, ”गोविन्दमाणिक्य का रक्त मां के लिए लाना होगा।“

रघुपति घृणापूर्वक बोले, ”नहीं, तुम कुछ नहीं कर सकते।“

नक्षत्रराय बोले, ”क्यों नहीं कर सकता? जैसा आप कहेंगे वैसा ही होगा। आप आदेश दे रहे हैं?“

रघुपति‒हां, मैं आदेश दे रहा हूं।

नक्षत्रराय‒क्या आदेश है?

रघुपति परेशान होकर बोले, ”मां की इच्छा है, वे राज रक्त चाहती हैं। तुम गोविन्दमाणिक्य का रक्त लाकर उनकी इच्छा पूरी करोगे, यह मेरा आदेश है।“

नक्षत्रराय‒मैं आज ही फतेह खान को इस काम में लगा दूंगा।

रघुपति‒नहीं-नहीं, किसी और को कुछ मत बताना। सिर्फ जयसिंह तुम्हारी मदद करेगा। कल सुबह आना। क्यों, क्या करना है? कल बताऊंगा।

रघुपति के हाथ से छुटकारा पाकर नक्षत्रराय ने लम्बी सांस ली। जल्दी से बाहर चले गये।


नक्षत्रराय के जाने के पश्चात जयसिंह बोले, ”गुरुदेव, ऐसी भयानक बात मैंने पहले नहीं सुनी थी। आप मां के सम्मुख ही मां के नाम पर भाई द्वारा भाई की हत्या की बात कर रहे थे। मुझे चुपचाप वह सब सुनना पड़ा।“

रघुपति बोले, ”तो और क्या उपाय है बताओ?“

जयसिंह बोले, ”उपाय! कैसा उपाय?“

रघुपति‒ तुम्हें भी लगता है, नक्षत्रराय जैसे हो गये हो। अबतक तुमने क्या सुना?

जयसिंह‒ जो सुना, वह सुनाने योग्य नहीं था, वह सुनना पाप है।

रघुपति‒ क्या तुम पाप और पुण्य समझते हो?

जयसिंह‒आपसे इतने दिनों जो शिक्षा मिली, पाप-पुण्य क्या कुछ भी नहीं समझूंगा!

रघुपति‒तो सुनो वत्स, तुम्हें एक शिक्षा और देता हूं।

पाप और पुण्य कुछ नहीं होता। कौन पिता है, कौन भाई है, कौन किसका क्या है? हत्या अगर पाप है, तो सारी हत्याएं एक जैसी हैं। मगर कौन कहता है हत्या करना पाप है? हत्या तो रोज हो रही है। कोई तो सिर पर पत्थर ढो कर मर रहा है, कोई बाढ़ में बहकर मर रहा है। कोई मगरमच्छ के मुंह में जाकर मर रहा है, तो कोई इंसान के छुरे की आघात से मर रहा है। हम रोज अपने कदमों तले कितनी चींटियों को रौंद देते हैं। हम उनसे इतने क्या बड़े हैं? यह सब छोटे-छोटे प्राणियों का जीवन और मृत्यु खेल नहीं तो और क्या है, महाशक्ति की माया नहीं तो और क्या है। कालरूपिणी महामाया के निकट रोज ऐसे कितने लाखों-करोड़ों प्राणियों का बलिदान हो रहा है। जगत के चारों ओर से जीवों के रक्त की धारा उसके महा पर आकर गिर रही है। मैंने भी अगर उस धारा में एक बूंद और डाल दिया तो क्या होगा। खुद वो अपनी बलि कभी ग्रहण करती थी, बीच में मैंने एक भेंट और दे दी।

तब जयसिंह मूर्ति की ओर देखकर कहने लगे, इसलिए क्या तुझे सब मां कहते हैं मां‒तू इतनी पत्थर है। यह जिह्वा बाहर निकाली है। स्नेह, प्रेम, ममता, सौन्दर्य धर्म सब झूठ है, सत्य सिर्फ तेरी वह अनन्त रक्त तृष्णा है। तेरा पेट भरने के लिए इंसान, इंसान पर छुरा चलाएगा! भाई-भाई का खून बहाएगा, पिता-पुत्र में मारकाट होगी! निर्दयी अगर सचमुच तेरी ऐसी इच्छा है तो बादल खून क्यों नहीं बरसाते! करुणा रूपी नदियां रक्त की लहरें लेकर रक्त को समुद्र में क्यों नहीं गिरती? नहीं, नहीं मां, तू साफ-साफ बता‒यह शिक्षा झूठ है, ये शास्त्र झूठ है‒मेरी मां को मां नहीं कहते, सन्तान के रक्त की प्यासी राक्षसी कहते हैं। यह मैं नहीं सह सकता।”

जयसिंह की आंखों से आंसू बहने लगे, वो अपनी कही बातों को सोचने लगे। इतनी बातें इससे पहले कभी उनके मन में नहीं आयी थी रघुपति अगर उन्हें यह नई शिक्षा न देते तो उनके मन में कभी इतनी बातें नहीं आती।

रघुपति मुस्कुराते हुये बोले, “तो फिर बलिदान समाप्त हो जाना चाहिये।

जयसिंह बचपन से ही बलिदान देखते आये हैं। इसलिए मंदिर में बलि कभी बंद हो सकती है या बंद होनी चाहिए, यह बात कभी उनके मन में नहीं आयी। और तो और यह बात सोचने पर उसके हृदय को चोट लगती है। इसलिए रघुपति की बात का उत्तर देते हुए जयसिंह ने कहा, ”वह अलग बात है, उसका कोई और अर्थ है। उसमें कोई पाप नहीं हैं। मगर इसलिए क्या भाई भाई की हत्या करेगा? इसलिए क्या महाराज गोविन्दमाणिक्य को‒प्रभु आपके पैर पड़कर पूछता हूं, मुझे गलत मत समझिये, क्या मां ने सचमुच आपके सपने में आकर कहा है कि राजरक्त के बिना वे तृप्त नहीं होगी?“

रघुपति कुछ देर चुप रहने के पश्चात बोले, ”सच नहीं तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं? तुम मुझ पर अविश्वास कर रहे हो?“

जयसिंह ने रघुपति के चरण छूकर कहा, ”गुरुदेव पर मेरा विश्वास कभी कम न हो। मगर नक्षत्रराय का जन्म भी तो राजवंश में हुआ है।“

रघुपति बोले, ”भगवान का सपना इशारा होता है, सारी बातें सुनी नहीं जा सकती, समझनी पड़ती हैं। स्पष्ट दिख रहा है गोविन्दमाणिक्य से देवी नाराज हैं, नाराज होने का कारण भी तो है। इसलिए देवी ने जब राजरक्त मांगा है तो समझना होगा कि वह गोविन्दमाणिक्य का ही रक्त है।“

जयसिंह बोले, ”अगर ऐसी बात है तो मैं राजरक्त लाऊंगा‒नक्षत्रराय को पाप नहीं करने दूंगा।“

रघुपति बोले, ”देवी के आदेश पालन में कोई पाप नहीं होता।“

जयसिंह‒पुण्य तो है न प्रभु! वह पुण्य मैं ही अर्जित करूंगा। रघुपति बोले, ”तो तुम्हें सत्य ही बताता हूं वत्स! मैंने तुम्हें अपने पुत्र से भी ज्यादा जतन और प्यार से पाला है। मैं तुम्हें नहीं खो सकता। नक्षत्रराय अगर

गोविन्दमाणिक्य का वध करके राजा बन जाये तो तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा, मगर तुम अगर राजा पर हाथ उठाओगे तो मैं तुम्हें खो दूंगा।“

जयसिंह बोले, ”मेरा स्नेह-पिता, मैं अपदार्थ‒ मेरे स्नेह से तुम एक चींटी को भी हानि नहीं पहुंचा सकते। मेरे स्नेह के कारण अगर तुम पाप में लिप्त हो जाओगे तो यह स्नेह मैं ज्यादा दिनों तक नहीं भोग पाऊंगा, उस स्नेह का परिणाम कभी भी अच्छा नहीं होगा।“

रघुपति ने जल्दी से कहा,”ठीक है, ठीक है, यह सब बातें बाद में होंगी। कल नक्षत्रराय के आने के बाद जो होगा देखा जायेगा।“

जयसिंह ने मन ही मन प्रतिज्ञा की,”मैं ही राजरक्त लाऊंगा मां के नाम से गुरुदेव के नाम से भाई-भाई की हत्या करे, यह मैं नहीं होने दूंगा।“


जयसिंह को पूरी रात नींद नहीं आयी। गुरु के साथ जो बातें हुई थी, देखते ही देखते उसकी शाख-प्रशाखा फैलने लगी। ज्यादातर समय में शुरूआत हमारे अधीन होती है। अंत हमारे अधीन नहीं होता। चिंता के विषय में भी यही बात सच है। जयसिंह के मन में ऐसी बातें आने लगी जो बचपन से,जो विश्वास था उनकी जड़ों पर आघात करने लगी। जयसिंह पीड़ित हो गये।

मगर बुरे सपने की ही तरह चिंता भी समाप्त नहीं होना चाहती। जिस देवी को जयसिंह इतने दिनों से मां के रूप में जानते थे। गुरुदेव ने आज क्यों वह मातृत्व छीन लिया? क्यों उनकी व्याख्या हृदयहीन शक्ति की तरह की? ‘शक्ति का संतोष और असंतोष क्यों? शक्ति की आंखें कहां है? कहाँ है काम? शक्ति तो महारथ की तरह अपने पहियों के नीचे इस जगत को दबाती घर्र-घर्र करती चली जा रही है। उसके साथ कौन गया, उसके नीचे कौन टुकड़े-टुकड़े हो गया, उसके ऊपर चढ़कर कौन उत्सव मना रहा है, उसके नीचे गिरकर कौन गिड़गिड़ा रहा है, उसे उसका क्या पता? उसका क्या कोई सारथी नहीं? धरती के निरीह बेसहारा भीरू जीवों का रक्त निकालकर कालरूपिणी निर्दयी शक्ति की प्यास बुझानी होगी, क्या यही मेरा व्रत है? क्यों? वह तो अपना काम खुद कर ही रही है‒कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी भूकम्प, कभी महामारी, कभी आग, कभी निर्दय मानव के हृदय स्थित हिंसा, मेरी उसे क्या जरूरत है?’

अगली सुबह बड़ी ही मनोहर सुबह थी। बरसात रुक गयी थी। पूर्व दिशा में बादल नहीं थे। सूर्यकिरणें जैसे बरसात में घुलकर स्निग्ध हो गई हैं। बरसात की बूंदों और सूर्य की किरणों से दसों दिशाएं झिलमिला रही हैं। शुभ आनंदप्रभा आसमान में, जंगल में, नदी की लहरों में खिलते हुए सफेद कमल की तरह फूट रही है। नीले आकाश पर चील उड़ रही है। इन्द्रधनुष के नीचे से बगुले कतारों में उड़ रहे हैं। पेड़ों पर गिलहरियां दौड़ रही हैं। कुछ डरपोक खरगोश झाड़ के पीछे से झांककर फिर छिप रहे हैं। बकरी के बच्चे दुर्गम पहाड़ी पर चढ़कर घास खा रहे हैं। गायें भी आनंदित होकर मैदान में फैल गयी हैं। चरवाहा गीत गा रहा है। कलश उठाये मांओ का आंचल पकड़कर बच्चे भी बाहर आ गये हैं। वृद्ध पूजा के लिए फूल तोड़ रहे हैं। नदी पर नहाने के लिए बहुत से लोग इकट्ठे हुए हैं। वह सब आपस में बातचीत कर रहे हैं‒नदी की कलकल ध्वनि में भी कोई विराम नहीं। आषाढ़ की सुबह इस जीवमयी आनंदमयी धरती की ओर देखकर लम्बी श्वास छोड़कर जयसिंह ने मंदिर में प्रवेश किया।

जयसिंह ने मूर्ति की ओर देखकर हाथ जोड़कर कहा, ”क्यों मां, आज इतनी अप्रसन्न क्यों है? एक दिन अपने जीव का खून नहीं दिखा तो भवें तन गयी? हमारे हृदय में देखो, भक्ति में कोई कमी देख रही हो? भक्ति पूर्ण हृदय से क्या तुम्हारी तृप्ति नहीं होती? निरपराध का रक्त चाहिये? अच्छा मां, सच-सच बताओ, पुण्यात्मा गोविन्दमाणिक्य को इस धरती से हटाकर यहां दानवों का राज्य स्थापित करना क्या तेरा अभिप्राय है? क्या तुम्हें राजरक्त चाहिये? तेरे मुंह से इसका उत्तर सुने बिना मैं यह राजहत्या नहीं होने दूंगा, मैं रोकूंगा। बोलो हां या ना?“

अचानक सूने मंदिर में से आवाज आई ”हां।“

जयसिंह ने चौंककर पीछे देखा, कोई नहीं दिखाई दिया। लगा जैसे छाया की तरह कुछ काँप गया। आवाज सुनकर शुरू में ही उन्हें लगा था। यह आवाज उनके गुरु की है। बाद में सोचा, मां ने शायद उनके गुरु की आवाज में आदेश दिया है। उनका शरीर रोमांचित हो उठा। उन्होंने मूर्ति को प्रणाम किया और शस्त्र उठाकर बाहर चले गये।


गोमती नदी के दक्षिणी ओर एक स्थान का तट काफी ऊंचा है। वर्षा की धारा और छोटी-छोटी लहरों ने इस ऊंची भूमि को बहुत से गढ्ढों में विभक्त कर दिया है। इसके कुछ ही दूर अर्धचन्द्राकार बड़े-बड़े पेड़ इस खण्ड भूमि को घेरे हुए हैं। मगर इस जमीन के बीच में एक भी बड़ा पेड़ नहीं है। सिर्फ कहीं कहीं टिब्बों पर छोटे-छोटे पेड़ जो बढ़ नहीं पायें, झुककर काले हो गये हैं। चारों ओर पत्थर फैले हुए थे। एक हाथ या दो हाथ चौड़ी पानी की

धाराएं टेढ़े-मेढ़े पथों पर घूम-फिरकर, मिलकर और विभक्त होकर नदी में जाकर गिर रही है। यह स्थान बड़ा ही निर्जन है। यहां का आसमान पेड़ों से ढका नहीं है। यहां से गोमती नदी और उसके उस पार के अलग अलग रंग के खेत बहुत दूर तक दिखाई देते हैं। रोज सुबह राजा गोविन्दमाणिक्य यहां टहलने आते हैं। साथ में कोई भी पहरेदार नहीं आता था। कभी-कभी गोमती नदी में मछली पकड़ने आए हुए मछुआरे देखते कि सौम्यमूर्ति राजा योगियों की तरह स्थिर होकर आंखें बंद किए वहां बैठे हैं। उनके चेहरे पर प्रभात की ज्योति होती या आत्मा की ज्योति समझ नहीं आता। आजकल बरसात के कारण रोज तो यहां नहीं आ पाते, मगर बरसात रुकने पर जब यहां आते तो छोटे ताता को साथ लाते।

ताता को अब ताता बुलाने का मन नहीं करता। जिसके मुंह से ताता संबोधन अच्छा लगता था, वह तो अब नहीं है। पाठकों के लिये ताता शब्द का कोई अर्थ नहीं है। मगर हंसी जब सुबह शैतानी करते हुए इस वन में छिपकर अपनी मीठी आवाज से जोर से ताता पुकारती और उसके उत्तर में पेड़ों पर कोयल कूक उठती, दूर से प्रतिध्वनि लौटती। तब यह ताता शब्द अर्थ में परिपूर्ण होकर जंगल में फैल जाता, तब वह ताता संबोधन एक बालिका के क्षुद्र हृदय को त्याग कर पक्षी की तरह स्वर्ग में उड़ जाता। तब वह स्नेहरिक्त संबोधन प्रभात के पक्षियों के गीत लूट लेता। प्रभात, प्रकृति स्नेह में एकरूपता दिखाई देती। वह बालिका आज नहीं है। बालक तो है, मगर ताता नहीं है। यह बालक इस दुनिया का, लाखों लोगों का, लाखों विषय का होगा, मगर ताता सिर्फ बालिका का ही था। महाराज गोविन्दमाणिक्य इस बालक को

ध्रुव पुकारते थे, हम भी इसी नाम से बुलाएंगे।

पहले महाराज अकेले गोमती नदी के तट पर आते थे। अब ध्रुव को साथ लाते हैं। उसके पवित्र चेहरे पर उन्हें देवलोक की छाया दिखाई देती। दोहर के समय जब राजा संसार के चक्र में प्रवेश करते तब वृद्ध विद्वान मंत्र उन्हें घेर लेते, उन्हें साथ ले आता, उसकी बड़ी-बड़ी नीरव आंखों के संमुख विषयों की सारी कुटिलता संकुचित हो जाती हैं। बच्चे का हाथ पकड़कर महाराज विश्व जगत के बीच अनंत की ओर फैले हुए एक उदार सरल विस्तृत राजपथ पर खड़े हो जाते। वहां से अनंत नीले आकाश-चन्द्र-तारों के नीचे का विश्व ब्रह्मांड की महासभा दिखाई देती है- धरती, आकाश, पाताल और स्वर्ग के संगीत सुनाई देता है, वहां सरल पथ पर सभी सरल और सहज लगते हैं, सिर्फ आगे बढ़ने का मन करता‒बेकार की चिन्ता, बीमारी सब दूर हो जाती है। इस प्रभात में, निर्जनता में, वन में नदी के तट पर, मुक्त आकाश के नीचे एक बच्चे के प्रेम में डूबकर महाराज को असीम प्रेम समुद्र का पथ दिखाई देता।

गोविन्दमाणिक्य ध्रुव को गोद में उठाये कहानी सुना रहे हैं, उसे देख कर लग रहा है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, मगर राजा ध्रुव की तोतली आवाज बार-बार सुनना चाहते हैं।

कहानी सुनते-सुनते ध्रुव बोला, ”मैं वन में जाऊंगा।“

राजा बोले ”क्यों, क्या करोगे वहां जाकर?“

ध्रुव बोला, ”हंसी को देखने जाऊंगा।“

राजा बोले, ”हम तो वन में ही आये हैं, हरि को देखने के लिए।“

ध्रुव‒हरि कहां है?

राजा‒यही हैं।

ध्रुव बोला, ”दीदी कहां हैं“ कहकर पीछे मुड़कर देखने लगा, उसे लगा जैसे दीदी पहले की तरह पीछे से अचानक अपनी हथेलियों से उसकी आंखें बंद करने आ रही हैं, जब वह नहीं दिखी तो गर्दन घुमाकर पूछने लगा ”दीदी कहां है?“

राजा बोले, ”हरि ने तुम्हारी दीदी को बुला लिया है।“

ध्रुव बोला, ”हरि कहां है?“

राजा बोला, ”उन्हें पुकारो वत्स, तुम्हें जो श्लोक सिखाया था वही बोलो“ ध्रुव हिल-हिल कर बोलने लगा,

हरि तुम्हें पुकारूं, बालक एकाकी

अंधेरे अरन्य में जाय रे।

गहन तिमिर नयनों के नीर में

टुढ़ टुढ़ पथ न पाऊं रे।

सदा सोचू, क्या करूं, क्या करूं

कब आयेगी काल-विभावरी,

डर से मरता, पुकारूं हरि-हरि

हरि बिना कोई नहीं रे।

नयन का जल, न होगा विफल,

तुम्हें सब कहते भगत वत्सल,

वहीं आशा मन की है सम्बल,

जीवित हूं इसलिए ही रे।

अंधेरे में जगता तुम्हारी आंखें का तारा,

तुम्हारा भक्त न होता कभी पथ-हारा,

ध्रुव तुम्हें चाहे तुम ध्रुवतारा

और किस ओर मैं देखूं हूं।”

र,ल,ड,द को उलट-पलट करके, आधे शब्दों को मुंह में ही रखकर, आधे शब्द उच्चारण करके, ध्रुव ने मीठी आवाज से हिल-हिल कर यह श्लोक बोला। सुनकर राजा के प्राण आनंद में डूब गये, सुबह दोगुनी मधुर हो गयी, चारों ओर नदी, जंगल, बेलें हंसने लगी, कनक सुधा रिक्त नीले आसमान में उन्हें किसका अनुपम सुन्दर हंसता हुआ चेहरा दिखाई दिया। ध्रुव जैसे उनकी गोद में बैठा है, वैसे ही उन्हें भी जैसे किसी ने अपनी बांहों में, गोद में बिठा लिया है। वे खुद को, अपने चारों ओर के सबको, विश्व विचारक को किसकी गोद में देख रहे हैं। उनका आनंद और प्रेम सूर्यकिरण की तरह दिशाओं में फैलकर आकाश को पूर्ण करने लगा।

ठीक उसी समय सशस्त्र जयसिंह गुफा से अचानक राजा के सम्मुख उपस्थित हुए।

राजा ने अपनी दोनों बांहें बढ़ा दी, बोले, “आओ जयसिंह, आओ।” उस समय राजा बच्चे के साथ बच्चे बने हुए थे, उस समय राज मर्यादा कहां थी!

जयसिंह ने झुककर राजा को प्रणाम किया। जयसिंह ने कहा, “एक निवेदन है महाराज।”

राजा ने कहा, “क्या, बताओ।”

जयसिंह। मां आपसे नाराज है।

राजा। क्यों, मैंने क्या गलती की?

जयसिंह‒ महाराज आपने बलि बंद कराकर मां की पूजा में बाधा पहुंचायी है।

राजा कहने लगे, “क्यों जयसिंह, क्या इतनी हिंसा की लालसा है? मां की गोद में रक्तपात करके तुम मां को खुश करना चाहते हो!”

जयसिंह धीरे-धीरे राजा के पैरों के पास बैठ गये। ध्रुव उनकी तलवार से खेलने लगा। जयसिंह बोले, “क्यों महाराज, शास्त्रों में तो बलि का विधान है।” राजा बोले, “शास्त्रों की यथार्थ विधि का पालन कौन करता है? अपनी प्रवृत्ति के अनुसार सब इसी व्याख्या करते हैं। जब देवी के सामने बलि का खून अपने शरीर पर मलकर सबलोग चीखते हुए उल्लासपूर्वक प्रांगण में नृत्य करते हैं। तब क्या वह मां की पूजा करते हैं? नहीं, अपने हृदय में जो हिंसा रूपी राक्षस है, उस राक्षस की पूजा करते हैं। हिंसा के कदमों में बलि देना शास्त्रों की विधि नहीं है, हिंसा की बलि देना शास्त्रों की विधि है।”

जयसिंह बहुत देर तक चुप रहे। कल रात से उनके मन में भी तो यही बातें आ रही थी।

अन्ततः बोले, “मैंने मां के मुंह से सुना है‒इस विषय में और कोई संशय नहीं हो सकता। उन्होंने स्वयं कहा है, उन्हें राज रक्त चाहिये।” कहकर जयसिंह ने आज सुबह की घटना विस्तार पूर्वक राजा को बताई।

राजा ने हंसकर कहा, “यह मां का आदेश नहीं है, यह तो रघुपति का आदेश है। रघुपति ने पीछे से तुम्हें यह उत्तर दिया था।” राजा के मुंह से यह बात सुनकर जयसिंह चौंक उठे। उनके मन भी तो अचानक यह ख्याल आया था, मगर बिजली की तरह चला भी गया था। राजा की बात सुनकर उस संदेह पर फिर से चोट लगी।

जयसिंह अत्यन्त कठोर होकर कहने लगे, “नहीं महाराज नहीं, मुझे शक से और ज्यादा शक के अंधेरे में मत ले जाइये‒मुझे तट से उठाकर समुद्र में मत फेंकिये‒आपकी बातें सुनकर मेरे चारों ओर का अंधेरा बढ़ रहा है। मेरा जो विश्वास था, जो भक्ति थी, उसे वैसी ही रहने दें। उसके बदले में यह धुंध नहीं चाहिए मुझे। मां का आदेश हो या गुरु का आदेश, मेरे लिए एक जैसा है‒मैं उसका पालन करूंगा।” कहकर तेजी से उठकर अपनी तलवार उठाई। सूर्य की किरणों में वह तलवार बिजली की तरह चमकने लगी। यह देखकर ध्रुव ऊंची आवाज में रोने लगा, उसके दो छोटे राजा से लिपटकर राजा को ढकने लगे‒ जयसिंह की ओर ध्यान न देकर राजा ने ध्रुव को छाती से लगा लिया।

जयसिंह ने तलवार फेंक दी। ध्रुव की पीठ सहलाते हुए बोले “डरो मत वत्स, डरो मत। मैं जा रहा हूं, तुम उस महान आश्रय में रहो, उस विशाल वक्ष में विराजमान रहो‒तुम्हें कोई अलग नहीं करेगा।” राजा को प्रणाम करके प्रस्थान करने लगे। अचानक कुछ सोचकर लौट आये, बोले, “महाराज आपको सावधान करना चाहता हूं, आपके भाई नक्षत्रराय आपकी हत्या की योजना बना रहे हैं। आषाढ़ की उनतीस तारीख को चतुर्थी तिथि में देवता की पूजा की रात आप सतर्क रहना।” राजा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नक्षत्र मेरी हत्या नहीं कर सकता, वह मुझसे प्यार करता है।”

जयसिंह चले गये।

राजा ने ध्रुव की ओर देखकर भक्ति भाव से कहा, “तुमने ही आज इस धरती को लाल होने से बचाया, इस उद्देश्य के लिये ही तुम्हारी दीदी तुम्हें यहां छोड़ गयी हैं।”

कहकर ध्रुव के आंसुओं से भीगे गाल पोंछ दिये।

ध्रुव गंभीर होकर बोला, “दीदी कहां है?”

उसी समय एक बादल सूर्य पर छा गया, नदी पर काली छाया दिखने लगी। दूर का वन भी बादलों जैसा काला दिखने लगा। बरसात की आशंका देख राजा महल में लौट आए।


मंदिर ज्यादा दूर नहीं था। मगर जयसिंह नदी के तट से घूमते हुए लम्बे पथ से धीरे-धीरे मंदिर को चले। मन में विविध चिंताएं आने लगीं। एक जगह नदी-तट पर पेड़ के नीचे बैठ गये। दोनों हाथों से मुँह ढक कर सोचने लगे, “एक काम कर दिया है, फिर भी संशय दूर नहीं हो रहा। आज से मेरा संशय कौन दूर करेगा? क्या अच्छा है क्या बुरा, कौन मुझे समझायेगा? संसार के लाखों पथों के कौन से तट पर खड़े होकर किससे पूछूंगा कि यथार्थ पथ कौन सा है? बड़े मैदान में अंधों की तरह अकेले खड़ा हूं, आज मेरा विश्वास टूट गया है।”

जयसिंह जब वहां से उठे तो बारिश आरम्भ हो गयी थी। बरसात में भीगते हुए मंदिर की ओर चले। उन्होंने देखा कि भीड़ शोर मचाती हुई मंदिर की ओर से आ रही है। बुड्ढा कह रहा था, “दादा‒परदादाओं के समय से यही चला आ रहा है, आज राजा की अक्ल क्या हम सब ऊपर उठ गई?

एक युवा कह रहा है, ”अब तो मंदिर में आने का मन ही नहीं करता, पूजा में पहले वाली बात नहीं रही।“

किसी ने कहा, ”यह तो नवाब का राज्य हो गया!“ उसके कहने का भाव यह था कि बलि के संबंध में दुविधा सिर्फ एक मुसलमान को हो सकती है, मगर एक हिन्दू के मन में इस तरह की दुविधा आना आश्चर्य है।”

औरतें कहने लगी, “इस राज्य का भला नहीं हो सकता।” एक व्यक्ति बोला, “पुरोहित ने बताया है कि मां ने सपने में आकर कहा है कि तीन महीने के भीतर यह देश शमशान बन जायेगा।”

हारू बोला, “अरे यही देखो न, पिछले डेढ़ साल से माधो बीमार रहकर भी जीवित था, जैसे ही बलि बंद हुई वह मर गया।” शान्ति बोली, “उसकी छोड़ो, मेरे जेठ का लड़का, कौन जानता था कि वह मरने वाला है? तीन दिन बुखार हुआ। जैसे ही वैध की गोली खाई। आंखें उलट गयी।” जेठ का दुःख और राज्य के अमंगल की आशंका से शान्ति डर गयी।

तीनकड़ि ने कहा, “उस दिन मथुरहाती में आग लगी, कुछ भी नहीं बचा।”

चिंतामणि किसान ने अपने साथी किसान से कहा, “इतनी बातों की क्या जरूरत है, यही देखो, इस साल धान इतना सस्ता है, पहले कभी नहीं हुआ। इस साल न जाने किसानों के भाग्य में क्या लिखा है।

बलि बंद होने के बाद और पहले भी जो-जो नुकसान हुआ है, सबने मिलकर यही फैसला किया कि यह सब बलि बंद होने के कारण हुआ है। यह राज्य छोड़कर जाना ही सबके लिये ठीक होगा, ऐसा सब कहने लगे। यह विचार किसी भी तरह नहीं बदला मगर गया कोई नहीं।

जयसिंह अनमने से थे। इन बातों पर ध्यान दिये बिना वे मंदिर पहुंच गये उन्होंने देखा रघुपति पूजा समाप्त करके मंदिर के बाहर बैठे हैं।

जयसिंह तेजगति से रघुपति के पास गए और दृढ़ स्वर में पूछने लगे, ”गुरुदेव आज सुबह मां का आदेश लेने जब मैं मां से प्रश्न पूछ रहा था, तो आपने उत्तर क्यों दिया? रघुपति थोड़ा हड़बड़ाते हुए बोले, “मां अपना आदेश मेरे द्वारा ही तो देती हैं। वे अपने मुंह से कुछ नहीं कहती।”

जयसिंह बोले, “तो आप सामने आकर क्यों नहीं बोले? ”चुप रहो। मैं क्या सोचकर क्या करता हूं, यह तुम क्या समझोगे! वाचाल की तरह जो मुंह में आये वही बात बोलो। मैं जो आदेश दूंगा तुम सिर्फ उसका पालन करोगे, कोई प्रश्न मत पूछना।“

जयसिंह चुप हो गये। उनका संशय को होने के बजाय बढ़ गया। कुछ देर बाद बोले, ”आज सुबह मैंने मां से कहा था, अगर वे खुद मुझे आदेश नहीं देगी तो मैं कभी भी राजहत्या नहीं होने दूंगा, मैं रोकूंगा। अब जब समझ गया हूं कि वह आदेश मां का नहीं था तो मैंने महाराज को सावधान करते हुए नक्षत्रराय का संकल्प दिया है।“

कुछ देर तक रघुपति चुप रहे। अपना क्रोध का दमन करके दृढ़स्वर में बोले, ”मंदिर में चलो।“

दोनों ने मंदिर में प्रवेश किया।

रघुपति बोले, ”मां के चरण स्पर्श करके शपथ लो, कहो कि आषाढ़ की उनतीस तारीख को तुम राजरक्त लाकर मां के चरणों में चढ़ाओगे।“

जयसिंह सिर झुकाये चुप खड़े रहे। फिर एक बार गुरु की ओर तो एक बार मूर्ति की ओर देखा, मूर्ति स्पर्श करके धीरे-धीरे बोले, आषाढ़ की उनतीस तारीख को मैं राजरक्त लाकर इन चरणों में चढ़ाऊंगा।”


घर लौटकर महाराज ने अपना दैनिक राजकर्म समाप्त किया। सुबह की सूर्यकिरणें ढक गयी थी बादलों की छाया से, फिर अंधेरा छा गया था। महाराज उदास थे। रोज राजसभा में नक्षत्रराय उपस्थित रहते थे, मगर आज नहीं थे। राज ने उन्हें बुलावा भेजा। उन्होंने बहाना भेजा कि उनकी तबियत ठीक नहीं है। राजा खुद नक्षत्रराय के कमरे में पहुंचे। नक्षत्र राजा से नजरें मिला पाया। ऐसा भाव किया जैसे कुछ लिखने में व्यस्त हों। राजा ने पूछा, “नक्षत्र, तुम बीमार हो? नक्षत्र ने कागज को इधर-उधर पलटा, हाथ की अंगुली को ध्यान से देखते हुए कहा, ”बीमारी? नहीं बीमार नहीं‒बस थोड़ा सा काम था। हाँ, हाँ बीमार भी था। कुछ अजीब सा।“

नक्षत्रराय अधीर हो उठे। गोविन्दमाणिक्य उदास होकर नक्षत्र को देखने लगे। वे सोचने लगे‒”हाय, स्नेह के नीड़ में भी हिंसा प्रवेश कर गयी, वह सांप की तरह छिपना चाहती है, मुंह नहीं दिखाना चाहती। हमारे जंगलों में क्या हिंसक पशुओं की कमी है, अब क्या इंसान भी इंसान से डरेगा, भाई अपने भाई के पास बिना किसी शंका के बैठ नहीं पायेगा। इस दुनिया में हिंसा और लोभ इतने बड़े हो गये और प्रेम को कहीं कोई जगह नहीं! यह मेरा भाई है, इसके साथ मैं एक ही घर में रहता हूं, एक आसन पर बैठता हूं, हंसते हुए बात करता हूं‒यह भी मेरे पास बैठकर मन ही मन छुरा चला रहा है। उस समय गोविन्दमाणिक्य को यह संसार हिंसक पशुओं से पूर्ण लगने लगा। घने अंधेरे में चारों ओर सिर्फ नाखून और दांत दिखाई देने लगे। लम्बी श्वास छोड़कर महाराज सोचने लगे, इस स्नेह-प्रेम हीन राजा में जीवित रहकर मैं अपनी गति, अपने भाई के मन में हिंसा और लोभ की मशाल जला रहा हूं। मेरे सिंहासन के चारों ओर मेरे परम आत्मीय बैठकर मेरी ओर देखकर मन ही मन मुंह बनाते हैं, दांत पीसते हैं, श्रृंखलाबद्ध कुत्तों की तरह चारों ओर से मुझ पर झपटने का अवसर ढूंढ रहे हैं। इससे अच्छा तो यही है कि इनके दांत-नाखूनों से क्षत-विक्षित होकर, इनकी रक्त की प्यास बुझाकर यहां से हट जाऊं।’ सुबह के आसमान में गोविन्दमाणिक्य ने जो प्रेम की तस्वीर देखी थी वह न जाने कहां खो गयी?

महाराज ने खड़े होकर गंभीर स्वर में कहा, “नक्षत्र आज दोपहर को हम दोनों गोमती तट के निर्जन वन में घूमने जाएंगे।”

राजा के इस आदेश के विरुद्ध नक्षत्र कुछ नहीं कह पाये। मगर संशय और आशंका से उनका मन बेचैन हो गया! उन्हें लगने लगा इतनी देर से महाराज ने अपनी दोनों आंखें उनके मन पर ही गाड़ रखी थी। वहां

अंधेरे गढ्ढे में जो भावनाएं कीड़े की तरह बिलबिला रही थी, वह अचानक प्रकाश देखकर बेचैन होकर बाहर आ गयी हो। डरते हुए नक्षत्रराय ने एकबार राजा की ओर देखा, उनके चेहरे पर शांति का भाव है, वहां रोष था नामोनिशान नहीं था। मानवहृदय की कठोरता देखकर एक गहरा शोक उनके हृदय में विराज रहा था।

दोपहर हो गयी। अभी भी बादल छाये हुए हैं। नक्षत्रराय को साथ लेकर महाराज पैदल ही जंगल की ओर चले। अभी शाम होने में देर है, बादलों के कारण शाम का भ्रम हो रहा है। कौवे जंगल में लौटकर लगातार कांव-कांव कर रहे हैं, दो-तीन चील अभी भी आसमान में उड़ रही हैं। दोनों भाइयों ने जब जंगल में प्रवेश किया तो नक्षत्रराय का शरीर कांपने लगा। बड़े-बड़े पुराने पेड़ एक-साथ खड़े हैं। वह कुछ नहीं बोलते, मगर स्थिर खड़े रहकर कीड़े की आवाज भी सुनते हैं, वह सिर्फ अपनी छाया की ओर, अपने नीचे के अंधेरे की ओर बिना पलक झपकाये देखते रहते हैं। जंगल के उस जटिल रहस्य के भीतर कदम रखने के लिए नक्षत्रराय के पैर जैसे उठ ही नहीं रहे‒चारों ओर की गहन शांति देखकर उनका हृदय कांपने लगा। नक्षत्रराय के मन में भय

के साथ-साथ संदेह भी हुआ। भाग्य की तरह नीरव राजा शाम के समय इस धरती के अन्तराल में उन्हें कहां लेकर जा रहे हैं, उन्हें समझ नहीं आया। उन्होंने सोचा राजा को पता चल गया है और दण्ड देने के लिए ही राजा उन्हें इस जंगल में लेकर आये हैं। नक्षत्रराय वहां से भाग जाये तो बचे, मगर लगा जैसे कोई उनके हाथ-पैर पकड़कर खींच रहा है। किसी भी तरह बच नहीं सकते।

जंगल के मध्य में कुछ खाली जगह है। एक तालाब है, जो बरसात के पानी से भरा हुआ है। उस जलाशय के पास अचानक राजा ने रुककर कहा, “रुको!” नक्षत्रराय चौंक कर रुक गये! ऐसा महसूस हुआ जैसे राजा का आदेश सुनकर उस पल समय की लहर रुक गयी हो‒उस पल वन के वृक्ष जहां थे वहीं झुक कर खड़े हो गये‒ नीचे से धरती और ऊपर से आकाश जैसे सांस रोककर स्तब्ध खड़ा हो। कौवों की कांव-कांव रुक गई, जंगल में कोई आवाज नहीं। सिर्फ वह ‘रुको’ शब्द की प्रतिध्वनि काफी देर तक गूंजती रही‒वह ‘रुको’ शब्द बिजली के प्रवाह की तरह एक वृक्ष से दूसरे एक शाखा से दूसरी शाख में प्रवाहित होने लगा, जंगल का प्रत्येक पत्ता जैसे उस शब्द के कंपन में री-री करने लगा। नक्षत्रराय भी पेड़ की तरह स्तब्ध खड़े हो गये।

तब अपनी मर्मभेदी उदास स्थिर दृष्टि नक्षत्रराय के चेहरे पर गड़ाकर राजा धीरे-धीरे कहने लगे, “नक्षत्र, तुम मुझे मारना चाहते हो?”

नक्षत्रराय वज्राहत की तरह खड़े रखे, उत्तर देने की कोशिश भी नहीं कर पाये।

राजा बोले, क्यों मारना चाहते हो भाई? राज्य के लोभ में? तुम क्या सोचते हो, राज्य सिर्फ सोने का सिंहासन, हीरों का मुकुट और राजछत्र है ? इस मुकुट, इस राजछत्र इस राजदण्ड का बोझ कितना है जानते हो ? हजारों लोगों की चिंताये इस हीरे के मुकुट से ढक रखी हैं। राज्य पाना चाहते हो तो सबके दुःखों को अपना दुःख समझो, हजारों लोगों की विपदा को अपनी विपदा समझो, हजारों लोगों की दरिद्रता तो अपनी दरिद्रता मानकर अपने

कंधों पर ढोओ - जो यह करता है वही राजा है, वह कुटिया में रहे या फिर महल में। जो व्यक्ति सबको अपना मान सके तभी तो सब लोग उसके होंगे। पृथ्वी के दुःखों को जो हर लेता है वही पृथ्वी का राजा है। धरती का रक्त और अर्थ का जो शोषण करता है वह तो दस्य है - हजारों अभागों के आंसू दिन रात उसके मस्तक पर बरसते रहते हैं, उस अभिशाप से कोई भी

राजछत्र उसकी रक्षा नहीं कर सकता। उसके राजभोग में सहस्त्रों उपवासियों की भूख छिपी है, अनाथों की दरिद्रता को पिघलाकर वह सोने की आभूषण पहनता है, उसके राजवस्त्रों से सहस्त्रों शीतातुर के मलिन छिन्न चिथड़े हैं। राजा के वध से राजस्व नहीं मिलता भाई, पृथ्वी को अपने वश में करके राजा बनना पड़ता है। गोविन्दमणिक्य रुके। चारों ओर गहन शांति छा गयी।

नक्षत्रराय सिर झुकाये चुप खड़े रहे।

महाराज ने म्यान से तलवार निकाली, नक्षत्रराय के सम्मुख ला कर बोले, “भाई, यहां कोई नहीं है, कोई नहीं देख रहा भाई के वक्ष पर अगर भाई ने छुरा मारना है तो उसका स्थान यही है, समय यही है - यहां तुम्हें कोई नहीं रोकेगा, कोई तुम्हारी निंदा नहीं करेगा। तेरी और मेरी रगों में एक ही खून बह रहा है - एक ही पिता, एक ही मां का खून तुम यह रक्तपात करना चाहते हो तो करो, मगर ना इंसान को आवासस्थल में मत करना। क्योंकि जहां भी इस खून की बूंद गिरेगी, वहां अनजाने में भ्रातृत्व का पवित्र बंधन शिथिल हो जायेगा। पाप का अंत कहां होगा, कौन जाने। पाप का एक भी बीज जहां गिर जाता है, वहां देखते ही देखते चुपचाप कैसे हजारों वृक्ष जन्म लेते हैं, किसी तरह धीरे-धीरे सुशिक्षित मानव समाज जंगल में बदल जाता है, यह किसी को पता भी नहीं चलता। इसलिये नगरों में गांव में जहां बेफिक्री से, परम स्नेह से भाई-भाई गले मिलकर रहते हैं, उन भाईयों की भीड़ में रक्तपात मत करना। इसलिए आज तुम्हें जंगल में लेकर आया हूं।

यह कहकर राजा ने नक्षत्रराय के हाथों में तलवार पकड़ा दी। नक्षत्र-राय के हाथों से तलवार जमीन पर गिर गयी। नक्षत्रराय दोनों हाथों से मुंह ढककर रोते हुए बोले, “मैं दोषी नहीं हूं भैया - यह बात मेरे मन में कभी भी नहीं आयी।”

राजा उन्हें छाती से लगाकर बोले, “मैं जानता हूं। तुम मुझे कभी नहीं मार सकते - तुम्हें पांच लोगों ने गलत सलाह दी है।

नक्षत्रराय बोले, “सिर्फ रघुपति मुझे यह आदेश दे रहे हैं।”

राजा बोले, “तुम रघुपति से दूर रहो।”

नक्षत्रराय बोले, “कहां जाऊं, बता दें, मैं यहां नहीं रहना चाहता।

मैं यहां से, रघुपति के पास से भागना चाहता हूं।”

राजा बोले, “तुम मेरे पास रहो, कहीं जाने की जरूरत नहीं है।

-रघुपति तुम्हारा क्या बिगाड़ेगा।”

नक्षत्रराय ने राजा का हाथ जोर से पकड़ लिया। रघुपति उन्हें अपनी और खींच लेगा, यही आशंका सताने लगी।

नक्षत्रराय जब राजा का हाथ पकड़कर जंगल के मध्य से घर लौट रहे थे। उस समय आसमान से हल्का-हल्का प्रकाश आ रहा था, मगर जंगल के बीच में बहुत अंधेरा था। जैसे अंधेरे की बाढ़ आयी हो, सिर्फ पेड़ों के ऊपर प्रकाश है। धीरे-धीरे वह भी डूब जायेगा - तब अंधेरे में पूर्ण होकर आकाश और पृथ्वी एक हो जायेगी।

महल की ओर न जाकर राजा मंदिर की ओर चले। मंदिर में संध्या वंदना के पश्चात एक दीपक जलाकर रघुपति और जयसिंह कुटिया में बैठे थे। दोनों चुपचाप अपनी-अपनी चिंता में डूबे हुये। दीपक के हल्के प्रकाश में उन दोनों के चेहरे छाया जैसे दिख रहे थे। रघुपति को देखकर नक्षत्रराय नजरें नहीं उठा पाये। राजा की छाया में खड़े होकर जमीन की ओर देखने लगे। राजा ने उन्हें अपने पास खींच लिया और जोर से उनका हाथ पकड़ लिया, और स्थिर भाव से एक बार रघुपति की ओर देखा। रघुपति ने तीव्र दृष्टि से नक्षत्रराय की ओर कटाक्ष किया। अन्ततः राजा ने रघुपति को प्रणाम किया, नक्षत्रराय ने भी उनका अनुसरण किया। रघुपति ने प्रणाम ग्रहण करके गंभीर भाव में कहा, “जयस्तु - राज्य में कुशल तो है ?

कुछ देर ठहरकर राजा बोले, “आप आशीर्वाद दे कि राज्य में अकुशल न घटे। इस राज्य में मां की सारी संतान प्रेम से मिलकर रहें, इस राज्य में भाई से भाई को कोई न छीने, जहां प्रेम है वहां कोई हिंसा न ला पाये। राज्य में अमंगल की आशंका देखकर ही आया हूं। पाप-संकल्प के घर्षण से दावानल जल सकती है - आप निर्वाण करें, शांति की वर्षा करें, पृथ्वी को शीतल करें।”

रघुपति बोले, “देवता का क्रोध जग जाये तो उसे कौन शांत करेगा। एक अपराधी के लिये सहस्त्र निरापराध उस आग में जल जाते हैं।”

राजा बोले, “यही तो डर की बात है, इसीलिये तो कांप रहा हूं। यह बात कोई समझकर भी क्यों नहीं समझता। क्या आप नहीं जानते, इस राज्य में देवता के नाम पर देवता का नियम भंग किया जा रहा है ? इसलिये ही अमंगल की आशंका से शाम के समय यहां हूं - यहां पाप का वृक्ष रोप कर मेरे इस धन-धन्यता सुखी राज्य में देवता का वज्र आह्वान न करें। आपको यही कहकर जा रहा हूं, मैं यही कहने आया था।” कहकर महाराज ने रघुपति के चेहरे पर अपनी मर्मभेदी दृष्टि डाली। राजा की गंभीर आवाज बंद कुटिया में कांपने लगी। रघुपति ने कोई उत्तर नहीं दिया, अपने जनेऊ को हिलाने लगे। राजा प्रणाम करके नक्षत्रराय का हाथ पकड़कर बाहर आ गये, साथ-साथ जयसिंह भी आ गये। कमरे में सिर्फ एक दीपक, रघुपति और रघुपति की बड़ी सी परछाई रह गयी।

तब तक आसमान का प्रकाश बुझ गया था। बादलों में तारे छिपे हुये थे। आसमान अंधेरे में डूबा हुआ था। पूर्व की हवा में उस घनघोर अंधेरे में भी कहीं से कदम्ब फूल की खुशबू आ रही थी और पत्तों की मर्म आहट सुनाई दे रही थी। चिंता में डूबे अपने परिचित पथ पर राजा चले जा रहे हैं, अचानक पीछे से किसी ने पुकारा, “महाराज।”

महाराज ने पीछे मुड़कर पूछा, “कौन हो तुम ?”

परिचित आवाज आयी, “मैं आपका अद्यम सेवक हूं। मैं जयसिंह। महाराज आप ही मेरे गुरु हैं, मेरे प्रभु हैं। आपके सिवा मेरा कोई नहीं है। जैसे आप अपने छोटे भाई का हाथ पकड़कर अंधेरे में से ले जा रहे हैं, वैसे ही मेरा हाथ भी पकड़े। मुझे भी अपने साथ ले जायें। मैं घने अंधेरे में फंस गया हूं। मेरा किस में भला है, किसमें बुरा मैं कुछ नहीं जानता। मैं एक बार दायें जा रहा हूं एक बारे बांये, मेरा कोई कर्णधार नहीं है।”

अंधकार में ही आंसू बहने लगे, किसी ने नहीं देखा। आवेग से भरा हुआ जयसिंह की भीगी आवाज कांपती हुई राजा के कानों को छूने लगी। निस्तब्ध अंधकार हवा से चंचल समुद्र की तरह कांपने लगा। राजा ने जयसिंह का हाथ पकड़कर कहा, चलो, मेरे साथ महल में चलो।”


अगले दिन जयसिंह जब मंदिर में लौटकर आयें तब तक पूजा का समय बीत चुका था। रघुपति उदास से अकेले बैठे थे। इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ था।

जयसिंह सीधे अपने गुरु के पास न जाकर अपने बगीचे में चले गये। अपने पेड़-पौधों के बीच में जाकर बैठ गये। वह उनके चारों ओर कांपने लगे, हिलने लगे, छाया को नचाने लगे। उनके चारों ओर फलों की पत्तियां झड़ी पड़ी थी, हरे पत्तों के ढेर, छायापूर्ण कोमल स्नेह की चादर, मधुर आह्वान प्रकृति का प्रीतिपूर्ण आलिंगन था। यहां पर सब इंतजार किया करते हैं - कुछ पूछते नहीं, सोच के बीच में बाधा नहीं पहुंचाते देर पर देखते हैं, बात करने पर बोलते हैं। इस नीरव ममता में, प्रकृति के भीतर बैठकर जयसिंह सोचने लगे। राजा ने उन्हें जो उपदेश दिये थे उन्हीं के विषय में सोचने लगें।

उसी समय रघुपति धीरे से वहां आये और उनके पीठ पर अपना हाथ रख दिया। जयसिंह की ओर देखकर कांपती हुयी आवाज में बोले, “वत्स, तुम्हारा यह भाव क्यों देख रहा हूं ? मैंने तुम्हारा क्या गलत किया है कि तुम धीरे-धीरे मुझसे दूर जा रहे हो ?

जयसिंह ने कुछ कहना चाहा, रघुपति ने बाधा देते हुये कहा, “एक पल के लिये भी कभी मेरे स्नेह में कमी देखी ? मैंने क्या कोई गलती की है जयसिंह ? अगर की भी है तो मैं तुम्हारा गुरु हूं, तुम्हारे पिता जैसा, मैं तुमसे क्षमा की भीख मांगता हूं, मुझे माफ कर दो।

जयसिंह बिजली की तरह चौंक गये, गुरु के चरण पकड़कर रोने लगे, बोले, पिता, मैं कुछ नहीं जानता, मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूं, मैं कहां जा रहा हूं मुझे न दिख रहा है।”

रघुपति जयसिंह का हाथ पकड़कर बोले, “बेटा, मैंने तुम्हें तुम्हारे बचपन से ही मां की तरह पाला है, पिता से ज्यादा शस्त्र की शिक्षा दी, तुम पर पूरा विश्वास रखकर मित्र की तरह तुम्हें अपने काम में सहयोगी बनाया। आज तुम्हें मेरे पास से कौन दूर ले जा रहा है। इतने दिनों की स्नेह और ममता कौन खिन्न कर रहा है? तुम्हारे ऊपर मेरा जो अधिकार है उस पवित्र अधिकार पर कौन हस्तक्षेप कर रहा है ? बोलो वत्स, उस महापापी का नाम बताओ।”

जयसिंह बोले, “प्रभु, आपसे मुझे किसी ने अलग नहीं किया -आपने खुद ही मुझे दूर कर दिया है। मैं तो घर के भीतर था, आपने अचानक मुझे रास्ते पर छोड़ दिया है, आपने कहा है, पृथ्वी पर कोई बंधन नहीं होता, स्नेह प्रेम का पवित्र अधिकार नहीं है। जिन्हें मैं मां मानता था। आपने उन्हें कहा है शक्ति। जो जहां हिंसा फैला रही है, रक्त बहा रही है, भाई-भाई में विवाद करवा रही है, जहां भी दो व्यक्तियों में झगड़ा है वहीं यह प्यासी शक्ति रक्त की लालसा में अपना खप्पर लेकर खड़ी है। मां की गोद से आपने मुझे यह किस राक्षसी के देश में निर्वासित कर दिया।”

रघुपति काफी देर चुप रहे। अन्त में दीर्घश्वास फेंकते हुए बोले, “तो तुम स्वतंत्र हुये, बंधन मुक्त हुये, तुम्हारे ऊपर से मैंने अपने सारे अधिकार वापस ले लिये, इसी से अगर तुम सुखी होते हो तो ऐसा ही हो।” कहकर जाने लगे।

जयसिंह ने पैर पकड़ बोले, नहीं नहीं प्रभु, आप मेरा त्याग भले ही कर दें, मगर मैं आपको नहीं त्याग सकता। मैं यहीं रहूंगा - आपके चरणों के नीचे, आप जो चाहेंगे, वही होगा। आपके पथ के अलावा मेरा दूसरा पथ नहीं है।”

तब रघुपति ने जयसिंह को आलिंगबद्ध कर लिया, उनके आंसू जयसिंह के कंधे पर गिरने लगे।


मंदिर में बड़ी भीड़ है। खूब शोर हो रहा है। रघुपति ने रूखे स्वर से पूछा, “तुम लोग क्या करने आये हो?”

अलग-अलग आवाजें आयी, “हम देवी-दर्शन के लिये आये हैं। रघुपति बोले, “देवी है कहां! देवी इस राज्य को छोड़कर चली गयी हैं। तुम लोग देवी को रख कहां पाये! वे चली गयी हैं।

शोर मच गया - विभिन्न दिशाओं से भिन्न-भिन्न बातें सुनायी देने लगी।

“यह क्या हुआ भगवान ?”

“हमने क्या गलती की है पण्डित जी?”

“मां क्या किसी भी तरह प्रसन्न नहीं होगी ?”

“मेरे भाई का बेटा बीमार था, इसलिये मैं कुछ दिनों से पूजा करने नहीं आया।” उसका दृढ़ विश्वास है कि इसी कारण देवी नाराज होकर चली गयी हैं।

“मेरे दो बकरे देवी पर चढ़ाऊंगा, यही सोचा था, मंदिर दूर होने के कारण आ नहीं पाया।” दो बकरे न देकर उसने राज्य का अमंगल किया है, यही सोचकर वह परेशान हो रहा था।

“गोवर्धन ने जो वचन दिया था मां को, वह पूरा नहीं कर पाया, मगर मां ने भी तो उसे दण्ड दिया है। उसका बच्चा जो बड़ा हो गया था, वह छह महीने से बिस्तर पर है।” गोवर्धन उसकी बीमारी समेत भाड़ में जाये, मां यहीं रहें, उसने मन ही मन यह प्रार्थना की। सभी अभागे गोवर्धन की उन्नति की कामना करने लगे।

भीड़ में एक लम्बा-चौड़ा व्यक्ति था उसने सबको डांट कर रोका और रघुपति हाथ जोड़कर बोला, “प्रभु, मां क्यों गयी, हमने क्या गलती की है ?

रघुपति बोले, तुम लोग मां को एक बूंद भी खून की नहीं दे पाये, यही तुम लोगों की भक्ति है!”

सब चुप हो गये। अन्नतः फिर फुसफुसाहट शुरू हो गयी।

“राजा ने मना किया है, हम क्या करें ?”

जयसिंह पत्थर की मूरत की तरह चुप बैठे थे। उनके मन में जो बात तीव्रता से उठी थी, वह थी ‘मां ने ही मना किया है’

-मगर उन्होंने खुद को रोका, कुछ नहीं बोले।

रघुपति ने तेज स्वर में कहा, “राजा कौन है ? मां का सिंहासन क्या राजा के सिंहासन से नीचे है? तो इस मां विहीन देश में तुम लोग अपने राजा के साथ रहो। देखता हूं तुम लोगों की रक्षा कौन करता है।

जनता में फुसफुसाहट और बढ़ गयी। सभी सावधानी पूर्वक बातें करने लगे।

रघुपति खड़े होकर बोले, “राजा को बड़ा करके तुम लोगों ने मां का अपमान करके, उन्हें यहां से विदा कर दिया है। तुम लोग क्या सोचते हो तुम ऐसे सुखी रहोगे। तीन साल बाद देखना तुम लोगों का नामों-निशान नहीं बचेगा इस राज्य में - तुम्हारे वंश में दिया जलाने वाला कोई नहीं बचेगा।”

भीड़ में समुद्र की तरह आवाजें उठने लगी। भीड़ भी धीरे-धीरे बढ़ रही थी। वह लम्बा-चौड़ा व्यक्ति हाथ जोड़कर रघुपति से बोला, “बच्चों ने अगर गलती की है तो मां उन्हें दण्ड दे, मगर मां अपनी संतान को त्याग कर चली जायेगी, ऐसा कभी होता है! प्रभु आप ही बताये हम क्या करें जिससे मां लौट आयेगी।”

रघुपति बोले, “तुम्हारे यह राजा जब इस राज्य से बाहर निकलेंगे तभी मां दोबारा यहां लौटेगी।”

यह सुनकर जनता की फुसफुसाहट रुक गयी। अचानक चारों ओर गहन चुप्पी छा गयी, अन्ततः सब एक-दूसरे की ओर देखने लगे, किसी में भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुयी।

रघुपति बादलों की तरह गरजकर बोले, “तो तुम देखो, चलो मेरे साथ आओ। इतनी दूर से बड़ी उम्मीदों से तुम देवी के दर्शन के लिये आये हो न - चलो एक बार मंदिर में चलो।”

सभी डरते हुये मंदिर के प्रांगण में आ गये। मंदिर का द्वार बंद था, रघुपति ने धीरे-धीरे द्वार खोला।

कुछ देर तक किसी के भी मुंह से कोई शब्द नहीं निकला। प्रतिमा का चेहरा नहीं दिखाई दे रहा था, प्रतिमा का पिछला भाग दर्शकों को दिखाई दे रहा था। मां ने मुंह फेर लिया है। अचानक भीड़ में से रोने की आवाज आयी, “एक बार घूम कर देख मां! हमने क्या गलती की है ?” चारों ओर मां कहां है ? मां कहां है?” की आवाजें आनी लगी। पत्थर की मूर्ति थी, नहीं घूमी। कई लोग बेहोश हो गये। बच्चों को कुछ समझ न आया, वह रोने लगे। वृद्ध भी मां के बच्चों की तरह पुकारने लगे “मां, ओ मां!” औरतों ने घूंघट हटा दिया, आंचल गिर गया, वह छाती पीटने लगी। युवक कांपते हुये स्वर से ऊंची आवाज में कहने लगे “मां, हम तुम्हें लौटा लायेंगे, हम तुम्हें यूं नहीं जाने देंगे।

एक पागल गाने लगा,

“मां मेरी पत्थर की बेटी

बच्चे को नहीं देखती।”

मंदिर के द्वार पर खड़े होकर समस्त राज्य जैसे “मां, मां, कहकर विलाप करने लगा, मगर प्रतिमा नहीं घूमी। दोपहर का सूर्य तेजी से चमकने लगा, मंदिर में उपवासी भीड़ का विलाप नहीं रुका।

तब कांपते हुये कदमों से जयसिंह ने आकर रघुपति से कहा, “प्रभु, मैं क्या एक शब्द भी नहीं कह सकता?”

रघुपति बोले, “नहीं, एक शब्द भी नहीं।”

जयसिंह बोले, “सन्देह का क्या कोई कारण नहीं ?”

रघुपति ने दृढ़तापूर्वक कहा, “नहीं!”

जयसिंह ने दृढ़ता से मुट्ठी बांधकर कहा, “मैं क्या सब कुछ विश्वास कर लूं?” रघुपति ने अपनी तेज दृष्टि से जयसिंह को जलाते हुये कहा, “हा।” जयसिंह ने छाती पर हाथ रखकर कहा, “मेरी छाती फट रही है।” वे भीड़ से निकलकर तेजी से बाहर चले गये।


अगले दिन ही आषाढ़ की उनतीस तारीख थी। आज रात को चतुर्दश देवता की पूजा है। आज सुबह, तालवन के पीछे से जब सूरज उगा तो पूर्व दिशा में बादल नहीं थे। सूर्य की किरणों से नहाये हुये आनंद मग्न बगीचे में जाकर जब जयसिंह बैठे। तब उनके मन में पुरानी यादें आने लगी। इस वन में, इस पत्थर के मंदिर की पत्थर की सीढ़ियों पर, इस गोमती के तट पर, इस विशाल बड़ की छाया में, उस छाया से घिरे तालाब के किनारे उनका बचपन - मधुर सपने की तरह याद आने लगा। जो सब मधुर दृश्य बचपन में उन्हें स्नेह से घेरे रहते थे, वह सब आज हंस रहे हैं, उन्हें फिर से बुला रहे हैं, मगर उनका मन कह रहा है, मैं यात्रा पर निकल पड़ा हूं, मैं विदा ले चुका हूं, अब मैं नहीं लौटूंगा।” श्वेत पत्थर के मंदिर पर सूर्य की

किरणें पड़ रही हैं और उसके बायीं ओर की दीवार पर बकुल पेड़ की शाखा की छाया गिर रही है। बचपन में यह पत्थर का मंदिर जितना जीवित महसूस होता था, इन सीढ़ियों पर अकेले बैठकर जब वे खेलते तब यह सीढ़ियां जैसे उनकी साथी बन जाती, आज प्रभात की किरणों में मंदिर वैसा ही जीवित और उसकी सीढ़ियां वैसे ही बचपन से भरकर देखने लगी - मंदिर के भीतर की मां आज फिर मां जैसी लगने लगी। मगर अभिमान से उसका हृदय भर गया, आंखों से आंसू बहने लगे।

रघुपति को आते देख जयसिंह ने जल्दी से आंसू पोंछे। गुरु को प्रणाम करके खड़े हो गये। रघुपति बोले, “आज पूजा है। मां के चरण स्पर्श करके जो शपथ ली थी, वह याद है न?”

जयसिंह बोले, “हां याद है।”

रघुपति। शपथ पालन करोगे या नहीं ?”

जयसिंह। करूंगा।

रघुपति- देखो वत्स, सावधानीपूर्वक काम करना संकट की आशंका है। मैंने तुम्हारी रक्षा के लिये ही प्रजा को राजा के विरुद्ध भड़काया है।

जयसिंह चुपचाप रघुपति को देखते रहे, कोई उत्तर नहीं दिया। रघुपति ने उनके सिर पर हाथ रखकर कहा, “मेरा आशीर्वाद है कि बिना किसी बाधा के तुम अपने कार्य में सफल होओ, मां का आदेश पालन कर पाओ।” यह कहकर चले गये।

दोपहर के समय एक कमरे में राजा ध्रुव के साथ खेल रहे थे। ध्रुव के आदेशानुसार एक बार मुकुट उतारते, फिर पहनते। ध्रुव महाराज की यह हालत देख हंस-हंसकर लोटपोट हो रहा था। राजा हंसकर बोले, “मैं आदत डाल रहा हूं। उनके आदेश से यह मुकुट जितनी सहजता से पहन पाया, उनके आदेश पर उतनी ही सहजता से इसे उतार भी पाऊं। मुकुट पहनना कठिन है मगर उसका त्याग करना बहुत कठिन है।”

ध्रुव के मन में अचानक एक भाव उदय हुआ कुछ देर राजा की ओर देखकर मुंह पर अंगुली रखकर बोला, “तुम राजा हो।” राजा शब्द का ‘र’ बिल्कुल न बोलकर भी ध्रुव के मन में कोई अनुताप नहीं था। राजा के सम्मुख राजा को ‘राजा’ कहकर उसे सम्पूर्ण आत्मप्रसाद लाभ हुआ।

राजा की ध्रुव की यह धृष्टता न सह पाकर बोले, “तुम राजा हो।”

ध्रुव बोला, “तुम राजा हो।”

इस विषय में बहस समाप्त नहीं हुयी। किसी भी पक्ष के पास कोई प्रमाण नहीं था सिर्फ बहस और जबरदस्ती थी। अन्त में राजा ने अपना मुकुट

ध्रुव के सिर पर रख दिया। तब ध्रुव के पास कुछ भी कहने को नहीं बचा,

सम्पूर्ण रूप से हार हुयी - ध्रुव का आधा चेहरा उस मुकुट के नीचे ढक गया। मुकुट समेत अपना सिर हिलाते हुये ध्रुव ने राजा को आदेश दिया,

“एक कहानी सुनाओ।”

“राजा बोले, “कौन-सी कहानी?”

ध्रुव बोला, “दीदी की कहानी सुनाओ।

ध्रुव तो यही जानता था कि कहानी मतलब दीदी की कहानी।

वह जानता था दीदी जो कहानियां सुनाती थी, उसके सिवा पृथ्वी पर और कहानी नहीं होती। राजा तब एक पौराणिक कहानी सुनाने लगे। वे बोले, “हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था।”

‘राजा’ सुनकर ध्रुव बोला, “मैं राजा हूं।” इस बड़े से मुकुट के जोर पर उसने हिरण्यकश्यप का राजा होना स्वीकार नहीं किया। चतुर सभासद की तरह गोविन्दमणिक्य उस बच्चे को संतुष्ट करने के लिये बोले, “तुम भी राजा हो, वह भी राजा है।”

ध्रुव ने असम्मति प्रकाश करते हुये कहा, “नहीं, मैं राजा हूं।”

अन्त में महाराज ने जब कहा, “हिरण्यकश्यप राजा नहीं राक्षस है।” तब ध्रुव को आपत्ति प्रकाश करने का मौका नहीं मिला।

उसी समय नक्षत्रराय ने कमरे में प्रवेश किया। बोले, आपने राजकार्य के लिये मुझे बुलाया है, आदेश की प्रतीक्षा कर रहा हूं।” राजा बोले, “थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो, कहानी पूरी कर दूं।” कहकर कहानी पूरी की। कहानी सुनकर ध्रुव ने अपने विचार व्यक्त किये - आक्षस (राक्षस) शैतान है।”

ध्रुव के सिर पर मुकुट नक्षत्रराय को अच्छा नहीं लगा। ध्रुव ने जब देखा कि नक्षत्रराय की दृष्टि उस पर है, तब उसने नक्षत्रराय को बताया “मैं राजा हूं।”

नक्षत्र बोले, “छिःछिः ऐसा नहीं कहते।” कहकर ध्रुव के सिर से मुकुट लेकर राजा को देने लगे। ध्रुव ने जब देखा कि मुकुट का हरण हो रहा है तो वह चीख उठा। गोविन्दमणिक्य ने उसे इस विपदा से बचाया, नक्षत्रराय को रोक दिया।

अन्त में गोविन्दमाणिक्य ने नक्षत्रराय से कहा, “मैंने सुना है, रघुपति विभिन्न उपायों द्वारा प्रजा को भड़का रहे हैं। तुम खुद नगर में जाकर पता करके आओ, और सच क्या है झूठ क्या मुझे बताओ।”

नक्षत्रराय बोले, “जी अच्छा।” कहकर चले गये। मगर ध्रुव के सिर पर मुकुट उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। चौकीदार ने आकर कहा, “पुरोहित के सेवक जयसिंह आपसे मिलना चाहते हैं।”

राजा ने उन्हें आने की अनुमति दी।

जयसिंह ने महाराज को प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा, “महाराज मैं बहुत दूर देश जा रहा हूं। आप मेरे राजा हैं, मेरे गुरु हैं, आपका आशीर्वाद लेने आया हूं।”

राजा ने पूछा, “कहां जाओगे जयसिंह ?

जयसिंह बोले, “नहीं जानता महाराज! कहां यह कोई नहीं बता सकता।” राजा कुछ कहने ही वाले थे कि जयसिंह बोले, “मुझे मत रोकिये महाराज! आप अगर रोकेंगे तो मेरी यात्रा शुभ नहीं होगी। आशीर्वाद दीजिये। यहां मेरे मन में जो संशय है, वह वहां जाकर दूर हो जायें। यहां के बादल वहां जाकर छट जाये। आपके जैसा राजा वहां भी मिले तो मुझे भी शांति मिले।

राजा ने पूछा, “कब जा रहे हो?”

जयसिंह बोले, “आज शाम को ज्यादा समय नहीं है महाराज, मैं आपसे विदा लेता हूं।” कहकर राजा को प्रणाम करके उनके चरण छुये, राजा के चरणों पर दो बूंद आंसू गिर गयी।

जयसिंह जब उठकर जाने लगे, तब ध्रुव धीरे-धीरे उनके पास जाकर उनकी धोती पकड़कर बोला, “तुम मत जाओ।”

जयसिंह हंसकर घूमकर खड़े हो गये, ध्रुव को गोद में उठाकर चूमकर बोले, किसके पास रुकूं वत्स? मेरा कौन है ?

ध्रुव बोला, “मैं राजा हूं।”

जयसिंह बोले, “तुम लोग राजाओं के भी राजा हो, तुम्हीं लोगों ने सबको बंदी बना रखा है।” ध्रुव को गोद से उतारकर जयसिंह चले गये। महाराज गंभीर भाव से काफी देर तक सोचते रहे।


आज चतुर्दशी है। बादल भी है, चांद भी निकला है। आसमान में कहीं प्रकाश तो कहीं अंधेरा है। कभी चांद निकल रहा है तो कभी छिप रहा है। गोमती के तट का जंगल चांद की ओर देखता हुआ, अपने अंधेरे का मर्म भेदता हुआ, रह-रह कर सांस बाहर फेंक रहा है।

आज रात को लोगों का बाहर आना मना है। वैसे भी रात के समय कौन बाहर आता है। मगर मनाही के कारण आज बाहर की निर्जनता और ज्यादा गहरी लग रही है। नगरवासी अपने-अपने घरों में दीया बुझाकर दुबके पड़े हैं। रास्ते में कोई प्रहरी भी नहीं है। आज की रात चोर भी बाहर नहीं निकलते। जिन लोगों को शमशान में शव दाह करने जाना है, वे भी शव घर में लिये सुबह होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जिनके घरों में बच्चे बीमार है, वह वैद्य बुलाने भी नहीं नहीं निकलते। जो भिखारी रास्ते के किनारे वाले पेड़ के नीचे सोता था उसने भी किसी के घर की गोशाला में आश्रय लिया है।

उस रात को कुत्ते और सियार पथों पर घूम रहे हैं। एक चीता घर के पास आकर झांक रहा है। इंसानों में सिर्फ एक इंसान घर से बाहर है, और कोई नहीं है। वह एक छुरा लेकर नदी तट के पत्थर पर उसे तेज कर रहा है और अनमना होकर न जाने क्या सोच रहा है। छुरा तेज था मगर शायद वह छुरे के साथ अपनी भावनाओं को तेज कर रहा है, इसलिये वह उसे पत्थर पर रगड़े जा रहा था। पत्थर के घर्षण से तेज छुरी हिस्-हिस् करती हिंसा की लालसा में तप रही थी। अंधेरे में अंधेरी नदी बही जा रही थी। धरती पर

अंधेरी रात के प्रहर बीत रहे थे। आसमान में अंधेरे बादल इधर-उधर घूम रहे थे।

अन्त में जब मूसलाधार बारिश शुरू हुयी तो जयसिंह को होश आया। तपती हुयी छुरी को म्यान में रखकर उठ खड़े हुये। पूजा का समय पास ही है। उन्हें अपनी शक्ति याद आयी। अब ज्यादा देर करना ठीक नहीं।

मंदिर में आज हजारों दीपक जल रहे हैं। तेरह देवताओं के बीच में खड़ी होकर मां काली नर-रक्त के लिये जिह्वा निकाले खड़ी है। मंदिर के सेवकों को विदा करके देवी की प्रतिमा के सम्मुख रघुपति अकेले बैठे हैं। उनके सामने एक बड़ा-सा खड़ग रखा है। नंगा खड़ग दीपक के प्रकाश से आलोकित होकर स्थिर बिजली की तरह देवी के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है।

आधी रात के समय पूजा है। समय पास ही है। रघुपति बेचैनी से जयसिंह की प्रतीक्षा कर रहे थे। अचानक तूफानी हवा के साथ मूसलाधार बरसात होने लगी। हवा के कारण दीपशिखायें कांपने लगी, नंगे खड़ग पर बिजली खेलने लगी। देवी और रघुपति की छाया को जैसे जीवन मिल गया, वह दीप शिक्षा के नृत्य के साथ ताल मिलाकर मंदिर की दीवारों पर नाचने लगी। मंदिर में दो चमगादड़ आकर सूखे पत्ते की तरह लगातार उड़ने लगी। दीवार पर उनकी छाया उड़ने लगी।

दो प्रहर हो गये। पहले पास, फिर दूर-दूर सियार बोलने लगे। तूफान की हवा उनकी आवाज से मिलकर हूं-हू कर रोने लगी। पूजा का समय हो गया है। रघुपति अमंगल की आशंका से चंचल हो उठे हैं।

उसी समय जीवित तूफान-बारिश और बिजली की तरह रात के अंधेरे के भीतर से जयसिंह ने अचानक मंदिर के प्रकाश में प्रवेश किया। बड़ी-सी चादर से सारा शरीर ढका हुआ, सारे शरीर से बरसात का पानी झर रहा है, सांस तेज चल रही है, आंखों से ज्वाला निकल रही है।

रघुपति ने उन्हें पकड़ा और कान के पास मुंह ले जा कर बोले, “राजरक्त लाये हो?

जयसिंह ने उनका हाथ छुड़वाकर ऊंचे स्वर में कहा, “लाया हूं, राजरक्त लाया हूं? आप हट जाइयें, मैं देवी को निवेदन करता हूं।” उनकी आवाज से मंदिर कांप उठा।

मां काली की मूर्ति के सम्मुख आकर कहने लगे, “सचमुच क्या तुझे संतान का रक्त चाहिये मां। राजरक्त के बिना तेरी प्यास नहीं मिटेगी! जन्म के बाद से मैं ही मां कहता आया हूं, मैंने तेरी ही सेवा की है, मैंने किसी ओर देखा तक नहीं, मेरे जीवन का और कोई उद्देश्य नहीं था। मैं राजपूत हूं, क्षत्रिय हूं, मेरे परदादा राजा थे, मेरे मां के वंश वाले अभी भी राज कर रहे हैं। यह ले अपनी संतान का रक्त, अपना राजरक्त ले। शरीर से चादर गिर गयी। उन्होंने छुरा निकाला - बिजली चमक उठी। उस छुरी को अपने हृदय में घोंप लिया, मौत की जिह्वा उसके वक्ष में बिंध गयी। मूर्ति के पैरों के नीचे गिर गये, पत्थर की मूर्ति विचलित नहीं हुयी।

रघुपति चीखने लगे - जयसिंह को उठाने की कोशिश करने लगे मगर उठा नहीं पाये। वे मृत शरीर पर पड़े रहे। मंदिर के सफेद पत्थर पर खून बहने लगा। धीरे-धीरे दीये बुझ गये। अंधेरे में सारी रात एक प्राणी के श्वास की आवाज सुनायी देने लगी। रात को तीसरे प्रहर को तूफान थम गया, सब कुछ शांत हो गया। रात के चौथे प्रहर बादलों के मध्य से चांदनी ने मंदिर में प्रवेश किया। चांदनी जयसिंह के पीले पड़े चेहरे पर पड़ी , सिरहाने पर देवी खड़ी यह सब देख रही थी, सुबह जंगल से जब पक्षियों के बोलने की आवाजें आयी तब रघुपति मृत शरीर के पास से उठे।


राजा के आदेशानुसार प्रजा में असंतोष का कारण जानने के लिये नक्षत्रराय सुबह ही नगर में निकल पड़े। वे सोचने लगे ‘मंदिर में कैसे जाऊं’। रघुपति के सामने आते ही उनकी हालत अजीब-सी हो जाती है, खुद को संभाल नहीं पाते। रघुपति के सामने जाने की उनकी इच्छा नहीं थी। इसलिये उन्होंने निश्चय किया था, रघुपति की नजर बचाकर चुपचाप जयसिंह के पास जाकर सारी बातें विस्तार-पूर्वक जान लेंगे।

नक्षत्रराय ने धीरे-धीरे जयसिंह के कमरे में प्रवेश किया। प्रवेश करते ही उन्हें लगा, लौट जाऊं किसी तरह। उन्होंने देखी जयसिंह की पुस्तकें, उनके कपड़े, उनके कमरे का सामान चारों ओर बिखरा पड़ा है। बीच में रघुपति बैठे हैं। जयसिंह वहां नहीं थे। रघुपति की लाल आंखें अंगारों की तरह दहक रही थी, उनके बाल बिखरे पड़े थे। नक्षत्रराय को देखते ही दृढ़ता से रघुपति ने उनका हाथ पकड़ लिया। बलपूर्वक उन्हें नीचे बिठाया। नक्षत्रराय की तो जान ही निकल गयी। रघुपति अपनी अंगारों-सी दहकती आंखों से नक्षत्रराय को पागलों की तरह बोले, “रक्त कहां है?” नक्षत्रराय का हृदय जोरों से धड़कने लगा, कुछ कह नहीं पाये।

रघुपति ने ऊंची आवाज में कहा, “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा की, क्या हुआ ? रक्त कहां है ?”

नक्षत्रराय ने हाथ मिलाया, पैर हिलाया, बांयी ओर सरककर बैठे, धोती का किनारा पकड़कर खींचने लगे, उन्हें पसीना आने लगा, सूखे कंठ से बोले, “प्रभु!”

रघुपति बोले, “अब मां ने स्वयं खड़ग उठा लिया है। अब चारों ओर खून की नदियां बहेंगी, अब तुम्हारे वंश में एक बूंद भी खून नहीं बचेगा! तब नक्षत्रराय का भाई के प्रति प्यार देखूंगा।”

“भाई के प्रति प्यार! हा-हा-हा! प्रभु” - नक्षत्रराय की हंसी कंठ में ही रह गयी, गला सूख गया।

रघुपति बोले, “मुझे गोविन्दमणिक्य का रक्त नहीं चाहिये। इस धरती पर गोविन्दमणिक्य सबसे ज्यादा जिसे प्यार करता है, उसका खून चाहिये। उसका खून लेकर मैं गोविन्दमणिक्य के शरीर पर मलना चाहता हूं - उसकी छाती लाल हो जायेगी - उस खून के धब्बे कभी नहीं मिटेंगे। यह देखो-देखो कहकर अपने शरीर से चादर हटा दी। उनकी देह खून से रंगी हुयी थी, उनकी छाती पर खून जमा हुआ था।

नक्षत्रराय डर गये। उनके हाथ-पैर कांपने लगे। रघुपति ने जोर से नक्षत्रराय का हाथ पकड़कर कहा, “कौन है वह? कौन है वह जिसे गोविन्दमणिक्य प्राणों से अधिक प्यार करता है। किसके जीने पर गोविन्दमणिक्य को यह

धरती शमशान लगने लगेगी, उसके जीवन का उद्देश्य समाप्त हो जायेगा ? सुबह बिस्तर से उठते ही किसका चेहरा उसे याद आता है, किसी याद साथ लेकर वह रात को सोने जाते हैं, उसके हृदय को पूर्ण करके कौन उसमें विराज कर रहा है ? वह क्या तुम हो ?” कहकर वाद्य हरिण का शिकार करने से पहले जैसे उसे देखता है, रघुपति ने नक्षत्रराय को उसी तरह देखा।

नक्षत्रराय ने जल्दी से कहा, “नहीं, मैं नहीं हूं।” मगर किसी भी तरह रघुपति से हानि नहीं छुड़वा पायें।

रघुपति ने कहा, “तो बताओ, वह कौन है ?

नक्षत्रराय ने बता दिया, “वह ध्रुव है।”

रघुपति ने पूछा, “ध्रुव कौन है?”

नक्षत्रराय। एक बच्चा -

रघुपति बोले, “मैं जानता हूं उसे। राजा की अपनी संतान नहीं है। उसे वे संतान की तरह पाल रहे हैं। अपने बच्चे को इंसान कितना चाहता है में नहीं जानता। मगर पाले हुये बच्चे को प्राणों से भी ज्यादा चाहता है, यह मैं जानता हूं। अपनी सारी सम्पत्ति से उसका सुख ज्यादा मूल्यवान लगता है। अपने सिर पर मुकुट होने से ज्यादा अच्छा उसके सिर पर मुकुट लगता है।

नक्षत्रराय चौंकते हुये बोले, “हाँ, ठीक बात है।”

रघुपति बोले, “ठीक नहीं तो क्या! राजा उससे कितना प्यार करते हैं, क्या मैं नहीं जानता! मैं क्या नहीं समझता! मुझे वही चाहिये।”

नक्षत्रराय अवाक् होकर रघुपति की ओर देखते रहे। अपने मन ही मन बोले “वही चाहिये।”

रघुपति बोले, “उसे यहां लाना ही होगा - आज लाना होगा - आज रात को ही।

नक्षत्रराय प्रतिध्वनि की तरह बोले, “आज रात को ही! कुछ देर तक नक्षत्रराय की ओर देखकर, आवाज धीमी करके रघुपति बोले, “तुम जानते हो, यह बच्चा ही तुम्हारा शत्रु है? तुमने राजवंश में जन्म लिया है - यह अज्ञात कुल का बच्चा न जाने कहां से तुम्हारा मुकुट छीनने आ गया है जानते हो ? जो सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था, उस सिंहासन पर अब उसका

अधिकार है, यह सब क्या तुम्हें दिखायी नहीं दे रहा है।”

नक्षत्रराय के लिये यह बातें नयी नहीं है। उन्होंने पहले ऐसा सोचा था। गर्व से बोले, “यह क्या कहने की बात है प्रभु! मैं क्या यह सब नहीं देख पा रहा।”

रघुपति बोले, “ते फिर क्या! मुझे लाकर दो। तुम्हारे सिंहासन की बाधा दूर कर देता हूं। दिन किसी तरह बीत जाये, उसके बाद -

तुम कब लाओगे ?

नक्षत्रराय आज शाम को-अंधेरा होने के बाद।

अपना जनेऊ हाथ में लेकर रघुपति बोले, “अगर न ला पायें तो ब्राह्मण का श्राप लगेगा। अगर तुमने अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं की तो तीन रात बीतते ही तुम्हारे मुंह का मांस गिद्ध नोंचकर खायेंगे।”

यह सुनकर नक्षत्रराय ने चौंककर अपने मुंह पर हाथ फेर - कोमल मांस पर गिद्ध की नजर कल्पना करके डर गये। रघुपति को प्रणाम करके वे जल्दी से चले गये। उस कमरे से बाहर हवा-प्रकाश में आकर नक्षत्रराय की जान में जान आयी।


उस दिन शाम को नक्षत्रराय को देखकर ध्रुव “चाचा” कहता हुआ दौड़कर आया, अपने छोटे-छोटे हाथों से उनके गले से लिपटकर उनके गाल के पास अपना गाल मिलाया। फुसफुसा कर बोला “चाचा!”

नक्षत्र बोले, “ऐसा मत बोलो, मैं तुम्हारा चाचा नहीं हूं।”

ध्रुव इतने दिनों से उन्हें चाचा पुकारता आया है, आज अचानक मनाही सुनकर वह चौंक गया। गंभीर भाव से कुछ देर बैठ रहा; फिर नक्षत्र की ओर बड़ी-बड़ी आंखों से देखते हुये पूछा, “तुम कौन हो?”

नक्षत्रराय बोले, “मैं तुम्हारा चाचा नहीं हूं।”

सुनकर अचानक ध्रुव को हंसी आ गयी। इतनी बड़ी असंभव बात उसने पहले कभी नहीं सुनी थी। वह हंसकर बोला, “तुम चाचा हो।” नक्षत्र जितना उसे मना करते वह उतना ज्यादा कहने लगा “तुम चाचा हो”, उसकी हंसी भी उतनी ही बढ़ने लगी। वह नक्षत्रराय को चाचा कहकर चिढ़ाने लगा।

नक्षत्र बोले, “ध्रुव अपनी दीदी से मिलने चलोगे?”

ध्रुव ने जल्दी से नक्षत्र को छोड़ा और सीधे खड़े होते हुये बोला, “दीदी कहां है?”

नक्षत्र ने कहा, “मां के पास!”

ध्रुव ने पूछा “मां कहां है ?”

नक्षत्र मां एक जगह पर है, मैं तुम्हें वहां ले जा सकता हूं।”

ध्रुव ताली बजा कर बोला, “कब ले चलोगे चचा”

नक्षत्र। अभी।

ध्रुव खुशी से चीख उठा और उसने जोर से नक्षत्र के गले में बांहें डाल दी, नक्षत्र उसे गोद में उठाकर चादर से ढककर गुप्त द्वार से बाहर चले गये।

आज रात भी लोगों का बाहर आना मना है। इसलिये बाहर कोई चौकीदार नहीं था। आसमान में पूरा चांद था।

मंदिर में जाकर नक्षत्रराय ध्रुव को रघुपति के हाथों में देने लगे। रघुपति को देखकर ध्रुव ने जोर से नक्षत्रराय को पकड़ लिया, किसी भी तरह छोड़ना नहीं चाहा। रघुपति ने बलपूर्वक उसे छीन लिया। ध्रुव ‘चाचा-चाचा’ कहकर रोने लगा। नक्षत्रराय की आंखों में आंसू आ गये, मगर रघुपति को अपने हृदय की दुर्बलता दिखाने में उन्हें शर्म आने लगी। उन्होंने ऐसा भाव किया जैसे वे पत्थर के बने हैं। तब ध्रुव ने रो रोकर ‘दीदी दीदी’ पुकारने लगा, दीदी नहीं आयी। रघुपति ने जोर से उसे डांटा। डर से ध्रुव का रोना थम गया। वह सिर्फ सुबक रहा था, रोना सिसकियों में बदल गया। देवी की मूर्ति देखती रही।

गोविन्दमणिक्य सपने में रोना सुनकर जाग उठे। अचानक उन्होंने सुना उनकी खिड़की के नीचे से कोई पुकार रहा है” महाराज! महाराज!”

राजा ने उसी समय जाकर देखा ध्रुव के चाचा केदारेश्वर।

उन्होंने पूछा, “क्या हुआ है?”

केदारेश्वर ने कहा, “महाराज, मेरा ध्रुव कहां है?”

राजा बोले, “क्यों , अपने बिस्तर पर नहीं है ?”

“नहीं।” केदारेश्वर कहने लगे, “दोपहर बाद से जब ध्रुव मुझे दिखाई नहीं दिया तो युवराज नक्षत्रराय के नौकर से पूछने पर पता चला, ध्रुव भीतर युवराज के साथ है। सुनकर मैं निश्चिन्त हो गया। रात जब ज्यादा होगी तो मेरे मन में शंका आयी ढूंढने पर पता चला, युवराज नक्षत्रराय महल में नहीं है। मैंने आपसे मिलने की बहुत कोशिश की मगर पहरेदारों ने मेरी एक न सुनी। इसलिये खिड़की के नीचे से महाराज को पुकार रहा था। आपकी नींद में बाधा डाली। मेरी इस गलती को माफ कर दीजिये।”

राजा के मन में एक भाव बिजली की तरह कौंध गया। उन्होंने चार पहरेदारों को बुलाया; कहा, “सशस्त्र मेरा अनुसरण करो।” एक पहरेदार बोला, “महाराज, आज रात बाहर जाना मना है।”

राजा ने कहा, “मैं आदेश देता हूं।”

केदारेश्वर भी साथ चलने लगे तो राजा ने उन्हें लौटा दिया। निर्जन पथ पर चांदनी में राजा मंदिर की ओर चले।

मंदिर के द्वार जब अचानक खुल गये तो देखा खड़ग को सामने रखकर रघुपति और नक्षत्र शराब पी रहे हैं। ज्यादा प्रकाश नहीं था। एक दीपक जल रहा था। ध्रुव कहां है? ध्रुव काली की मूर्ति के पैरों के पास सोया पड़ा है। उसके गालों पर आंसू सूख गये थे। मुंह थोड़ा-सा खुला हुआ, चेहरे पर भय या चिंता की कोई रेखा नहीं थी। जैसे यह पत्थर न हो कर दीदी की गोद हो, दीदी ने जैसे उसे चूमकर आंसू पोंछ दिये हो।

शराब पीकर नक्षत्र के प्राण खुल गये थे। मगर रघुपति स्थिर बैठकर पूजा के लगन की प्रतीक्षा कर रहे थे। नक्षत्र की बकवास पर कोई ध्यान नहीं दे रहे थे। नक्षत्र कह रहे थे, “प्रभु, आप मन ही मन डर रहे हैं, आप सोच रहे हैं मैं डर रहा हूं। मगर डरने की कोई बात नहीं है प्रमुख डर किस बात का? किससे डरना? मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। तुम क्या सोचते हो मैं राजा से डरता हूं? मैं तो शाह सूजा से भी नहीं डरता। प्रभु आपने कहा क्यों नहीं, मैं राजा को पकड़ लाता, देवी को संतुष्ट कर देते। उतने से बच्चे में कितना खून होगा।”

उसी समय अचानक मंदिर की दीवार पर छाया पड़ी। नक्षत्रराय ने पीछे मुड़कर देखा, राजा। एक ही पल में सारा नशा जाता रहा। अपनी छाया से भी ज्यादा नीचे हो गये। गोविन्दमणिक्य ने जल्दी से सोये हुये ध्रुव को गोद में उठाया और पहरेदारों से कहा, “इन दोनों को बंदी बना लो।”

चार पहरेदारों ने नक्षत्रराय और रघुपति के हाथ पकड़ लिये। ध्रुव को छाती से लगाये राजा चांदनी बिछे हुये पथ से महल में लौट आये। रघुपति और नक्षत्रराय उस रात कारागार में रहें।


अगला दिन न्याय का दिन था। न्यायालय लोगों से भरा हुआ था। न्यायाधीश के आसन पर राजा बैठे हैं। चारों ओर सभासद बैठे हैं। सामने दोनों बंदी खड़े हैं। किसी के हाथ में जंजीर नहीं थी। सिर्फ सशस्त्र पहरेदारों ने उन्हें घेर रखा था। रघुपति पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े हैं नक्षत्रराय का सिर झुका हुआ है।

रघुपति की गलती प्रमाण करके राजा ने कहा, “तुम कुछ कहना चाहते हो?”

रघुपति बोले, “मेरा न्याय करने का अधिकार आपको नहीं है।”

राजा बोले, “तो तुम्हारा न्याय कौन करेगा?”

रघुपति! मैं ब्राह्मण हूं। देवता का सेवक। देवता ही मेरा न्याय करेंगे।

राजा। पाप की सजा और पुण्य का पुरस्कार देने के लिए इस जगत में देवता के हजारों अनुचर हैं। मैं भी उनमें से एक हूं। इस बात को लेकर मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहता, मैं पूछ रहा हूं, कल शाम को बलि देने के लिये तुमने एक बच्चे का अपहरण किया था या नहीं।

रघुपति बोले, “हां, किया था।”

राजा बोले, “तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो?”

रघुपति। अपराध। कैसा अपराध? मैं मां के आदेश का पालन कर रहा था। मां का कार्य कर रहा था, तुमने उसमें बाधा पहुंचायी है - अपराध तुमने किया है। मैं मां के सामने तुम्हें अपराधी करार देता हूं, वे ही तुम्हारा न्याय करेंगी।”

राजा उनकी बातों का उत्तर दिये बिना ही बोले, “मेरे राज्य का नियम है - जो व्यक्ति देवी देवता के नाम पर जीव बलि देगा या देने की कोशिश करेगा उसे देश निकाला दिया जायेगा। वही नियम तुम पर लागू होता है। आठ साल के लिये तुम निर्वासित हुये। पहरेदार तुम्हें मेरे राज्य के बाहर छोड़ आयेंगे।”

पहरेदार रघुपति को सभागृह से बाहर ले जाने लगे।

रघुपति ने उनसे कहा, “रुको।” राज की ओर देखकर बोले

“तुम्हारा न्याय समाप्त हुआ-अब मैं तुम्हारा न्याय करूंगा। चतुर्दशी पूजा की दो रातों तक जो भी बाहर निकलता है उसे पुरोहित सजा देता है। यही हमारे मंदिर का नियम है। उस प्राचीन नियम के अनुसार तुम मेरे अपराधी हो।”

राजा बोले, “मैं तुम्हारा दिया हुआ दंड भोगने को तैयार हूं।

सभासदों ने कहा, “इस अपराध का दंड सिर्फ अर्थ होता है। पुरोहित बोले, “मैं तुम्हें दो लाख मुद्रा देने की सजा सुनाता हूं।”

राजा ने कुछ देर सोचा, फिर बोले, “तथास्तु।” कोषाध्यक्ष को बुलवाकर दो लाख मुद्रा देने का आदेश दे दिया। पहरेदार रघुपति को बाहर ले गये।

रघुपति को ले जाने के पश्चात नक्षत्रराय की ओर देखकर राजा ने दृढ़ स्वर में कहा, “नक्षत्रराय, तुम अपना अपराध स्वीकार करते हो या नहीं?”

नक्षत्रराय बोले, “महाराज मैं अपराधी हूं, मुझे माफ कर दीजिये।” कहकर दौड़कर आकर राजा के पैर पकड़ लिये।

महाराज विचलित हो गये, कुछ देर कुछ नहीं कह पाये। अन्ततः खुद को संभालकर बोले, ‘नक्षत्रराय उठो, मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें माफ करने वाला कौन होता हूं। मैं अपनी शासन पद्धति से बंधा हुआ हूं। बंदी जैसे बंधा हुआ होता है विचारक भी वैसे ही बंधा होता है। एक अपराध करने वाले दो व्यक्तियों में मैं एक को सजा दूं, दूसरे को माफ कर दूं, यह कैसे हो सकता है? तुम्हीं बताओ।”

सभासद कहने लगे, “महाराज नक्षत्रराय आपको भाई है, अपने भाई को माफ कर दें।”

राजा ने दृढ़ता पूर्वक कहा, “तुम सब चुप रहो। जब तक मैं इस आसन पर हूं तब तक मैं किसी का भाई नहीं हूं, किसी का भी मित्र नहीं हूं।”

सभासद चुप हो गये। सभा शांत हो गयी। राजा गंभीर स्वर में बोले, “तुम सबने सुना है - मेरे राज्य का नियम है जो व्यक्ति देवी को जीव बलि देगा या देना चाहेगा उसे देश निकाला दिया जायेगा। कल शाम को नक्षत्रराय ने पुरोहित के साथ मिलकर बलि देने के उद्देश्य से एक मानव शिशु का अपहरण किया। यह अपराध प्रमाण होने के पश्चात मैंने उसे आठ साल के लिये देश निकाला दिया।

पहरेदार जब नक्षत्रराय को ले जाने लगे तब राजा आसान छोड़कर आये और नक्षत्रराय को गले लगाया, भरी हुयी आवाज में बोले, “वत्स यह सजा सिर्फ तुम्हें ही नहीं मिली, मुझे भी मिली है। पिछले जन्म में न जाने क्या पाप किया था। जब तक तुम अपनों से दूर रहोगे, देवी तुम्हारे साथ रहे, तुम्हारी रक्षा करें।”

कुछ ही देर में यह बात आग की तरह फैल गयी। महल के भीतर से रोने की आवाजें आने लगी। राजा अकेले कमरे में दरवाजा बंद करके बैठ गये। हाथ जोड़कर कहने लगे, “प्रभु, अगर मैंने कोई गलती की हो तो मुझे माफ मत करना, बिल्कुल भी दया मत दिखाना। मुझे मेरे पापों की सजा देना। पाप करके दंड भोगा जा सकता है मगर माफी का बोझ नहीं ढोया जा सकता प्रभु।”

राजा के मन में नक्षत्रराय के लिये प्रेम उमड़ने लगा। नक्षत्रराय का बचपन का चेहरा उन्हें याद आने लगा। वह जो खेल खेलता था, बातें करता था, काम करता था, वह एक-एक करके उन्हें याद आने लगा। एक एक दिन, एक एक रात अपनी सूर्य किरणों के साथ, अपने तारों से भरे आसमान के साथ शिशु नक्षत्रराय के चेहरे को साथ लेकर उनके सामने आने लगे। राजा की आंखों में आंसू बहने लगे।


रघुपति से जब पहरेदारों ने पूछा, “प्रभु कहां जायेंगे, तो रघुपति ने उत्तर दिया, “पश्चिम दिशा की ओर।”

नौ दिन तक पश्चिम दिशा की यात्रा करने के पश्चात अपराधी और पहरेदार ढाका शहर के आसपास पहुंच गये। तब पहरेदार रघुपति को वहां छोड़कर राजधानी लौट आये।”

रघुपति मन ही मन बोले, “कलियुग में ब्राह्मण का श्राप नहीं फलता। देखता हूं ब्राह्मण की बुद्धि से क्या होता है। देखता हूं गोविन्दमणिक्य कैसा राजा है और मैं कैसा पुरोहित।

त्रिपुरा के प्रांत में मंदिर के कोने में मुगल राज्य की खबर ज्यादा नहीं पहुंचती थी। इसलिये रघुपति ढाका शहर में जाकर मुगलों की रीति-नीति और शासन व्यवस्था के विषय में जानकारी लेने लगे।

उस समय मुगल सम्राट शाहजहां का शासन था। उनके तीसरे बेटे औरंगजेब उस समय दक्षिणापथ में बिजापुर आक्रमण करने में व्यस्त थे। उनके दूसरे बेटे राजा बंगाल के अधिपति थे। उनकी राजधानी राजमहल में थी। छोटे बेटे कुमान मुराद गुजरात के शासन कर्ता थे। ज्येष्ठ पुत्र दारा राजधानी दिल्ली में ही रहते थे। सम्राट उस समय सड़सठ साल के थे। उनके स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण दारा पर ही शासन का भार था।

रघुपति ने ढाका में कुछ समय बिताया और उर्दू सीखी और अन्ततः राजमहल की ओर चल दिये।

वे जब राजमहल पहुंचें तब सारे भारत में हलचल मची हुयी थी। अफवाहें फैली थी कि शाहजहां मृत्यु शैया पर है। यह संवाद पाते ही सूजा सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच कर गये हैं। सम्राट के चारों बेटे सम्राट के सिर से मुकुट छीनने की ताक में थे।

उसी पल रघुपति राजमहल त्याग कर सूजा के पीछे चले अपने नौकरों को विदा कर दिया। साथ में जो दो लाख रुपये थे वह राजमहल के पास एक निर्जन जगह पर छिपा दिये। उस जगह पर एक निशान छोड़ गये। थोड़े से रुपये साथ रख लिये। चलते हुये घर, सूने गांव और उजड़े हुये खेतों को देखते हुये रघुपति आगे बढ़ने लगे। रघुपति ने संन्यासी का वेश धारण कर लिया। मगर संन्यासी का भेष धरकर भी उन्हें आतिथ्य नहीं मिला। क्योंकि सूजा की सेना जिस पथ से आयी थी वहां सिर्फ उजाड़ था। घोड़े और हाथियों के लिए सैनिक अधपके खेत काट ले गये थे। किसानों के खलिहानों में एक दाना भी नहीं बचा था। चारों ओर लूटपाट मची हुयी थी। ज्यादातर लोग गांव छोड़ कर भाग चुके थे। अचानक कोई दिख भी जाता तो उनके चेहरे पर हंसी नहीं थी। वह चकित हिरण की तरह सतर्क, किसी पर भी विश्वास नहीं, कोई दया नहीं। निर्जन पथ के किनारे पेड़ की छाया में दो-चार व्यक्ति लाठी हाथ में लिये बैठे होते। कोई पथिक-शिकार की प्रतीक्षा में सारा दिन वहां बैठे रहते। धूमकेतु के पीछे उल्कापिण्डों की तरह यह लोग सैनिकों का अनुसरण कर रहे हैं। और तो और शव पर भी सियार कुत्तों की तरह रह-रहकर सैनिकों और डाकुओं में झगड़ा हो जाता। निष्ठुरता सैनिकों का खेल हो गया है‒राह पे जाते किसी पथिक के पेट में तलवार घोंप देना था उसके सिर को पगड़ी समेत उड़ा देना, उनके लिए मजाक था। गांव के लोग उन्हें देखकर डर रहे हैं, इससे उन्हें मजा आता। लूटपाट के पश्चात गांवों के लोगों को सताने में उन्हें मजा आता। दो ब्राह्मणों को एक दूसरे की ओर पीठ करके बिठाकर उनकी चोटियों को आपस में बांधकर दोनों के नाक में नसवार डाल देना। दो घोड़ों की पीठ पर एक व्यक्ति को बिठाकर घोड़ों को चाबुक मारते, घोड़े विपरीत दिशा में भागते और वह आदमी बीच में गिरता उसके हाथ पैर टूट जाते। इस तरह रोज नये-नये खेल होते, बिना किसी कारण से गांव जला देते। कहते, बादशाह के सम्मान में पटाखे जला रहे हैं। इस तरह के अत्याचारों के निशानों से राहें भरी पड़ी थी। यहां रघुपति को कौन अतिथि रखेगा। कभी अनाहार तो कभी थोड़ा सा आहार, इस तरह दिन कटने लगे। थककर रात के एक टूटी सी कुटिया में सो गये; सुबह डटकर देखा जिस चीज को रात को तकिया समझकर उस पर सिर रखा था वह एक सिर कटा शव था। एक दिन दोपहर के समय भूरा लगने पर वे एक कुटिया में गये, देखा एक टूटे हुए संदूक के ऊपर एक आदमी सिर रखकर औंधा पड़ा है। शायद अपना धन लूट जाने के कारण रो रहा है। पास जाकर हल्का-सा धक्का लगाते ही वह गिर गया; शव था‒उसके प्राण बहुत पहले निकल चुके थे।

एक दिन रघुपति एक कुटिया में सो रहे थे। सुबह होने में थोड़ी देर बाकी थी। तभी धीरे-धीरे दरवाजा खुला। शरदऋतु की चांदनी के साथ कुछ छाया कमरे में प्रविष्ट हुई। उनके फुसफुसाने की आवाजें सुनायी देने लगी। रघुपति चौंककर उठ बैठे। जैसे ही वे उठकर बैठे कुछ औरतें चीखी, “ओह मां!”

एक पुरुष आगे बढ़कर बोला, “कौन है रे?”

रघुपति बोले, “मैं एक ब्राह्मण पथिक हूं। तुम लोग कौन हो?”

“यह घर हमारा ही है। हम घर छोड़कर भाग गये थे। मुगल सैनिक चले गये हैं यह जानकर हम लौट आये हैं।”

रघुपति ने पूछा, “मुगल सैनिक किस ओर गये हैं?”

उन्होंने बताया, “विजयगढ़ की ओर। अबतक तो विजयगढ़ के जंगलों में प्रवेश कर चुके होंगे।”

रघुपति ने कुछ नहीं कहा, उसी समय यात्रा पर निकल पड़े।


विजयगढ़ के जंगलों में ठगों का अड्डा था। जंगल से जो रास्ता गया है उसके दोनों ओर बहुत से मानव कंकाल पड़े थे। उनपर घास उग आयी थी, बाकी कोई निशान नहीं था। जंगल में बड़ का पेड़ है नहीं, बबूल है, विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और बेल हैं। बीच-बीच में तालाब है। उनमें पेड़ों के पत्ते गिर-गिर कर पानी हरा हो गया है। छोटी-छोटी पगडंडियां इधर-उधर से सांप की तरह जंगल में प्रवेश कर रहे थे। पेड़ों की प्रत्येक शाखाओं पर बंदर बैठे थे। बड़ के पेड़ पर उसकी जड़ें और बंदरों की पूंछ लटक रही थी। टूटे हुये मंदिर का आंगन सफेद फूलों और बंदरों के कटे हुए भोजन से भरा पड़ा था। शाम के समय जंगल के बड़े-बड़े पेड़ों पर तोते समूहों में आते और उनके शोर से अंधेरा विदीर्ण होता रहता। आज इस जंगल में करीब बीस हजार सैनिकों ने प्रवेश किया है। इस घने जंगल में बीस हजार सैनिक बाज के एक घोंसले के समान लग रहे हैं। सैनिकों को देखकर असंख्य कौवे कांव-कांव करते आकाश में उड़ रहे हैं। शाखाओं पर आकर बैठने की हिम्मत नहीं हो रही। किसी भी प्रकार की गड़बड़ न करने का आदेश है सेनापति का। सारा दिन चलने के बाद शाम को सूखी लकड़ियां इकट्ठा करके सेना भोजन की तैयारी कर रही है और फुसफुसा कर बातें कर रहे हैं। उनकी फुसफुसाहट पूरे जंगल में गूंज रही है। झींगुर की आवाज सुनायी दे रही है। पेड़ों से बंधे घोड़े रह-रहकर अपने खुर से मिट्टी खोद रहे हैं और हुंकार रहे हैं, सारा जंगल उस आवाज से चौंक उठता। टूटे हुए मंदिर के पास खाली जगह में सूजा का तंबू लगाया गया है। और सब आज पेड़ों के नीचे ही रात काटेंगे।

सारा दिन चलने के बाद रघुपति ने जब वन में प्रवेश किया तब रात हो गयी थी। ज्यादातर सैनिक सो रहे थे, कुछ सैनिक चुपचाप पहरेदारी कर रहे थे। कहीं-कहीं पर आग जल रही थी, जैसे अंधेरा अपनी नींद भरी आंखों को खेल कर देख रहा हो। रघुपति को वन में जैसे बीस हजार सैनिकों की श्वांस लेने की आवाज सुनायी दी। वन में हजारों पेड़ अपनी शाखा फैलाकर पहरा दे रहे थे। उल्लू जैसे जन्मते हुए बच्चे पर अपने पंख फैलाये बैठा रहता है उसी तरह जंगल की बाहर की विशाल रात जंगल की भीतर की गाड़ी रात पर पंख फैलाये चुपचाप बैठी है। जंगल के भीतर एक रात सिर छुपाकर सो रही है, जंगल के बाहर एक रात सिर उठाकर जाग रही है। रघुपति उस रात जंगल के बाहर सो गये।

सुबह कुछ धक्के लगने पर हड़बड़ा कर रघुपति उठ बैठे। उन्होंने देखा कुछ पगड़ी पहने दाड़ी वाले तुरानी सैनिक विदेशी भाषा में उसे कुछ कह रहे हैं, सुनकर उन्होंने अनुमान लगाया कि वह गाली दे रहे हैं। उन्होंने भी बंगाली भाषा में गाली दी। वह उनके साथ खींचतान करने लगे।

रघुपति बोले, “मजाक है क्या? मगर उनके व्यवहार में मजाक के लक्षण नहीं दिखायी दिये, वह उन्हें जंगल में खींचकर ले जाने लगे।

उन्होंने गुस्सा दिखाते हुये कहा, ”खींचतान क्यों कर रहे हो? मैं खुद ही जा रहा हूं। मैं इतनी दूर और किसलिये आया हूं?“

सैनिक हंसने लगे और उनकी बातों की नकल करने लगे। धीरे-धीरे उनके ओर सैनिक इकट्ठे हो गये उनको लेकर बड़ा शोरगुल होने लगा। उत्पीड़न की सीमा नहीं रही। एक सैनिक ने एक जंगली बिल्ली की पूंछ पकड़कर उसे रघुपति के गंजे सिर पर छोड़ दिया। वह देखना चाहता था कि उनके सिर को फल समझकर खाती है या नहीं। एक सैनिक उनके नाक के सामने एक बेंत टेड़ी करके उनके साथ-साथ चलने लगा। अगर वह उस बेंत को छोड़ देगा तो रघुपति के मुंह से नाक की महिमा समाप्त हो जायेगी। सैनिकों में हंसी मजाक चल रहा था। अब दोपहर को युद्ध करना है, इसलिए सुबह रघुपति को लेकर अच्छा खेल मिल गया। जब खेल पूरा हुआ तो ब्राह्मण को सूजा के पास ले गये।

सूजा को देखकर रघुपति ने सलाम नहीं किया। देवता और अपनी जाति के अलावा उन्होंने कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया। सिर उठाकर खड़े रहे; हाथ उठाकर बोले, ”शहनशाह की जय हो।“

सूजा शराब के प्याले और सभासदों के साथ बैठे थे। आलस्य भरे स्वर से उपेक्षा पूर्वक बोले, ”क्या मामला है?“

सैनिकों ने कहा, ”जनाब, शत्रुपक्ष का गुप्तचर हमारी थाह लेने आया था; हम आपके पास पकड़ लाए हैं।“

सूजा बोले, ”अच्छा, बेचारा देखने आया है, इसे अच्छी तरह सबकुछ दिखाकर छोड़ दो। देश में जाकर बताने दो।“

रघुपति ने टूटी-फूटी हिन्दी में कहा, ”मैं आपसे काम की प्रार्थना करता हूं।“

”सूजा ने आलस्य में भरकर इशारे से उन्हें वहां से चले जाने को कहा। बोले, “गर्मी!” जो व्यक्ति हवा कर रहा था वह दोगुने जोर से हवा करने लगा।

दारा ने अपने पुत्र सुलेमान को राजा जयसिंह के अधीन सूजा से लड़ने के लिए भेजा था। उनकी विशाल सेना पास ही पहुंच चुकी है। ऐसी खबर आयी है। इसलिए विजयगढ़ के किले पर अपना अधिकार जमाकर वहां सेना इकट्ठी करने के लिए सूजा बेचैन हो रहे हैं। सूजा के हाथों किला और वहां का खजाना सौंप देने का प्रस्ताव लेकर सूजा का दूत विजयगढ़ के अधिपति विक्रमसिंह के पास गया था विक्रमसिंह ने उस दूर से कहलवा भोजा था, “मैं सिर्फ दिल्ली के सम्राट शाहजहां और जगदीश्वर भवानीपति को जानता हूं। सूजा कौन है? मैं उसे नहीं जानता।”

सूजा गुस्से में बोले, “इतनी बेअदबी! बेकार लड़ाई करनी पड़ेंगीं, बेकार का हंगामा होगा।” रघुपति ने यह सब सुना। सैनिकों के हाथों से निकलते ही विजयगढ़ की ओर चल दिये।


विजय गढ़ पहाड़ के ऊपर बसा हुआ है। विजयगढ़ का जंगल किले के पार जाकर ही समाप्त हुआ है; जंगल से बाहर आते ही रघुपति ने अचानक देखा, विशाल पत्थरों से बना विशाल दुर्ग जैसे नीले आसमान पर सहारा लेकर खड़ा है। जंगल जैसे हजारों पेड़-पौधों से ढका हुआ था, वैसे ही दुर्ग भी अपने पत्थरों में बंद था। जंगल सावधान और दुर्ग सतर्क है। जंगल बाघ की तरह अपनी पूंछ छिपाये बैठा है और दुर्ग सिंह की तरह अपने बाल बिखेरकर गर्दन टेड़ी किये खड़ा है। जंगल मिट्टी में कान बिछाये सुन रहा है और दुर्ग आसमान में सिर उठाये देख रहा है।

रघुपति जैसे ही जंगल से बाहर निकले दुर्ग पर तैनात सैनिक सतर्क हो गये। शंख बज उठे। दुर्ग जैसे अचानक सिंहनाद करता हुआ दांत-नाखून दिखाकर भौंएं चढ़ाकार इशारा करने लगे। सैनिक सावधानी पूर्वक खड़े हो गये। रघुपति जब दुर्ग की दीवार के पास पहुंचे तो सैनिकों ने पूछा, “कौन हो तुम?”

रघुपति बोले, “मैं ब्राह्मण अतिथि हूं।”

दुर्ग का अधिपति विक्रमसिंह धर्मनिष्ठ व्यक्ति है। देवता और ब्राह्मण की सेवा को लिये हमेशा तैयार रहते। अगर जनेऊ पहना हुआ व्यक्ति हो तो दुर्ग में प्रवेश के लिए कोई और परिचय आवश्यक नहीं था। मगर आज युद्ध के दिन क्या करना ठीक रहेगा, सैनिक निश्चय नहीं कर पा रहे थे।

रघुपति बोले, “अगर तुमने मुझे आश्रय नहीं दिया तो मुसलमानों के हाथों मुझे मरना पड़ेगा।

विक्रम सिंह के कानों तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने ब्राह्मण को दुर्ग में आश्रय देने की अनुमति दे दी। दीवार के ऊपर से एक सीढ़ी उतारी गयी और रघुपति ने दुर्ग में प्रवेश किया।

दुर्ग के भीतर सभी युद्ध की प्रतीक्षा में व्यस्त थे। एक वृद्ध ने ब्राह्मण सेवा भार अपने ऊपर ले लिया। उनका नाम खड़गसिंह था मगर कोई उन्हें चाचा जी पुकारता तो कोई कहता सूबेदार साहब‒इस तरह पुकारने का कोई कारण नहीं था। धरती उनका कोई भाई का बेटा नहीं था, कोई भाई नहीं था, उन्हें चाचा बनने का कोई अधिकार या दूर-दूर तक संभावना नहीं थी और उनके जितने भतीजे थे यह सूबा उससे ज्यादा नहीं था। मगर आज तक किसी ने उनकी इस उपाधि पर आपत्ति या शक जाहिर नहीं किया था। जो बिन-भतीजे के चाचा, बिना सूबे के सूबेदार हों, उन्हें इस दुनिया में लक्ष्मी की चपलता या अपने पद से हटने का कोई डर नहीं होता।

चाचा ने आकर कहा, ”वाह, वाह! यह तो ब्राह्मण ही है।“ कहकर भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। रघुपति का व्यक्तित्व तेज दीपशिखा जैसा था, जिसे अचानक देखकर लोग मुग्ध हो जाते थे।

आज के बुरे हालात से उदास होकर चाचा बोले, ”प्रभु, ऐसे ब्राह्मण आजकल मिलते हैं?

रघुपति बोले, “बहुत थोड़े से।”

चाचा बोले, “पहले ब्राह्मण की जबान पर आग होती थी, अब सारी आग पेट में चली गयी है।”

रघुपति बोले, “वह भी कहां पहले जैसा है।”

चाचा ने सिर हिलाकर कहा, “ठीक बात है। अगस्त्य मुनि ने जितना पिया था उतना अगर भोजन करते तो क्या होता, सोचिये।

रघुपति ने कहा, ”और भी उदाहरण है।“

चाचा‒हां है ना। जुन्हू मुनि की व्यास की बात सुनने में आती है। उनके भूख के विषय में तो कहीं नहीं लिखा, मगर अनुमान लगाया जा सकता है। सब्जी खाने का अर्थ ही कम खाना नहीं होता, कितनी सब्जी खाते थे, उसका हिसाब होता तो समझ में आता।

रघुपति ब्राह्मणों की महानता स्मरण करके गंभीर भाव से बोले, ”नहीं साहब, भोजन के प्रति उनका ज्यादा ध्यान नहीं था।“ चाचा दांतों तले जीभ दबाकर बोले, ”राम, राम, आप क्या कह रहे हैं प्रभु। उनकी पेट की आग बहुत प्रबल थी, इसके प्रमाण हैं। देखिये ना समय के साथ सारी आग बुझ गयी, हवन की अग्नि भी नहीं जलती मगर‒“

रघुपति थोड़ा झुंझला कर बोले, ”हवन में अग्नि कैसे जलेगी? देश में घी कहां बचा है? नास्तिक सारी गायों को मार रहे हैं, अब सामग्री कहा मिलती है? हवन में आग नहीं जलेगी तो ब्राह्मणों का तेज कहां बचेगा।“ कहकर रघुपति अपनी छिपी हुई दहन शक्ति को अनुभव करने लगे।

चाचा बोले, ”ठीक कह रहे हैं आप; गायें भी मरकर मनुष्यलोक में जन्म लेने लगीं हैं। मगर उनके पास से घी पाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। दिमाग की कमी है। आप कहां से आये हैं?“

रघुपति बोले, ”त्रिपुरा के राजबाटी से।“

विजयगढ़ के बाहर के भूगोल या इतिहास के संबंध में चाचा बहुत थोड़ा जानते थे। विजयगढ़ के सिवा भारत में कुछ मानने योग्य है, ऐसा उन्हें विश्वास भी नहीं था। सिर्फ अनुमान लगाकर बोले, ”वाह त्रिपुरा का राजा तो बहुत महान है।“

रघुपति ने पूरी तरह हां में हां मिलाई।

चाचा‒आप वहां क्या करते हैं?

रघुपति‒मैं त्रिपुरा का राजपुरोहित हूं।

चाचा आंखें बंद करके सिर हिलाकर बोले, ”आहा!“ रघुपति पर उनकी भक्ति और बढ़ गयी।

”क्या करने आये हैं यहां?“

रघुपति बोले, ”तीर्थ करने।“

रघुपति बोले, ”तीर्थ करने।“

धड़ाम से आवाज आयी। शत्रुपक्ष ने दुर्ग पर आक्रमण किया है, चाचा हंसकर आंखें बंद करके बोले, ”वह कुछ नहीं है, पत्थर मार रहे हैं। विजयगढ़ पर चाचा का विश्वास जितना दृढ़ था, विजयगढ़ दुर्ग के पति उसमें दृढ़ नहीं थे। कोई भी अतिथि दुर्ग में आता तो चाचा का उन पर पूरा अधिकार हो जाता और विजयगढ़ की महानता अतिथि को सुनते रहते। त्रिपुरा से रघुपति आये हैं, ऐसे अतिथि हमेशा नहीं आते,‒चाचा बड़े खुश हैं। मेहमान के साथ विजयगढ़ के पुरावल के विषय में बातें करने लगे। उन्होंने कहा, ब्रह्मा का कमल और विजयगढ़ था दुर्ग एक ही समय उत्पन्न हुआ और मनु के बाद से ही महाराज विक्रम सिंह के पूर्वज इस दुर्ग को भोगते आये हैं, इस विषय में कोई दो राय नहीं है। इस दुर्ग को शिव ने क्या वरदान दिया है और इस दुर्ग में कतिवीर्याजुन किस तरह बंद हुए थे, यह भी रघुपति से छिपा न रहा।

शाम के समय खबर मिली, शत्रुपक्ष दुर्ग का कोई नुकसान नहीं कर पाये। उन्होंने तोपें लगाई थीं मगर तोप के गोले दुर्ग तक नहीं पहुंच सके, चाचा ने हंसकर रघुपति की ओर देखा। अर्थ यहीं था कि दुर्ग के प्रति शिवजी का जो वरदान है उसका प्रत्यक्ष प्रमाण और क्या होगा! शायद नंदी खुद आकर तोप के गोलों को लूट ले गये हैं, “कैलाश पर्वत पर गणपति और कार्तिक आपस में खेलेंगे।


सूजा को अपने अधीन करना ही रघुपति का एक मात्र उद्देश्य था। उन्हें जब पता चला था कि सूजा दुर्ग आक्रमण करने वाले हैं, तब उन्होंने सोचा, मित्र बनकर दुर्ग में प्रवेश करके किसी भी तरह दुर्ग आक्रमण करने में सूजा की मदद करने। मगर इस ब्राह्मण को युद्ध का ज्यादा ज्ञान नहीं है, क्या करें जिससे सूजा की मदद हो उन्हें समझ नहीं आया।

अगले दिन फिर युद्ध आरंभ हुआ। विपक्षियों ने बारूद लगाकर दुर्ग का कुछ हिस्सा उड़ा दिया, मगर दुर्ग के भीतर से गोलियां चलने के कारण दुर्ग में प्रवेश नहीं कर पाये। टूटा हुआ भाग देखते ही देखते दोबारा बना दिया गया। आज रह-रह कर गोले दुर्ग के भीतर गिर रहे थे, इस कारण दुर्ग के दो चार सैनिक हताहत हो गये।

प्रभु डरने की कोई बात नहीं है, यह तो खेल हो रहा है।“ कहते हुए चाचा रघुपति को दुर्ग दिखाने लगे। रघुपति बोले, ”चमत्कार है सब! त्रिपुरा का दुर्ग तो इसके पास कहीं नहीं ठहर सकता। मगर साहब, त्रिपुरा में तो छिपकर निकलने के लिए एक सुरंगपथ है, यहां ऐसा कुछ नहीं दिख रहा।

चाचा कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक खुद को संभालते हुए बोले, नहीं, इस दुर्ग में ऐसा कुछ नहीं है।

रघुपति चौंकते हुए बोले, “इतने बड़े दुर्ग में एक भी सुरंग नहीं, यह कैसी बात हुई।

चाचा परेशान होते हुए बोले, ”नहीं हो, ऐसा नहीं हो सकता। मगर हमें इस विषय में कुछ नहीं पता।“

जब आप ही नहीं जानते तो किसी और को क्या होगा? चाचा कुछ देर गंभीर हो चुप रहे, उसके बाद अचानक ”राम राम“ कहते हुए उबासी ली, फिर चेहरे पर, दाड़ी पर हाथ फेरकर बोले, ”प्रभु, आप तो पूजा-पाठ करते हैं, आपको बताने में कोई दोष नहीं‒दुर्ग में प्रवेश करने के लिए और बाहर जाने के लिए दो सुरंग हैं। मगर बाहर के लोगों को दिखाना मना है।

रघुपति संदेह में भरकर बोले, “हां, ऐसा तो होगा ही।”

चाचा ने सोचा, गलती उनकी अपनी है, एकबार नहीं, एक बार हां कहकर खुद ही संदेह में डाल दिया है। त्रिपुरा के दुर्ग के सामने विजयगढ़ का दुर्ग किसी भी मामले में छोटा हो, यह बात चाचा के लिए असहनीय है।

वे बोले, “प्रभु! शायद आपका त्रिपुरा बहुत दूर है और आप ब्राह्मण भी हैं, देव सेवा ही आपका एकमात्र काम है आपके द्वारा कुछ भी बाहर जाने की संभावना नहीं है।”

रघुपति बोले, “क्या जरूरत है, अगर शक हो रहा है तो यह सब बातें रहने ही दीजिए! मैं ब्राह्मण का बेटा हूं, मुझे दुर्ग के विषय में जानने का क्या फायदा?

चाचा जीभ काटते हुए बोले, ”राम-राम, आप पर शक किस लिए? चलिये एक-बार दिखाकर लाता हूं।“

दूसरी आरे अचानक दुर्ग के बाहर सूजा की सेना में अराजकता फैल गयी है। जंगल में सूजा का शिविर था। सुलेमान और जयसिंह की सेना ने अचानक उन्हें बदी बना लिया है और अब दुर्ग आक्रमण-कारियों से लड़ रही है। सूजा की सेना बिना लड़े बीस तोप वहीं छोड़कर भाग गयी।

दुर्ग के भीतर उत्सव मनाया जाने लगा। विक्रम सिंह के निकट सुलेमान का दूत जैसे ही पहुंचा उन्होंने दुर्ग के द्वार खोल दिये, खुद जाकर जयसिंह और सुलेमान का स्वागत किया। दिल्ली की सेना और हाथी-घोड़ों से दुर्ग भर गया। झंडे उड़ने लगे, शंख और रणवादय बजने लगे और चाचा की सफेद दाड़ी के नीचे मुस्कान जारी रही।


चाचा के लिये आज खुशी का दिन था। आज दिल्ली की राजपूत सेना विजयगढ़ की मेहमान है, प्रबल प्रतापी शाह सूजा आज विजयगढ़ का बंदी है। कतिवीर्यार्जुन के पश्चात विजयगढ़ को ऐसा बंदी नहीं मिला था। कतिविर्यार्जुन की बंदी दशा को याद करते हुए सांस छोड़ते हुए चाचा राजपूत सुचेतसिंह से बोले, ” सोच कर देखो, हजार हाथों में जंजीर पहनाने में कितनी दिक्कत हुई होगी। कलियुग के आते ही सब कुछ बराबर हो गया, अब राजा का बेटा हो या बादशाह का, किसी के भी दो से ज्यादा हाथ नहीं होते; जीकर भी कोई सुख नहीं है।

हंसते हुए सुचेतसिंह अपने दोनों हाथों की ओर देखकर बोले, “यह दो हाथ ही काफी हैं।”

चाचा कुछ देर सोचकर बोले, “हां यह भी ठीक है, उस जमाने में काम भी तो कितना था। आजकल इतना कम काम है कि दो हाथों से भी आराम से हो जाता है। ज्यादा हाथ होते तो बस मूंछें ही सहलाते रहते।

आज चाचा की वेश-भूषा में कोई कमी नहीं थी। ठोड़ी के नीचे से सफेद दाड़ी को दो भागों में बांटकर उसे कानों पर लटका दिया है। मूंछों को ताव दे-देकर कान तक ले गये हैं। सिर पर पगड़ी और कमर पर तलवार। जरी के जूते सामने की ओर से सींग की तरह ऊपर उठे हुए। आज चाचा की चाल ऐसी है जैसे विजयगढ़ की महिमा उन्हीं में तरंगाचित हो रही है। आज इन सब समझदारों के निकट विजयगढ़ का महात्मा प्रमाण हो जाएगा, इसी आनंद के कारण उनकी भूख और नींद खो गयी।

सुचेतसिंह को साथ लेकर सारा दिन दुर्ग में घूमते रहे। जिस जगह सुचेतसिंह आश्चर्य प्रकाश नहीं करते वहीं चाचा खुद ”वाह-वाह“ करके अपना उत्साह से वीर राजपूत के हृदय में संचार करने की कोशिश करते। खास कर दुर्ग की बनावट को लेकर उन्हें खासी मेहनत करनी पड़ी। दुर्ग जितना अविचलित है, सुचेतसिंह भी उतना ही अविचलित व्यक्ति है‒उनके चेहरे से किसी भी प्रकार का भाव प्रकाश नहीं हुआ। चाचा घूम-घूमकर उन्हें एक बार दुर्ग के बायें, कभी दायें, कभी ऊपर कभी नीचे ले जाने लगे‒बार-बार कहने लगे ”कितना अच्छा है।“ मगर किसी भी तरह सुचेतसिंह का हृदय दुर्ग पर

अधिकार नहीं जमा पाये। अन्ततः शाम को थककर सुचेतसिंह कहने लगे, ”मैंने भरतपुर का दुर्ग देखा है, उससे अच्छा दुर्ग मुझे कोई नहीं लगा।“

चाचा कभी भी किसी से बहस नहीं करते, बहुत उदास होकर बोले, ”अवश्य, अवश्य यह बात कह सकते हैं आप।

लम्बी श्वांस छोड़कर दुर्ग के संबंध में बातचीत बंद कर दी विक्रमसिंह के पूर्वज दुर्गा सिंह की बात करने लगे। वे कहने लगे, “दुर्गा सिंह के तीन पुत्र थे। छोटे पुत्र चित्रसिंह की एक अजीब आदत थी। वे रोज सुबह आधा सेर चने दूध में उबालकर खाते थे। उनका शरीर भी वैसा ही था। अच्छा जी, तुम जो भरतपुर के दुर्ग की बात कर रहे थे, वह तो बहुत बड़ा होगा‒मगर ब्रह्मवर्त पुराण में तो उसका कोई उल्लेख नहीं है।

सुचेतसिंह हंसकर बोले, ”इस कारण उनका काम तो नहीं रुक रहा।“ चाचा झूठी हंसी हंसते हुए बोले, ”हा-हा-हा-हा, ठीक है, ठीक है। मगर पता है त्रिपुरा का दुर्ग कम बड़ा नहीं है, मगर विजयगढ़ का‒“

सुचेतसिंह‒त्रिपुरा, यह किस देश में है?

चाचा‒वह बहुत बड़ा देश है। इतनी बातें करके क्या फायदा, वहां के राजपुरोहित हमारे दुर्ग में मेहमान हैं। तुम उसी से सब सुन लो।

मगर वह ब्राह्मण, आज कहीं नहीं मिला, चाचा के प्राण उस ब्राह्मण के लिए रो उठे। वे मन ही मन बोल, ‘इन राजपूतों से वह ब्राह्मण ज्यादा अच्छा है। सुचेतसिंह के सम्मुख रघुपति की प्रशंसा करने लगे और विजयगढ़ के संबंध में रघुपति के क्या विचार हैं वह बतायें।

चाचा से बचने के लिए सुचेतसिंह को ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ा कल सुबह बंदी समेत सम्राट सैनिकों की यात्रा का दिन तय हुआ है, सेना यात्रा की तैयारी में जुटी हुई है। जेल में बदी शाह-सूजा परेशान होकर कह रहे हैं ”इतनी बेअदबी है। शिविर से मेरा सामान तक नहीं लाकर दिया।“

विजयगढ़ के पहाड़ों के नीचे एक गहरी नहर है। उसे नहर के किनारे एक जगह बड़ के पेड़ की जड़ें हैं। उस जड़ के पास गहन रात में रघुपति ने डुबकी लगायी और अदृश्य हो गये।

छिपकर दुर्ग में प्रवेश करने के लिए जो सुरंग है इस नहर के नीचे ही उसका प्रवेशद्वार है। इस रास्ते से सुरंगपथ के पास पहुंचकर नीचे से धक्का मारने पर एक पत्थर हटता है, ऊपर से उसे नहीं हटाया जा सकता। जो लोग दुर्ग के भीतर हैं वह इस रास्ते से बाहर नहीं आ सकते।

बंदीशाला में पलंग पर सूजा सो रहे थे। पलंग के अलावा कमरे में और कुछ भी नहीं है। एक दीपक जल रहा है। अचानक कमरे में छेद दिखा। धीरे-धीरे सिर उठाकर पाताल से रघुपति आ गए। वे पूरी तरह भीगे हुए थे। भीगे कपड़ों से पानी टपक रहा था। रघुपति ने धीरे से सूजा को स्पर्श किया।

सूजा चौंककर उठे, आंखें रगड़कर कुछ देर बैठे रहे; उसके बाद आलस्य में भरकर बोले, ”क्या हंगामा है, यह लोग क्या मुझे रात को भी सोने नहीं देंगे? तुम्हारे व्यवहार से मैं अवाक् हूं।“

रघुपति धीमे स्वर में बोले, ”शहजादे, उठने की आज्ञा दें। मैं वही ब्राह्मण हूं। मुझे याद कीजिए। भविष्य में भी मुझे याद रखिएगा।“

अगली सुबह सम्राट की सेना यात्रा के लिए तैयार थी। सूजा को नींद से जगाने स्वयं राजा जयसिंह बंदीशाला में आये। देखा, सूजा अभी तक बिस्तर से नहीं उठे थे पास जाकर देखा, सूजा नहीं थे, उनके कपड़े पड़े थे। सूजा नहीं थे, कमरे के मध्य में सुरंग, उसका दरवाजा खुला पड़ा है।

बंदी की भागने की खबर पल भर में दुर्ग में फैल गयी। चारों ओर लोग चढ़ने लगे। राजा विक्रमसिंह का सिर झक गया। बंदी भागा कैसे? विचार करने के लिए सभा बैठी।

चाचा का वह गर्वित भाव कहां गया? वे पागलों की तरह ”ब्राह्मण कहां हैं, ब्राह्मण कहां है, कहते हुए रघुपति को ढूंढने लगे। ब्राह्मण कहीं नहीं था। पगड़ी उतारकर चाचा कुछ देर सिर पर हाथ रखकर बैठे रहे। सुचेत सिंह पास आकर बैठ गये; बोले, “चाचा क्या आश्चर्य दुर्ग है। यह काम क्या किसी भूत का है?”

चाचा उदासी से गर्दन हिलाते हुए बोले, “नहीं यह किसी भूत का काम नहीं है सुचेत सिंह। यह काम एक निर्बोध वृद्ध का है और एक विश्वास घातक का है।”

सुचेतसिंह ने चौंकते हुए कहा, “अगर तुम उसे जानते हो तो उसे गिरफ्तार करवा दो।”

चाचा बोले, “उनमें से एक भाग गया है। दूसरे को बंदी बनाकर राजसभा में ले जा रहा हूं।” कहकर पगड़ी पहनी और राजसभा का वेश धारण किया।

सभा में जब पहरेदारों की गवाही ली जा रही थी। चाचा सिर झुकाये सभा में पहुंचे। विक्रमसिंह के पैरों में तलवार रखकर बोले, “मुझे बंदी बनाने का आदेश दीजिये। मैं अपराधी हूं।”

राजा चौंककर बोले, “चचा जी, मामला क्या है?

चाचा बोले, ”वह ब्राह्मण, यह सारी उस बंगाली ब्राह्मण की करतूत है। राजा जयसिंह ने पूछा, “तुम कौन हो?”

चाचा बोले, “मैं विजयगढ़ का वृद्ध चाचा हूं।”

जयसिंह‒तुमने क्या किया है?

चाचा‒मैंने विजयगढ़ के विषय में बताकर विश्वासघात किया है। मैंने बेवकूफों की तरह उस ब्राह्मण पर विश्वास करके उसे सुरंग के विषय में बताया था।“

विक्रमसिंह अचानक गुस्से में बोले, ”खड़गसिंह।“

चाचा बुरी तरह चौंक गये। वे तो भूल ही गये थे कि उनका नाम खड़गसिंह है।

विक्रमसिंह बोले, ”खड़गसिंह, इस उम्र में आकर क्या फिर से बच्चे बन गए हो!“

चचा चुपचाप सिर झुकाये खड़े रहे।

विक्रमसिंह‒चाचा, यह तुमने क्या किया, तुम्हारे हाथों आज विजयगढ़ का अपमान हुआ।

चाचा चुपचाप खड़े रहे, उनके हाथ थर-थर कांपने लगे। कांपते हुए हाथों से माथा छूकर मन ही मन बोले, भाग्य।

विक्रमसिंह बोले, ”मेरे दुर्ग से दिल्ली के शत्रु ने पलायन किया है। जानते हो, तुमने मैं दिल्ली के निकट अपराधी बना दिया।“

चाचा बोले, ”मैं अकेला अपराधी हूं। महाराज अपराधी हैं, यह बात सम्राट विश्वास नहीं करेंगे।“

विक्रमसिंह परेशान होकर बोले, ”तुम क्या हो, तुम्हारे बारे में सम्राट को क्या पता है? तुम तो मेरे ही व्यक्ति हो। यह तो वैसा ही है कि मैंने अपने हाथों से बंदी को मुक्त किया हो।“

चाचा निरुत्तर हो गये। वे अपने आंसू नहीं रोक पाए।

विक्रमसिंह बोले, ”तुम्हें क्या सजा दूं?

चाचा‒जो महाराज की इच्छा हो।

विक्रमसिंह‒तुम वृद्ध हो, तुम्हें ज्यादा क्या सजा दूं। देश निकाला ही काफी है तुम्हारे लिए।

चाचा विक्रमसिंह के पैर पकड़कर बोले। विजयगढ़ से निर्वासन। नहीं महाराज‒मैं वृद्ध, मेरी मति मारी गयी थी। मुझे विजयगढ़ में ही मरने दीजिये। मृत्युदंड का आदेश दीजिये। इस उम्र में सियार-कुत्तों की तरह विजयगढ़ से मत निकालिये।“

राजा जयसिंह बोले, ”महाराज, मेरा अनुरोध है, आप इसे माफ कर दें। मैं सम्राट को सारे हालात बता दूंगा।

चाचा को माफी मिल गयी। सभा से बाहर जाते समय चाचा कांप कर गिर गये। उस दिन के पश्चात चाचा दिखाई नहीं दिये, वे घर से बाहर नहीं निकलते थे। उनकी रीढ़ की हड्डी जैसे टूट गयी हो।


ब्रह्मपुत्र के तट पर गुजुरपाड़ा नामक एक छोटा सा गांव था। एक छोटे से जमींदार है पीताम्बर राय - आबादी भी ज्यादा नहीं थी। अपने पुराने चंडीमंडप में बैठकर पीताम्बर खुद को राजा कहते थे। उसकी राज महिमा आम-कटहल के पेड़ों से घिरे इस छोटे से गांव में ही विराजमान थी। उनका यश इस गांव की गलियों में ध्वनित होकर गांव की सीमारेखा तक विलीन हो जाता है। दुनिया के बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं का प्रताप इस छायामय नीड़ में प्रवेश नहीं कर पाता। सिर्फ तीर्थ स्नान के उद्देश्य से नदी के तट पर त्रिपुरा के राजाओं का एक विशाल महल है, मगर काफी समय से कोई राजा स्नान करने नयी आये। इसलिये त्रिपुरा के राजाओं के संबंध में गांव के लोगों में कुछ अस्पष्ट-सी बातें प्रचलित हैं।

भादों के महीने में एक दिन गांव में खबर आयी कि त्रिपुरा के एक राजकुमार नदी तट के पुराने महल में रहने आ रहे हैं। कुछ दिनों बाद पगड़ी पहने हुये लोगों ने आकर वहां चहल-पहल कर दी। एक हफ्ते पश्चात हाथी-घोड़े जस्कर लेकर स्वयं नक्षत्रराय गुजूरपाड़ा गांव में आ गये। सारा समारोह देखकर गांव के लोग अवाक् रह गये। पहले तो पीताम्बर बड़े राजा समझे जाते थे; मगर आज वह कुछ भी नहीं लग रहे थे - नक्षत्रराय को देखकर सभी ने सहमति जताई कि हां राजकुमार ऐसे ही होते हैं।

इस तरह पीताम्बर अपने पक्के चबूतरे और चण्डीमण्ड से लुप्त हो गये, और उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। नक्षत्रराय को उन्होंने ऐसा

राजा माना कि अपनी क्षुद्र राजमहिमा नक्षत्रराय के चरणों में विसर्जित करके बड़े सुखी हुये। कभी जब नक्षत्रराय हाथी पर बैठकर बाहर निकलते तब पीताम्बर अपनी प्रजा को बुलाकर कहते, “राजा देखा है कभी? वह देख, राजा।” मछली-सब्जी, भोजन सामग्री लेकर पीताम्बर रोज नक्षत्रराय से मिलने आते - नक्षत्रराय का तरुण सुंदर चेहरा देखकर पीताम्बर का स्नेह और बढ़ जाता। नक्षत्रराय ही उस गांव के राजा बन गये। पीताम्बर प्रजा के साथ प्रजा बन गये।

रोज दिन में तीन बार नगाड़े बजने लगे। गांव के रास्तों पर हाथी घोड़े चलने लगे, राजदरबार में नंगी तलवार की बिजली चमकने लगी, हाट-बाजार लगने लगे। पीताम्बर और उनकी प्रजा पुलकित हो उठी। नक्षत्रराय इस निर्वासन में राजा बनकर सारे दुःख भूल गये। यहां शासन का कोई बोझ नहीं था, मगर शासन के सारे सुख थे। यहां वे पूरे स्वतंत्र है, अपने देश में उनका इतना ज्यादा प्रताप नहीं था, इसके अलावा यहां रघुपति की छाया नहीं थी। खुशी के कारण डूब गये। ढाका से नट-नटी आ रखा सेनापति, पीताम्बर का नाम दीवानजी पड़ गया। राजदरबार में बैठकर नक्षत्रराय आडम्बर सहित न्याय करते। नकुड़ ने आकर शिकायत की, “माथुर ने मुझे कुत्ता कहा है।” इस बात पर विचार हुआ। प्रमाण संग्रह करने के पश्चात माथुर जब दोषी पाया गया तब नक्षत्रराय ने गंभीर भाव से न्याय-आसन से आदेश दिया - नकुड़ दो बार माथुर के कान खींचेगा इस तरह समय सुख से बीतने लगा। कभी-कभी कोई काम न होने पर कुछ नया मजा करने के लिये मंत्री को बुलाया जाता। मंत्री राज सभासदों को एकत्रित करके व्याकुल होकर नये खेल निकालने की तैयारी करता, गहन विचार-विमर्श और परामर्श होता। एक दिन सेना लेकर पीताम्बर के चण्डीमण्डप पर आक्रमण किया, उसके तालाब से मछली और बगीचे से नारियल और पालक लूट कर बड़े धूमधाम से वाद्य बजाकर सारी चीजें महल में लायी गयी। इस तरह के खेलों के कारण नक्षत्रराय के प्रति पीताम्बर का स्नेह और गहरा होता गया।

आज महल में बिल्ली के बच्चों का विवाह है। नक्षत्रराय के पास एक बिल्ली का बच्चा था। उसके साथ मण्डल के बिल्ली का विवाह होगा। चूड़ामणि को रिश्ता पक्का करने के लिए तीन सौ रुपये और एक शाल मिली है। हल्दी लगाने की रीत हो चुकी है। आज शुभ लगन में शाम के समय विवाह है। पिछले कुछ दिनों से राजमहल राजबारी में किसी के पास भी समय नहीं था।

शाम के समय लाइटें जल उठी, नगाड़े बजने लगे। मंडल के घर से पालकी में बैठकर फेरों के कपड़े पहनकर दूल्हा म्याऊं-म्याऊं करता आ रहा है। मण्डल के घर का छोटा लड़का सरबाला बना उसके गले की रस्सी पकड़े साथ-साथ आ रहा है। शंख ध्वनि और शुभ गीतों से दूल्हा के स्वागत हुआ।

पुरोहित का नाम था केनाराम, मगर नक्षत्रराय ने उसका नाम रखा था रघुपति नक्षत्रराय ने उसका नाम रखा था रघुपति। असल रघुपति से डरते थे, इसलिये नकली रघुपति से इस तरह खेलकर आनंद लेते। बात-बात में उसे डांटते, गरीब केनाराम चुपचाप सबकुछ सहन करता। आज किसी कारणवश केनाराम सभा में उपस्थित नहीं थे - उसका बेटा बीमार है।

नक्षत्रराय ने अधीर होकर पूछा, “रघुपति कहां है?”

नौकर बोला, “उनके घर में बेटा बीमार है।”

नक्षत्रराय दोगुने जोर से बोले, “बुलाओ उसको।”

नौकर लाना। तब तक रोते हुये बिल्ले के सामने नाच-गाना चलता रहा।

नक्षत्रराय बोले, “गीत गाओ।” गीत गाये जाने लगे।

कुछ देर बाद नौकर ने आकर बताया, “रघुपति आये हैं।”

नक्षत्रराय गुस्से में बोले, “बुलाओ।”

उसी पल पुरोहित ने प्रवेश किया। पुरोहित को देखते ही नक्षत्रराय का गुस्सा न जाने कहां खो गया, किसी और ही भाव में पहुंच गये। उनके चेहरे का रंग उड़ गया, माथे पर पसीना आ गया। गीत और नाच-गाना अचानक थम गया, सिर्फ बिल्ले की म्याऊं-म्याऊं गूंजने लगी।

यह तो रघुपति ही है। इसमें कोई संदेह नहीं है। लम्बा-दुबला, तेजस्वी भूखे कुत्ते की तरह उनकी आंखें चमक रही हैं। दोनों पैर धूल में सने हुये, मखमल की चादर पर पैर रखकर सिर उठाकर बोले, “नक्षत्रराय।” नक्षत्रराय चुप रहे।

रघुपति ने कहा, “तुमने रघुपति को बुलाया था, मैं आ गया हूं।”

नक्षत्रराय अस्पष्ट स्वर में बोले, “प्रभु! प्रभु”

रघुपति बोले “उठकर इधर आओ।”

नक्षत्रराय धीरे-धीरे सभा से उठकर बाहर आये।

बिल्ली का विवाह, गीत और नाच बंद हो गया।


रघुपति ने पूछा, “यह क्या हो रहा था?”

नक्षत्रराय सिर खुजाते हुये बोले, “नाच-गाना।”

रघुपति घृणा पूर्वक बोले, “छिः छिः।”

नक्षत्रराय अपराधी की तरह खड़े रहे।

रघुपति बोले, “कल यहां से चलना है। तैयारी कर लो।”

नक्षत्रराय ने पूछा, “कहां जाना है?”

रघुपति, “यह सब बातें बाद में होगी। अभी तुम मेरे साथ चलो।”

नक्षत्रराय बोले, “मैं यहां खुश हूं।”

रघुपति, “खुश हूँ।” तुमने राजपरिवार में जन्म लिया है, तुम्हारे पूर्वज राजा रह चुके हैं, और तुम इस गांव के सियार-राज बने हुये हो, और कहते हो ‘खुश हूं।”

रघुपति ने अपने वाक्यों और तीक्ष्ण कटाक्षों द्वारा प्रमाण कर दिया कि नक्षत्रराय खुश नहीं है। रघुपति के चेहरे के तेज से नक्षत्रराय को भी यह समझ आया। वे बोले, “क्या ठीक हूं। मगर क्या करूं? उपाय क्या है?”

रघुपति। उपाय तो बहुत है, उपायों की कमी नहीं है। मैं तुम्हें उपाय बताऊंगा - तुम मेरे साथ चलो।

नक्षत्रराय। एक बार दीवानजी से पूछलेता।

रघुपति। नहीं।

नक्षत्रराय। मेरा सारा सामान-

रघुपति। कुछ नहीं चाहिये।

नक्षत्रराय। लोग।

रघुपति। किसी की कोई जरूरत नहीं।

नक्षत्रराय। मेरे पास ज्यादा रुपये भी नहीं है।

रघुपति। मेरे पास है। अब ज्यादा बहाने मत बनाओ - आज सो लो कल सुबह रवाना होना है।

कहकर किसी उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना रघुपति चले गये।

अगले दिन सुबह नक्षत्रराय सोकर उठे। उस समय गायक ललित राग में गीत गा रहे थे, बाहर कमरे में आकर नक्षत्रराय ने खिड़की से बाहर देखा। पूर्वदिशा में सूर्य उदय हुआ है, लाल रंग दिख रहा है। दोनों ओर के घने पेड़ों के बीच में से, छोटे-छोटे निद्रित गांवों के द्वारा पर से ब्रह्मपुत्र अपना अपार जल लेकर बही जा रही है। महल की खिड़की से नदी तट की एक कुटिया दिखायी दे रही है। एक लड़की आंगन में झाडू लगा रही है - एक पुरुष उससे बातें करता, सिर पर चादर लपेटे एक बांस के अग्रभाग में एक पोटली बांधकर निश्चिन्त होकर कहीं बाहर जाने के लिये निकला। बुलबुल और कोयल पुकार रही है। मैना कटहल के पत्तों में बैठकर गीत गा रही है। खिड़की से बाहर देखते हुये नक्षत्रराय के हृदय से एक गहरी श्वांस निकली, उसी समय पीछे से रघुपति ने आकर उनके कंधे पर हाथ रख दिया। नक्षत्रराय चौंक गये। रघुपति ने धीमे, स्वर से कहा, “यात्रा का समय हो गया है।”

नक्षत्रराय हाथ जोड़कर विनती करते हुये बोले, “मुझे माफ कर दीजिये, मैं कहीं भी नहीं जाना चाहता। मैं यहीं खुश हूं।”

रघुपति बिना कुछ कहे आग्नेय दृष्टि से नक्षत्रराय को देखने लगे। नक्षत्रराय ने आंखें झुकाकर कहा, “कहां जाना है?”

रघुपति। यह मैं अभी नहीं बता सकता।

नक्षत्र। मैं भैया के विरुद्ध कोई षड्यंत्र नहीं कर सकता।

रघुपति जल उठे, बोले, “भैया ने तुम्हारे लिये ऐसा क्या महान काम किया है बताओ मुझे।”

नक्षत्र मुंह फेरकर खिड़की पर लकीर खींचते हुये बोले,

“मैं जानता हूं, वे मुझसे प्यार करते हैं।”

रघुपति जोर से हंसते हुये बोले, “हरि हरि! क्या प्रेम है।

इसलिये ही शायद ध्रुव को युवराज बनाने के लिये तुम्हें झूठे बहाने से अपने राज्य से बाहर भेज दिया है - कहीं राज्य के काम के भार से मोम से बना यह भाई व्यथित न हो जाये। उस राज्य में क्या तुम कभी प्रवेश कर पाओगे? बेवकूफ।

नक्षत्रराय, जल्दी से बोले, “मैं क्या यह छोटी-सी बात नहीं समझता? मैं सब समझता हूं - मगर मैं क्या करूं, उपाय क्या है ?”

रघुपति। उसी उपाय की बात ही तो कर रहा हूं। इसी लिये तो आया हूं। अगर इच्छा है तो मेरे साथ चल नहीं तो यहां बांस के वन में बैठकर अपने हिताकांक्षी भाई का ध्यान कर। मैं चला।

कहकर रघुपति जाने लगे। नक्षत्रराय जल्दी उनके पीछे जाकर बोले, “मैं भी चलूंगा प्रभु। मगर दीवान जी अगर हमारे साथ चलना चाहें तो उन्हें साथ ले जाने में क्या आपत्ति है?”

घर से बाहर जाने के लिये नक्षत्रराय के पैर नहीं उठ रहे। यहां के सारे सुख छोड़कर, दीवानजी को छोड़कर रघुपति के साथ अकेले कहां जाना पड़ेगा। मगर रघुपति जैसे उनके बाल पकड़ कर ले जा रहे हैं। इसके अलावा नक्षत्रराय के मन में एक भय मिश्रित कौतूहल जगने लगा। उसका आकर्षण बड़ा गहरा था।

नाव तैयार थी। नदी तट पर पहुंचकर नक्षत्रराय ने देखा, कंधे पर गमछा (तौलिया) लटकाये पीताम्बर स्नान करने आये हैं। नक्षत्र को देखते ही पीताम्बर हंसकर बोले, “महाराज की जय हो, मैंने सुना है कि कल अचानक एक कठोर ब्राह्मण ने आकर शुभ विवाह में बाधा पहुंचायी।”

नक्षत्रराय परेशान हो गये। रघुपति गंभीर स्वर में बोले, “मैं ही वह कठोर ब्राह्मण हूं।”

पीताम्बर को हंसी आ गयी, बोले- “आपके सामने आपकी वर्णना करना ठीक नहीं रही। अगर पता होता तो किसके पिता की इतनी हिम्मत होती। बुरा मत मानिये भगवन् पीछे से लोग न जाने क्या-क्या कहते हैं ? मेरे सामने लोग मुझे राजा कहते हैं और पीठ पीछे नाई। मुंह पर कुछ नहीं कहते यही काफी है, मैं तो यही समझता हूं। असल बात क्या है जानते थे, आपका चेहरा बड़ा गुस्सैल है। किसी का भी ऐसा चेहरा देखकर लोग ऐसी ही बातें करते हैं।

महाराज, इतनी सुबह नदी तट पर ?”

नक्षत्रराय करुण स्वर में बोले, “मैं जा रहा हूं दीवान जी।’

पीताम्बर। जा रहे हैं। कहां? मण्डल के घर?

नक्षत्रराय। नहीं दीवानजी, मण्डल के घर नहीं, बहुत दूर।

पीताम्बर। बहुत दूर तो क्या पाईकघाटा में शिकार करने जा रहे हैं।

नक्षत्रराय ने एकबार रघुपति की ओर देखकर उदास होकर सिर्फ गर्दन हिलायीं।

रघुपति बोले, “देर हो रही है, नाव में बैठो।”

पीताम्बर ने संदिग्ध भाव से गुस्से से ……..की ओर देखा - बोले, “तुम कौन हो ? हमारे महाराज को हुक्म दे रहे हो।”

नक्षत्रराय ने परेशान होकर पीताम्बर को एक ओर खींचकर कहा, “यह हमारे गुरु हैं।”

पीताम्बर बोले, “तो क्या हुआ। ये हमारे चण्डीमण्डप में रहें, भोजन का प्रबंध मैं करूंगा, आदरपूर्वक रहें - महाराज की इन्हें क्या जरूरत है?”

रघुपति, “बेकार का समय नष्ट हो रहा है - मैं चलता हूं।”

पीताम्बर जी, देर करने का क्या फायदा, जल्दी चलिये।

मैं महाराज को लेकर महल में जा रहा हूं।

नक्षत्रराय ने एकबार रघुपति की ओर तो एक बार पीताम्बर की ओर देखा। फिर धीमे से बोले, “नहीं दीवानजी, मैं चलता हूं।”

पीताम्बर तो मैं भी साथ चलता हूं। और लोगों को भी साथ लेते हैं। राजा की तरह जाइये। राजा जायेंगे साथ में दीवान जी नहीं जायेंगे ?

नक्षत्रराय ने रघुपति की ओर देखा। रघुपति बोले, “कोई साथ नहीं जायेगा।”

पीताम्बर गुस्से में बोले, “देखो पण्डित तुम -”

नक्षत्रराय उन्हें बीच में रोककर बोले, “दीवान जी मैं चलता हूं, देर हो रही है।’

पीताम्बर उदास होकर नक्षत्रराय का हाथ पकड़कर बोले,

“देखो बेटा, मैं तुम्हें राजा कहता हूँ, मगर मैं तुम्हें अपने बेटे जैसा प्यार करता हूं - मेरी कोई औलाद नहीं है। तुम पर मेरी जबरदस्ती नहीं चलती। तुम जा रहे हो, मैं जब रोक नहीं सकता। मगर मेरा एक अनुरोध है, जहां भी जाओ, मरने से पहले लौटकर आना होगा। मैं अपने हाथों से अपना सब कुछ तुम्हें देकर जाऊंगा, यही मेरी इच्छा है।”

नक्षत्रराय और रघुपति नाव में सवार हुये। नाव दक्षिण दिशा में चली गयी। पीताम्बर स्नान करना भूलकर, तौलिया कंधे पर डाले घर लौट आये। गुजूरपाड़ा जैसे खाली हो गया; आमोद-उत्सव सब समाप्त हो गये। सिर्फ रोज वही प्रकृति का उत्सव, सुबह पक्षियों के गीत, पत्तों की मरमराहट और नदी की कलकल में कोई विराम नहीं।


लम्बा रास्ता था। कहीं नदी, कहीं घना जंगल, कहीं छायाहीन मैदान - कभी नाव में, कभी पैदल और कभी टट्टू पर - कभी धूप में, कभी बरसात में, कभी कोलाहल पूर्ण दिन तो कभी शांत गहन रात का अंधकार - नक्षत्रराय चलते जा रहे हैं।

कितने देश, कितने ही विचित्र दृश्य, कितने विचित्र लोग - मगर नक्षत्रराय के साथ छाया जैसा क्षीण, धूप जैसा तेज, रघुपति है। दिन में रघुपति, रात में रघुपति, सपने में भी रघुपति विराजमान रहते। पथ पर पथिक चले जा रहे हैं, धूल में बच्चे खेल रहे हैं, हाट में लोग सामान खरीद बेच रहे हैं, गांव में वृद्ध शतरंज खेल रहे हैं, घाट पर औरतें पानी भर रही हैं, नावों में मल्लाह गीत गा रहा है - मगर नक्षत्रराय के साथ एक शीर्ण रघुपति हमेशा जाग रहे हैं। दुनिया में चारों ओर विचित्र खेल हो रहे हैं, विचित्र घटनायें घट रही हैं - अगर इस रंगमंच की विचित्र के बीच में से नक्षत्रराय की दूर दृष्टि उन्हें खींचे ले जा रही है - अपने उनके लिये पराये, गांव सूने मरुस्थल लग रहे हैं।

थककर नक्षत्रराय ने अपनी पासवाली छाया से पूछा, “और कितनी दूर जाना है?”

छाया उत्तर देती, “बहुत दूर।”

“कहां जाना है?”

इसका कोई उत्तर नहीं है। नक्षत्रराय सांस फेंकते चलते रहते। पेड़ों से घिरी कुटिया देखकर उन्हें लगता, “काश मैं इस कुटिया में रह सकता।” शाम के समय जब ग्वाला कंधे पर लाठी लिये मैदान में से धूल उड़ता गाय-बछड़ों के साथ चलता तब नक्षत्रराय को लगता, “काश, मैं इसके साथ जा पता, शाम को घर जाकर आराम कर सकता।” दोपहर को कड़ी धूप में किसान खेत में काम कर रहा है, उसे देखकर नक्षत्रराय को लगता, “आहा! यह कितना सुखी है।”

थककर नक्षत्रराय पीले-दुर्बल और मलिन हो गये है - रघुपति से कहने लगे, “पण्डित जी, अब मैं जीवित नहीं बचूंगा।”

रघुपति कहते, “अब तुम्हें मरने कौन देगा?”

नक्षत्रराय को महसूस हुआ, रघुपति अगर अवकाश नहीं देंगे तो उन्हें मरने का भी समय नहीं मिलेगा। एक स्त्री ने नक्षत्रराय को देखकर कहा, “अहा किसका बेटा है। इसे यूं रास्ते पर कौन भटका रहा है?” सुनकर नक्षत्रराय के प्राण पसीज गये, आंखें भर आयी, उनका मन हुआ कि उस स्त्री को मां कहे और उसके साथ उसके घर चले जाये।

मगर नक्षत्रराय को रघुपति के हाथों जितना दुःख सहना पड़ता उतना ही वे रघुपति के वश में होने लगे; रघुपति के अंगुली के इशारे से उनका समस्त अस्तित्व पश्चिलित होने लगा।

चलते चलते क्रमशः नदियां कम हो गयी। कठोर जमीन आ गयी, यहां की माटी लाल रंग की कंकड़ों से भरी है - नारियल के वन का देश छोड़कर दोनों तालवन के देश में पहुंच गये। बीच-बीच में बड़े-बड़े बांध, सूखी नदी, दूर बादलों जैसा पहाड़ दिखायी दे रहा है। धीरे-धीरे वह सूजा की राजधानी राजमहल के पास आ गये।


अन्ततः दोनों राजधानी पहुंचे। पराजय और पलायन के पश्चात सूजा नयी सेना बनाने की कोशिश कर रहे थे - मगर राजकोष में ज्यादा धन नहीं था। प्रजा कर में डूबी हुयी थी। इस बीच दारा को पराजित और उसे मारकर औरंगजेब दिल्ली के सिंहासन पर बैठ चुके थे। यह खबर सुनकर सूजा परेशान हो उठे। मगर सेना तैयार नहीं थी - इसलिये कुछ समय पाने की उम्मीद में उन्होंने छल करके हुये एक दूत औरंगजेब के पास भेज दिया। संदेश भेजा, नयनों की ज्योति, हृदय का आनंद, परम स्नेही प्रिय भाई औरंगजेब सिंहासन लाभ कर चुके हैं, यह सुनकर सूजा की लाश जैसी देह में प्राणों का संचार हुआ अभी सूजा का बंगाल के शासन को नये सम्राट अगर मंजूरी दे दें तो खुशी की सीमा नहीं रहेगी। औरंगजेब ने दूत का बड़ा आदर किया। सूजा का स्वास्थ्य और परिवार के विषय में जानकारी ली और बोले, “जब स्वयं सम्राट शाहजहां ने सूजा को बंगाल का शासन कार्य सौंपा था तो दूसरी मंजूर-पत्र की कोई आवश्यकता नहीं है।

उसी समय रघुपति सूजा की सभा में पहुंचे।

सूजा ने आदर और कृतज्ञता पूर्वक ब्राह्मण का स्वागत किया।

बोले, “कैसे हो?”

रघुपति बोले, “बादशाह से कुछ निवेदन करना चाहता हूं।”

सूजा ने मन ही मन सोचा, “निवेदन क्या? बस धन न मांगे।”

रघुपति बोले, “मेरी प्रार्थना है कि -

सूजा बोले, “ब्राह्मण तुम्हारी प्रार्थना मैं जरूर पूरी करूंगा। मगर कुछ दिन सब्र करो। अभी राजकोष में ज्यादा धन नहीं है।”

रघुपति बोले, “शहनशाह, सोना-चांदी या कोई और धातु नहीं चाहिये, मुझे तो अभी कसा हुआ लोहा चाहिये। मेरी शिकायत सुनिये, मैं आपसे न्याय की प्रार्थना करता हूं।”

सूजा बोले, “अजीब मुसीबत है। अभी मेरे पास न्याय करने का समय नहीं है। ब्राह्मण तुम बुरे समय पर आये हो।”

रघुपति बोले, शहजादे, अच्छा-बुरा समय सभी पर आता है। आप बादशाह है आप पर भी आया है और मैं गरीब ब्राह्मण हूं, मुझ पर भी आया है। आप अगर न्याय करने बैठेंगे तो मेरा समय कहां रहेगा ?”

सूजा निराश होकर बोले, “बड़ी मुश्किल है। इतनी बातें सुनने से अच्छा है तुम्हारी शिकायत सुन लूं। बोलो।”

रघुपति बोले, “त्रिपुरा के राजा गोविन्दमणिक्य ने अपने छोटे भाई को बिना किसी अपराध के राज्य से निर्वासित किया है ”

सूजा परेशान होकर बोले, “ब्राह्मण, तुम दूसरों की शिकायत लेकर क्यों मेरा समय बर्बाद कर रहे हो ? यह सब बातें करने का समय नहीं है यह।”

रघुपति बोले, “फरियादी राजधानी में उपस्थित है।”

सूजा बोले, “वे जब खुद आकर अपनी शिकायत करेंगे तब सोचूंगा।”

रघुपति बोले, “उन्हें कब यहां हाजिर करूं,”

सूजा बोले, “ब्राह्मण तो पीछा ही नहीं छोड़ रहा, अच्छा एक हफ्ते बाद लाना।”

रघुपति बोले, “अगर बादशाह का हुक्म हो तो मैं कल ही उन्हें हाजिर करना चाहता हूं।”

सूजा ने परेशान होते हुये कहा, “ठीक है, कल ही ले आना।”

आज के लिये तो छुटकारा मिला। रघुपति चले गये।

नक्षत्रराय बोले, “नवाब के पास तो जाऊंगा मगर भेंट देने के लिये क्या लूं?”

रघुपति बोले, “इस विषय में तुम्हें सोचने की जरूरत नहीं है।” भेट के लिये उन्होंने डेढ़ लाख मुद्रायें लाकर रख दी।

अगली सुबह कांपते हृदय से रघुपति नक्षत्रराय को साथ लेकर सभा में उपस्थित हुये। जब डेढ़ लाख रुपये नवाब के कदमों में रखे गये तो अब वे इतना अप्रसन्न नहीं दिख रहे थे। नक्षत्रराय की शिकायत सहजता से उनके हृदय में उतर गयी। वे बोलें, “अब तुम लोग क्या चाहते हो बताओ।”

रघुपति बोले, “गोविन्दमणिक्य को निर्वासित करके उनकी जगह नक्षत्रराय को राजा बनाने की आज्ञा दे दें।”

सूजा को अपने भाई की गद्दी छीनने में कोई संकोच नहीं था, फिर भी यह बात सुनकर उनके मन में आपत्ति पैदा हुयी। मगर रघुपति की प्रार्थना मान लेना अभी उनको सबसे सहज लगा - नहीं तो रघुपति बक-बक करेगा, यही डर था उनको। और फिर डेढ़ लाख रुपये भेंट के पश्चात ज्यादा ना नुकुर शोभा नहीं देती, ऐसा उन्हें महसूस हुआ। वे बोले, “ठीक है,

गोविन्दमणिक्य का निर्वासन और नक्षत्रराय को राजा बनाने का पत्र मैं तुम्हें दे देता हूं। तुम ले जाओ।”

रघुपति बोले, “बादशाह को कुछ सैनिक साथ भेजने पड़ेंगे।”

सूजा दृढ़ता पूर्वक बोले, “नहीं, नहीं, नहीं - यह नहीं हो सकता, युद्ध नहीं कर सकता।”

रघुपति बोले, “युद्ध के खर्चें के लिये छत्तीस हजार रुपये मैं आपको देकर जा रहा हूं। और त्रिपुरा में नक्षत्रराय के राजा बनते ही इस साल का लगान सेनापति के हाथों भिजवा दूंगा।

यह प्रस्ताव सूजा को ठीक लगा और सभासद भी इस विचार से सहमत थे। मुगल सेना के साथ रघुपति और नक्षत्रराय त्रिपुरा की ओर रवाना हुये।


इस उपन्यास को शुरू हुये दो साल बीत चुके हैं। ध्रुव उस समय दो साल का बालक था, अभी उसकी उम्र चार साल है। अब वह बोलना सीख गया है। अब वह खुद को बहुत बड़ा आदमी समझता है। सारी बातें साफ-साफ नहीं कह पाता मगर बड़े जोर से कहता है। राजा को प्रलोभन और सांत्वना देने के लिये “गुड़िया दूंगा’ कहता है और राजा अगर कोई शैतानी करते तो ध्रुव उन्हें ‘कमरे में बंद कर दूंगा’ की धमकी देता है। इस तरह राजा अब उसके शासन में है - ध्रुव की मर्जी के बगैर कोई काम करने में उन्हें भरोसा नहीं होता।

इस बीच अचानक ध्रुव को एक साथी मिल गया। एक पड़ोसी की लड़की, ध्रुव से छह महीने छोटी है वह। दस मिनट के भीतर ही दोनों में हमेशा के लिये मित्रता हो गयी। बीच में झगड़े की आशंका हुयी थी। ध्रुव के हाथ में एक बड़ा सा पताशा था। पहली मित्रता के उल्लास में ध्रुव ने अपनी छोटी-छोटी अंगुलियों से सावधानी पूर्वक थोड़ा सा किनारा तोड़कर अपनी संगिनी के मुंह में देकर परम अनुग्रह के साथ गरदन हिलाकर बोला, “तुम काओ (खाओ)” संगिनी को मीठा स्वाद आने पर परितृप्त होकर बोली, “और काऊंगी (खाऊंगी)”

तब ध्रुव बेचैन हो गया। मित्रता पर इतनी ज्यादा अधिकार उसे ठीक नहीं लगा। ध्रुव अपने स्वभाव अनुसार गंभीरता और गौरव से गर्दन हिलाकर बोला, “छिः - और नहीं काना (खाना) - बीमार हो जाओगी, पिताजी मारेंगे।” कहकर देर न करते हुये पूरा पताशा मुंह में डाल लिया और खा गया। अचानक बालिया के चेहरे के भाव बदलने लगा; होंठ फूलने लगे, भौव ऊपर उठने लगी, रोने के सारे लक्षण दिखायी दिये।

ध्रुव किसी का रोना नहीं सह सकता। जल्दी से सांत्वना देते हुये बोला, “कल दूंगा।”

राजा के आते ही ध्रुव ज्ञानियों की तरह अपनी संगिनी के प्रति राजा को निर्देश देते हुये बोला, “इसे कुछ मत कहना, यह रोयेगी, छिः मारना नहीं चाहिये।”

राजा तो ऐसा कुछ करने ही नहीं जा रहे थे, फिर भी राजा को यूं खबरदार करना ध्रुव को आवश्यक लगा।

राजा ने उस लड़की को मारा नहीं, ध्रुव को लगा उसका उपदेश बेकार नहीं गया।

उसके बाद ध्रुव बड़ों जैसा भाव करके किसी भी प्रकार संकट की कोई आशंका नहीं है बताकर उस लड़की को आश्वासन देने लगा।

इसकी भी कोई जरूरत नहीं थी। क्योंकि वह लड़की खुद ही राजा के पास जाकर बड़े कौतुहल और लोभपूर्वक राजा का हाथ का कड़ा घुमा घुमाकर देखने लगी।

इस तरह ध्रुव अपनी लगन और परिश्रम से पृथ्वी पर शांति और प्रेम स्थापित करके प्रसन्नचित्त से राजा के निकट अपना बेल के फूल जैसा गोलमटोल पवित्र चेहरा बढ़ा दिया - राजा के अच्छे व्यवहार का पुरस्कार राजा ने उसे चूम लिया।

तब ध्रुव ने अपनी साथी का चेहरा आगे बढ़ाकर राजा को अनुमति और अनुरोध के मध्य के स्वर में कहा , “इसको भी चूमो।”

ध्रुव का आदेश न मानने का राजा का साहस नहीं हुआ। तब वह लड़की बिना किसी संकोच के निमंत्रण की अपेक्षा बिना किये राजा की गोद में चढ़कर बैठ गयी।

अब तक किसी प्रकार की अशांति के लक्षण नहीं दिख रहे थे, मगर इस बार ध्रुव के सिंहासन पर उसके बैठते ही ध्रुव का प्रेम हिल उठा। राजा की गोद पर उसी का एक मात्र अधिकार है, यह इच्छा ध्रुव की बलवती हो उठी। चेहरा भारी हो गया। उस लड़की से एक-दो बार खींचतान की, इस बार छोटी लड़की को मारना उसे अन्याय नहीं लगा।

यह लड़ाई खत्म करने के लिये राजा ने ध्रुव को अपनी आधी गोद दे दी। मगर इससे ध्रुव की आपत्ति समाप्त नहीं हुयी। पूरा अधिकार करने के लिये नया आक्रमण शुरू किया। उसी समय नये राजपुरोहित बिल्लन ने कमरे में प्रवेश किया।

दोनों को गोद से उतारकर राजा ने उन्हें प्रणाम किया। ध्रुव से बोले, “पुरोहित जी को प्रणाम करो।” ध्रुव को इसकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुयी - मुंह में अंगुली डाले विद्रोही भावपूर्वक खड़ा रहा। लड़की ने खुद ही राजा को प्रणाम करते देख पुरोहित को प्रणाम किया।

बिल्लन पुरोहित ध्रुव को अपनी ओर खींचकर बोले, “तुम्हें यह साथी कहां मिली?”

कुछ देर सोचकर ध्रुव बोला, “मैं चक्टक् पर बैठूंगा। चक्टक् का अर्थ है घोड़ा।

पुरोहित बोले, “वाह-वाह, प्रश्न और उत्तर में क्या सामंजस्य है।”

अचानक उस लड़की पर ध्रुव की दृष्टि पड़ी, उसके विषय से अति संक्षेप में अपने विचार और अभिप्राय व्यक्त करके बोला, “यह शैतान है, इसको मारूंगा।” कहकर आसमान की ओर अपनी छोटी सी मुट्ठी फेंकी।

राजा ने गंभीर स्वर में कहा, “छिः ध्रुव।”

फूंक मारते ही जैसे दीपक बुझ जाता है वैसे ही उसी पल ध्रुव का चेहरा हो गया। पहले वह दोनों हाथों से आंसू रोकने के लिये अपनी आंखें रगड़ने लगा, मगर देखते ही देखते उसका क्षुद्र हृदय रोक नहीं पाया, वह रोने लगा।

बिल्लन उसे हिला-डुला कर, गोद में उठाकर, आकाश में उछालकर चुप कराने की कोशिश करने लगे, ऊंची आवाज में बोले, “सुनो ध्रुव सुनो; श्लोक सुनाता हूं सुनो -

कलह कटकटांग काठ कठिन्य काठयंग

कटन कीटन कीटंग कुटालंग खट्टमटंग।

अर्थात् जो बच्चा रोता है उसे कटकटांग में डालकर तीन दिनों तक रखना होता है तभी वह ठीक होता है।”

पुरोहित इस तरह बकबक करने लगे। ध्रुव का रोना बीच में ही रुक गया। वह पहले तो अवाक् होकर बिल्लन की ओर देखता रहा फिर उनका हाथ-पैर हिलाना उसे बड़ा अच्छा लगा।

वह खुश होकर बोला, “और सुनाओ।”

पुरोहित फिर बकने लगा, ध्रुव हंसते-हंसते बोला, “और सुनाओ।”

राजा ने ध्रुव के भीगे गालों, होठों को बार-बार चूमा। तब इन दोनों बच्चों को लेकर राजा और पुरोहित खेलने लगे।

बिल्लन राजा से बोले, “महाराज इन दोनों के साथ मजे में है। दिन-रात बुद्धिमानों के साथ रहने पर बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। छुरी पर धार लगाते रहने पर छुरी पतली होकर अन्तरध्यान हो जाती है, सिर्फ हत्था बचा रह जाता है।”

राजा हंसते हुये बोले, “तो क्या अब तक मेरी बुद्धि की सूक्ष्मता प्रकाशित नहीं हुयी है?”

बिल्लन! नहीं। सुक्ष्म बुद्धि का एक लक्षण यह है कि वह सहज चीज को कठोर बना देता है। धरती पर इतने ज्यादा बुद्धिमान व्यक्ति नहीं होते तो पृथ्वी का काम काफी सहज हो जाता। ज्यादा सुविधा करते हुये ही ज्यादा असुविधा घटती है। ज्यादा बुद्धि पाकर इंसान उसका क्या करे सोच नहीं पाता।

राजा बोले, “काम तो पांच अंगुलियों से भी हो जाता है, दुर्भाग्य के कारण सात अंगुलियां पाने की आशा काम बढ़ा देती है।

राजा ने ध्रुव को पुकारा। ध्रुव अपनी सहेली के साथ झगड़ा समाप्त करके फिर से खेलने में व्यस्त था। राजा की आवाज सुनकर उसी समय खेल छोड़ कर राजा के पास आ गया।

उसे अपने सामने बिठाकर, राजा ने कहा, “ध्रुव, वह नया गीत पुरोहित को सुनाओ।” मगर ध्रुव ने आपत्ति के भाव से पुरोहित की ओर देखा।

राजा ने लालच देते हुये कहा, “तुम्हें टक्टक् पर बिठाऊंगा।”

ध्रुव अपनी तोतली आवाज में बोलने लगा -

हछ लोगों के पथ निर्देश के कारण

कदम-कदम पर पथ भटकता है।

विभिन्न बातों से, विभिन्न त्रषियों के बल से

संशय में ही डोलू है।

बजाऊं तुम्हारे पास यही थी आस

तुम्हारी वाणी सुनकर मिटेगा प्रमाद

कानों के पास सभी कर रहे विवाद

सहस्त्र लोगों की सहस्त्र बोली हे।

कातर प्राणों से जब तुम्हें पुकारूं

ओट दिये सब खड़े होते पास

धरती की धूल इसलिये लिये हूं

मिलती नहीं चरण-धूलि हे।

सहस्त्र भाग मेरे सहस्त्र ओर घाते

खुद ही खुद में विवाद बांधते,

किसे संभालू, यह क्या हुआ हाय-

एक ही बहुत है यह।

मुझे एक करो अपने प्रेम में बांधकर

एक पथ ही दिखाओ मुझे

झमेलों में फंसकर मर रहा रो-रोकर,

अपने चरणों में दो स्थान हे।

ध्रुव की तोतली आवाज में यह कविता सुनकर बिल्लन पुरोहित भावुक हो उठे। वे बोलें, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं, तुम अमर रहो।” ध्रुव को गोद में उठाकर पुरोहित मिन्नतें करते हुये बोले, “एकबार और सुनाओ।”

ध्रुव ने मौन रहकर अपनी आपत्ति जता दी। पुरोहित अपनी आंखें ढककर बोले, तो मैं रोऊं?”

ध्रुव विचलित होता हुआ बोला, “कल सुनाऊंगा। छिः रोते नहीं। तुम अब दल (घर) जाओ। बाबा मारेंगे।”

बिल्लन हंसते हुये बोले, “कितना मीठा धक्का है यहां।” राजा से विदा लेकर पुरोहित बाहर चले गये।

रास्ते पर दो पथिक चले जा रहे थे। पहला दूसरे से कह रहा था, “तीन दिनों से उसके दरवाजे पर माथा रगड़ रहा हूं एक पैसा नहीं निकाल पाया - अब जब वह बाहर आयेगा तो उसका सिर फोड़ दूंगा। देखता हूं क्या होता है।”

पीछे से पुरोहित ही बोले, “इसका भी कोई फल नहीं होगा। देख ही तो रहे हो, सिर में कुबुद्धि के सिवा कुछ नहीं रहता, इससे अच्छा तो अपना सिर फोड़ लो, किसी को जवाब तो नहीं देना पड़ेगा।”

दोनों व्यक्तियों ने चौंककर पुरोहित को प्रणाम किया। बिल्लन बोले, “तुम लोग जो बातें कर रहे थे वह अच्छी बात नहीं है।”

दोनों व्यक्ति बोले, “जैसी आज्ञा आपकी, अब ऐसी बातें नहीं करेंगे।”

रास्ते में ही कुछ बच्चों ने पुरोहित को घेर लिया। वे बोले “ठीक है, आज शाम को मेरे घर आ जाना, मैं सबको कहानी सुनाऊंगा।” बच्चे खुश होकर उछल-कूद करते हुये शोर मचाने लगे। कभी-कभी दोपहर के समय पुरोहित जी बच्चों को इकट्ठा करके सहज भाषा में बच्चों को रामायण, महाभारत और पुराण की कहानियां सुनाते। नीरस बातें भी रसपूर्ण करके कहने की कोशिश करते, मगर जब देखते की बच्चे उबासियां लेने लगे हैं तो उन्हें मंदिर के बगीचे में छोड़ देते। वहां बहुत से फलों के पेड़ हैं। बच्चे चीखते हुये बन्दरों की तरह पेड़ों पर लूटपाट मचा देते - बिल्लन खड़े होकर सारा खेल देखते रहते।

बिल्लन कहां के रहने वाले हैं कोई नहीं जानता। ब्राह्मण है मगर जनेऊ त्याग चुके हैं। बलि बंद करके नये ढंग से पूजा करते हैं। शुरू-शुरू में लोगों ने आपत्ति प्रकाश की थी, मगर अब सब ठीक हो गया है। बिल्लन की बातों में जादू है। वे घर-घर जाकर सबसे बातें करते, कुशल क्षेम पूछते और रोगी को जो दवा देते वह चमत्कार करती। संकट के समय सब उनकी राय लेते - बीच में पड़कर किसी का झगड़ा मिटा देने पर कोई उनसे ऊपर होकर कुछ नहीं कहता।


इस साल त्रिपुरा में अभूतपूर्व घटना घटी। उत्तर दिशा से चूहों का समूह आकर त्रिपुरा के खेतों पर छा गया। सारी फसल नष्ट कर दी। किसानों के घर पर जो संचित अन्त था वह भी खा गये - राज्य में हाहाकार मच गया। देखते ही देखते लोग भूखे मरने लगे। जंगल से फल-फूल लाकर लोग अपने प्राण बचाने लगे। जंगल की कोई कमी नहीं थी और वहां पर भोजन लायक बहुत कुछ था। हिरणों का मांस बाजार में ऊंचे मूल्य पर बिकने लगा लोग जंगली भैंस, हिरण, खरगोश, जंगली बिल्ली बड़े बड़े कछुए शिकार करके खाने लगे। हाथी मिल जाता तो हाथी भी खा जाते। अजगर को भी खाने लगे। वन में पक्षियों की कोई कभी नहीं थी, पेड़ों से शहद मिलता है। जगह-जगह नदी का पानी रोककर उसमें मछलियों को बेहोश करने वाली बेलें डालकर मछलियों को बेहोश कर देते, बेहोश मछलियां ऊपर तैर आती। वह मछलियां पकड़कर लोग खाने लगे और उन्हें सुखाकर रखने लगे। भोजन का काम तो किसी तरह चल रहा था, मगर अराजक माहौल था। चोरी-डकैतियां होने लगी, प्रजा में विद्रोह के लक्षण दिखाई देने लगे।

लोग आपस में कहने लगे कि काली मां को बलि देना बंद करने के कारण मां की नाराजगी के कारण यह सारी दुर्घटना घट रही है। बिल्लन पुरोहित ने यह बातें हंसी में उड़ा दी। वह मजाक करते हुये बोले, कैलाश पर्वत पर कार्तिक और गणेश में विच्छेद हो गया है। कार्तिक के मोर की शिकायत लेकर गणेश के चूहे त्रिपुरा की देवी को शिकायत करने आये हैं। प्रजा में यह बात उपहास की तरह ग्रहण नहीं कर पायी। उन्होंने देखा बिल्लन पुरोहित के कथनानुसार चूहों का सूह जिस तेजी से आया था उसी तेजी से सारा अन्न नष्ट करके कहीं अंतर्ध्यान हो गया - तीन दिनों के भीतर-भीतर उनका नामोनिशान नहीं बचा। पुरोहित के अगाध ज्ञान पर किसी को कोई संदेह नहीं रहा। कैलाश पर्वत पर भाइयों के विच्छेद पर गीत लिखे जाने लगे; बच्चे और भिखारी वही गीत गाने लगे, वह गीत प्रचलित हो गया।

मगर राजा के प्रति द्वेष भाव नहीं मिटा। पुरोहित के परामर्श से राजा गोविन्दमणिक्य ने प्रजा पर एक साल कर लगान माफ कर दिया। उसका कुछ फायदा हुआ। मगर फिर भी बहुत से लोग मां के श्राप से बचने के लिये चट्टग्राम के पर्वतों तक पलायन कर गये। और तो और राजा के मन में भी संदेह पैदा होने लगा।

वे पुरोहित को बुलाकर बोले, “रोहित जी, राजा के पापों का फल प्रजा को भोगना पड़ता है। क्या मैंने मां की बलि समाप्त करके पाप किया है ? या यह सब उसकी सजा है ?”

परोहित ने इन बातों को हंसी में उड़ा दिया। वे बोले, “मां को जब हजार नर बलि देते थे तब ज्यादा प्रजा हानि होती थी या अब हुयी है ?”

राजा निरुत्तर रहे, मगर उनके मन से संशय पूरी तरह दूर नहीं हुआ। प्रजा उनसे असंतुष्ट है, उनके प्रति प्रजा में से देह है, इस कारण उनके हृदय को चोट पहुंची, इस कारण ही उन्हें अपने प्रति संदेह पैदा हुआ। वे दीर्घ श्वांस छोड़ते हुये बोले, “कुछ समझ नहीं आ रहा।”

बिल्लन बोले, “ज्यादा समझने की जरूरत भी क्या है! क्यों चूहों के समूहों ने खेत उजाड़ दिये? यह न भी समझा तो क्या हुआ। मैं अन्याय नहीं करूंगा, मैं सबका भला करूंगा इतना समझ लेना काफी है। उसके बाद का विधाता का काम विधाता करेंगे। वे हमें हिसाब समझाने नहीं आयेंगे।

राजा बोले, “पुरोहित जी, तुम घर-घर जाकर अपना काम कर रहे हो, धरती का जितना भला कर रहे हो उतना ही तुम्हें पुरस्कार भी मिल रहा है - इस खुशी में तुम्हारा सारा संशय मिट जाता है। मैं दिन-रात एक मुकुट सिर पर रखकर सिंहासन पर चढ़कर बैठा रहता हूं । सिर्फ बंधों पर कुछ चिंताये है - तुम्हारा काम देखकर मुझे लोभ होता है।”

बिल्लन बोले, महाराज, मैं तो तुम्हारा ही अंश हूं, तुम अगर उस सिंहासन पर नहीं बैठे होते तो क्या मैं यह काम कर पाता ? हम दोनों के एक-दूसरे से मिलने पर ही हम दोनों पूर्ण हुये हैं।”

यह कहकर बिल्लन ने विदा ली, राजा सिर पर मुकुट पहने सोचते रहे। मन ही मन बोले, ‘बहुत से काम है, मैं कुछ नहीं कर रहा। सिर्फ अपनी चिंता लेकर निश्चिंत हूं। इसलिये मैं प्रजा का विश्वास हासिल नहीं कर पा रहा हूं। मैं राज्यशासन के योग्य नहीं हूं।


मुगल सेना के कर्ता बनकर नक्षत्रराय तेंतुले नाम एक छोटे से गांव में आराम कर रहे थे। सुबह-सुबह रघुपति ने आकर कहा, “महाराज तैयार हो जायें, यात्रा करनी है।’

अचानक रघुपति के मुंह से महाराज शब्द बड़ा मीठा लगा। नक्षत्रराय उल्लास में भरकर उठे। वे कल्पना में समस्त पृथ्वी के लोगों के मुंह से महाराज संबोधन सुनने लगे - वे मन ही मन भरी सभा में त्रिपुरा के सिंहासन पर बैठ गये। खुश होते हुये बोले, “पुरोहित जी, आपको कभी नहीं छोड़ सकता। आपको सभा में रहना होगा। आपको क्या चाहिये मुझे बतायें।”

नक्षत्रराय ने मन ही मन एक विशाल जागीर उसी समय रघुपति को दान दे दी।

रघुपति बोले, “मुझे कुछ नहीं चाहिये।”

नक्षत्रराय बोले, “यह क्या बात हुयी? यह नहीं हो सकता। कुछ तो लेना ही होगा। कैलासर परगना मैंने आपको दिया, आप लिखने-लिखाने का काम कर लें।

रघुपति बोले, “यह सब बाद में देखा जायेगा।”

नक्षत्रराय बोले, “बाद में क्यों, मैं तो अभी दूंगा। पूरा कैलासर परगना आपका हुआ, मैं एक पैसा भी लगान नहीं लूंगा।” कहकर नक्षत्रराय सिर उठाकर तन कर बैठ गये।

रघुपति बोले, “मरने के लिये तीन हाथ जमीन ही काफी है। मुझे और कुछ नहीं चाहिये। कहकर रघुपति चले गये। उन्हें जयसिंह याद आ गये। जयसिंह अगर जीवित होते तो पुरस्कार जरूर लेते; जब जयसिंह ही नहीं है तब समस्त त्रिपुरा राज्य मिट्टी के ढेर के अलावा कुछ भी नहीं है।

इस समय रघुपति नक्षत्रराय को राज-अभिमान में डुबो देने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें डर है कहीं बाद में सब व्यर्थ न हो जाये, कहीं दुर्बल स्वभाव नक्षत्रराय बिना युद्ध किये ही राजा के हाथ न लग जाये। मगर दुर्बल हृदय में एक बाद राजा का भाव उदय हो जाये तो कोई चिंता नहीं है। अब रघुपति नक्षत्रराय के प्रति अवज्ञा नहीं दिखाते, बात बात पर सम्मान देते हैं। सब मामलों में उनसे जबानी आदेश लेते हैं। मुगल सेना उन्हें महाराज साहब पुकारती है उन्हें देखते ही परेशान हो उठती - हवा के बहने पर खेत जैसे झुक जाते हैं उसी तरह नक्षत्रराय के आने पर कतार बद्ध मुगल सेना झुककर उन्हें सलाम करती है। सेनापति अदब के साथ उनका अभिवादन करते, हजारों नंगी तलवारों की ज्योति के बीच विशाल हाथी की पीठ पर राज चिह्न अंकित स्वर्ण मण्डित हौदे पर बैठकर वे यात्रा करते, साथ-साथ उल्लास में भर देने वाले वाद्य बजते रहते और साथ-साथ राजनिशान स्वरूप झंडे उठाये लोग चलते, वे जहां से भी गुजरते वहां के लोग सेना से डरकर घर छोड़कर भाग जाते। उनकी ये हालत देखकर नक्षत्रराय गर्व से फूले न समाते। उन्हें लगता, ‘मैं दिग्विजयी बन रहा हूं।’ छोटे-छोटे जमींदार विभिन्न प्रकार के उपहार लेकर उन्हें सलाम करने आते। उन्हें देखकर पराजित राजा का अहसास होता, महाभारत के दिग्विजयी पाण्डवों की याद आती।

एक दिन सैनिकों ने आकर सलाम करते हुये कहा, “महाराजा-साहब।” नक्षत्रराय तन कर बैठ गये।

“हम महाराज के लिये प्राण न्यौछावर करने आये हैं, हम प्राणों की परवाह नहीं करते। हमेशा से हमारा दस्तूर है - लड़ने जाते समय हम गांव लूटते हैं, कोई शास्त्र इसे गलत नहीं कहता। नक्षत्रराय सिर हिलाते हुये बोले, “बात तो ठीक है।“

“महाराज का अगर हुक्म हो तो हम उस ब्राह्मण की आज्ञा न मानकर लूटने जाये।”

नक्षत्रराय पूरी हिम्मत के साथ बोले, “वह ब्राह्मण होता कौन है ? वह जानता क्या है ? मैं तुम्हें हुक्म देता हूं तुम लूट पाट करने जाओ।” कहकर इधर-उधर देखा-रघुपति को वहां न देखकर निश्चिंत हो गये।

रघुपति को इस तरह लांघकर उन्हें मन ही मन बहुत खुशी हुयी। राजमद मदिरा की तरह उनकी नसों में संचारित होने लगा। पृथ्वी को नये तरीके से देखने लगे। काल्पनिक गुब्बारे पर सवार होकर यह धरती जैसे बहुत से बादलों की तरह मिट गयी। कभी-कभी तो रघुपति भी उन्हें नगन्थ महसूस होने लगा। अचानक बलपूर्वक गोविन्दमणिक्य के प्रति क्रोधित हो उठे। मन ही मन बार-बार कहने लगे, “मेरा निर्वासन! सामान्य प्रजा की तरह राजसभा में मुझे खड़ा किया। अब देखता हूं कौन किसका निर्वासन करता है। इस बार त्रिपुरा के लोग नक्षत्रराय के प्रताप से अवगत होंगे। नक्षत्रराय बड़े ही खुश हुये।

निर्दोष गांववासियों पर बेकार का उत्पीड़न और लूटपाट रघुपति को पसंद नहीं था। इससे रोकने की उन्होंने बहुत कोशिश की थी। मगर सैनिकों ने नक्षत्रराय की आज्ञा पाकर उनकी अवहेलना की। वे नक्षत्रराय के पास आकर बोले, “असहाय गांववासियों पर इतना अत्याचार क्यों ?”

नक्षत्रराय बोले, “पुरोहित जी, इन सब मामलों को तुम ठीक से नहीं समझोगे। युद्ध के समय सैनिकों को लूटपाट से रोककर उनका उत्साह कम करना ठीक नहीं।”

नक्षत्रराय की बात सुनकर रघुपति चौंक गये। अचानक नक्षत्रराय का यह अभिमान देखकर वे मन ही मन हंसे। बोले, “अब अगर लूटपाट करने दोगे तो बाढ़ में इन्हें रोकना कठिन हो जायेगा। समस्त त्रिपुरा लूट खायेंगे यह।”

नक्षत्रराय बोले, इसमें नुकसान क्या है ? मैं तो यही चाहता हूं - त्रिपुरा भी एक बात समझ लें, नक्षत्रराय को निर्वासित करने का फल। आप इन मामलों को नहीं समझोगे, आपने कभी युद्ध नहीं किया है न।”

रघुपति मन ही मन हंसे। बिना कोई उत्तर दिये इंसान बने, यही तो उनकी इच्छा है।


त्रिपुरा में चूहों का उत्पात जब आरंभ हुआ था तब सावन का महीना था। तब खेतों में सिर्फ भुट्टा लगा था और पहाड़ी जमीन के धान के खेत पकने शुरू हुये थे। तीन महीने किसी तरह कट गये - अगहन के महीने में जब

धान काटने का समय आया जब राज्य में खुशी की लहर दौड़ गयी। किसान, औरत, बच्चे,युवक, बड़े सब धान काटने खेतों में पहुंच गये। हैचा हैचा करके एक दूसरे को आह्वान करने लगे। किसान औरतों के गीतों से खेत ध्वनित हो उठे। राजा के प्रति नाराजगी दूर हो गयी, राज्य में शांति स्थापित हो गयी। ऐसे समय खबर आयी कि नक्षत्रराय आक्रमण के उद्देश्य से बहुत बड़ी सेना के साथ त्रिपुरा राज्य की सीमा पर पहुंच चुके हैं और उत्पीड़न और लूटपाट शुरू कर दिया है - इस खबर से समूचा राज्य शंका में डूब गया।

यह खबर राजा के सीने में तीर की तरह चुभी। सारा दिन उन्हें यह बात चुभती रही। रह-रहकर उनके मन में आने लगा, नक्षत्रराय उन पर आक्रमण करने आ रहा है। नक्षत्रराय का सरल सुंदर चेहरा उनकी आंखों में तैरने लगा और इसके साथ-साथ उन्हें लगने लगा, वही नक्षत्रराय कुछ सैनिकों के साथ तलवार हाथ में उठाये उन पर आक्रमण करने आ रहा है। रह-रह कर उनके मन में आने लगा बिना किसी सैनिक के युद्धक्षेत्र में नक्षत्रराय के सामने खड़े होकर नक्षत्रराय के सारे सैनिकों की तलवार के वार अपनी छाती पर ले लें।

उन्होंने ध्रुव को अपने पास खींचकर कहा, “ध्रुव क्या तू भी इस मुकुट के लिये मुझसे लड़ेगा?” कहकर मुकुट जमीन पर फेंक दिया, एक बड़ा-सा मोती टूट कर गिर गया।

ध्रुव आग्रहपूर्वक हाथ बढ़ाकर बोला, “मैं लडूंगा। राजा ध्रुव को मुकुट पहनाकर उसे गोद में लेकर बोले, “यह लो, मैं किसी से लड़ना नहीं चाहता।” कहकर आकर पूर्वक ध्रुव को सीने से लगा लिया।

उसके बाद सारा दिन, यह मेरे ही पाप की सजा है। कहकर खुद से बहस करने लगे। नहीं तो भाई कभी भाई पर आक्रमण करता है। यह सोचकर उन्हें थोड़ी सी सांत्वना मिली। वे मन ही मन बोले, यही विधि का विधान है। जगतपति के दरबार से आदेश आया है, क्षुद्र नक्षत्रराय सिर्फ मानवहृदय के कारण उसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यह सोचकर उनके आहत स्नेह को थोड़ी शांति मिली। वे पाप अपने कंधों पर लेने के लिये तैयार हैं। इससे नक्षत्रराय के पाप का बोझ जैसे कुछ कम हो जायेगा।

उसी समय बिल्लन ने आकर कहा, “महाराज, क्या यह आकाश की ओर देखकर सोचने का समय है ?” राजा बोले, “यह सब मेरे ही पापों का फल है।”

बिल्लन कुछ बेचैन होकर बोले, “महाराज, ऐसी बातें सुनकर मेरा धैर्य टूटता है। दुःख पाप का ही फल है। यह किसने कहा, पुण्य का फल भी तो हो सकता है। कितने धर्मात्मा सारा जीवन दुःख उठाते रहे।

राजा चुप रह गये।

बिल्लन ने पूछा, “महाराज ने क्या पाप किया है जो ऐसी घटना घटी?”

राजा ने कहा, “अपने भाई को निर्वासित किया था।”

बिल्लन बोले, “आपने भाई नहीं अपराधी को निर्वासित किया था।”

राजा बोले, “अपराधी होने पर भी भाई के निर्वासन में पाप तो है ही। उसके फल से छुटकारा नहीं मिल सकता। कौरव दुराचारी थे फिर उनका वध करके पाण्डव प्रसन्नचित्त राज्यसुख नहीं भोग पाये थे। यज्ञ करके प्रायश्चित किया था। पाण्डवों ने कौरवों से राज्य जीता, कौरवों ने मरकर उनसे राज्य छीन लिया। मैंने नक्षत्र को निर्वासित किया, नक्षत्र मुझे निर्वासित करने आ रहा है।”

बिल्लन बोले, पाप की सजा देने के लिये पाण्डवों ने कौरवों से युद्ध नहीं किया था, राज्यलाभ के लिये ही उन्होंने युद्ध किया था। मगर महाराज आपने पाप की सजा देकर अपने सुख-दुःख की उपेक्षा करके धर्म का पालन किया है। इसमें मुझे तो कोई पाप दिखाई नहीं देता। फिर भी प्रायश्चित करने की विधि बताने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं ब्राह्मण उपस्थित हूं, मुझे संतुष्ट कर दो, प्रायश्चित हो जायेगा।”

कुछ देर राजा चुप रहे।

बिल्लन बोले, जो भी हो, अब तो युद्ध की तैयारी करें। और विलम्ब न करे।’

राजा बोले, “मैं युद्ध नहीं करूंगा।”

बिल्लन बोले, “यह तो हो ही नहीं सकता। आप बैठकर सोचते रहे, तब तक मैं सेना का एकत्रित करता हूं। सब अब फसल काटने गये है। ज्यादा सैनिक मिल पाने भी कठिन है।” कहकर उत्तर की अपेक्षा किये बिना बिल्लन चले गये।

ध्रुव को अचानक न जाने क्या याद आया; वह राजा के पास आकर उनके चेहरे की ओर देखकर पूछने लगा, “चाचा कहां है ?” नक्षत्रराय को ध्रुव चाचा कहता था।

राजा बोले, “चाचा आ रहे हैं ध्रुव।” उनकी आंखें भीग गयी।


बिल्लन का काम बहुत बढ़ गया। उन्होंने उपहार देकर दूत चट्टग्राम के पर्वतों पर भेज दिये। वहां के कूकी-ग्रामपतियों से कूकी सेना की मदद मांगी। युद्ध का नाम सुनकर वह नाचने लगे। कूकीओं के जितने गांव-

प्रधान थे, उन्होंने युद्ध की खबर स्वरूप लाल कपड़े में बंधी हुयी खुकरी (एक प्रकार का तेज हथियार) दूतों के हाथों गांव-गांव भेज दी। देखते ही देखते पर्वतों से त्रिपुरा के पर्वतों पर पहुंच गये। उन्हें किसी नियम में बांध पाना कठिन है। बिल्लन खुद गांव-गांव घूमकर खेतों से साहसी युवकों को सेना के लिये चुन लाये। खुद आगे बढ़कर मुगल-सेना पर आक्रमण करना बिल्लन ने ठीक नहीं समझा। जब वह समतल भूमि पार करके अपेक्षाकृत दुर्गम पर्वत पर पहुंचेंगे तब पर्वत और विभिन्न दुर्गम पथों से अचानक उन पर आक्रमण करके उन्हें चौंका देंगे, ऐसा उन्होंने स्थिर किया। बड़े-बड़े पत्थरों द्वारा गोमती नदी का पानी रोक लिया - अगर हारने की हालात हो भी जायें तो यह पत्थर हटाकर बाढ़ द्वारा मुगल सेना को बहा देंगे।

दूसरी ओर लूटपाट करते हुये नक्षत्रराय त्रिपुरा के पर्वतों पर पहुंच गये। तब तक फसल काटी जा चुकी थी। किसान हाथों में तीर-धनुष उठाकर युद्ध के तैयार थे। कूकीओं को फूटते हुये जलप्रपात की तरह रोक पाना कठिन था।

गोविन्दमणिक्य बोले, “मैं युद्ध नहीं करूंगा।”

बिल्लन बोले, “यह कोई बात नहीं हुयी।”

राजा बोले, “मैं राज करने के योग्य नहीं हूं। इस बात के सारे लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इसलिये प्रजा का मुझ पर विश्वास नहीं है, इसलिये अकाल की सूचना हुयी, इसलिये ही यह युद्ध हो रहा है। यह सब भगवान का आदेश है कि मैं राज्य का त्याग कर दूं।”

बिल्लन बोले, “भगवान का ऐसा आदेश हो ही नहीं सकता। भगवान ने आप पर राज्य का भार सौंपा है। जब तक राज कार्य निष्कंटक था तब तक आपने अपना कर्तव्य आसानी से पालन किया, जैसे ही राज-कार्य कठिन हुआ वैसे ही आप कर्तव्य छोड़कर स्वतंत्र होना चाह रहे हैं और इसे भगवान का आदेश बताकर खुद को धोखा देकर सुखी करना चाहते हैं।”

यह बात गोविन्दमणिक्य को जंची। वे निरुत्तर हो कुछ देर बैठे रहे, अंत में कातर स्वर में बोले, “यही मान लो पुरोहित जी, मैं हार गया हूं, नक्षत्र मेरी हत्या करके राजा बन गया है।”

बिल्लन बोले, “अगर सचमुच ऐसा हुआ तो मैं महाराज के लिये शोक नहीं करूंगा। मगर महाराज अगर कर्तव्य छोड़कर पलायन करेंगे तो मुझे दुःख होगा।

राजा अधीर होकर बोले, “अपने भाई का खून बहाऊंगा।”

बिल्लन बोले, “कर्तव्य के आगे भाई-बंधु कोई नहीं होता।

कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्या उपदेश दिया था याद करें।”

राजा बोले, “आप क्या यह कह रहे हैं कि मैं अपने हाथों से यह तलवार उठाकर नक्षत्रराय को आघात करूंगा?

बिल्लन बोले, “हां।”

अचानक ध्रुव आकर गंभीर आवाज में बोला, “छिः ऐसी बात नहीं करते।”

ध्रुव खेल रहा था। दोनों बातचीत से उसे लगा दोनों जरूर कोई शैतानी कर रहे हैं - इसलिये समय रहते दोनों को डांटना जरूरी है। यह सब सोचकर अचानक गर्दन हिलाकर उसने कहा , “छिः ऐसी बात नहीं करते।”

पुरोहित को बड़ा मजा आया। वे हंसने लगे। ध्रुव को गोद में उठाकर उसे चूमने लगे। मगर राजा हंस नहीं पाये। उन्हें महसूस हुआ जैसे इस बालक के मुंह उन्होंने देववाणी सुनी हो।

वे दृढ़तापूर्वक बोले, “पुरोहित जी, मैंने निश्चय किया है मैं खून नहीं बहने दूंगा, मैं युद्ध नहीं करूंगा।”

बिल्लन कुछ देर चुप रहकर बोले, “महाराज को अगर युद्ध करने में आपत्ति है तो एक काम करें। आप नक्षत्रराय से मिलकर उसे युद्ध करने से रोके।”

गोविन्दमणिक्य बोले, “हां, इसके लिये मैं तैयार हूं।”

बिल्लन बोले, “तो ऐसा एक प्रस्ताव लिखकर नक्षत्रराय के निकट भेजा जाये।”

अन्त में यही तय हुआ।


नक्षत्रराय अपनी सेना के साथ आगे बढ़ने लगे, कहीं कोई बाधा नहीं आयी। त्रिपुरा के जिस गांव में वे प्रवेश करते उस गांव के वासी उनका राजा की तरह स्वागत करने लगे। कदम-कदम पर राजभोग का स्वाद मिलने लगा, भूख और बढ़ने लगी। चारों ओर की धरती, गांव, पर्वत, नदी सब कुछ ‘मेरा है’ ऐसा महसूस होने लगा। और इस अधिकार के व्याप्त होते ही खुद भी बहुत दूर तक व्याप्त होकर फैलने लगे। मुगल सेना को जो भी चाहिये वह लेने का आदेश उन्होंने दे दिया। उन्हें महसूस हुआ - ‘यह सब कुछ तो मेरा है और यह मेरे राज्य में आ गये हैं, इन्हें किसी भी प्रकार के सुख से वंचित नहीं किया जाना चाहिये। अपने राज्य लौटकर मुगल सेना उनके आतिथ्य की और इनकी उदारता की प्रशंसा करेगी, कहेगी त्रिपुरा का राजा कोई छोटा-मोटा राजा नहीं है। मुगल सेना द्वारा ख्याति प्राप्त करने में उनकी उत्सुकता बढ़ने लगी। उनमें से कोई भी उन्हें आदर से पुकारता तो वे उसके आगे पानी की तरह बह जाते। हमेशा डरते रहते कि बाद में इनकी निंदा न हो।

रघुपति ने आकर कहा, “युद्ध की तो कोई तैयारी नहीं दिख रही है यहां पर।

नक्षत्रराय बोले, “हां पुरोहित, वे डर गये हैं। कहकर जोर से हंसने लगे।

हंसने का कोई विशेष कारण रघुपति को दिखाई नहीं दिया। फिर भी वे हंसने लगे।

नक्षत्रराय बोले, “नक्षत्रराय नवाब की सेना ले कर आ रहे है, यह कोई सामान्य बात नहीं है।”

रघुपति बोले, “देखता हूं इस बार कौन किसे निर्वासित करता है? क्यों ?

नक्षत्रराय बोले, “मैं अगर चाहूं तो निर्वासन दण्ड दे सकता हूं, कारागार में बंद कर सकता हूं, कारागार में बंद कर सकता हूं - वध का आदेश भी दे सकता हूं। अभी तक निश्चय नहीं किया, क्या करूंगा। कहकर बुद्धिमानों की तरह सोच-विचार में डूब गये। रघुपति बोले, “इतना मत सोचिये महाराज! अभी बहुत समय है। मगर मुझे डर लग रहा है, गोविन्दमणिक्य बिना युद्ध करे हार मान लेंगे।”

नक्षत्रराय बोले, “ऐसा कैसे हो सकता है?’

रघुपति बोले, “गोविन्दमणिक्य अपनी सेना को छिपाकर पहले तो भाई के प्रति प्रेम दिखायेंगे। तुम्हारे गले लगकर कहेंगे, मेरे प्यारे छोटे भाई, आओ कमरे में आओ, दूध-मलाई खाओ।’ महाराज भी रोते हुये कहेंगे, ‘जो आज्ञा।’ अभी आ रहा हूं। ज्यादा देर नहीं लगेगी।’ कहकर अपने जूते पहनकर भाई के पीछे-पीछे सिर झुकाये टट्टू घोड़े की तरह चलेंगे। बादशाह की मुगल फौज तमाशा देखकर हंसते हुये अपने घर लौट जायेगी।”

रघुपति से यह तीखा व्यंग्य सुनकर नक्षत्रराय परेशान हो उठे। हंसने की निष्फल कोशिश करके बोले, “मैं क्या बच्चा हूं जो इस तरह बहका लेंगे। इतनी हिम्मत नहीं है। यह नहीं हो सकता। देख लेना।

उसी दिन गोविन्दमणिक्य की चिट्ठी पहुंची। उसे रघुपति ने खोला। राजा ने स्नेह के साथ मिलने की प्रार्थना की है। यह पत्र उन्होंने नक्षत्रराय को नहीं दिखाया। दूत से कहा, इतना कष्ट उठाकर गोविन्दमणिक्य को इतनी दूर आने की जरूरत नहीं है। सेना और तलवार के साथ महाराज नक्षत्रराय जल्दी ही उनसे मुलाकात करेंगे। इस थोड़ी सी देर के कारण गोविन्दमाणिक्य अपने प्रिय भाई के विरह से परेशान न हो। आठ साल तक अगर निर्वासित रहते तो इससे ज्यादा ही विच्छेद रहता।”

रघुपति ने नक्षत्रराय से जाकर कहा, “गोविन्दमणिक्य ने निर्वासित छोटे भाई को बड़े ही स्नेह से एक पत्र लिखा है।”

नक्षत्रराय उपेक्षा दिखाते हुये बोले, “क्या यह सच है? कैसा पत्र? दिखाना” कहकर हाथ बढ़ा दिया।

रघुपति बोले, वह पत्र महाराज को दिखाना मुझे जरूरी नहीं लगा। उसी समय फाड़ दी। मैंने कह दिया है युद्ध के सिवा और कोई उत्तर नहीं है।

नक्षत्रराय हंसते हंसते बोले, “अच्छा किया। तुमने कहा कि युद्ध के सिवा कोई उत्तर नहीं ? अच्छा उत्तर दिया।”

रघुपति बोले, गोविन्दमणिक्य उत्तर सुनकर सोचेंगे कि जब निर्वासन दण्ड दिया गया था तब तो भाई बड़ी सहजता से चला गया था, मगर वही भाई लौटते समय बड़ी गड़बड़ कर रहा है।”

नक्षत्रराय बोले, “याद रखना भाई कोई सीधा व्यक्ति नहीं है। जब चाहा निकाल दिया, और जब चाहा बुला लिया, यह इतना आसान नहीं है। “कहकर खुश होकर फिर हंसने लगे।


नक्षत्रराय का उत्तर सुनकर गोविन्दमणिक्य को बहुत दुःख हुआ। बिल्लन ने सोचा, शायद राजा अब कोई आपत्ति नहीं करेंगे। मगर गाविन्दमणिक्य बोले, “यह उत्तर कभी भी नक्षत्रराय का नहीं हो सकता। यह उस पुरोहित ने ही कहलवाया है। नक्षत्रराय के मुंह से ऐसी बातें कभी निकल ही नहीं सकती।”

बिल्लन बोले, तो महाराज, अब आपने क्या सोचा?

राजा बोले, “मैं अगर किसी तरह एक बार नक्षत्रराय से मिल लूं तो सब ठीक हो सकता है।”

बिल्लन बोले, “और अगर मुलाकात नहीं हुई हो?”

राजा बोले, “ठीक है, मैं एक कोशिश करके देखता हूं।”

पहाड़ के ऊपर नक्षत्रराय का शिविर लगा है। घना जंगल है वहां। बांस, बेंत का जंग। विभिन्न प्रकार की बेलों से जमीन ढकी हुयी है। जंगली हाथियों के चढ़ने का पथ अनुसरण करके सेना शिखर तक पहुंची है। दोपहर हो गयी पहाड़ के पश्चिम ओर सूरज चला जा रहा है। पूर्व दिशा में अंधेरा हो गया है। शाम के पहले की छाया और पेड़ों की छाया ने मिलकर जंगल में शाम से पहले शाम कर दी है। ठंड के कारण जमीन से ओस की तरह भाप उड़ रही है। झींगुर की आवाज से जंगल गूंज रहा है। बिल्लन जब शिविर में पहुंचे तब सूर्य डूब चुका था, मगर पश्चिम दिशा की सुवर्ण रेखा अभी भी बाकी थी। पश्चिम ओर की समतल भूमि पर स्वर्णछाया से रंजित जो घना जंगल है वह निस्तब्ध हरा समुद्र सा दिख रहा है। सेना कल सुबह यात्रा करेगी। रघुपति सेनापति और कुछ सैनिकों के साथ रास्ता ढूंढने गये हैं, अभी तक नहीं लौटे। जबकि रघुपति की अनुपस्थिति में नक्षत्रराय से किसी का मिलना मना था, फिर भी संन्यासी के वेश में बिल्लन को किसी ने नहीं रोका।

बिल्लन ने नक्षत्रराय के पास जाकर कहा, “महाराज गोविन्दमणिक्य ने यह पत्र आपको लिखा है। कहकर पत्र नक्षत्रराय को दे दिया। नक्षत्रराय ने कांपते हाथों से पत्र लिया। वह पत्र खोलते हुये उन्हें शर्म और डर लगने लगा। जबतक रघुपति गोविन्दमणिक्य और उनके बीच खड़े रहते थे तब तक नक्षत्रराय निश्चिन्त रहते हैं। वे किसी भी तरह गोविन्दमणिक्य को सामने नहीं जाना चाहते। गोविन्दमणिक्य के इस दूत के अचानक नक्षत्रराय के सामने आ जाने से नक्षत्रराय संकुचित हो गये, और मन ही मन परेशान हो गये। मन में आया कि अगर रघुपति यहां होते और इस दूत को उनसे मिलने न देते तो ठीक होता। मन में यही सब सोचते हुये उन्होंने पत्र खोला।

उस पत्र में कोई डांट या भर्त्सना नहीं थी। उन्हें शर्मिन्दा करने के लिये गोविन्दमणिक्य ने एक शब्द भी नहीं लिखा। भाई के प्रति लेशमात्र अभिमान प्रकाश नहीं किया। नक्षत्रराय सेना के साथ आक्रमण करने आ रहे है इस बात का उल्लेख तक नहीं है। दोनों में पहले जितना प्यार था अभी भी बिल्कुल वैसा ही है। और पूरे पत्र में एक गहन स्नेह और विषाद है - यह साफ शब्दों में नहीं लिखा इसलिये नक्षत्रराय के हृदय में ज्यादा पीड़ा होने लगी।

पत्र पढ़ते-पढ़ते धीरे-धीरे उनके चेहरे के भाव बदलने लगे। हृदय का पत्थर देखते ही देखते हट गया। उनके कांपते हाथों में पत्र कांपने लगा। वह पत्र कुछ देर तक माथे से लगाये रखा। उस पत्र में भाई का जो आशीर्वाद था वह शीतल झरने की तरह उनके तपते हृदय पर बरसने लगा। काफी देर तक पश्चिम की ओर के हरे-भरे जंगल की ओर देखते रहे। चारों ओर निर्जन शाम शब्दहीन शांत समुद्र की तरह विराजती रही। फिर उनकी आंखें भीग गयी तेजी से आंसू बहने लगे। अचानक शर्म और पछतावे से नक्षत्रराय ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।

रोते हुये बोले, “मुझे यह राज्य नहीं चाहिये। भैया, मेरी सारी गलतियों को माफ करके मुझे अपने चरणों में स्थान दो। मुझे अपने पास रखो, मुझे अपने से दूर मत करो।”

बिल्लन कुछ नहीं बोले। चुपचाप बैठे देखते रहे। अन्ततः नक्षत्रराय जब सहज हुये तो बिल्लन बोले, “युवराज महाराज आपका इंतजार कर रहे हैं, और देर न करें।’

नक्षत्रराय ने पूछा, “क्या वे मुझे माफ कर देंगे ?”

बिल्लन बोले, “वे युवराज से बिल्कुल भी नाराज नहीं हैं। रात ज्यादा होने पर रास्ते में कष्ट होगा। जल्दी से एक घोड़ा मंगवाये। पहाड़ के नीचे महाराज के लोग इंतजार कर रहे हैं।”

नक्षत्रराय बोले, “मैं छिपकर चलता हूं। सेना को कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है और देर करना ठीक नहीं । जितनी जल्दी यहां से निकला जाये उतना ही अच्छा है।”

बिल्लन बोले, “हां, ठीक है।

सामने वाले पहाड़ पर संन्यासी के साथ शिवजी की पूजा करने जा रहे हैं,“ यह कहकर नक्षत्रराय बिल्लन के साथ घोड़े पर रवाना हुये। पहरेदार साथ चलने लगे, उन्हें रोक दिया।

बस बाहर निकले ही थे कि घोड़ों की टाप और सेना का कोलाहल सुनाई दिया। नक्षत्रराय डर गये। देखते ही देखते रघुपति सेना के साथ लौट आये, आश्चर्य पूर्वक बोले, “महाराज, कहां जा रहे हैं?” नक्षत्रराय कोई उत्तर नहीं दे पाये।

नक्षत्रराय को चुप देखकर बिल्लन बोले, “ये महाराज गोविन्दमणिक्य से मिलने जा रहे हैं।”

रघुपति ने बिल्लन को सिर से पांव तक देखा। अपनी भौवें चढ़ाई फिर खुद को संभालते हुये बोले, “आज ऐसे समय में हम महाराज को विदा नहीं कर सकते। जल्दी का कोई कारण भी नहीं है। कल प्रातःकाल में यात्रा होगी। आप क्या कहते है महाराज?

नक्षत्रराय धीमे स्वर में बोले, “कल सुबह ही जाऊंगा। अभी तो रात हो गयी है।”

निराश होकर बिल्लन ने रात उसी शिविर में बितायी। अगली सुबह नक्षत्रराय के पास जाने की कोशिश की, सैनिकों ने रोक दिया। देखा चारों और पहरेदार खड़े हैं। कहीं कोई छिद्र नहीं है। अन्ततः रघुपति के पास जाकर बोले, “यात्रा का समय हो गया है। युवराज को खबर भेज दें।”

रघुपति बोले, महाराज ने निश्चय किया है कि वे नहीं जायेंगे।

बिल्लन बोले, “मैं एकबार उनसे मिलना चाहता हूं।”

रघुपति - उन्होंने कहा है वे किसी से नहीं मिलना चाहते।”

बिल्लन बोले, महाराज गोविन्दमणिक्य के पत्र का उत्तर चाहिये।”

रघुपति बोले, “पत्र का उत्तर पहले दिया जा चुका है।”

बिल्लन - मैं युवराज के मुंह से उत्तर सुनना चाहता हूं।

रघुपति - इसका तो कोई उपाय नहीं है।

बिल्लन समझ गये कि कोशिश बेकार है, सिर्फ समय का व्यय करना है। जाते समय रघुपति से बोले, ब्राह्मण यह क्या सर्वनाश कर रहे हो तुम। यह ब्राह्मण का काम नहीं है।”


बिल्लन ने लौटकर देखा, इस बीच राजा ने कूकी सेना को विदा कर दिया है। उन्होंने राज्य में उपद्रव शुरू कर दिया था। अपनी सेना को भी तोड़ दिया है। युद्ध हो ही नहीं सकता। बिल्लन ने राजा को सारी बातें बताई।

राजा ने कहा, “तो पुरोहित जी मैं विदा लेता हूं। नक्षत्र के लिये यह राज्य छोड़कर जा रहा हूं।”

बिल्लन बोले, “असहाय प्रजा को दूसरे के हाथों छोड़कर पलायन करेंगे यह सोचकर मैं किसी भी तरह प्रसन्न मन से विदा नहीं दे सकता महाराज। सौतेली मां को पुत्र सौंपकर मां भारमुक्त हो कर शांति लाभ कर गयी - क्या यह कल्पना की जा सकती है ?

राजा बोले, “पुरोहित जी, आपके शब्द मेरे हृदय को छेदते हुये प्रवेश करते हैं। मगर इस बार मुझे माफ कर दो। मुझसे अब ज्यादा कुछ मत कहो। मुझे विचलित करने की कोशिश मत करो। तुम जानते हो, मैंने मन ही मन प्रतिज्ञा ली थी कि मैं रक्तपात नहीं करूंगा, यह प्रतिज्ञा मैं नहीं तोड़ सकता।”

बिल्लन बोले, “तो महाराज अब क्या करेंगे?”

राजा बोले, “तुम्हें मैं सब कुछ बताता हूं। मैं ध्रुव को साथ लेकर वन में चला जाऊंगा। पुरोहित जी मेरा जीवन अधूरा रह गया। जो सोचा था वह कुछ नहीं कर पाया - जीवन जितना बीत गया है उसे फिर से लौटाकर नये ढंग से नहीं जी सकता - मुझे लग रहा है जैसे भाग्य ने हमें तीर की तरह छोड़ा है, अपने लक्ष्य से अगर जरा भी हट गया तो लाख कोशिशों के बाद भी लक्ष्य की ओर नहीं लौट पाऊंगा। जीवन की शुरूआत में जो जरा-सा लक्ष्य से भटक गया था। आज जीवन के अंतिम समय में मुझे लक्ष्य ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा। जो सोचता हूं वैसा नहीं होता। जिस समय जागने पर आत्मरक्षा कर पाता। उस समय नहीं जागा, जिस समय डूबा था, चेतना अब हुयी है। समुद्र से डूबता व्यक्ति जिस तरह एक लकड़ी के टुकड़े में सहारा ढूंढता है, मैं इस बच्चे ध्रुव में आत्म समाधान करके ध्रुव में ही दोबारा जन्म लूंगा। मैं ध्रुव को इंसान बनाऊंगा। ध्रुव के साथ हर पल मैं ही बढूंगा अपना मानवजन्म पूर्ण करूंगा। मैं इंसान जैसा तो हूं नहीं, राजा बनकर क्या करूंगा?”

अन्तिम शब्द - ‘राजा’ बड़े आवेग में कहा। सुनकर ध्रुव अपना माथा राजा के घुटने पर रगड़ते हुये बोला “मैं राजा हूं।”

बिल्लन ने हंसते हुये ध्रुव को गोद में उठा लिया काफी देर तक उसके चेहरे को देखते रहे फिर राजा से बोले, “वन में कभी इंसान बन सकता

है ? वन में तो पेड़ ही पाला जा सकता है। इंसान समाज में ही बन जाता है।”

राजा बोले, “मैं बिल्कुल ही वनवासी नहीं बनूंगा - मनुष्य समाज से थोड़ा दूर रहूंगा मगर समाज से सारे संबंध विच्छेद नहीं करूंगा। ऐसा सिर्फ कुछ दिनों के लिये करना होगा।

दूसरी ओर नक्षत्रराय सेना के साथ राजधानी के पास पहुंच गये। प्रजा का धन लूटा जाने लगा। प्रजा गोविन्दमाणिक्य को कोसने लगी। सब कहने लगे, “यह सब राजा के पाप का फल है।”

राजा ने रघुपति से मिलना चाहा। रघुपति के आने पर राजा ने कहा, बेकार में प्रजा को क्यों कष्ट दे रहे हो ? मैं नक्षत्रराय के लिये राज्य छोड़कर जा रहा हूं। अपनी मुगल सेना को विदा कर दो।”

रघुपति बोले, “जो आज्ञा। आपके विदा होते ही मैं मुगल सेना को विदा कर दूंगा; त्रिपुरा को लूटवाने की इच्छा मेरी भी नहीं है।”

उसी दिन राजा राज्य छोड़कर जाने की तैयारी करने लगे, अपनी राजपोशाक त्यागकर भगवे वस्त्र पहन लिये। नक्षत्रराय को राजा के कर्तव्य याद दिलाते हुये लम्बा सा आशीर्वाद से भरा वस्त्र लिखा।

अन्त में ध्रुव को गोद में उठाकर बोले, “मेरे साथ वन में चलोगे बेटा?

ध्रुव उसी पल राजा के गले में बांहें डालकर बोला, “जाऊंगा।”

अचानक राजा को ध्यान आया, ध्रुव को साथ ले जाने के लिये उसके चाचा केदारेश्वर की सम्मति जरूरी है। केदारेश्वर को बुलाकर राजा ने कहा, “तुम्हारी सम्मति हो तो ध्रुव को मैं, अपने साथ ले जाऊं।”

ध्रुव दिन रात राजा के साथ रहता था, अपने चाचा से उसका विशेष कोई संबंध नहीं था। शायद इसलिये राजा ने कभी सोचा भी नहीं कि ध्रुव को साथ ले जाने में केदारेश्वर को कोई आपत्ति होगी।

राजा की बात सुनकर केदारेश्वर बोला, यह नहीं हो सकता महाराज।

सुनकर राजा चौंक गये। अचानक उनके सिर पर जैसे वज्राघात हुआ। कुछ देर चुप रहने के बाद बोले,

“केदारेश्वर, तुम भी हमारे साथ चलो।”

केदारेश्वर-नहीं महाराज मैं वन में नहीं जा सकता।

राजा व्याकुल होकर बोले, “मैं वन में नहीं जाऊंगा, धन सम्पत्ति के साथ किसी गांव में रहूंगा।”

केदारेश्वर बोले, “मैं देश नहीं छोड़ सकता महाराज।”

राजा ने कुछ नहीं कहा, बस एक लम्बी सी श्वास ली। उनकी सारी आशा धुंधली हो गयी। एक ही पल में सारी धरती का चेहरा जैसे बदल गया। ध्रुव अपनी मस्ती में खेल रहा था-काफी देर तक उसकी ओर देखते रहे, मगर वह जैसे उन्हें दिख नहीं रहा है। ध्रुव उनकी धोती पकड़कर खींचते हुये बोला “चलो खेलें।”

राजा का हृदय पिघलकर आंसू बनकर आंखों में आ गया, बड़ी कठिनाई से आंसू रोके। मुंह फेरकर टूटे हृदय से बोले, “तो ध्रुव रही रहा, मैं अकेले ही जाता हूं।” अन्तिम जीवन का लम्बा रेतीला पथ एक पल के लिये बिजली की तरह उनकी आंखों के आगे खेल गया।

केदारेश्वर ध्रुव का खेल बीच में रोककर बोले, “चल मेरे साथ चल।” कहकर ध्रुव का हाथ खींचने लगे।

ध्रुव रोती आवाज में बोला, “नहीं।”

राजा ने चौंककर ध्रुव की ओर देखा। ध्रुव दौड़कर राजा के पास आया और उनके दोनों पैरों में अपना मुंह छिपा लिया। राजा ने ध्रुव को गोद में उठाकर अपनी छाती से लगा लिया। विशाल हृदय विदीर्ण होना चाहता था, छोटे से ध्रुव को हृदय से लगाकर उसे आश्वस्त किया। उसी तरह ध्रुव को गोद में उठाकर वे बड़े से कमरे में चहलकदमी करने लगे। ध्रुव कंधे पर सिर रखकर स्थिर पड़ा रहा।

अन्ततः यात्रा का समय हो गया। ध्रुव राजा की गोद में सो गया था। सोये हुये ध्रुव को धीरे-धीरे केदारेश्वर को सौंपकर राजा रवाना हो गये।


पूर्व दिशा के दरवाजे से सेना को साथ लेकर नक्षत्रराय ने राजधानी में प्रवेश किया, थोड़ा-सा धन और दो-चार प्रहरी लेकर पश्चिम दिशा के दरवाजे से गोविन्दमणिक्य बाहर चले गये। नगरवासियों ने ढोल-बाजे के साथ शंख बजाकर नक्षत्रराय का स्वागत किया। गोविन्दमणिक्य जिस पथ पर घोड़े पर बैठकर जा रहे थे। वहां किसी ने उनका समादर करना आवश्यक नहीं समझा। दोनों ओर झोपड़ी में रहने वाली औरतें उन्हें सुना-सुना कर गाली देने लगी; भूख और भूखे बच्चों के रोने से उनकी जीभ जल चुकी थी। अकाल के समय जिस बुढ़िया के राजदरबार में भोजन मिला था और स्वयं राजा ने जिसे सांत्वना दी थी। वह अपना दुर्बल हाथ उठाकर राजा को अभिशाप देने लगी। अपनी मांओं से शिक्षा लेकर बच्चे व्यंग करते हुये, चीखते हुये राजा के पीछे पीछे चलने लगे।

दायें-बांये न देखकर राजा सामने देखते हुये धीरे-धीरे चलने लगे। एक किसान खेत से लौट रहा था, राजा को देखकर उसने झुककर प्रणाम किया। राजा का हृदय भीग गया। उन्होंने स्नेह पूर्वक उससे विदा मांगी। इतनी सारी प्रजा में सिर्फ एक किसान ने उनके शासन की समाप्ति पर भक्ति भाव और उदास होकर उन्हें विदा दी। राजा के पीछे जो बच्चे शोर मचाते चल रहे थे, उन्हें गुस्से से डांटकर भगाया। राजा ने उसे ऐसा करने से रोका।

अन्त में जहां केदारेश्वर का घर था राजा वहां पहुंचे। तब उन्होंने एकबार दक्षिण की ओर देखा। ठंडी सुबह थी। ओस के बीच से सूर्य अभी दिखा ही है। कुटीर की ओर देख कर राजा को पिछले साल के आषाढ़ महीने की एक सुबह याद आ गयी। तब घने बादल थे और तेज बारिश हो रही थी। द्वितीया के क्षीण चांद की रेखा की तरह बच्ची हंसी बिस्तर पर लेटी थी। छोटा ताता बिना कुछ समझे कभी तो दीदी का आंचल मुंह में डालकर दीदी की ओर देख रहा था। कभी अपने गोल-मोल, छोटे-छोटे, मोटे-मोटे हाथों से दीदी के गाल को थपथपा रहा था। अगहन महीने की आज की ओस से भीगी सुबह आषाढ़ की बादलों से ढकी उस सुबह में ढकी हुयी है। राजा को अचानक लग जो भाग्य आज उन्हें राज्य त्याग कर, अपमानित करके घर से बेघर कर रहा है, वही भाग्य इस छोटी सी कुटिया के द्वारा पर उस आषाढ़ की सुबह क्या उसी का इंतजार कर रहा था? यही पर उसके साथ पहली मुलाकात हुयी थी। अनमने से राजा कुछ देर तक इस कुटिया के सामने खड़े रहे। उनके प्रहारियों के अलावा बाहर कोई नहीं था। किसान से डांट सुनकर बच्चे चले गये थे। मगर किसान के जाते ही वह दोबारा आ गये। उनका शोर सुनकर राजा जैसे नींद से जागे, वे धीरे-धीरे चलने लगे।

अचानक बच्चों के शोर में एक मीठी सी परिचित आवाज उनके कानों तक पहुंची। उन्होंने देखा छोटा सा ध्रुव अपने छोटे-छोटे पैरों से चलता हुआ दोनों हाथ उठाये हंसते हुये उनके पास आ रहा है। केदारेश्वर नये राजा का स्वागत करने गये हैं, कुटिया में सिर्फ ध्रुव और एक बूढ़ी नौकरानी थी। गोविन्दमणिक्य ने घोड़ा रोका और नीचे उतर आये। ध्रुव खिलखिलाता हुआ दौड़कर उनके पास आ गया। राजा की धोती खींचकर, उनके घुटनों में सिर रखकर जब ध्रुव की खुशी थोड़ी ठहरी तब वह गंभीर होकर बोला, “मैं टक्टक् (घोड़ा) पर बैठूंगा।”

राजा ने उसे घोड़े पर बिठा दिया। घोड़े पर बैठकर उसने राजा के गले में अपनी बांहें डाल दी। और अपने कोमल गाल को राजा के गाल पर टिका दिया। ध्रुव की क्षुद्र बुद्धि को राजा में परिवर्तन महसूस हुआ। गहन निद्रा से जगाने के लिये लोग जैसे भिन्न-भिन्न कोशिश करते है, ध्रुव भी वैसे ही उन्हें खींचकर, उनसे लिपटकर, उन्हें चूमकर किसी भी तरह उन्हें पहले वाले भाव में लाने की कोशिश करने लगा। अन्त में असफल होने पर मुंह में दो अंगुली लेकर बैठा रहा। राजा ध्रुव का भाव समझकर उसे बार-बार चूमने लगे।

अन्त में बोले “ध्रुव, तो मैं चलूं।”

ध्रुव राजा की ओर देखकर बोला, “मैं भी जाऊंगा।”

राजा बोले, “तुम कहां जाओगे। तुम अपने चाचा के पास रहो।

ध्रुव बोला, “नहीं। मैं भी जाऊंगा।”

उसी समय कुटिया से बूढ़ी नौकरानी बड़बड़ाती हुयी बाहर आयी और तेजी से ध्रुव का हाथ पकड़कर खींचती हुयी बोली, “चल।”

ध्रुव ने डरते हुये अपने दोनों हाथों से राजा को पकड़ लिया और उनकी छाती पर अपना मुंह छिपा लिया। राजा व्याकुल होकर सोचने लगे की नसें खींचकर फेंकी जा सकती है मगर इन दो हाथों का बंधन क्या अलग किया जा सकता है? मगर उसे भी अलग करना ही पड़ा। धीरे-धीरे ध्रुव के हाथों की पकड़ ढीली करते हुये बलपूर्वक उसे नौकरानी के हाथों सौंप दिया।

ध्रुव चीत्कार कर उठा; हाथ उठाकर बोला, “पिताजी, मैं भी चलूंगा। पीछे मुड़कर देखे बिना राजा तेजी से घोड़े पर सवार होकर चले गये। जितना दूर जाते ध्रुव का क्रन्दन सुनाई देता, ध्रुव जैसे बार-बार हाथ उठाकर कह रहा हो-“पिताजी, मैं भी चलूंगा। अन्ततः राजा की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें अब रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। छूयें से सूर्यलोक और जगत जैसे ढक गया हो। घोड़ा अपनी मर्जी से भागने लगा।

राह में एक जगह कुछ सैनिक राजा को देखकर हंसने लगे, और तो और उनके अनुचरों के साथ कठोर विद्रूप करने लगे। राजा का एक सभासद घोड़े पर जा रहा था, यह दृश्य देखकर वह राजा के पास आ गया। बोला, ”महाराज यह अपमान अब सहन नहीं होता। महाराज का दी वेश देखकर ही इनकी इतनी हिम्मत हुई है। यह लीजिये ढाल और तलवार। महाराज, आप थोड़ा इंतजार कीजिये। मैं अपने लोगों को लेकर आता हूं और इन्हें मजा चखाता हूं।“ राजा बोले, ”नहीं नक्षत्रराय, मुझे बाल और तलवार की जरूरत नहीं है। यह मेरा क्या बिगाड़ेंगे? इस समय मैं इससे भी ज्यादा अपमान सह सकता हूं। नंगी तलवार उठाकर मैं इस पृथ्वी के लोगों से सम्मान पाना नहीं चाहता। पृथ्वी के आम लोग जैसे अच्छे और बुरे समय में मान-अपमान, सुख दुःख सहन करते हैं, मैं भी भगवान की और देखकर वह सब सहन करूंगा। मित्र कभी दुश्मन बन रहे हैं, अतिथि भी कृतघ्न हो रहे हैं किसी समय शायद यह सब असहनीय होता, मगर अब यह सब सहकर मेरा हृदय आनंदित हो रहा है। मेरे मित्र कौन है यह मैं जान गया हूं। जाओ नक्षत्रराय, तुम लाट जाओ। नक्षत्र को आदरपूर्वक ले आओ। जैसे मेरा सम्मान करते थे वैसे ही नक्षत्र का सम्मान करो। तुम सब मिलकर हमेशा नक्षत्र की सही राह पर और प्रजा के कल्याण हेतु रक्षा करना। आज विदाई की घड़ी में तुमसे यही प्रार्थना है। देखे, गलती से भी कभी मेरा उल्लेख करके या मेरे साथ तुलना करके उसकी निंदा मत करना। तो अब मैं चलता हूं।“ कहकर अपने सभासद से गले मिलकर राजा अग्रसर हुये, सभासद उन्हें प्रणाम करके आंसू पोंछकर चला गया।

राजा जब गोमती के ऊंचे तट पर पहुंचे तब बिल्लन पुरोहित जंगल से बाहर निकले और उनके सामने आकर दोनों हाथ उठाकर बोले, ”जय हो।“

घोड़े से नीचे उतरकर राजा ने उन्हें प्रणाम किया।

बिल्लन बोले, ”पुरोहित जी, आप नक्षत्र के पास रहकर उसे सी राय दें। राज्य का हित करें।

बिल्लन बोले, “नहीं, जहां आप राजा नहीं हैं, मैं वहां बेकार हूं। यहां रहकर मैं और कोई काम नहीं कर सकता।”

राजा बोले, “पुरोहित जी, आप नक्षत्र के पास रहकर उसे सही राय दें। राज्य का हित करें।

बिल्लन बोले, ”इन्हीं जहां आप राजा नहीं हैं, मैं वहां बेकार हूं। यहां रहकर मैं और कोई काम नहीं कर सकता।“

राजा बोले, ”तो आप कहां जायेंगे? मुझ पर दया करें, आप अगर साथ रहेंगे तो मेरे दुर्बल हृदय को बल मिलेगा।“

बिल्लन बोले, ”मेरा काम कहां है मैं यही ढूंढ़ने चला हूं। मैं पास रहूं या दूर, आपके प्रति मेरा प्रेम कभी विच्छन्न नहीं होगा। मगर आपके साथ वन जाकर क्या करूंगा?“

राजा मृदुस्वर से बोले, ”तो मैं चलता हूं।“कहकर दूसरी बार प्रणाम किया। बिल्लन एक ओर चले गये, राजा दूसरी ओर।


नक्षत्रराय छत्रमाणिक्य नामधारण करके समारोह पूर्वक सिंहासन पर बैठे। राजकोष में ज्यादा धन नहीं था। प्रजा का सबकुछ हर कर मुगल सेना को देकर उन्हें विदा करना पड़ा। महा अकाल और दरिद्रता के साथ छत्रमाणिक्य शासन करने लगे। चारों ओर से अभिशाप और क्रन्दम बरसने लगा।

जिस आसन पर गोविन्दमाणिक्य बैठते थे, जिस बिस्तर पर गोविन्दमाणिक्य सोते थे, जो गोविन्दमाणिक्य के प्रिय सहचर थे, वह जैसे दिन-रात चुपचाप छत्रमाणिक्य को कोसने लगे। छत्रमाणिक्य को यह सब असहनीय लगने लगा। वे अपने सामने से गोविन्माणिक्य की सारी निशानियां मिटाने लगे।

गोविधामाणिक्य की व्यवहार की हुई चीजें नष्ट कर दी और उनके प्रिय अनुचरों को दूर भाग दिया अब तो गोविन्दमाणिक्य का नाम सुनना भी उनसे सहन नहीं होता था। गोविन्दमाणिक्य का किसी भी प्रकार का उल्लेख होते ही उन्हें लगता जैसे उन्हें सुनाने के लिये वह उल्लेख किया जा रहा है। हमेशा महसूस होता, सब उन्हें राजा की तरह सम्मान नहीं कर रहे‒इसलिए अचानक अकारण गुस्सा करने लगते, सभासदों को परेशान रहना पड़ता।

उन्हें राजकाज का कुछ पता नहीं था, मगर कोई सलाह देता तो नाराज होकर कहते, ”मैं क्या यह नहीं समझता। मैं क्या बेवकूफ हूं?

उन्हें लगता, उनका यूं सिंहासन पर बैठना देखकर सब उन्हें मन ही मन कोस रहे हैं, इसलिए बलपूर्वक राजा बनने लगे। मनमानी करके चारों ओर अपना एकाधिकार प्रचार करने लगे। वे चाहें तो किसी को रखें या मारे, यह प्रमाण करने के लिए जिन्हें रखना उचित नहीं था उन्हें रखा और जिन्हें मारना उचित नहीं था उन्हें मार दिया। प्रजा भूखी मर रही है, मगर उनको यहां दिनरात रास चल रहा है‒रोज नाच-गाना और भोज। इससे पहले किसी भी राजा सिंहासन पर बैठने के पश्चात इस तरह नृत्य में नहीं डूबा।

चारों ओर प्रजा में असंतोष फैलने लगा यह देख छत्रमाणिक्य और जल उठे; उन्होंने सोचा, यह तो राजा के प्रति असम्मान है। उन्होंने असंतोष को दोगुना करते हुए बलपूर्वक, पीड़ा-पूर्वक डरा कर सबका मुंह बंद करवा दिया‒ सारा राज्य निद्रा में डूबी रात की तरह नीरस हो गया। वह शांत नक्षत्रराय छत्रमाणिक्य बनकर सहसा ऐसा आचरण करेंगे, इसमें चकित होने वाली कोई बात नहीं है। दुर्बल हृदय वाले व्यक्ति मालिक बनते ही बहुत बार ऐसे ही प्रचण्ड और मनमौजी हो जाते हैं।

रघुपति का काम समाप्त हो गया। अंत तक प्रतिशोध की प्रवृत्ति उनके हृदय में जाग रही थी, ऐसा नहीं था। धीरे-धीरे प्रतिशोध का भाव समाप्त होकर जिस काम को शुरू किया है, उसे पूरा करना ही उनका एकमात्र व्रत हो गया था। विभिन्न तरह से सारे संकट अतिक्रम करके दिनरात एक उद्देश्य को पूरा करने में नियुक्त रहकर उन्हें एक अजीब से सुख का अनुभव हो रहा था। अन्ततः वह उद्देश्य भी पूरा हो गया। धरती पर अब कहीं कोई सुख नहीं था।

रघुपति ने मंदिर में जाकर देखा वहां कोई नहीं था। जबकि रघुपति अच्छी तरह जानते कि जयसिंह नहीं है फिर भी मंदिर में प्रवेश करके जैसे दोबारा नये तरीके से पता चला कि जयसिंह नहीं है। कभी कभी भ्रम होता कि है, फिर याद आता कि नहीं है। अचानक तेज हवा से दरवाजा खुल गया; उन्होंने चौंककर मुड़कर देखा, जयिंसह नहीं आया। जयसिंह जिस कमरे में रहता था, लगा शायद वहां हो‒मगर काफी देर तक उस कमरे में प्रवेश नहीं कर पाये; मन ही मन डरने लगे कहीं जाकर देखें कि जयसिंह वहां नहीं है।

अन्त में जब शाम का हल्का अंधेरा वन की छाया में गाढ़ा हुआ तब रघुपति ने धीरे धीरे जयसिंह के कमरे में प्रवेश किया‒सूना निर्जन कमरा समाधि भवन की तरह स्तब्ध था। कमरे में एक ओर लकड़ी का एक संदूक और संदूक के पास ही जयसिंह के धूल में भरे खड़ाऊं पड़े थे। दीवार पर जयसिंह के हाथों बनी काली की मूर्ति। कमरे के पूर्वी कोने में धातु का एक दीया धातु के आधार पर खड़ा है। पिछले साल से किसी ने यह दीया नहीं जलाया ‒मकड़ी के जाले से वह ढका हुआ है। पास की दीवार पर दीपशिखा का काला निशान हो गया था। कमरे में थोड़े से सामान के सिवा कुछ नहीं था। रघुपति ने गहरी लंबी श्वांस छोड़ी। सूने निर्जन कमरे में उस सांस की प्रतिध्वनि गूंज उठी। अंधेरे के कारण अब कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। एक छिपकली रह-रह कर टिकटिक आवाज करने लगी। खुले दरवाजे से कमरे में ठंडी हवा प्रवेश करने लगीं संदूक पर बैठकर रघुपति कांपने लगे।

इस तरह एक महीना इस निर्जन मंदिर में काटा मगर इस तरह दिन नहीं कट रहे थे। पण्डिताई छोड़नी पड़ी। राजसभा में चले गये। शासन कार्य में हस्तक्षेप किया। उन्होंने देखा- अन्याय,उत्पीड़न और अराजकता छत्रमाणिक्य का नाम धारण करके राज कर रही है। उन्होंने राज्य में शांति स्थापित करने की कोशिश की। छत्रमाणिक्य को सलाह देने गये।

छत्रमाणिक्य गुस्से में बोले, “पुरोहित, शासनकार्य के विषय में तुम क्या जानते हो? इन मामलों को तुम नहीं समझते।”

रघुपति राजा का प्रताप देखकर अवाक् रह गये। उन्होंने देखा, यह वह नक्षत्रराय नहीं है। रघुपति के साथ राजा की रोज तू-तू, मैं-मैं होने लगी। छत्रमाणिक्य को लगने लगा कि रघुपति सोचते कि उन्होंने ही इनको राजा बनाया है। इसलिये रघुपति को देखते ही उन्हें असहनीय लगता।

अंत में एक दिन स्पष्ट रूप से बोले, “ पुरोहित, तुम अपना मंदिर का काम देखो। राजसभा में तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है।” रघुपति ने जलती हुयी निगाहों से छत्रमाणिक्य को देखा। छत्रमाणिक्य चौंककर मुंह फेरकर चले गये।


नक्षत्रराय ने जिस दिन नगर में प्रवेश किया केदारेश्वर उसी दिन उनसे मिलने गये; मगर काफी कोशिश के बाद भी उनकी नजर में नहीं आये। सैनिक और प्रहरी उन्हें धक्का मारकर भगाकर हिला डुला कर परेशान करते। अन्त में वह जान बचाकर भाग जाते। गोविन्दमाणिक्य के शासनकाल में राज-सुख से तृप्त होकर महल में रहते थे‒युवराज नक्षत्रराय से उनकी विशेष मित्रता भी थी। कुछ समय महल से बाहर रहकर जीवन यापन करना कठिन हो गया है; जब से राजा की छाया में थे तब सब उनसे डरते और सम्मान करते, मगर अब उसे कोई नहीं पूछता। पहले किसी को राजरागा में कोई काम होता तो अकार उनके आगे हाथ-पैर जोड़ता, अब राह-चलते हुये दो बातें करने का समय नहीं है किसी के पास। इस पर भोजन भी नहीं मिल रहा। ऐसी हालत में दोबारा महल में प्रवेश कर पाने पर बड़ी सुविधा हो जायेगी। एक दिन अवसर पाकर कुछ भेंट लेकर राजदरबार में वे क्षत्रमाणिक्य से मिलने गये। विनीत हंसी हंसते हुये राजा के सम्मुख आकर खड़े हो गये।

राजा उसे देखकर गुस्से से आगबबूला हो गये। बोले, “यह हंसी किसलिये! तुम मुझसे मजाक करते हो! यह क्या रहस्य करने आये हो?

सभी राजदरबारी मंत्री हुंकार करने लगे। उसी समय केदारेश्वर की हंसी पर परदा गिर गया।

छत्रमाणिक्य बोले, ”तुम जो कहना चाहते हो जल्दी से कहकर चले जाओ।“

केदाररेश्वर जो कहना चाहते थे याद ही नहीं आया, बड़ी कोशिश के बाद मन ही मन क्या कहना था सोच रखा था। वह सब पेट में ही चूर-चूर हो गया।

अन्त में राजा ने जब कहा, ”अगर कहने को कुछ नहीं है तो जाओ।“ तब जल्दी से केदारेश्वर को जल्दी से कुछ कह देना आवश्यक लगा।

आंखों में, चेहरे पर और आवाज में करुणारस का संचार करके बोले, ”महाराज, क्या ध्रुव को भूल गये हैं?“

छत्रमाणिक्य गुस्से में लाल हो गये। मूर्ख केदारेश्वर बिना कुछ समझे बोले, ”वह तो महाराज के लिये चाचा-चाचा कहकर रो रहा है।“

छत्रमाणिक्य बोले, ”तुम्हारी हिम्मत तो कम नहीं है! तुम्हारे भाई का बेटा मुझे चाचा कहता है। तुमने उसे यह सिखाया है।

केदारेश्वर व्याकुल भाव से हाथ जोड़कर बोले, “महाराज‒”

छत्रमाणिक्य बोले, “अरे कोई है‒इसे और उस लड़के का राज्य से दूर कर दो।”

अचानक कंधे पर इतने सारे प्रहारियों ने हाथ रखा कि केदारेश्वर तीर की तरह गिर गये। उनके हाथ से पोअली छीन कर प्रहारियों ने आपस में बांट लिया। केदारेश्वर ध्रुव को लेकर त्रिपुरा से चले गये।


रघुपति फिर मंदिर में लौट आये। जाकर देख, कोई प्रेमपूर्ण हृदय वस्त्र लेकर उनका इंतजार नहीं कर रहा है। पत्थर का मंदिर खड़ा है, उसमें कहीं भी हृदय नहीं है। वे गोमती तट पर सफेद सीढ़ियों पर जाकर बैठ गये। सीढ़ियों के बायीं ओर जयसिंह कोई लगाये हुये शेफाल के पौधे पर असंख्य फूल खिले हैं। यह फूल देखकर जयसिंह का सुंदर चेहरा, सरल हृदय, सरल जीवन और अत्यन्त सहज विशुद्ध भाव उन्हें स्पष्ट रूप से याद आने लगा। सिंह जैसा सबल तेजस्वी और हिरण के बच्चे जैसा सुकुमार जयसिंह रघुपति के हृदय में आविर्भूत हुआ, उनके पूरे हृदय पर छा गया। इससे पहले वे खुद को जयसिंह से बहुत बड़ा मानते थे अब जयसिंह उन्हें खुद को बहुत बड़ा लगने लगा। अपने प्रति जयसिंह की सरल भक्ति याद करके उनके मन में जयसिंह के प्रति भक्ति का उदय हुआ। और अपने प्रति घृणा ने जन्म लिया। जिन सब कारणों से जयसिंह का तिरस्कार का अधिकार मेरा नहीं है; जयसिंह के साथ अगर एक पल के लिये मुलाकात हो जाये तो मैं अपनी हीनता स्वीकार करके उससे माफी मांग लूंगा।’ जयसिंह ने जब जो-जो किया था, कहा था वह सब उन्हें याद आने लगा। जयसिंह का पूरा जीवन संयत भाव से उनमें विराजने लगा। वे इस महान चरित्र में खुद को भुलाकर सारे विवाद-विद्वेष भूल गये। चारों ओर का विशाल संसार लघु बनकर अब उन्हें पीड़ित नहीं कर रहा! जिस नक्षत्र को उन्होंने राजा बनाया, उसने राजा बनकर उन्हीं का अपमान किया, यह याद करके उन्हें गुस्सा नहीं आया। यह मान-अपमान सामान्य सी बात है, सोचकर उन्हें हँसी आयी। उनकी सिर्फ एक ही इच्छा हुयी, जयसिंह जिससे संतुष्ट हो ऐसा कोई काम किया जाये। जबकि अपने चारों ओर कोई काम दिखाई नहीं दिया‒चारों ओर शून्य हा-हाकार कर रहा है। उस निर्जन मंदिर ने जैसे उन्हें जोर से पकड़ लिया हो, उनकी श्वास रुकने लगी; कोई एक बड़ा काम करके अपनी हृदय वेदना शांत रखेंगे, मगर इस नीरव-निस्तब्ध निरालय मंदिर की ओर देखकर पिंजरे में बंद पक्षी की तरह उनका हृदय

अधीर हो उठा। वे उठकर वन में अधीर होकर टहलने लगे। मंदिर की अचेतन अकर्मण्य जड़ प्रतिमाओं के प्रति उनके मन में घृणा का उदय हुआ। हृदय जब आवेग से उद्वेलित हो रहा है तब कुछ निरुद्यम स्थूल पाषाणमूर्ति के साथ दिन काटना उन्हें हेय लगने लगा। जब रात का दूसरा प्रहर हुआ तो रघुपति ने पत्थर रगड़कर एक दीपक जलाया। दीपक हाथ में लेकर चतुर्दश देवता के मंदिर में गये। देखा चतुर्दश देवता वैसे ही खड़े हैं, पिछले साल आषाढ़ की कालरात में क्षीण दीपक के प्रकाश में भक्त के मृतदेह के सामने रक्त प्रवाह के बीच जैसे बुद्धिहीन हृदयहीन की तरह खड़े थे, आज भी वैसे ही खड़े हैं। रघुपति चीखते हुए बोले, “झूठ, सब झूठ। ओह बेटा जयसिंह अपने अनमोल हृदय का खत किसे दिया तुमने। यहां कोई देवता नहीं है, कोई देवता नहीं! पिशाच रघुपति ने वह वक्त पान किया है।” कहकर आसन से काली की प्रतिमा खींच ली। मंदिर के द्वार पर खड़े होकर जोर से बाहर फेंक दीं अंधेरे में पत्थर की सीढ़ियों पर आवाज करती हुयी। वह गोमती के जल में जा गिरी। अज्ञान रूपी राक्षसी पाषाण की आकृति लेकर इतने दिनों से रक्त पान कर रही थी, वह आज गोमती के गर्भ के हजारों पाषाण में अदृश्य हो गयी, मगर मानव का कठिन हृदय-आसन त्याग नहीं कर पायी। दीपक बुझाकर रघुपति रास्ते पर निकल पड़े, उसी रात राजधानी छोड़कर चले गये।


कुछ दिनों से बिल्लन पुरोहित नोआखाल के निजामतपुर में रह रहे हैं। वहां भयंकर महामारी फैली थी।

फागुन के महीने के अंत में एक दिन बादल छाये हुए थे, रह-रहकर बारिश भी हो रही थी। अन्ततः शाम को तूफान आ गया। पहले पूर्व दिशा से हवा चल रही थी। रात के दूसरे पहर उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा से तेज हवायें चलने लगी। अन्ततः मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी, इससे हवा का वेग कम हो गया। ऐसे समय शोर सुनाई दिया “बाढ़ आ रही है।” कोई घर की छत पर चढ़ गया तो कोई तालाब के किनारे वाली दीवार पर, कोई वृक्ष की शाखा पर तो कोई मंदिर के गुम्बद पर। अंधेरी रात, लगातार बरसात हो रही थी - बाढ़ की गर्जन पास आने लगी, डर के कारण गांव के लोग दिशा भूल गये। बाढ़ आ गयी। ऊपर-ऊपर दो बार तरंगें आयी, दूसरी बार के बाद गांव में आठ हाथ पानी जमा हो गया। अगले दिन जब सूर्य निकला और पानी बह गया, तब दिखा - गांव में कुछ ही घर बचे थे और कोई नहीं था, दूसरे गांव से इंसान गाय, बकरी भैंस, कुत्तों के लाशें बहकर आ रही थी। सुपारी के पेड़ टूटकर बह गये थे, जड़ बची थी। बड़े-बड़े आम कटहल के पेड़ जड़ों समेत उखड़े पड़े थे। दूसरे गांव से घर की छत बहकर आकर दीवार के शोक में जमीन पर औंधे मुंह पड़ी थी। बहुत से बरतन बिखरे पड़े थे। ज्यादातर झोपड़ियां बांस, आम-कटहल इत्यादि बड़े पेड़ों से ढकी हुयी थी, इसलिये बहुत से लोग पूरी तरह से न बहकर इन पेड़ों में अटके पड़े थे। कोई तो सारी रात बाढ़ के वेग के कारण बांस के झाड़ में हिलता रहा तो कोई कांटों से क्षतविक्षत था, कोई पूरे पेड़ के साथ बह गया था। पानी उतरने के बाद जीवित व्यक्ति मृतकों के बीच अपने रिश्तेदारों को ढूंढने लगे। अधिकांश मृतदेह अपरिचित थी जो दूसरे गांव से बहकर आयी थी। किसी ने उनका दाह संस्कार नहीं किया। सिद्धों के समूह आकर उन मृतकों को खाने लगा। सियार-कुत्तों से उनका कोई विवाद नहीं था, क्योंकि सियार-कुत्ते सब मर गये थे। पठानों के गांव में बारह घर थे; वह ऊंची जमीन में थे इसलिये उनका कोई नुकसान नहीं हुआ था। बचे हुये जीवित व्यक्तियों में जिन्हें घर मिला उन्होंने घर में आश्रय लिया बाकी आश्रय ढूंढने कहीं और चले गये। जो विदेश में थे उन्होंने घर लौटकर दूसरा घर बनाया। धीरे-धीरे फिर से बसती शुरू हो गयी; इस समय मृतदेहों के कारण तालाब का पानी दूषित होने के कारण और दूसरे कारणों से गांव में महामारी फैल गयी। पठानों के गांव में सबसे पहले महामारी फैली। मृतदेहों का अंतिम संस्कार या एक दूसरे की मदद करने का अवसर किसी के पास नहीं था। हिन्दुओं ने कहा, मुसलमान गोहत्या के पाप का पुल भोग रहे हैं। जाति से निकाले जाने के डर से किसी हिन्दू ने उन्हें पानी नहीं दिया था किसी भी प्रकार की मदद नहीं की। बिल्लन जब गांव में आये तो वहां ऐसी हालत थी। बिल्लन ने कुछ चेले इकट्ठे किये थे मगर महामारी के डर से उन्होंने भागने की कोशिश की। बिल्लन ने डराकर उन्हें रोका। वे पीड़ित पठानों की सेवा करने लगे। उन्हें भोजन और दवा देने लगे और उनके मृत शरीर को दफनाने लगे। हिन्दू एक हिन्दू संन्यासी का अनाचार देखकर चकित रह गये। बिल्लन कहते,

“मैं संन्यासी हूं, मेरी कोई जाति नहीं है। मेरी जात इंसानियत है। इंसान ही जब मर रहा है तो कैसी जाति? भगवान के बनाये इंसान जब इंसान से प्रेम मांग रहे है तो कैसी जाति? बिल्लन की सेवा भाव देखकर उन्हें घृणा अथवा निंदा करने का साहस हिंदुओं में नहीं हुआ। बिल्लन का काम भला है या बुरा वह समझ नहीं पाये। उनका असम्पूर्ण शास्त्रज्ञान संदिग्ध भाव से बोल ‘बुरा है’ मगर उनके हृदय में जो मनुष्य रहता है वह बोला ‘भला है’ जो भी हो, बिल्लन दूसरों के भले-बुरे की ओर न देखकर अपना काम करने लगे। संकट में फंसे पठान उन्हें देवता मानने लगे। पठानों के छोटे-छोटे बच्चों को महामारी से दूर रखने के लिए वे उन्हें हिन्दुओं के पास ले गये। हिन्दू परेशान हो उठे, किसी ने उन्हें आश्रय नहीं दिया। तब एक बड़े से टूटे हुये मंदिर में बिल्लन ने आश्रय लिया। उन बच्चों को वहीं रखा। सुबह उठकर बिल्लन उन बच्चों के लिये भीख मांगने निकलते। मगर भीख कौन देगा? देश में अनाज कहां है? कितने लोग भूखे मरने की कगार पर खड़े थे। गांव के मुसलमान जमींदार बहुत दूर रहते थे। बिल्लन उनके पास पहुंचे। बड़ी कोशिशों से उन्हें मनाकर ढाका से चावल मंगवाने लगे। वो पीड़ितों की सेवा करते और उनके चेले चावल बांटते। बीच-बीच में बिल्लन बच्चों के साथ खेलते। बच्चे उन्हें देखकर शोर मचाने-शाम के समय मंदिर के पास से गुजरने पर लगता जैसे मंदिर में हजारों ताते रहते हैं। बिल्लन के पास एक तारे जैसा एक यंत्र था; जब बहुत थक जाते तो उसे बजाकर गीत गाते। बच्चे उन्हें घेर लेते, कोई गीत सुनता तो कोई उनके यंत्र का तार खींचता तो कोई उनकी तरह गाने की कोशिश करता।

अन्ततः महामारी मुसलमानों के मोहल्ले से हिन्दुओं के मोहल्ले में पहुंच गयी। गांव में अराजकता फैल गयी - चोरी-डकैती होने लगी, जिसे जो मिलता लूट लेता। मुसलमान समूहों में डकैती करने लगे। वह पीड़ितों को बिस्तर से खींचकर उनका पलंग और बिस्तर तक ले जाते। बिल्लन पूरी कोशिश से उन्हें रोकने लगे। बिल्लन की बात वह मानते थे, उनकी बात लांघने का साहस नहीं था उनमें। इस तरह बिल्लन गांव में शांति बनाने की कोशिश करते रहे।

एक सुबह बिल्लन के एक चेले ने आकर बताया कि एक छोटे से बालक के साथ एक विदेशी ने गांव के बड़ के पेड़ के नीचे आश्रय लिया है, उसे महामारी ने पकड़ा है, शायद वह नहीं बचेगा। बिल्लन ने देखा, केदारेश्वर बेहोश पड़े हैं और ध्रुव जमीन पर सोया पड़ा है। केदारेश्वर की हालत खराब थी - लम्बी यात्रा और अनाहार से वह दुर्बल हो गया था। इसलिये महामारी ने बलपूर्वक उसे जकड़ लिया था, किसी भी दवा का कोई फायदा नहीं हुआ। उस वृक्ष के नीचे ही उसकी मृत्यु हो गयी। ध्रुव को देखकर लग रहा था कि भूख के कारण रो-रोकर वह सो गया है। बिल्लन से सावधानी पूर्वक उसे गोद में उठाया और अपनी शिशुमाला में ले गये।


चट्टग्राम इस समय अराकान के अधीन है। गोविन्दमणिक्य निर्वासित होकर चट्टग्राम आये हैं, सुनकर अराकान के राजा ने समारोह के पूर्व उनके पास दूत भेजा। कहलवाया कि, अगर फिर से सिंहासन पाना चाहते हैं तो अराकानपति उनकी मदद कर सकते हैं।

गोविन्दमणिक्य बोले, “नहीं, मुझे सिंहासन नहीं चाहिये? दूत ने कहा, “तो अराकान - राजसभा के पूजनीय अतिथि बनकर कुछ समय रहें।”

राजा बोले, “मैं राजसभा में नहीं रहूंगा। चट्टग्राम के एक ओर कुछ जगह अगर मुझे मिल जाये तो मैं अराकान राज का ऋणी रहूंगा।”

दूत ने कहा, “महाराज, जहां चाहे रह सकते हैं, इसे अपना राज्य ही समझे।”

अराकान राज्य के कुछ अनुचर राजा के साथ ही रहे। गोविन्माणिक्य ने भी उन्हें नहीं रोका; उन्होंने सोचा शायद अराकानपति को उन पर संदेह हो, इसलिये अपने आदमी उनके साथ रखना चाहते हैं।

मयानी नदी के तट पर राजा ने अपनी कुटिया बनाई। स्वच्छ-सलिला क्षुद्र नहीं छोटे - बड़े पत्थरों पर तेजी से बही जा रही है। दोनों ओर कृष्ण वर्ण पहाड़ खड़े है। काले पत्थरों पर विचित्र रंगों के शैवाल लटक रहे है। बीच बची में छोटे-छोटे गड्ढे हैं, उनमें पक्षियों ने घोंसले बनाये हैं। कहीं-कहीं पर दोनों ओर पहाड़ इतने ऊंचे है कि बहुत देर बाद सूर्य की दो-एक किरण नदी के जल में आकर गिरती। बड़े-बड़े पेड़ विविध आकार के पत्ते फैलाकर पहाड़ पर लटक रहे है। कहीं-कहीं पर नदी तट का घना जंगल बहुत दूर तक फैला हुआ है। एक लम्बा शाखाहीन श्वेत पेड़ पहाड़ पर पड़ा है। नीचे नदी के चंचल जल में उसकी छाया नाच रही है बड़ी-बड़ी बेलों ने उसे ढक रखा है। घने हरे वन के बीच में कहीं-कहीं स्निग्ध श्यामल कदलीवन है। कहीं-कहीं पर दोनों तट विदीर्ण करके छोटे-छोटे झरने बच्चों की तरह व्याकुल बाहु, चंचल आवेग और कल-कल हास्यध्वनि के साथ नदी में गिर रहे हैं। कुछ दूर तक समतल रहकर नदी पत्थरों में बहकर नीचे गिर रही है। वह अविराम झर्र झर्र की आवाज पत्थरों पर प्रतिध्वनित हो रही है।

इस शीतल प्रवाह के स्निग्ध झरझर शब्द के स्तब्ध पत्थर के नीचे

गोविन्दमणिक्य रहने लगे। अपना हृदय विस्तारित करके उसमें शांति संचय करने लगे - निर्जन प्रकृति का सांत्वना भरा प्रेम विभिन्न दिशाओं से सहस्त्र झरनों की तरह उनके हृदय में गिरने लगा। वे अपनी हृदय की गुफा में घुसकर वहां से क्षुद्र अभिमान मिटाने लगे - द्वार उन्मुक्त करके अपने भीतर विमल प्रकाश और वायु प्रवाह ग्रहण करने लगे। किसने उन्हें दुःख दिया, दर्द दिया, किसने उन्हें स्नेह का बदल नहीं दिया, किसने उनसे एक हाथ से उपकार लेकर दूसरे हाथ से कृतघ्नता दी, किसने उनसे आदर पाकर उनका अपमान किया, यह सब वे भूल गये। शिला पर रहने वाली इस प्रकृति की अविश्राम कार्यशीलता देखकर और उसकी निश्चिन्त प्रशान्त नवीनता देखकर वे भी जैसे वैसे ही पुरातन, वैसे ही विशाल, वैसे ही प्रशांत हो उठे। उन्होंने जैसे पूरे जगत में अपनी कामनाहीन स्नेह विस्तारित कर दिया - सारी वासना दूर करके हाथ जोड़कर बोले, “हे ईश्वर, पतन के शिखर से अपनी गोद में लेकर मेरी रक्षा की है। मैं मरने चला था, बच गया हूं। जब राजा बना था तब अपना महत्व नहीं जानता था, आज पूरी पृथ्वी में अपना महत्व अनुभव कर रहा हूं।” अन्त में आंखों से आंसू बहने लगे; बोले, “महाराज, तुमने मेरे स्नेह, ध्रुव को छीन लिया है, वह पीड़ा अभी तक हृदय से नहीं गयी। आज मैं समझ रहा हूं, तुमने अच्छा ही किया। उस बच्चे पर अपने स्वार्थी स्नेह के कारण अपना कर्तव्य, अपना जीवन विसर्जित करने चला था। तुमने मुझे संकट से उबार लिया। मैंने ध्रुव को अपने सारे पुण्यों के पुरस्कार स्वरूप ग्रहण किया था - तुमने उसे छीनकर शिक्षा दी कि पुण्य का पुरस्कार पुण्य और तुम्हारा प्रसाद अनुभव कर रहा हूं। मैं वेतन भोगी नौकर की तरह काम नहीं करूंगा प्रभु, मैं तुम्हारे प्रेम के वश में होकर तुम्हारी सेवा करूंगा।”

गोविन्दमणिक्य ने देखा, निर्जन में ध्यान परायणा प्रकृति जो स्नेह की धारा संचय कर रही है, लोकालय में वह नदी रूप में प्रेषित हो रही है - जो उसे ग्रहण कर रहा है उसकी प्यास मिट रही है, जो ग्रहण नहीं कर रहा उसके प्रति प्रकृति का कोई अभिमान भी नहीं है! गोविन्मणिक्य बोले, ‘मैं भी अपना प्रेम लोगों में बांटने निकलूंगा।’ कहकर अपनी कुटिया छोड़कर वे बाहर निकले।

अचानक राजपाट छोड़कर बैरागी होना, लिखने में जितना सहज महसूस होता है वास्तव में इतना सहज नहीं है। राजवेश त्यागकर भगवे कपड़े पहन लेना कोई मामूली बात नहीं है। राज्य का त्याग तो सहज है, मगर जन्म से ही जो आदतें हमें पड़ जाती है उन्हें हम सहज ही नहीं छोड़ पाते। वह आदतें अपनी तीव्र भूख के साथ हमारी नस-नस में समायी है; उन्हें नियमित खुराक न देने पर वह हमारा रक्त चूसती रहती है। कोई यह न सोचे कि

गोविन्दमणिक्य जब तक अपनी निर्जन कुटिया में रह रहे थे तब तक वे अविचलित थे। वे हर पल अपनी छोटी आदतों से लड़ रहे थे। जब भी किसी चीज की कमी से उनका हृदय व्याकुल होता तभी वे उसका तिरस्कार करते। अपने मन के सहस्त्र मुंह वाली भूख को भोजन न देकर उसका विनाश कर रहे थे। कदम-कदम पर इन हजारों कमियों पर विजयी होकर सुख का अनुभव कर रहे थे। जैसे व्याकुल थोड़े को शांत करने के लिये उसे भगाना पड़ता है वैसे ही वे अपने व्याकुल हृदय को व्याकुलता की मरुभूमि पर लगातार दौड़ाकर शांत कर रहे थे। बहुत दिनों तक उन्होंने एक पल भी आराम नहीं किया।

पर्वत छोड़कर गोविन्दमणिक्य दक्षिण दिशा में समुद्र की ओर चलने लगे। समस्त वासनाओं को त्यागने के बाद उन्हें अपने हृदय में एक अजीब सी स्वतंत्रता का अनुभव हुआ उन्हें अब कोई बांधा नहीं पाया, अग्रसर होते समय कोई उन्हें बाधा नहीं दे पाया । प्रकृति उन्हें विशाल रूप में दिखाई दी और खुद को प्रकृति के साथ एक पाया। वृक्षों का नया हरा रूप, सूर्य की एक नयी किरण, प्रकृति का एक नया चेहरा उन्हें दिखाई देने लगा। इंसानों के हंसी-मजाक, उठना-बैठना और चलने फिरने में उन्हें अपूर्व नृत्य-गीत की माधुरी दिखाई दी।

जिसे भी देखा उसे ही पास बुलाकर बात करके सुख मिला - जिसने उनकी उपेक्षा की, उनका हृदय उससे भी दूर नहीं हुआ। हर जगह दुर्बल की मदद और दुःखी को सांत्वना देने का मन करने लगा। उन्हें लगने लगा, ‘अपना सारा बल और सारा सुख मैंने दूसरों को उत्सर्ग किया, क्योंकि मुझे कोई काम नहीं, मेरी कोई वासना नहीं।’ जो दृश्य कभी किसी को नजर नहीं आते थे वह नये आकार लेकर उन्हें दिखने लगे। जब दो बच्चों को पथ पर खेलते हुये देखते - दो भाईयों को पिता पुत्र को, मां और बच्चे को देखते - वह

धूल में सने हों, दरिद्र हो, कुरूप हो, उन्हें उनमें दूर दूर तक फैला हुआ मानव हृदय रूपी समुद्र में गहन प्रेम दिखाई देता। बच्चे को गोद में उठाये हुयी मां में उन्हें जैसे अतीत और भविष्य के सारे मानव शिशुओं की जननी दिखाई देती। दो मित्रों को साथ देखकर उन्हें समस्त मानवजाति मित्र प्रेम में डूबी दिखाई देती, पहले जो धरती कभी कभी मातृहीन लगती थ